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मीडिया मीमांसा : एक ऑपरेशन

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मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है, इस बात को मीडिया दम भर के कहता है और इस सत्य को नकारा भी नहीं जा सकता| देश की स्वतंत्रता के आन्दोलन में मीडिया ने अप्रतिम योगदान दिया है| 1826 में कलकत्ता से प्रकाशित हुए “उद्दंड मार्तंड” ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध जो बिगुल बजाया उसने देश में एक नयी क्रांति को जन्म दिया था| क्रांति की इस प्रज्वलित मशाल को भारतेंदु हरिश्चंद्र की “कविवचन सुधा”, ने पुनः प्रचंड किया और पं. मदनमोहन मालवीय, बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, गुलाब चन्द, अमृतलाल चक्रवर्ती, बाबूराव विष्णु पराड़कर, पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे राष्ट्रभक्तों की लेखनी ने इसे अंग्रेजी शासन के अत्याचारों के झंझावातों के सामने जीवित रखकर राष्ट्रीय चेतना को क्रांति का स्वरुप दिया| स्वतंत्रता के बाद भी पत्रकारों ने निष्पक्ष रूप से देश की अमूल्य सेवा की| किन्तु व्यवसायिकता के बढ़ते चलन ने विगत कुछ बर्षों में पत्रकारिता की निष्पक्षता को लकवा सा मार दिया है, और अब वह पहले सा देशप्रेम, निष्पक्षता, और सच्चाई मीडिया में नजर नहीं आती| यही कारण है कि अब मीडिया भी भ्रष्टाचार का उतना ही बड़ा अड्डा बन गया है जितना कि अनन्य कोई क्षेत्र| मीडिया पर न तो लोगों का पहले जैसा विश्वास ही रहा है और न ही भरोसा.!
चाहे सलमान की गाली हो या शाहरुख़ को लगी ठण्ड, अथवा विपाशा की नयी तस्वीर हो या ऐश्वर्या की प्रेगनेंसी.., सब कुछ नेशनल खबर बनता है| कौन नहीं जानता राहुल की ग्राम यात्राएं चुनावी फायदे के के लिए की जाने बाली रंगमंचीय लीलाएं मात्र हैं किन्तु फिर भी हमारे अखबारों की वह पहली मुख्य खबर बनती है, लेकिन नक्सलियों की गोलियों से शहीद होने वाले जवानो के बलिदान को अन्दर के पन्नो के कोनों में ऐड के बाद बमुश्किल जगह मिलती है……… कई बार तो सीमा पर हुई गोलीबारी की खबर को भी विज्ञापन और चटखारेदार न्यूज के चलते आप कहीं अन्दर के किसी पन्ने में पड़ा पते होंगे… कई समाचारों को आवश्यकता से कहीं अधिक तूल दी जाती है तो कुछ ख़बरें गुमनामी के अंधेरों में खो जाती हैं| सेकुलरिज्म के नाम पर समुदाय विशेष की मौका पाते ही आलोचना और संदर्भित खबरों की मनमानी व्याख्या फैशन हो चली है| यह सब अब आम हो चुका है किन्तु प्रश्न उठता है कि आज पत्रकारिता का उद्देश्य आखिर कितना बदल चुका है.?
लोकतंत्र इस स्तम्भ पर कैसे टिक पायेगा.?

पद्मनाभ मंदिर संपत्ति के प्रकाश में आने के बाद मीडिया अपनी बेतुकी व्याख्याओं से पुनः अपने दुराग्रह को स्पष्ट करता नजर आया, इस सन्दर्भ में मीडिया की लाफ्बाजिओं की एक बानगी देखिये…….

एक इतिहासकार के अनुसार ये धन ‘कर, तोहफ़ो,रिश्वत और जीते गए राज्यों से लूटे गए पैसों’ का हिस्सा है. 1931 में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार उस समय चीज़ो की सूची बनाने के लिए कम से कम एक तहख़ाने को खोला गया था.
खोलने की पूरी प्रक्रिया भी काफ़ी नाटकीय थी. ज़ंक खाए तालों को तोड़ने में ढाई घंटे लगे थे.

यह शब्द हैं बीबीसी के.! 1931 में छपी रिपोर्ट का हवाला देकर यह बताने कि ताला खोला गया था और उसमे ढाई घंटे लगे थे, के बींच में किस शातिराना तरीके से एक हवाई इतिहासकार के वचन विना कोई आधार बताये जोड़ दिए गए| 1931 में क्या छपा इसका किसी इतिहासकार(?) की सोंच से क्या सम्बन्ध..? ये इतिहासकार महोदय कौन हैं और इनके निष्कर्ष का कोई सुदृढ़ आधार भी है? किन्तु यह एक मनोवैज्ञानिक तरीके से भ्रमित करने वाली मीडिया शैली है जो षड़यंत्र के तहत हिन्दुओं के लिए ही प्रयुक्त होती है| क्या आप इन शब्दजालों को को समझ पाते हैं.?
यहाँ कोई कमेन्ट करने, विचार देने से पहले आप विषय के नंगे ऑपरेशन को देखने और समझने के लिए आप यहाँ क्लिक करें और अपनी अमूल्य राय दें| ” हिन्दू निशाने पर: एक नंगा सच

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15 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

gopesh के द्वारा
July 19, 2011

बात सिर्फ मिडिया की ही नहीं है वासुदेव जी, यहाँ तो कोई भी स्तम्भ अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर पा रहा है! असल में ये तथाकथित प्रयोगवादी शैली और आधुनिक व्यवसिकता के धुंध में सभी है चाहे वो सरकार हो चाहे संसद हो चाहे राष्ट्रपति हों चाहे मिडिया , यहाँ तक की जहाँ से आज का युवा वर्ग ज्ञान ले रहा है वो ज्ञान के मंदिर भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं! आज अभिभावकों के पास अपने बच्चों को देने के लिए समय नहीं इसी व्यावसिकता की वजह सी , इसी आधुनिकता की दौर की वजह से! फिर भी मीडिया को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना ही होगा! एक बार फिर आपने एक ज्वलंत मुद्दे पर बात की , जिसमें मीडिया के द्वारा अपनाई गयी गलत परंपरा का भंडाफोड़ किया गया है , इसके लिए आपका शत शत आभार!

ankit के द्वारा
July 16, 2011

can I get your email ID , mine is ankitcktd@gmail.com

chaatak के द्वारा
July 11, 2011

वासुदेव जी, हिन्दू निशाने पर… मैं पहले पढ़ चुका हूँ और तथ्यों से अपनी सहमती पहले ही जाहिर कर चुका हूँ| अब बात इस लेख की तो मीडिया और पत्रकारिता के मूल्यों के बीच अब कोई तालमेल नहीं रह गया है यहाँ भी भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पैठ बना चुका है| आज जिस तरह से पत्रकारिता दलाली पेशे में उतर कर आम आदमी के विश्वास से खेल रही है उसे देख कर तो लगता है कि बहुत जल्दी पत्रकारों का भी स्टिंग ओपरेशन सामने आने लगेगा कि ये ख़बरों तक की दलाली किस तरह करते हैं| किशोरों को तो बाकायदा ये राय देनी पड़ती है कि आप खबरे रेडियो पर सुने और टी.वी. पर समाचार चैनलों को टयून न करें| भगवान जाने किसकी नंगई को खबर बना कर परोसा जा रहा हो| आपकी पोस्ट पढ़कर बड़ा अच्छा लगा| मुझे महसूस हो रहा है कि जागरण मंच को एक और बेहतरीन ब्लोगर मिल चुका है| मैं इस मंच पर आपकी उपस्थिति से अभिभूत हूँ| शुभकामनाएं एवं बधाईयाँ!

    vasudev tripathi के द्वारा
    July 12, 2011

    भाई चातक जी, टीवी से आने वाली गन्दगी अब मीडिया के सभी भागों में फ़ैल चुकी है, समाचारपत्र भी अछूते नहीं रहे जहाँ १-२ पन्ने अश्लीलता के लिए आरक्षित रहते हैं और रेडिओ में इस छूत की बीमारी को FM ने फैला दिया है| आपने जो मेरे लिए इतने विशिष्ट शब्दों का प्रयोग कर दिया ये आपकी महानता है और इसके प्रतिउत्तर में मैं आपकी कृतज्ञता ही व्यक्त कर सकता हूँ| धन्यवाद|

allrounder के द्वारा
July 11, 2011

भाई वासुदेव आप सदा ही मुद्दों पर ही इस मंच पर लिखते हैं और दिन प्रतिदिन कलम को प्रखर करते जा रहे हैं ! एक और वैचारिक आलेख पर हार्दिक बधाई !

    vasudev tripathi के द्वारा
    July 12, 2011

    भाई सचिन जी, ये तो नहीं जानता कि मैं आपकी प्रशंसा के योग्य अभी हूँ या नहीं किन्तु मंच का उद्देश्य अपने जीवन की कहानी सुनाना तो मैं नहीं समझता हूँ, कई विषयों पर प्रबुद्ध लेखक लिखते ही रहते हैं मैं अपनी बात राष्ट्र की आवश्यकता और कटु सत्य के अनुसार ढालने का प्रयास करता हूँ| फिर भी आप से प्राप्त प्रशंसा के लिए आपका आभार|

anoop pandey के द्वारा
July 11, 2011

वासुदेव जी मिडिया पर एक और आरोप है……..वो जानकारियों को विकृत करके हमारे सोचने का दायरा नियंत्रित कर रहे है. एक उदाहरण देता हूँ. मुंबई हमलों के समय मै वहीँ था. दुर्भाग्य अथवा सौभाग्य से ‘ कैफे लिओपोल्ड ‘ से गोली चलने से ठीक आधे घंटे पहले निकल कर वि टी होते हुए क्लब में आया. तब रात को ही मुंबई पुलिस का एक मैसेज आया था की २ गाड़ियों से जो की पुलिस की है कुछ आतंकवादी भागे है….जिन्हें दिखे कृपया फोन करें. बाद में पता लगा की एक ही गाड़ी थी. और कयास जो था की १५ से २० लोग है घट कर १० हो गया. इसे आप क्या कहेंगे? आज भले ही मुंबई पुलिस अपनी पीठ ठोक रही हो और देश भी इस मिडिया की बदौलत सच से दूर हो पर उस समय जो भी उस इलाके में थे जानते है की मुंबई कितनी आसानी से दोबारा निशाना बन सकता है. और उसकी दोषी पुलिस और मिडिया की आत्ममुग्धता होगी.

    vasudev tripathi के द्वारा
    July 11, 2011

    अनूप जी, कितनी पीड़ा होती है जब हम देखते हैं कि मीडिया, राजनेता या कॉर्पोरेट अपने तुच्छ आर्थिक स्वार्थों के लिए देश के हितों को ताक पर रख देते हैं| आप तो मुंबई घटना के प्रत्यक्षदर्शी हैं, इतना तो पूरे देश ने देखा कि न्यूज चैनलों ने घटना को पहले और सनसनीखेज तरीके से दिखने की होड़ में किस तरह गलत आंकड़े पेश किये और कमांडो कार्यवाही का लाइव प्रसारण कर के ऑपरेशन की सफलता के लिए खतरे उत्पन्न कर दिए थे……

himanshu के द्वारा
July 9, 2011

media ka kya kiya jay koi to rasta batao bhai…………

Tamanna के द्वारा
July 9, 2011

बाकी स्तंभों की तरह अब मीडिया भी एक बेहद कमजोर स्तंभ के रूप में अपनी छवि बना चुका हैं…आपके लेख हमेशा नई और सश्क्त बातें सामने लाते है. http://tamanna.jagranjunction.com/2011/07/09/homosexuality-and-gay-rights-in-india/

santosh kumar के द्वारा
July 9, 2011

आदरणीय वासुदेव जी , सादर अभिवावादन …….मीडिया भी पैसे के पीछे भाग रहा है , बाज़ार वाद के इस दौर में सब कुछ बिकाऊ है , पत्रकारिता उद्देश्य से भटक गयी है, अधिकांश मीडिया का नियंत्रण विदेशिओं के हाथों में जाने से हमारे पत्रकारों को भी शायद स्वतंत्रता कम है /

    vasudev tripathi के द्वारा
    July 9, 2011

    आदरणीय संतोष जी, आपको सादर प्रतिअभिवादन| हम आशा करते हैं आम जनमानस जागरूक होगा और पुनः सब कुछ ठीक होगा|

shaktisingh के द्वारा
July 9, 2011

चौथे स्तम्भ के रुप में मिडिया अपना असली काम भूलता जा रहा है. इस देश को मिडिया की काफी जरुरत है

    vasudev tripathi के द्वारा
    July 9, 2011

    शक्ति जी, पूरी बात तो लिंक पर जाकर और स्पष्ट होती है| धन्यवाद.


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