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खून दिया है खून लिया है: स्वातंत्र्य गीत

Posted On: 13 Aug, 2011 में

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Indian Flag 4

लाखों आँचल रिक्त हुए हैं।
लाखों दामन तिक्त हुए हैं।
यौवन की लाखों आँखों के,
शैशव सपने रक्त हुए हैं।।
प्रस्फुटित कली भी जब मशाल बन हक लेने के लिए जली है,
खून लिया है खून दिया है, तब आजादी हमें मिली है॥
………..
जलती लाशों की लपटों से,
रक्त धरा और गगन हुए हैं।
कण-कण के स्वर उद्द्वेलित हो
क्रान्ति राग के पवन हुए हैं।
अपने पूतों के खूँ से ही.,
रंगा भारती का दामन है।
कितने दफन हुए जीवित ही,
कितने जीवित हवन हुए हैं.!
और कोख की औलादें जब, बलिदानों के लिए पलीं हैं।
खून लिया है खून दिया है तब आजादी हमें मिली है॥
………..
गंगा की पावन धार संग ही,
शोणित की अविरल धार बही है।
हर वाणी प्रतिशोधों की.,
प्रतिकारों की तलवार रही है।
दीं नर-आहुतियाँ क्रांति कुंड में,
तब भारत माँ आजाद हुई है,
ये शांति अहिंसा के खेलों का,
छोटा सा उपहार नहीं है॥
लाखों दीप बुझे तब जाकर आजादी की किरण खिली है।
खून लिया है खून दिया है तब आजादी हमें मिली है॥

.
(15 अगस्त 2007, बुधवार)
note :- कविता लेखक की मौलिक रचना है जिसका किसी भी रूप में अनाधिकृत प्रयोग अवैध होगा| (all rights reserved )

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukl bhramar5 के द्वारा
September 4, 2011

वासुदेव जी बहुत सुन्दर रचना उत्तेजित करती और हमारे वीरों की याद दिलाती बधाई हो …भ्रमर ५ कण-कण के स्वर उद्द्वेलित हो क्रान्ति राग के पवन हुए हैं। अपने पूतों के खूँ से ही., रंगा भारती का दामन है। कितने दफन हुए जीवित ही, कितने जीवित हवन हुए हैं.!

nishamittal के द्वारा
August 16, 2011

अति सुन्दर त्रिपाठी जी,आज़ादी थाली में राखी भेंट नहीं थी,अपनी युवावस्था,अपना सुख-दुःख पी छे छोड़ बच्चे ,बूढ़े,महिलाएं पुरुष सबके कुछ खोने पर ही इस का आस्वादन किया है परन्तु असली आज़ादी तो आज तक भी हासिल नहीं हुई .

संदीप कौशिक के द्वारा
August 15, 2011

बहुत खूब त्रिपाठी जी ! आज़ादी के असली मोल से हर आम भारतीय को परिचित कराती हुई अप्रतिम रचना !! :)

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 16, 2011

    भाई संदीप जी, हार्दिक आभार प्रतिक्रिया के लिए। आजादी का वास्तव मे कोई मोल ही नहीं होता, स्वतन्त्रता संसार की सर्वाधिक गौरवशाली अनुभव है।

Pramod Joshi के द्वारा
August 14, 2011

अति उत्तम त्रिपाठी साहब,आशा है की भविष्य में भी आपकी कलम से कुछ इसी प्रकार की गरज पढने एवं सुनने को मिलेगी. वन्देमातरम…..!

Santosh Kumar के द्वारा
August 14, 2011

आदरणीय वासुदेव जी ,…आपकी ओजस्वी रचना सभी प्रशंसाओ से ऊपर है ……….. वन्देमातरम

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 15, 2011

    आदरणीय संतोष जी, आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद॥

Ramesh Bajpai के द्वारा
August 14, 2011

गंगा की पावन धार संग ही, शोणित की अविरल धार बही है। हर वाणी प्रतिशोधों की., प्रतिकारों की तलवार रही है। प्रिय श्री त्रिपाठी जी माँ भारती को समर्पित यह ओजस्वी तेवर ,यह अंदाज और यह जूनून आजादी के लिए अपने प्राणों को हँसते हँसते न्योछावर करने वाले भारत माता के दुलारों को सच्ची श्रधांजली सपर्पित कर रहे है| बहुत बहुत बधाई | जय भारत |

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 14, 2011

    आदरणीय बाजपेयी जी, शब्द तो भावना की अभिव्यक्ति मात्र हैं, इनका उद्देश्य तो राष्ट्र-प्रेम का संचार करना है, वास्तविक सिद्धि तो तब होगी जब हम इन संदेशों से हम एक जनक्रांति को जन्म दे सकें| प्रतिक्रिया व प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद|

chaatak के द्वारा
August 14, 2011

इस रचना की तारीफ़ करना शायद मेरे वश की बात नहीं| शब्द हों तो कुछ कहा जाए ये तो मनोभाव हैं जिन्हें सिर्फ महसूस किया जा सकता है बयाँ नहीं किया जा सकता, इसके लिए सिर्फ एक ही शब्द है- वन्देमातरम!

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 14, 2011

    आदरणीय चातक जी, निश्चित रूप से ये शब्द नहीं भाव मात्र हैं, भावनाओं के विचित्र उफान में ही ऐसे शब्दों को कविता के सांचे में ढालना संभव हो पाता है| एक शब्द की बहुमूल्य अतुलनीय प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद|


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