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क्रिश्चियन योगा; हिन्दुत्व के विरुद्ध एक ढोंगपूर्ण षड्यंत्र

Posted On: 27 May, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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एक समय था जब भारत विश्वगुरु व सोने की चिड़िया के नाम से जाना जाता था। तक्षशिला व नालन्दा तो शिक्षा के वैश्विक केन्द्र थे अन्यथा भारत का प्रत्येक घर विज्ञान व शोध का केन्द्र था। नालंदा जैसे ज्ञान के भव्य मन्दिर 1193 में बख्तियार खिलजी जैसे मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा जलाकर राख़ कर दिए गए। अंग्रेजों ने भी भारतीय विज्ञान को भारी क्षति पहुंचाई। 17वीं सदी से आज तक भारतीय विज्ञान के महान शोधों-सूत्रों को अँग्रेजी नाम देकर छल किए गए और आज अदरक, कालीमिर्च, हल्दी व नीम जैसी पारंपरिक आयुर्वेद की औषधियों के अमेरिका-यूरोप द्वारा पेटेंट कराये जाने के प्रयास हो रहे हैं।
christiasn yogaइन दिनों “क्रिश्चियन योगा” प्रोपगंडा के तहत सनातन भारत का योग विज्ञान निशाने पर है। योग हिन्दू धर्म की मानवता को अभूतपूर्व देन है। योग हिन्दुत्व की नींव भी है और शिखर भी। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि तपस्वी, ज्ञानी व कर्मों में लगे व्यक्ति से भी योगी श्रेष्ठ है अतः अर्जुन तू योगी बन! योग हिन्दुत्व का ध्येय है किन्तु आज क्रिश्चियन मिशनरीज़ द्वारा योग के भी ईसाईकरण अर्थात धर्मांतरण के दुष्प्रयास हो रहे हैं। ईसाई देशों में जहां कई चर्च इस काम में लगे हैं वहीं भारत में निनान पॉल नामक केरल के एक पादरी ने योग के ईसाईकरण का अभियान छेड़ा है।
योग शब्द संस्कृत की “युज्” धातु से बना है जिसका अर्थ है जुड़ना या एक होना अर्थात जीवात्मा का ब्रम्ह के साथ एक हो जाना अर्थात कैवल्य। कैवल्य अर्थात मोक्ष हिन्दू धर्म का विशिष्ट दर्शन है जहां पर प्रत्येक मत अंत में एक हो जाता है क्योंकि “तुम ईश्वर के अंश हो, तुम ही ईश्वर हो, आयमात्मा ब्रम्ह, अहम् ब्रम्हास्मि” ऐसा कहने का साहस भारतीय हिन्दू ऋषियों के अतिरिक्त कोई भी नही कर सका। सभी प्राणियों में एक ईश्वर को देखना ही योग है इसीलिए गीता कहती है समता ही योग है, “समत्वम् योग उच्यते”। स्वामी विवेकानंद ने जब शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में इस दर्शन का उद्घोष किया तो सम्पूर्ण विश्व अचंभित हो गया! विश्व के अन्य सभी नए धर्म स्वर्ग के ऐशों-आराम के वादे तक ही सीमित हैं जबकि हिन्दू धर्म स्वर्ग को निकृष्ट कहकर बेझिझक उसकी अवहेलना कर देता है। भारतीय दर्शन में ब्रम्हत्व की प्राप्ति अर्थात पूर्ण सत्य का दर्शन ही परम उद्देश्य है इसी कारण यहाँ ज्ञान की पूजा होती रही है। योग वस्तुतः जीव-ब्रम्ह के योग का मार्ग है जिसेकि विभिन्न रूपों से स्पष्ट किया गया है। महर्षि पतंजलि के अनुसार “योगश्चित्तवृत्ति निरोंध:” अर्थात चित्त की वृत्तियों (मन) का संयमन ही योग है। माण्डूक्योपनिषद अद्वैत प्रकरण श्लोक 40 भी यही अर्थ स्पष्ट करता है। जन्नत में इंद्रियों के सुख भोगना ही जिस दर्शन का चरम उद्देश्य हो वह योग पर दावा कैसे ठोंक सकता है?
हिन्दू धर्म का प्रत्येक ग्रन्थ योग पर आधारित है। गीता के 18 अध्याय सांख्ययोग, कर्मयोग, भक्तियोग आदि योग अध्याय ही हैं। रामायण-भागवद आदि ग्रन्थ भक्ति योग पर आधारित हैं, सगुण उपासना या मूर्तिपूजा आदि के द्वारा भगवान से एकत्व स्थापित करना ही भक्तियोग या प्रेमयोग है जिसके विषय में गीता के 12वें अध्याय के श्लोक 2 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा योगी मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ है । वेद व उपनिषद योग ग्रन्थ ही हैं। ऋग्वेद के मण्डल 1 सूक्त 18 का 7वां श्लोक है कि योग के बिना विद्वान का कोई भी यज्ञकर्म सिद्ध नहीं होता। श्वेताश्वतरोपनिषद का अध्याय 2 गीता के अध्याय 6 की भांति योग प्रक्रिया प्राणायाम-आसन आदि कैसे किए जाएँ यही बताता है, चरमयोग पर तो उपनिषदों का एक-एक मन्त्र ही समर्पित है। गीता में अध्याय 11 श्लोक 4, 9 अध्याय 18 श्लोक 78 आदि स्थानों पर भगवान को योगेश्वर कहा गया है, पुराणों में भगवान शिव के लिए योगीश्वर सम्बोधन आया है। जिस हिन्दुत्व की जड़ से लेकर फल तक सर्वत्र योग की ही अवधारणा हो, जहां ईश्वर को भी योगेश्वर व योगीश्वर कहा जाता हो, जिसने सम्पूर्ण विश्व को योग की शिक्षा दी हो उसे चन्द चर्च-मिशनरीज़ यह बताने का दुस्साहस कर रहे हैं कि योग को हिन्दू धर्म से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए? सनातन हिन्दू उपासना पद्धति में सर्वाधिक महत्वपूर्ण त्रिकाल संध्या में प्राणायाम आदि योग ही उपासना है! भगवान कृष्ण गीता अध्याय 4/1 में कहते हैं कि इस अविनाशी योग विज्ञान को मैंने सूर्य से कहा था, सूर्य ने मनु से, मनु ने इक्ष्वाकु से कहा था। अर्थात हिन्दू धर्म के अनुसार योग का इससे सनातन संबंध है। कुछ तथाकथित धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी यह कहकर क्रिश्चियन योगा का बचाव करते हैं कि योग व धर्म दो अलग चीजें हैं। यदि वास्तव में ऐसा हैं तो फिर योग को क्रिश्चियन योगा क्यों बनाया जाना चाहिए?
क्रिश्चियन योगा में सूर्य नमस्कार व विभिन्न हिन्दू मंत्रों, विशेषकर ॐ, को निकाल कर उसके स्थान पर मनचाहे शब्द रख दिए गए। प्रणव अर्थात ॐ ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ति का नाद है, हिन्दू शास्त्रों में प्रणव को योग व उपासना की आत्मा कहा गया है। कठोपनिषद 2/15, प्रश्नोपनिषद पंचम प्रश्न, तैत्तरीयोपनिषद अष्टम अनुवाक, श्वेताश्वरोपनिषद प्रथम अध्याय, मंडूक्योपनिषद आगम प्रकरण आदि सर्वत्र ओंकार के महत्व को बताया गया है। हिन्दू योग विज्ञान के आधे भाग को शैतानियत घोषित कर देना और आधे को तोड़-मरोड़कर क्रिश्चियानिटी का ठप्पा लगा देना, इससे अधिक संकीर्ण, हास्यास्पद व निंदनीय मानसिकता कुछ नहीं हो सकती।
सम्पूर्ण विश्व में मौलिक संस्कृतियों को नष्टकर ईसाइयत फैलाने के लिए चर्च ने सदैव षडयंत्रों का प्रयोग किया है। भारत में चर्च का इतिहास काफी प्राचीन है किन्तु धर्मांतरण का चक्र तब तक प्रारम्भ नहीं हो सका जब तक पुर्तगाली यहाँ नहीं आए। सोलहवीं शताब्दी के मध्य में प्रसिद्ध पादरी फ्रांसिस ज़ेवियर, जोकि आज सैंट ज़ेवियर के नाम से भारत में पूजे जाते हैं, भारत आए और तटीय क्षेत्रों में परवास मछुआरों को ईसाई बनाने का काम शुरू किया अन्यथा उनकी नावें पुर्तगाली जला देते थे। गोवा आदि क्षेत्रों में हिन्दुओं पर अमानवीय अत्याचार हुए, ब्राम्हणों को जिन्दा जलाया गया। किन्तु विश्व के सबसे सशक्त समझे जाने वाले हिन्दू धर्म की सदियों पुरानी दृढ़ धार्मिक आस्थाओं के कारण चर्च को कुछ विशेष सफलता नहीं मिली। 1604 में डी नोब्ली नामक फ्रांसीसी पादरी भारत भेजा गया जोकि 1606 में मदुरई मिशन का प्रमुख नियुक्त हुआ। भारत में छल कपट व षडयंत्रों से धर्मांतरण की नींव उसने ही रखी। धर्मांतरण के सभी प्रयासों में असफल होने के बाद उसने पोप पॉल पंचम को पत्र लिखा कि यहाँ मूर्तिपूजकों को ईसाई बनाने के मेरे सभी प्रयास व्यर्थ हो चुके हैं अब मेरे पास कोई और रास्ता नहीं बचा है। पुर्तगालियों द्वारा किए गए अत्याचारों के कारण वे और भी दूर हो गए हैं। इसके बाद नोब्ली ने लोगों को भरमाने के लिए क्रांगनोर के आर्चबिशप से अनुमति लेकर ब्राम्हण बनने का ढोंग किया। संस्कृत तमिल सीखने के साथ साथ उसने जनेऊ, चोटी, तिलक रखना व भगवा कपड़े पहनना भी शुरू का दिया। उसने मदुरई में कोविल (तमिल में मन्दिर) नाम से अपना एक आश्रम बनाया और क्रिश्चियन प्रार्थनाओं को तमिल संस्कृत में रचा, खुद को रोम का ब्राम्हण बताकर उसने आस्थाओं का शोषण करते हुए क्रिश्चियन पाठ पढ़ाना व प्रसाद बांटना शुरू कर दिया। ब्राम्हण दिखने के लिए वो जमीन पर सोना, दांत माँजना व शौच के बाद पानी से सफाई भी करने लगा। इस तरह उसने कुछ वर्षों में 120 हिन्दुओं को पथभ्रमित कर धर्मांतरित कर दिया। सितम्बर 1883 में विवेकानन्द के शिकागो भाषण के बाद विश्व में हिन्दू धर्म का शंखनाद गूँज उठा था जिससे भारत में ईसाई मिशनरीज़ के धर्मांतरण के षडयंत्रों को करारा झटका लगा था। इससे निपटने के लिए एक धर्मांतरित ईसाई भवानीचरण ने फिर एकबार ब्रम्हबान्धव नाम से मिशनरीज़ प्रोपगंडा फैलाने के लिए सन्यासी वेशभूषा का डी नोब्ली का पाखण्ड शुरू किया था।
meditating jesusसुनियोजित व संगठित तरीके से क्रिश्चियन आश्रम का यह षड्यंत्र 1921 से पी. चेंचियह द्वारा शुरू किया गया जिसमे पादरियों को सन्यासी वेश-भूषा, शाकाहारी भोजन, व क्रिश्चियनाइज्ड हिन्दू परम्पराओं को अपनाने को कहा गया। ईसामसीह एवं मेरी के हिन्दू ऋषि व हिन्दू महिला की वेशभूषा में चित्र बनाए गए। प्रीस्ट्स को पुजारी के भेष मे दिखाया गया। कई चित्रों में जीसस को योगमुद्रा में दिखाया गया। आश्रमों के नाम भी “क्राइस्टकुल”, “क्राइस्ट सेवा संघ” आदि ईसाइयत मिक्स्ड संस्कृत में रखे गए। विदेशी फ़ंड पर ऐसे आश्रमों की बाढ़ आगई, अपनी संस्कृति परम्पराओं में कठोर निष्ठा रखने वाले आदिवासी व निम्न वर्ग इन जालों में सबसे अधिक फंसे फिर प्रचारित किया गया कि आदिवासी व निम्न जातियाँ अपने को हिन्दू नहीं मानती और स्वेच्छा से ईसाई बन रहे हैं। श्रीराम गोयल जी ने इस विषय पर एक कैथोलिक आश्रम नाम से पृथक पुस्तक ही लिखी है।
हंसों के बींच बगुलों का यह षड्यंत्र आज भी कई रूपों में काम कर रहा है। छोटे-छोटे गावों में कार्यक्रम किए जाते हैं जिनमें भीड़ जुटाने के लिए लाउडस्पीकर पर राम भजन बजाए जाते हैं और बाद में पानी से रोग व शैतानी साया ठीक करने का ढोंग होता है। अगले दिन मरीजों को बताया जाता है कि उनके घरों में मूर्तियाँ रखी हैं इसलिए कृपा नहीं हो रही फिर घर जाकर मूर्तियों को तोड़कर फेंका जाता है उनकी जगह क्राइस्ट मेरी की मूर्ति रख दी जाती है और फिर पैसे दिए जाते हैं और गले में क्रॉस लटका दिया जाता है। 2008 में उत्तर प्रदेश के कस्बे में मैंने इस पूरे षड्यंत्र को पहली बार देखा था। समाज व धर्मों को जानने की इस यात्रा में एक पादरी से मेरी पहली मुलाक़ात 12-13 वर्ष की आयु पर हुई थी जिसमें उसने मुझे ईसामसीह पर एक कॉमिक्स की तरह एक किताब कुछ अन्य किताबों के साथ दी थी। उसके पीछे एक फॉर्म था जिसे भरके भेजने पर उधर से रुपए आते थे। साथ में “क्राइस्ट गीता” नाम से एक किताब थी जिसमें गीता की नकल पर 18 अध्याय रचे गए थे। क्राइस्ट गीता व क्राइस्ट रामायण व सत्संग उसी सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा हैं जिसके अंतर्गत आज “क्रिश्चियन योगा” का प्रोपगंडा शुरू हुआ है, इसे इंडीजेनाइज्ड क्रिश्चियानिटी कहते हैं।
इंडीजेनाइज्ड क्रिश्चियानिटी व क्रिश्चियन योगा चर्च का गहरा षड्यंत्र है। इससे न सिर्फ अपनी परम्परा संस्कृति से दृढ़ता से चिपके हिंदुओं को धर्मांतरित किया जा रहा है साथ ही यह चर्च के ढहते साम्राज्य को बचाने का प्रयास भी है। इंद्रियसुखों के लालच पर टिका संकीर्ण एकेश्वरवाद आज पराभूत हो रहा है, हजारों लाखों की संख्या में पश्चिमी नागरिक हरिद्वार वृन्दावन आदि स्थानों पर हिन्दू धर्म की सघन स्वतन्त्र अध्यात्म शाखाओं की छांव में आश्रय ले रहे हैं, अमेरिका में लगभग 20 मिलियन लोग योग की शरण में आ चुके हैं। हिन्दुत्व एकेश्वरवाद का दुराग्रह नहीं करता अपितु विभिन्न मार्गों की प्रस्तीर्ण शाखाओं को अन्त में मूल में एक चरम बिन्दु पर मिला देता है। गीता 15/1 व कठोपनिषद 2/3/1 आदि हिन्दू शास्त्रों में “ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्….” रूपी वृक्ष का उल्लेख किया है जिसमें विभिन्न शाखाओं के बाद भी मूल में मात्र ब्रम्ह ही है। विविधता में एकता का ऐसा उदार व वास्तविक सन्देश विश्व का कोई और दर्शन कभी दे ही नहीं सका। पी. चेंचियाह ने अपनी पुस्तक “द हिन्दू” में स्वीकार किया है कि हिन्दू धर्म में योग जैसे अनूठे साधन हैं जोकि व्यक्ति को असीम ऊंचाई तक उठा सकता है जबकि क्रिश्चियानिटी के पास ऐसा कुछ भी नहीं है। क्रिश्चियानिटी की इस गरीबी को ढंकने के लिए, बाबजूद इसके कि चर्च खीज में कई बार योग को शैतानी काम घोषित कर चुकी हैं क्योंकि योग प्रत्येक रूप में अंर्त या बाह्य प्रकृति की उपासना ही है और बाइबल व्यवस्था विवरण 17/2-4 में कहती है की सूर्य चन्द्रमा अथवा देवी देवता पूजकों को तुम पत्थरों से मार डालो, हिन्दू अध्यात्म योग विज्ञान पर डकैती डालने के प्रयास हो रहे हैं। यह वैटिकन के सम्पूर्ण विश्व के ईसाईकरण के प्रयास का एक हिस्सा है। पॉप जॉन पॉल II ने 6 नवम्बर 1999 को भारत में खड़े होकर इस बात की घोषणा की थी कि पहली सहस्राब्दि में यूरोप और दूसरी सहस्राब्दि में अमेरिका एवं अफ्रीका में हमने क्रॉस गड़ा दिया अब तीसरी सहस्राब्दि में एशिया की बारी है। यह पॉप की केवल एक गर्वोक्ति नहीं थी, यह का सुनियोजित प्लान है जिसे वैटिकन ने 18 अप्रैल 1998 से मई 1998 के बींच रोम में आयोजित ईसाई धर्मसभा में “एक्लेसिया इन एशिया” नाम से पारित किया गया था।
हिन्दुओं को इन हथकंडों को समझना होगा, योग का ईसाईकरण हिन्दू संस्कृति के ईसाईकरण का षड्यंत्र है, हिन्दुओं के ईसाईकरण का षडयंत्र है, “एक्लेसिया इन एशिया” के अंतर्गत भारत के ईसाईकरण का षड्यंत्र है। यदि हमने अपनी उदारता को उदासीनता से बाहर नहीं निकाला तो सनातन भारतीय संस्कृति का गौरव इतिहास में सिमट जाएगा, ग्रीक जैसे देश व भारत में मिज़ोरम, नागालैंड, केरल जैसे राज्य इसके ज्वलंत प्रमाण हैं।
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-वासुदेव त्रिपाठी

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43 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dr. Shiva Acharya के द्वारा
November 3, 2012

ईसाइयों का हथकण्डा बड़ा फूहड़ रहता है। समलैंगिकता के साथ साथ कन्याओं के शोषण की दास्तान बड़ी खतरनाक है। आत्मचेतना खोए हुए बन्धु ही ईसाई बनते जा रहे हैं। आपने सही लिखा ”यदि हमने अपनी उदारता को उदासीनता से बाहर नहीं निकाला तो सनातन भारतीय संस्कृति का गौरव इतिहास में सिमट जाएगा, ग्रीक जैसे देश व भारत में मिज़ोरम, नागालैंड, केरल जैसे राज्य इसके ज्वलंत प्रमाण हैं।”

yamunapathak के द्वारा
June 5, 2012

आप इतनी गहनता से लेख लिखते हैं की मुझे यह जानने की उत्सुकता है की आप ये सारी जानकारी कहाँ से एकत्र करते हैं. अगर पुस्तकों या स्त्रोत के नाम दे सकते तो मेरे लिए अछा होता क्योंकि विद्यार्थियों की बहुत सी शंकाओं का समाधान करना आसान हो जाता शुक्रिया

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 5, 2012

    आदरणीय यमुना जी, मेरे भारत का मेरा एक स्वप्न है और मैं मानता हूँ कि भविष्य के भारत को बचाने व रचाने के लिए आज के बच्चों को दिशा देना ही एक मात्र मार्ग है| आप अध्यापिका हैं अतः एक महत्वपूर्ण योगदान दे सकतीं हैं| मेरा ज्ञान वास्तव में कोई बहुत विस्तृत नहीं है.. ज्ञान तो अनंत है| मेरे अपने ज्ञान का जो अध्यात्मिक व सांस्कृतिक पक्ष है वह मुझे मेरे परिवार से उठते-बैठते मिला है.., गीता अथवा उपनिषद को परंपरा से प्राप्त किया था और बाद में कई महापुरुषों वैज्ञानिकों के विचार इस दिशा में पढ़कर मुझे इसपर शोध और श्रद्धा की आवश्यकता प्रतीत हुई| विज्ञानं का छात्र होने से मुझे बहुत सहायता मिली| और जो अन्य सूचनाएँ होती हैं उनका स्रोत पुस्तकें व चिंतन रहता है| भारतीय अध्यात्म व संस्कृति के हजारों मूल ग्रन्थ मेरे बाबा व पिताजी द्वारा मुझे मिले, मैंने भी अब तक सैकड़ों पुस्तकें एकत्रित की हैं| मेरे माता पिता का सहयोग अमूल्य है, मैं कभी चाहे कुरआन खरीद कर लाया अथवा bible किसी ने प्रतिप्रश्न नहीं किया| पुस्तकों की संख्या इतनी अधिक है कि यहाँ नाम देना कठिन है| आप विषय बताएं तो मैं तदनुसार कुछ नाम दे सकता हूँ| ,..साभार!

अजीत राय के द्वारा
June 2, 2012

अरे यार त्रिपाठी जी, मैं इस कथित  “क्रिश्चियन योगा” के बारे में जानना चाहता था, इसके बारे में कुछ बताएं

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 5, 2012

    अजीत जी यह लेख वही बताने का प्रयास करता है जो आपने पूंछा है|

dineshaastik के द्वारा
May 30, 2012

वासुदेव जी आपके ईसाईकरण  के विरोध  का मैं समर्थन करता हूँ। मेरी समझ  के अनुसार ईसाई आदि  जिनके जन्म मात्र 2000 वर्ष हुये हैं, धर्म  नहीं हो सकते। एक  मात्र  धर्म  सनातन ही है। जो सृष्टि के निर्माण  के साथ  ही उत्पन्न हुआ   था। जो अपरिवर्तनशील  है।  लेकिन  धर्म  के संबंध  में आपकी व्याख्या से में संतुष्ट  नहीं हूँ। मैं न तो कोई  विद्वान हूँ और न ही इतिहास कार और न ही धर्मवेत्ता। एक  साधारण  सा थोड़ा पढ़ा लिखा भारतीय  हूँ। मेरी समझ  से हमें किसी बात  को इसलिये स्वीकार या अस्वीकार नहीं कर देना चाहिये कि वह हमारे प्रिय , आदरणीय हमारी विचार धारा का समर्थन करने वाले व्यक्ति ने कहीं है या हमारे अप्रिय तथा हमारी विचारधारा के व्यक्ति ने कही है। हमें अपने विवेक  से तार्किक या अतार्किक  होने पर ही उसे स्वीकार या अस्वीकारना चाहिये। चूँकि मैं इतिहास  का विद्यार्थी नहीं रहा, अतः इतिहास  की मेरी जानकारी नगण्य  है। धर्म  के जो लक्षण  बताये गये आज  वह केवल  पुस्तकों में ही  विद्यमान हैं। व्यवहारिक  जीवन में वह देखने को नहीं मिलते हैं। योग संबंध  में आपके विचारों का पूरा समर्थन……

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 31, 2012

    आदरणीय दिनेश जी, मैं ईसाई धर्म का विरोध नहीं करता… वह धर्म के आवरण में पूरी तरह ढल सके यह मेरी कामना है। मेरी आलोचना ईसाइयत की उस संकीर्ण मानसिकता के लिए है जो यह मानती है कि जबतक आप बपतिस्मा लेकर ईसाई नहीं बनते आप धार्मिक नहीं, नरक में ही डाले जाएंगे। और फिर इसके प्रचार के लिए निंदनीय घृणित हथकंडो का प्रयोग किया जाता है। सभ्यता संस्कृतियों को समूल मिटाया गया है और आज भी ऐसा करने के प्रयास हो रहे, क्रिश्चियन योगा योगा को स्वीकारोक्ति नहीं वरन इस दर्शन को नष्ट करने का एक हथकंडा है। अतः इसका सशक्त विरोध है। …..हिन्दू बनने के लिए किसी बपतिस्मा की जरूरत नहीं होती बस जब अपने आपको हिन्दू मन लो तभी हिन्दू….!!! धर्म के विषय में आपकी अपनी परिभाषा हो सकती है, यदि वह दूसरे को ह्येय नहीं बनाती तो वह भी सम्माननीय है।आप स्वयं भी कहते हैं कि मानवता सबसे बड़ा धर्म है जब स्पष्ट किया कि हजारों सालों से यही शास्त्रों का निर्देश तो है तो आपने कहा कि ये केवल किताबों की बातें हैं…??? किसी देश का संविधान ईमानदारी दया समानता के अनुच्छेदों से बना हो किन्तु उसके थोड़े या बहुत नागरिक लूट हत्या मे व्यस्त हो जाएँ इससे संविधान तो लूट हत्या की पोथी नहीं बन जाता…!!! उसी प्रकार धर्म के ये लक्षण शास्त्रों में हैं अतः शास्त्रों के अनुसार यही धर्म है…. न पालन करने वाले विकार हैं नियम अथवा उदाहरण नहीं!!

    dineshaastik के द्वारा
    June 1, 2012

    स्वर्ग  नर्क  की कल्पना हमें अधार्मिक  बनाती है। भाई मेरी बुद्धि तो मुझे यही बताती है। आदरणीय  वासुदेव जी सम्प्रदाओं को धर्ममत  बताइये। मेरा तो निवेदन है कि केवल मानवता के धर्मको अपनाइये।। किसी किताब से नहीं, स्वविवेक  से निर्णय  लीजिये। मानवता के अतिरिक्त सभी अधर्मों का विरोध  कीजिये।।

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 1, 2012

    दिनेश जी, संप्रदाय धर्म के ही होते हैं.. संप्रदाय का अर्थ ही यह है..!! आप आजके प्रचारित सांप्रदायिक शब्द से भ्रमित तो नहीं हो गए.?? केवल मानवता पर तो मैं कह ही चूका हूँ कि जब मैंने किताबों से उद्धरण दिया कि मानवीय सद्गुण ही धर्म हैं तब आपने कहा ये केवल किताबी बातें है… और अब आप स्वयं कह रहे है कि केवल मानवता को धर्म बनाईये..??? आप कहीं सदियों पुरानी शिक्षाओं का श्रेय अपने नाम तो नहीं करना चाहते हैं जैसे अंग्रेजों ने पहले शोर मचाया कि ये अदरक कालीमिर्च नीम सब जंगली लोगों के नुस्खे हैं एलोपैथी अपनाओ… बाद में कालीमिर्च नीम हल्दी गोमूत्र पर पटेंट ठोंक दिया..?? ये लेख इसी पर तो लिखा है कि अब वो योग पर भी अपना दावा ठोंक रहे हैं..?? ;)

alkargupta1 के द्वारा
May 29, 2012

वासुदेव जी , बहुत ही महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदत्त विचारणीय आलेख है आपके सभी आलेख अति प्रशंसनीय व सारगर्भित होते है ……

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 31, 2012

    आदरणीय अल्का जी, हार्दिक आभार!!!

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 28, 2012

आदरणीय वासुदेव जी …. सादर अभिवादन ! मेरे पिता जी अपनी जवानी के दिनों में किसी मेले में इनके स्टाल पर चले गए …… वहां पर उन्होंने बातो बातो में पता लिखवा लिया ….. कई सालो तक उनके पत्र आते रहे की आपकी शादी करवा देंगे मकान बनवा कर देंगे नौकरी लगवा देंगे आपकी जो भी अधूरी इच्छा हो उसको पूरी कर देंगे यह हाल तो नार्थ का है – पिछड़े इलाको का तो भगवान ही मालिक है (इन सभी बातों के बावजूद मैं माता मरियम और प्रभु इसा मसीह का दिल से आदर और सन्मान करता हूँ – और उनके धर्म की शिक्षाओं का गलत ढंग से प्रचार और प्रसार करने वालों से नफरत ) जय श्री कृष्ण जी :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 29, 2012

    राजकमल जी, पीछे लग जाते हैं salesman की तरह… कभी कभी तो लगता है जैसे वास्तव में टार्गेट मिलता है इनको और शायद कमीशन भी..!! आपके पिताजी तो बच ही गए कोई मेरी तरह होता कम समझ वाला तो शादी करवा ही देते पकड़ कर भले ही एक घर में बैठी होती.. फिर रास्ता ही क्या बचता?/ अब तो दिल्ली जैसी जगहों पर भी भगवान् ही मालिक है..!! “जय श्री कृष्ण”

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
May 28, 2012

अद्दभुत ! सशक्त आलेख ! वर्तमान परिदृश्य में ऐसे ही लेखों और आप जैसे विचारकों की आवश्यकता है. लोग तो हमरी संस्कृति को मिटाने पर लगे ही हुए हैं. बधाई.

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    आदरणीय अजय जी, आलस्य, अज्ञान व उपेक्षा की प्रवत्ति पलकर इस देश के लोगों ने विगत १३०० वर्षों में बहुत कुछ खोया है.. अब अस्तित्व मात्र ही शेष है खोने के लिए अतः अब तो नींद से बहार आना ही एक और एक मात्र विकल्प है..!! हार्दिक आभार!!

vinitashukla के द्वारा
May 28, 2012

एक बहुत ही विचारशील मुद्दे को उठाने व उससे संबद्ध बहुमूल्य जानकारी देने हेतु धन्यवाद वासुदेव जी.

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    हार्दिक आभार विनीता जी!

shailesh001 के द्वारा
May 28, 2012

सशक्त संदेश. हिंदू धर्म या आर्य धर्म कभी समस्त विश्व में व्याप्त था, वो कमजोर हुआ और है तो इन दो तथाकथित धर्मों से. आज हमारी हार की यह अंतिम सीमा है… जैसे बेहोश को मृत्यु का भास नहीं होता वैसे ही यह तथाकथितहिंदू धर्म अपनी वर्षों पुरानी निष्क्रियता की वजह से मृत्यु को प्राप्त होने वाला है… हमारे शत्रु बहुत शक्तिशाली व धनी हैं.. पर सामान्य हिंदू हमेशा की तरह अभी भी, मूर्खोंं की तरह सोया पड़ा है. हमें जानना होगा .  

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    शैलेश जी, बिलकुल सही कहा आपने, जो जाती विरोधियों द्वारा नष्ट होने पर भी सोती रहे उसे संकट में मानना ही होगा.. जागना ही एकमात्र उपाय है!!

yogi sarswat के द्वारा
May 28, 2012

इसका एक दूसरा पहलु भी है वासुदेव जी ! पश्चिमी देशों में ये दर बैठ गया है की भारतीय संस्कृति वहां के लोगों को अपनी और आकर्षित कर रही है और लोग मध्यपान और मांसाहार छोड़ रहे हैं ! वहां के धर्म के ठेकेदारों को ये लगने लगा है की आने वाले कल में ईसाइयत को मानाने वाले हिन्दू धर्म की तरफ आकर्षित हो सकते हैं क्योंकि योग उन्हें रोग मुक्त और तनाव मुक्त कर रहा है ! आप अल्फ्रेड फोर्ड ( फोर्ड कंपनी का मालिक जिसने हिन्दू धर्म ग्रहण कर लिया है ) को नेट से ढूंढकर उसके इस विषय में विचार पढ़ सकते हैं ! तो वहां का निर्देश केरल के ईसाई पादरी को मिला हुआ है ! लेकिन भरोसा रखिये – जो श्रेष्ठ होता है वाही आगे जाता है ! हिंदुत्व धीरे धीरे बिना किसी झगडे फसाद के अपनी जगह बना रहा है ! अब तो मिश्र में भी लोग योग कर रहे हैं , और ॐ , ॐ का जाप कर रहे हैं ! बढ़िया विषयपरक लेखन !

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    योगी जी, यही भय और छल योग पर क्रोस का ठप्पा लगाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं..!! शर्म तो तब आती है जब पुरातन हिन्दू पद्धति को शैतानी और विकृत स्वरुप को holy yoga कहकर पुकारने वालों के पीछे अपने आप को उदारवादी व बुद्धिजीवी समझने वाले कुछ धूर्त यह कहते हुए खड़े होते कि christian yoga में गलत क्या है..?? योग के आगे च्रिस्तियन शब्द लगाना ही दुर्भावना व षड़यंत्र का प्रतीक है|.. साभार!!

    bharodiya के द्वारा
    May 29, 2012

    क्या वासुदेवभाई मन छोटा कर रहे हो । आप जीस पीसी से ये लिख रहे हो उस पर कोई भारतिय कंपनी का नाम का ठप्पा मार दे तो आप मानोंगे के ये भारतिय कंपनेने बनाया है । नही मानोगे । आप सोचोगे ये कंपनी ऍसेम्बल तो कर सकती है पर मूल पूर्जे तो अमरिकी ही है । योग को भी चाहे कितने भी ठप्पे मारे रहेगा भारतिय ही । आप की ही तरह वहां के लोग सोचेन्गे ये पादरी ऍसेम्बल तो कर सकते हैं पर योग है रामदेव बाबा का । आप के अनुसार योग तो बहुत बडी चीज है । आम जनता के लिए योग याने रामदेवबाबा जो कसरत करवाते हैं वही । ईस से अधिक कुछ भी नही । योग इतनी बडी चीज थी तो अबतक कहां छुपी थी । बाबा के बाद ही बाहार निकली । ये ज्ञान है और ज्ञान बांटने के लिये होता है । हम आप जो सुविधाएं भुगत रहे हैं उस में विदेशों के ज्ञान का बडा हाथ है । आशा है ईस बात को कहने पर मैं उदारवादी व बुद्धिजीवी या धूर्त नही बन जाउंगा । ये आप का ही कथन है – योग हिन्दू धर्म की मानवता को अभूतपूर्व देन है- देन याने भेंट तोहफा, मानवता यानी विश्वभर के मानवी । योग का ज्ञान जब देने की ही चीज है तो मगजमारी क्यों । देनेवाले फिर मुड के नही देखता लेनेवालेने क्या किया । बाकी आप का ईतिहास का नोलेज अच्छा है । बहुत सी बातें जानने को मिलती है ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 29, 2012

    आदरणीय भदोरिया जी, भारतीय संस्कृति है कि ज्ञान पर कोई एकाधिकार नहीं होता… इसीलिए हमने पैटंट का आविष्कार नहीं किया। योग बड़ा विषय तो है ही किन्तु जो कसरत है वो बड़े का ही तो अंग है और उस कसरत के साथ प्राणायाम ॐ को जोड़कर ही तो बाबा रामदेव ने इतनी सफलता से उसका प्रचार किया। इसे मैंने लेख मे सीमित शब्दों मे स्पष्ट भी किया है। यहाँ विषय योग के उपयोग का नहीं है, ठप्पे का भी महत्व नहीं है, महत्व इस बात का है कि ठप्पा कौन और क्यों लगा रहा है। जैन बौद्ध आदि शाखाएँ बाद मे यहाँ फूटीं सभी के आगम मे मंत्र योग आदि है, कुछ परिवर्तन भी हैं किन्तु उन्होने यह तो नहीं कहा कि यह हमारा विशेष योग या विद्या है और जो इससे पहले का है वो शैतानी है। यहाँ बिन्दु यह है कि ऐसा करने वाला एक्लेसिया इन एशिया का ख्वाब पाले बैठा है, उसके पास हमसे अधिक पैसा व संसाधन हैं, अतः यदि हम फिर भी अतिविश्वास मे रहे कि नहीं भई ये तो सदियों से हमारी चीज है तो परिणाम आप चाहे ग्रीक के उदाहरण के रूप मे देख लें अथवा भारत के ही कई राज्यों के रूप मे। कौन मानने को तैयार था कि ये पादरी आश्रम चलाकर वो कर लेंगे जो ये चाहते हैं…. आश्रम सन्यास तो हिन्दुत्व की अनादि परंपरा है…!! उपेक्षा मनुष्य का बड़ा दुर्गुण है… नीति का वाक्य है कि शत्रु व्याधि कर्ज व अग्नि की कभी छोटा समझकर उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। प्रोपगंडा थियरि मे कहते हैं कि एक झूठ को 100 बार बोलो वह सच बन जाता है। कई बार सच नहीं बनता तब भी बड़ा भ्रम पैदा कर देता है कि क्या सच है क्या झूठ…!! आज इतिहास मे जो इतना भ्रम है वो इसीलिए कि अंग्रेज़ जानते थे कि तब जो झूठ लिखा जाएगा उसे 200 साल बाद पकड़ना बहुत कठिन होगा। 200 साल बाद ये जानना बड़ा कठिन होगा कि योग हिन्दू धर्म से पैदा हुआ या पश्चिम मे भी holy yoga जैसा कुछ पहले से ही था। हम पश्चिम के ज्ञान का समर्थन व प्रशंसा करते हैं किन्तु उसका चर्च की दक़ियानूसी से कोई संबंध नहीं!! बेचारे गैलीलियो का हाल तो सभी जानते हैं। यहाँ ज्ञान बांटने मे मगज़मारी नहीं रही, आचार्यों ने पश्चिम मे जाकर मुफ्त मे योग विज्ञान बांटा… विरोध एक्लेसिया इन एशिया का है।

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 28, 2012

priya vasudev ji, sasneh bahut tathyatmak lekh. jankaari प्राप्त हुई. निश्चित ही ऐसे उपाय करने होंगे की लोग यहीं ठहरें. धन्यवाद

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी, हार्दिक आभार!!

nishamittal के द्वारा
May 28, 2012

वासुदेव जी योग विषयक विस्तृत जानकारी प्रदान करने हेतु आभार.योग की महिमा ही तो है,कि सम्पूर्ण विश्व उसको अपनाने के लिए व्यग्र है,सामदाम दंड भेद सभी का आश्रय लेकर.परन्तु हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारी जितनी भी विशेषताएं या मौलिकताएं हैं,उनका हम महत्त्व तभी समझते हैं जब दूसरा उनको छीन भागता है क्यों हम उनको पेटेंट नहीं करते समय पर .प्रतिस्पर्धा के इस युग में अपनी सम्पत्ति की सुरक्षा हमको स्वयं करनी होगी

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    आदरणीय निशा जी, भारतीय दर्शन सहयोग की प्रेरणा देते हैं जबकि अन्य दर्शन प्रतिस्पर्धा पर आधारित हैं| प्रतिस्पर्धा का आधार स्वार्थ है.. अब्राहमिक जड़ के तीन धर्म प्रतिस्पर्धा पर आधारित हैं क्योंकि एक के बाद एक का जन्म हुआ व पूर्ववर्तियों के विरुद्ध प्रतिस्पर्धा ही उनके अस्तित्व को बचाए रखने का एक मात्र विकल्प था.. इसके लिए षड़यंत्र धोखा रक्तपात सबका सहारा लिया गया…!! आज भारत में भी धर्मान्तरण के पीछे वही कुंठित मानसिकता काम कर रही है..!! हमें अपनी संस्कृति के स्तर पर अपने मध्य सहयोग की अवधारणा को पुनर्जीवित करना होगा और बाहरी स्तर पर प्रतिस्पर्धा की रणनीति अपनानी होगी..!! दुर्भाग्य से इसे उलटे रूप में हमने अपना रखा है..!!

dineshaastik के द्वारा
May 28, 2012

धर्म  ने बहुत  कत्लेआम  किया है, आओ  अब धर्म  का  काम  तमाम करें। धर्म  की शराब ने हमें इंसान  नहीं बनने दिया, आओ   अब इंसानियत का काम  करें।। हमें खुदा ने इंसान  बनाया था, लेकिन हम  हिन्दु, मुसलमान, ईसाई बन गये, मंदिर  मस्जिद  चर्च  को, स्कूल  अस्पताल  बनाने का इंतजाम  करें।। आदरणीय  वासुदेव जी धर्म  का इतिहास  खून  से लिखा है। मैंने जितना  इतिहास  पढ़ा है या मुझे  जितना  दिखा है। हमारे  इतिहास  में  भी है, लेकिन औरों से कम, केवल  इंसानियत  एक  धर्म  क्यों  नहीं मानते  हम, हमारे  धर्म  ने  हमें  हिंसा  का पाठ  पढाया, इसी सिद्धांत  ने तो हमें विदेशों का गुलाम  बनाया। हिन्दु  ईसाई् मुसलमान  बनने में जिसे मजा आता है, ऐसा आदमी कभी सच्चा हिन्दुस्तानी नहीं बन पाता है।

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    दिनेश जी,, अधिकतर लोगों की भांति आप भी धर्म मजहब और religion में भ्रमित हैं.. भारत में धर्म ने खून से इतिहास likha हो ऐसा आपके द्वारा सुनकर मैं आश्चर्यचकित हूँ.. क्योंकि भारतीय इतिहास को विकृत करने का षड्यंत्र करने वाले अंग्रेजों ने भी काफी प्रयास के बाद भी ऐसा कहने का खुला साहस नहीं कर पाया.! आपने किस इतिहास को पढ़ा मुझे नहीं पता.. हाँ ऐसा संभव है कि जब कासिम और बाबर ने आक्रमण किया, मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने शुरू किये तब भारतियों ने भी उनका जमकर प्रतिकार किया इस बात का किसी को गम हो और उसने इतिहास के नाम पर कुछ लिख मारा हो.. “हमारे धर्म ने हमें हिंसा का पाठ पढाया, इसी सिद्धांत ने तो हमें विदेशों का गुलाम बनाया।” इस पंक्ति को तो मैं समझ ही नहीं सका… इसे थोडा सिद्ध करें तो समझ में आ सकता है!! आप धर्म को शराब भी मानते हैं.. मार्क्स ने ऐसा (अफीम) religion के लिए कहा था धर्म तो उसने सुना भी नहीं था.. धर्म की जो परिभाषा हिंदुत्व में है उसके अनुसार- धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह: । धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌ ।। (मनुस्‍मृति) (दस धर्म के लक्षण हैं : धैर्य रखना, क्षमा करना, संयम रखना, चोरी न करना, शौच (स्वच्छता), इन्द्रियों को वश मे रखना , बुद्धि निर्मल रखना, विद्या प्राप्ति के लिए प्रत्न्शील रहना, सत्य और क्रोध न करना ) इसमें शराब या अफीम कहाँ है मुझे नहीं पता… भारतीय इतिहास में भी कही किसी को हिन्दू बनाने के लिए षड्यंत्र क़त्ल किये गए हों मैंने नहीं सुना.., अटल जी एक कविता याद आती है- “कोई बतला दे काबुल में कब जाकर कितनी मस्जिद तोड़ी, घर-घर में हिन्दू करने को कब मैंने नर-संहार किया.?” यदि किसी को ग्रीक यूनान के बाद हिन्दू सभ्यता मिटाने का सपना रखने वालों का प्रतिरोध गलत लगता हो तो वे मानवता के छद्म चोले में करोड़ों बेबसों की हत्या बलात्कार व धर्मान्तरण का समर्थन ही कर रहे हैं..!! काल्पनिक परिभाषाओं में मेरी श्रद्धा नहीं है.. सच को ऊपर सप्रमाण लेख में मैंने स्पष्ट किया है.. समय मिला तो इस विषय को और आंकड़ों के साथ आगे बढ़ाऊंगा..!!

    dineshaastik के द्वारा
    May 28, 2012

    आदरणीय वासुदेव जी एक  पंक्ति टाइपिंग  के कारण  अशुद्ध  लिख  गई थी। उसे कृपया इस  प्रकार पढ़े- हमारे धर्म ने हमें अहिंसा का पाठ पढाया, इसी सिद्धांत ने तो हमें विदेशों का गुलाम बनाया। मेरी बातें काल्पनिक  नहीं हैं और न ही अतार्किक, यह पूर्णतः सत्य पर आधारित हैं। भारत मैं भी मुगलों के आने के पूर्व  बौद्धों और  हिन्दओं का संघर्ष  हुआ   था। बौद्ध  पराजित  हो गये तो और  अपनी पराजय  का बदला उन्होंने मुगलों  का सहयोग करके लिया।

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    आदरणीय दिनेश जी, मैं पहले ही समझ गया था कि यदि आओ कुछ कह सकते हैं तो वह यही होगा कि हिन्दू-बौद्ध संघर्ष इस देश में चलता रहा..!! मैंने जो पंक्ति पहले ही लिखी थी किन्तु बाद में हटा दी ताकि पहले आप इसे स्पष्ट कर दे वह यह थी कि हिन्दू-बौद्ध संघर्ष को खूनी रूप में प्रस्तुत करने का खूब प्रयास हुआ किन्तु क्या आपको इसके एक भी प्रमाण मिले हैं कि धर्म को लेकर हिन्दू बौद्ध में युद्ध हुए हों..?? एक दो नामों को गिनाकर कब तक वैदिक-बौद्ध शास्त्रार्थ संघर्षों को धर्म के नाम पर हिंसा व युद्ध सिद्ध करने का हास्यास्पद प्रयास किया जाता रहेगा.?? यह कहना कि बौद्धों ने बदला लेने के लिए मुग़लों का सहयोग किया दूसरा भ्रमपूर्ण कथन है… मुग़ल तो कब आये..!!! मुसलामानों का सहयोग भी नहीं कहा जा सकता है… मुसलमानों का सहयोग करने वाला पहला दाहिर का पुत्र वीर्सिम्हा था जोकि पूर्ण वैदिक था, उसने सहयोग नहीं किया उसे बंदी बनाकर सहयोग लिया गया| मुस्लिम सत्ता स्थापित करने में सहयोग करने वाला पहला जयचंद था जोकि बौद्ध नहीं था.. बौद्धों ने मुसलमानों का सहयोग नहीं वरन युद्ध में असहयोग किया किन्तु इस लिए क्योंकि उनकी अहिंसा इतनी रूढ़ हो चुकी थी कि वे युद्ध में किसी तरह सहभागी नहीं होना चाहते थे,.. उनके लिए यह हिंसा थी.. यदि मुसलमानों का सहयोग किया होता तो अबौद्ध राज्यों के साथ ही उनके राज्य न लुटे जाते, लाशों के ढेर पर उनकी औरतों का बलात्कार न होता…!! कुछ तो मोहलत मिलती..!! यह तो संक्षिप्त उत्तर है.. मैं समझता हूँ आपको ऐसा लगता होगा कि जो आपने पढ़ा वह इतिहास है.. लेकिन दुर्भाग्य से यह इतिहास ही वह है जिसे कुछ कमेटी कमीशन बनाकर अंग्रेजों ने इसीलिए लिखा था ताकि ऐसा ही भ्रम बन सके..!! लेकिन इतना भी नहीं कि उनकी किताबों से ऊपर उठकर आप सोचे तो समझ न सके..!!! बौद्ध पराजित हो गए.. इसे इतिहास में सही से खोजने का प्रयास करिए क्योंकि सुनने में अच्छे लगने वाले ये वाक्य बहुतों को भ्रमित कर देते हैं…!!

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    कृपया दाहिर का पुत्र वीर्सिम्हा के स्थान पर दाहिर व दाहिर के पुत्र वीर्सिम्हा जयसिम्हा के राज्य का काका कोंतल पढ़ें.!

    dineshaastik के द्वारा
    May 29, 2012

    आदरणीय वासुदेव जी, मेरा मानना है कि हिन्दु, मुसलमान, ईसाई आदि कोई धर्म   नहीं हैं, अपितु सम्प्रदाय हैं। धर्म  तो मात्र एक   ही है मानवीय (सनातन), जिसका जन्म सृष्टि की उत्पति के साथ  ही हुआ।  मेरी दृष्टि में हिंसा का अर्थ  केवल  किसी की हत्या के देना ही नहीं है। किसी  शारीरिक  एवं मानसिक  दुख  देना, किसी का धर्माधारित तथा जाति आधारित शोषण  करना, किसी को उसके अधिकारों से वंचित  करना एक  प्रकार की हिंसा ही है, हाँ इसे हम  अप्रत्यक्ष  हिंसा की संज्ञा दे सकते हैं। मेरा ज्ञान केवल  पुस्तकों पर आधारित  नहीं हैं और न ही में ज्ञान का अंतिम आधार पुस्तकों कों मानता हूँ। ज्ञान  का अंतिम आधार बुद्धि है। कुछ  हमें भ्रमित  करती हैं। अंग्रेजों द्वारा लिखी गई भारत  के संबंध  में अधिकांश  पुस्तकों निश्चित  ही विश्वास योग्य नहीं है। लेकिन  उनके माध्यम  से हम बुद्धि द्वारा हम  सत्य को प्राप्त  कर सकते हैं। लेकिन  भारत के संबंध  में अंग्रेजों द्वारा लिखा गया सारा इतिहास  दोष पूर्ण  नहीं है। मेरी समझ  से धर्म (मानवीय) का केवल  एक  ही गुण  होता है मानवता, जिसे सारे गुण  समाहित  हो जाते हैं। मार्क्सको मैंने आज  से लगभग  30 वर्ष  बीए फस्टईयर में पहिले पढ़ा था। मेरे पेपर में इस  संबंध  में एक  प्रश्न आया था, मुझे याद है कि मैंने उसके धर्म  को अफीम  समझने का धारणा की निंदा की थी। क्योंकि धर्म  और अफीम  में मेरे अनुसार एक  भी गुण  नहीं मिलते। हाँ धर्म और शराब में अनेक  गुणों की एकरूपता है। मैने धर्म  की शराब नामक  एक  कविता भी लिखी थी जो कल  पोस्ट भी की है, यह कविता वस्तुतः बहुत बड़ी है लगभग 5 पेजो की, किन्तु उसकी कुछ  पंक्तियाँ बहुत ही उत्तेजक  और आक्रोशित करने वालीं हैं, अतः उन्हें मैंने मंच  पर पोसट नहीं किया। मेरा मानना है कि धर्म   तो अपरिवर्तनशील  है, फिर धर्मान्तरण  कैसे हो सकता है और जो धर्म  बदल  सके तो यह  निश्चित  ही वे दोंनों ही धर्म  नहीं हैं, न  तो पूर्व  वाला और न ही बाद  में बदला हुआ। जो किसी का धर्म  बदलने  का  दावा करते हैं, वे वस्तुतः इंसान ही नहीं हैं और न ही खुदा के बंदे, अपितु खुदा का अपमान  करने वाले काफिर  हैं। वह अज्ञानी हैं, वह न तो खुदा के धर्म  को जानते हैं  और न ही उसके धर्म  को मानते हैं। जब मुसलिम  हमले सिन्ध की सरहद पर हो रहे थे, तो हिन्दुओं और बौद्धों में बड़ी खींचतान थी। बौद्धों ने अपने को कमजोर समझ कर मुसलमानों से संधि कर ली और बौद्धों ने इसका पूरी तरह पालन  किया। जब मुहम्द  बिन कासिम  बैरुन  में आया तो बौद्धों ने उसका स्वागत  किया, रशद आदि का पूरा इंतजाम  किया। इस  तरह हमारी आपसी लड़ाई ने सिन्ध का राज्य मुसलमानों के हवाले  हो गया। मुहम्मद  बिन कासिम  ने जो बौद्धों के मंदिर पर झंडा था, उसे गिरा दिया झंडे  के गिरने का प्रभाव दाहर की सेना पर बहुत ही बुरा पड़ा। बे युद्ध  का मैदान  छोड़कर भागने लगे। युद्ध  योग्य मनुषयों का कत्ल कर  दिया गया, मंदिरों के पुजारियों और  भिक्षुओं का भी कत्ल कर  दिया गया। यह काम  तीन  दिनों तक  जारी रहा कासिम  ने वहाँ मस्जित  बनवाई। बौद्धों ने युद्ध  में भाग  लिया हो या न  लिया हो लेकिन  मुगलों के लिये राशन  तथा रहने का इंतजाम   करने के कारण  ही मगलों का भारत  पर राज्य करने का आधार बना। धर्म  के संबंध  में बहुत से प्रश्न  बुद्धि  में उथल  पुथल  करते हैं, जो सदा से अनुत्तरित  हैं- 1.श्रीराम  का शूद्र  को तपस्या करने के अपराध  में मुत्युदण्ड देना, 2. सीता की अग्नि परीक्षा, 3. गर्भवति  स्त्री  को एक  राजा एवं पति द्वारा राज्य  से निष्कासन  एवं वनवास। 4. शूद्रों को मंदिर  प्रवेश  को अपराध  एवं पाप की श्रेणी में रखना। 5. शूद्रों का वेद श्रवण  को जघन्य  अपराध  मानना। बहुत से विद्वानों ने इन  प्रशनों का उत्तर अतार्किक  परिभाषायें गढ़ कर  दिया है। जैसे धर्म  के संबंध में कि धर्म  का  अर्थ  है धारण  करना, यह एक  अर्थ  हो सकता है किन्तु  धर्म  का वास्तविक  अर्थ  है गुण, स्वभाव, कर्तव्यों का निर्वहन, नियमों का पालन आदि।

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 29, 2012

    दिनेश जी, बौद्ध धर्म पर कासिम को सहायता का आरोप बड़ी ही चतुराई से लगाने का प्रयास किया जाता है किन्तु ऐसा करने वाले बेहद सामान्य बुद्धि का भी प्रयोग नहीं करते कि बौद्ध दाहिर की सीमा के अन्दर ही थे और आक्रमण शुरू होने के कारण दाहिर सेना ने नाकाबंदी कर रखी थी ऐसे मे यह कहना कि फिर भी राज्य के अन्दर से ही बौद्ध होने के कारण कुछ लोग रसद भेज रहे थे हास्यास्पद ही है। सिधु के उस पार यदि कहा जाय बौद्ध सहयोग कर रहे थे तो और भी बड़ा व्यंग होगा क्योंकि उधर एक तरफ से कत्ल और औरतों की सप्लाइ का काम शुरू था, कासिम ने बौद्ध होने के कारण किसी को नहीं छोड़ा उसने केवल काफिर के हिसाब से सभी का इलाज किया, यह खलीफा को भेजे गए उसके पत्र सामान्य विश्लेषण से ही स्पष्ट है। रसद खलीफा की ओर से आ रहा था और दाहिर द्वारा मार्ग रोक दिये जाने पर कासिम सेना मरने की कगार पर आ गई थी तब कासिम के द्वारा आतंकित भयभीत प्रतिनिधि मण्डल के लोगों ने रात में दुर्ग खोल दिया था जोकि अन्दर से राजा के पूरे वफादार थे, बौद्ध यहाँ भी कहीं नहीं थे। मंदिर की बात आप कर रहे हैं तो दो मंदिर मुख्यतः सामने आते हैं, देवल व नीरून का और दोनों हिन्दू मंदिर थे। सेना दाहिर की मौत के कारण हारी थी और दाहिर को मारने के लिए अपहरित स्त्रियों का प्रयोग कासिम ने किया था, दाहिर स्त्रियॉं की बेबसी देख नहीं सका और इस्लामी सेना के बींच घुस गया। यह तो आपको भी पता है कि पुजारियों के साथ भिक्षुओं को भी कत्ल किया गया फिर भी बौद्ध कासिम का सहयोग करते रहे…??? योद्ध एक-दो दिन की कहानी तो थी नहीं जो एक दिन मदद ले ली और दूसरे दिन सबको कत्ल कर दिया..?? भिक्षुओं का कत्ल और औरतों के बलात्कार के साथ साथ क्या बौद्धों की मदद जारी रही….?? भारत की टूटी तस्वीर दिखाने वाले चोचलों मे मत आइए… और बौद्धिक मतभेद शास्त्रार्थ संग्राम को हिंसा कहकर हिंसा को महिमामंडित मत करिए। बौद्धिक संग्राम सभ्य समाज का सूचक व ज्ञान के विकास का स्रोत रहा है इस देश में। मानवीय धर्म उन्हें समझाने की आवश्यकता है जिनकी नजर मे एक किताब से इंकार करने वाले सारे दोज़ख/जहन्नुम जाएंगे चाहे फिर वे कितने ही महान क्यों न हों!! हिन्दू धर्म को आप पलटकर क्यों सिखाएँगे जिसने ये पूरे विश्व को सिखाया है। फिर वही कि “कोई बतला दे कब काबुल मे जाकर कितनी मसजिद तोड़ीं..??” आपने जितने भी प्रश्न यहाँ पर लिखे हैं वे काफी पुराने हैं जिनका उत्तर यहाँ देने का तुक नहीं है क्योंकि यहाँ विषय योग का है जिसको उसकी जड़ों से काटने का षड्यंत्र हो रहा है, किन्तु आप स्वयंभू बुद्धिमानों की सोच से बाहर आकार सोचेंगे तो स्वयं समझ जाएंगे कि इन प्रश्नों को आधार बनाकर आक्षेप लगाना या तो छोटी सोच हैं अथवा दुर्भावना क्योंकि अविकृत ग्रन्थों मे ऐसा कुछ है ही नहीं, जो सीता आदि के प्रश्न है उनके उत्तर के लिए मूल ग्रंथ पढ़िये॥ आप धर्म के अपने अर्थ को सही समझ सकते हैं किन्तु धर्म का अर्थ धारण करना अतार्किक है तो धर्म शब्द ही गलत हो जाएगा क्योंकि इसकी उत्पत्ति ही इस धातु से हुई है। धारण का अर्थ ही इतना विस्तृत है कि आप जो भी सोचेगे उसके बाहर जा ही नहीं सकता। हाँ दुराग्रहवादी मजहबों को आप शराब भी कह सकते हैं और अफीम भी॥ अंत मे, यहाँ विषय “क्रिश्चियन योगा” का है जिसके अनुसार हिन्दू योग पद्धति (जोकि मूल है) शैतानी है और उसे विकृत करके जब क्रिश्चियन योगा कर दिया गया तब वह holy योगा हो गया…!!! इसके पीछे religion की घृणापरक विस्तारवादी सोच है जिसने ईसाईकारण के लिए आस्ट्रेलिया मे 50000000 अमेरिका मे 100000000 लोगों की हत्या की। हिन्दू धर्म का इतिहास ऐसा नहीं रहा अतः जबरन दोष निकालने के विषय से हटकर अप्रासंगिक विषयों को उठाना विषय सम्यक बुद्धि सम्यक नहीं है क्योंकि इससे चर्च के घृणित षडयंत्रों को सही नहीं ठहराया जा सकता।

    anoop pandey के द्वारा
    May 30, 2012

    दिनेश जी प्रणाम, वासुदेव जी नमस्कार, प्रतिक्रिया ही में सन्दर्भ इतना रोचक हो चला है की मेरी सलाह है इसके लिए आप लोग नया ब्लॉग या फोरम बनायें. क्यों की यहाँ पर इस वार्ता से बहुत लोगों का भला नहीं हो सकता. और दिनेश जी आपके प्रश्नों का थोडा सा उत्तर तो मै यहाँ दे ही देता हूँ, मै जिस हिन्दू धर्म का पालन करता हूँ उसके प्रणेता रघुकुल नंदन श्री राम नहीं थे अतः उनके सभी कृत्यों की जवाबदेही हिन्दू धर्म की नहीं है. शूद्रों का वेद श्रवण को जघन्य अपराध या मंदिर प्रवेश को अपराध एवं पाप की श्रेणी में रखना ये तो हिन्दू मान्यता नहीं है…..शबरी प्रकरण और बानर तथा भील जातियों की युति इसका सीधा विरोधाभास है और वो भी उसी काल खंड में. दूसरा विषय हिन्दू बौद्ध तथा मुस्लिम आक्रान्ता हैं तो वासुदेव जी की जानकारी ज्यादा सटीक है.अधिक वार्तालाप हेतु यह स्थान छोटा है.

anoop pandey के द्वारा
May 28, 2012

मित्र वासुदेव जी, सादर अभिवादन, ये चर्च के पहरेदार है बड़े मजेदार………अमेरिका में मेडिकल टेस्ट हुआ उसके बाद हमसे पुछा की भाई बताओ भाषा क्या बोलते हो बाद में रिपोर्ट के साथ कुछ चित्र कथाएं थमा दी हाथ में , एक थी बाइबल की कथाएं दूसरी शायद प्रभु यीशु के चमत्कारों पर थी. मेरी वाली हिंदी में और मेरे साथी की कन्नड़ में, एक बात तो गारंटी से कह सकता हूँ की अगर मै कहता की ‘भोजपुरी’ तो शायद उसमे भी लिखी एक कॉपी होती उनके पास और वो भी सात समुन्दर पार. यकीं नहीं आता की प्लानिंग इतनी तगड़ी है. ये वो ही हैं जिन्हों ने टेम्पलर्स नाम दिया था हत्यारों को. और पूरा इतिहास रंग दिया खून से. कभी गौटेमाला जाईये ; पूरी माया सबयता के नाम ही मिटा दिए. खैर इनसे बचना है तो भंडाफोड़ जरूरी है. साथ में सेवा का सच भी जमीनी स्तर के लोगो तक लाना पड़ेगा. अच्छी जानकारी के लिए धन्यवाद.

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    अनूप जी, मैंने भी ऐसे कितने चमत्कार देखे हैं| दिल्ली में मैं अपने पिताजी के साथ था आँखों की एक डॉक्टर के पास पिताजी के उपचार के सम्बन्ध में| डॉक्टर ईसाई थी, पहले ही दिन बोला कहाँ पे रह रहे हो यहाँ.. सन्डे को चर्च आना.. काफी ईसू की प्रार्थना होगी उससे काफी लाभ होगा!! ये एक MS डॉक्टर के शब्द थे.. फिर साथ में कुछ किताबें जैसे आप बता रहे हैं| जो मरीज चर्च हो आये थे उनका खास तबज्जो से इलाज हो रहा था और जिन्होंने उपेक्षा की वे वेचारे उपेक्षित..!! उन महोदया से मैंने पूंछा आप डॉक्टर होकर चर्च से इलाज करती हैं..?? वो बोलीं आप इन किताबों को पढियेगा आपको समझ आएगा..!! सौभाग्य से वे सभी किताबे मेरे लिए नै नहीं थीं.. फिर मैंने जब अपने अर्जित ज्ञान को कुछ बाँटना चाहा तब शायद उन्हें लगा यहाँ केवल दवा ही काम करेगी…!!! एम्स सफदरजंग जैसे सभी अस्पतालों के बाहर ये किताबी दुआ बाँटने वाले आपको मिल जायेंगे.. मजबूरी में फंसे लोगों की आस्था विश्वास की हत्या करने वाले इसे धर्म प्रचार कहते हैं और कुछ स्वयम्भू बुद्धिजीवी इसका समर्थन करते हैं यह कहते हुए कि धर्मपरिवर्तन लोगों की स्वेच्छा का विषय है…!!

चन्दन राय के द्वारा
May 28, 2012

मित्र , मुझे ये संकुचित मानसिकता ही लगती की हम धरम परिवर्तन करने को षड्यंत्र की संज्ञा दे , आस्था परिवर्तन होना , किसी भी भक्त की खुद की झूठी श्रद्धा और ढोंग का परिचायक है , पर यदि आस्था नए-नए प्रकार से उस इक इश्वर और इंसानियत की सेवा की बात करती है तो उसमे कोई बुराई नहीं , क्या हम हिन्दू रह के ही इश्वर को पा सकते है या धर्म परिवर्तन करके हम पाप के भागीदारी हो जायेंगे , जिसका निर्णय वो लोग कर रहे जिन्होंने खुद धर्म जात के आधार पर विश्व को बाँट दिया फैसला आप करे मित्र !

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    चन्दन राय जी, हम भारतियों के लिए धर्म एक ऐसा पवित्र व आस्था का विषय रहा है कि हम कभी कल्पना भी नहीं कर सके कि धर्म भी षड़यंत्र की विषयवस्तु हो सकती है परिणामतः लगभग १००० सालों की रक्त बलात्कारों से सनी गुलामी हमें भोगनी पड़ी..!! मुस्लिम आक्रमण का अँधा तूफ़ान भी पूरे विश्व में एक इस्लामी अल्लाह का दीन स्थापित करने के उद्देश्य से चला और पुर्तगाली भी पादरियों को साथ लेकर एक ईसा मसीह की सत्ता का उद्देश्य लेकर आये..!! दुर्भाग्य यह है कि आज भी हिन्दुओं को शुतुरमुर्गी सोच से बाहर आने की आवश्यकता नहीं लगती..!! आपने कहा क्या हम हिन्दू रह के ही इश्वर को पा सकते है या धर्म परिवर्तन करके हम पाप के भागीदारी हो जायेंगे…. पूरी विनम्रता के साथ कहना चाहूँगा कि यह एक अपरिपक्व प्रश्न है क्योंकि शायद आपने सुन रखा होगा कि हर धर्म एक ही पाठ पढाता है और आपने इसके आगे न ही कल और आज को जानने का प्रयास किया और न ही धर्मों को समझने के लिए कोई किताब को गंभीरता से स्वयं पढने समझने का प्रयास किया| सच को सुनने से बचने के लिए किसी पर बाँटने का आरोप रुपी रुई कानों में लगा लेने का एक फैशन चल पड़ा है.. लेकिन आपको पता होना चाहिए कि धर्म परिवर्तन से देशों के नक्से बदल गए.. सभ्यताएँ इतिहास के पन्नों में सिमट गईं.. नस्लें गुलाम बनी और इतिहास बन गईं.!! धर्मान्तरण एक षड़यंत्र है, इसे पुनः समझने के लिए लेख को गंभीरता से पुनः पढने का कष्ट करें..!!

May 27, 2012

“गर्व से कहो हम हिन्दू है” वासुदेव जी, हिन्दू धर्म वो अथाह सागर है जिसकी बराबरी कोई तालाब या पोखर नहीं कर सकता| हिन्दू धर्म और उसकी परम्पराएँ सदियों से विद्यमान रहीं है और रहेंगी| योग को योगा बनाने के प्रयास आज के नहीं हैं| इसमें उन दुष्कर्मियों को कितनी सफलता हाथ लगी है ये सबके सामने है| हिंदुत्व का गौरव कोई “कमसिन हसीना की जुल्फें” नहीं है जो बिखर जायेगा| हाँ, हिन्दू धर्म संगठित रहे इसके लिए सभी को मिल के प्रयास करने की जरूरत है|

    jlsingh के द्वारा
    May 27, 2012

    फिलहाल सहमत! बाद में विस्तृत कोमेंट करूंगा!

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    कुमार गौरव जी, बिलकुल सही कहा आपने, तलब या पोखर इस सागर की बराबरी कभी नहीं कर सकते| यह बात वे समझ चुके हैं शायद इसीलिए वे सागर की समृद्धि पर अपना दावा ठोंकने का दुष्प्रयास कर रहे हैं| निश्चित तौर पर हमारी जड़ें अत्यधिक प्राचीन सुदृढ़ व यथार्थ हैं किन्तु फिर भी हमें दो तरफ से सावधान रहने की आवश्यकता है- एक तो बाहरी दीमकों से और दुसरे अपनी ही जड़ों पर कुल्हाड़ी चलने वालों से…!! साभार!

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 28, 2012

    आदरणीय जवाहर जी,हार्दिक आभार विषय को समय देने के लिए|


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