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पॉलिसी पैरलिसिस और मनमोहन की पोल

Posted On: 31 May, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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rupeeरुपए के गिरते मूल्य व बढ़ती महंगाई के बींच भारतीय अर्थव्यवस्था इन दिनों बड़े संकट से गुजर रही है। यह संकट दो स्तरों पर है, पहला अर्थशास्त्रीय संकट (economical crisis) जो बड़े अर्थशास्त्रियों, कंपनियों के CEOs, शेयर दलालों व सरकारी मंत्रालयों के चर्चा व बहस का विषय है, आम जनता को इससे मतलब नहीं रहता। दूसरा संकट भीषण महंगाई व बेरोजगारी के रूप में है जिसने आम आदमी को दो समय की रोटी के लिए भी सोचने को मजबूर कर दिया है किन्तु यह सरकार व कॉर्पोरेट की चिन्ता का विषय नहीं है। एक देश की अर्थव्यवस्था की इससे बड़ी बिडम्बना और कुछ नहीं हो सकती। परिभाषाओं में इन दोनों संकटों को कितना ही एक साथ रखने का प्रयास क्यों न किया जाए यथार्थ में यह एक खाईं है जो दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। OECD रिपोर्ट 2011 के अनुसार विगत 20 वर्षों में भारत में गरीबी और अमीरी के बींच अन्तर दो गुना बढ़ गया है अर्थात अमीर दो गुना अमीर हो गया और गरीब दो गुना गरीब हो गया। क्या जमीन की सच्चाई यह नहीं बताती कि हमें अपनी राष्ट्रीय अर्थनीतियों की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता है?
जिस अर्थशास्त्र पर हमारी आज की अर्थव्यवस्था निर्भर है वस्तुतः वह नियम परिभाषों का ऐसा जाल है जो न ही किसी समस्या को वास्तविक रूप में परिभाषित करता है और न उसके समाधान को ही। किसी भी विषय पर प्रायः अर्थशास्त्री ही एकमत दिखाई नहीं देते हैं। यदि कहा जाये कि यह अर्थव्यवस्था गरीबों के जीवन के लिए स्थान नहीं छोडती तो गलत नहीं होगा क्योंकि परिदृश्य यही स्पष्ट करता है। और स्पष्ट शब्दों में यह अर्थव्यवस्था परिभाषाओं के मकड़जाल में पूँजीपतियों का प्रोपगंडा मात्र है। इसी प्रोपगंडा अर्थव्यवस्था ने इन दिनों पॉलिसी पैरालिसिस अर्थात नीतियों में लकवा नाम से एक नया टर्म गढ़ा है। यह शब्द प्रत्येक क्षेत्र में, विशेष तौर पर फुटकर बाजार में, मुक्त विदेशी निवेश को सरकार द्वारा अनुमति न मिल पाने के कारण लाया गया है। पॉलिसी पैरालिसिस यह प्रचारित करने का प्रयास है कि रुपये का गिरता मूल्य व देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था का कारण प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को छूट न दिया जाना है तथा रीटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति देकर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है व महंगाई गरीबी आदि का भी हल इसी से संभव है। इसे कॉर्पोरेट भाषा में लॉबिंग कहते हैं जिसका उद्देश्य कंपनियों का हित साधना होता है। लॉबिंग की एक शाखा प्रोपगंडा थियरि पर आधारित है कि किसी विषय को अपने अनुकूल इतना अधिक प्रचारित किया जाए कि लोगों की सोच बदल सके। यहाँ सच-झूठ महत्व नहीं रखता।
पिछले कुछ आंकड़ों पर गौर करें तो 2006-07 में 2005-06 के $5,540 million की अपेक्षा 125% की वृद्धि के साथ $12,492 million का विदेशी निवेश हुआ तथा देश की GDP 9.2% रही, 2007-08 में पुनः 97% की वृद्धि के साथ यह निवेश $24,575 million हो गया किन्तु GDP 9.2% से 9% पर आ गई। 2008-09 में विदेशी निवेश में पुनः 28% की वृद्धि हुई और यह $31,396 million तक पहुँच गया किन्तु GDP 9% से 6.7% पर लुढ़क गई। 2009-10 में विदेशी निवेश में 18% की गिरावट आई किन्तु GDP 6.7% से 8% पहुँच गई, 2010-11 में यह और भी 25% कमी के साथ $19,427 million पर पहुँच गया जोकि 2007-08 से भी कम था किन्तु GDP 8% से उछलकर 8.5% पहुँच गई। 2011-12 में इसमें लगभग दोगुनी बढ़ोत्तरी हुई और यह 36.5 billion तक जा पहुंचा, मार्च,2012 निवेश 8 गुना बढ़कर रेकॉर्ड $8.3 billion विदेशी निवेश हुआ किन्तु इस वर्ष GDP 6.1 के रेकॉर्ड निम्न स्तर पर रही। महंगाई इस दौरान अनवरत बढ़ती रही यह सर्वविदित है। ऐसे में समझना कठिन हो जाता है कि किस आधार पर जनमानस में यह भरने का प्रयास हो रहा है विदेशी निवेश की कमी के कारण अर्थव्यवस्था संकट में जा फंसी है और किस आधार पर पॉलिसी पैरालिसिस जैसे शब्द गढ़े गए? सफाई में यह कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था के लिए एक कारण ही उत्तरदायी नहीं होता किन्तु फिर यह बताने का प्रयास क्यों हो रहा है कि केवल कड़े निवेश कानून ही अर्थव्यवस्था को डुबोए दे रहे हैं? यूरोपीय अर्थव्यवस्था के ढहने जैसे कारणों के कारण गिरते रुपये का कारण भी पॉलिसी पैरालिसिस बताने के प्रयास क्यों किए जा रहे हैं?
सत्य यह है कि $450 billion की भारी भरकम भारतीय खुदरा बाजार (retail sector) पर वाल मार्ट व टेस्को जैसे वैश्विक दबंगों की नजर गड़ी है जिसके चलते अमेरिका, विश्व बैंक, IMF आदि के भारी दबाब व इन कंपनियों की लॉबिंग के कारण सरकार ने नवम्बर 2011 में रीटेल में 51% विदेशी निवेश को स्वीकृति दे दी थी तथा यह बताने का प्रयास किया था कि इससे महंगाई कम होगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। जबकि आंकड़े बताते हैं कि जिन जिन गरीब देशो में वाल मार्ट जैसी कंपनियाँ गईं वहाँ दीर्घकालिक समस्याएँ बढ़ी हैं। भारत में चार करोड़ परिवारों की रोटी खुदरा बाजार पर टिकी है जिसके चलते इस कदम का भारी व्यापारिक व राजनैतिक विरोध हुआ और सरकार को अपना फैसला स्थगित करना पड़ा। तभी से लॉबिंग व PR टीमों का प्रयोग करके मीडिया में पॉलिसी पैरालिसिस का राग तेज किया गया और इस सुनियोजित गढ़े गए शब्द से ऐसा भ्रम फैलाने का प्रयास शुरू हुए कि कथित आर्थिक सुधार न हुए तो अर्थव्यवस्था डूब जाएगी।
compareआज भी इस देश में आधे से अधिक जनसंख्या उस गरीबी के बोझ तले ज़िंदगी जी रही है कि कहीं भूख से कहीं ठंड से तो कहीं गर्मी से लोग सड़कों पर या टूटी झोपड़ी में मर जाते हैं, खून से लेकर किडनी तक बिकती हैं, कहीं कहीं माँ बाप की औलादें भी बिकती हैं किन्तु सरकार इक्नोमिक्स के बड़े-बड़े शब्दों में देश के विकास की बात करती है! करोड़ों रुपये विदेश यात्राओं पर और लाखों महीने के पेट्रोल पर खर्च करने वाले लाखों करोड़ों खर्च करके जो मीटिंग करते हैं उसमे तय किया जाता कि गरीबी की सीमा 27 रुपये है या 32 रुपए!!
जब तक देश की जनता के लिए अर्थशास्त्र की सारी परिभाषाएँ यहीं तक सीमित हैं कि उसे दो वक्त की रोटी मिल जाए, बच्चों के लिए दूध खरीद सके और इसलिए न मरे कि दवा खरीदने को पैसे नहीं थे, शॉपिंग मॉल विकास और अर्थव्यवस्था के मानक नहीं हो सकते। मनमोहन मंत्र और पॉलिसी पैरालिसिस के प्रोपगंडा सभी चन्द अमीरों के लिए की जाने वाली लॉबिंग मात्र हैं अन्यथा आर्थिक सुधार के इन 20 वर्षों मे (1991-2011) विकास के नाम पर गरीबी और अमीरी के बींच खाईं दोगुनी न हो गई होती! यही मनमोहन के अर्थशास्त्र व पॉलिसी पैरालिसिस के शोर की पोल है।
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-वासुदेव त्रिपाठी

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rahulpriyadarshi के द्वारा
June 3, 2012

हमेशा की तरह तथ्यपूर्ण दमदार आलेख,लेकिन इनकी पोलिसी को परलैसिस मार देगा,यही बात तो कबसे लोगों को चेता रहे थे,इनको छोड़कर देश में सबको पता था की इनके बेलगाम मनमर्जी की वजह से शीघ्र ही भारी घाटा अर्थव्यवस्था को होने लगा है,लेकिन अनार्थ्शास्त्री हैं की लगे हुए हैं,लगता है कि भगवान् के घर भी आजकल वोल्टेज कम रहने लगी है,वरना इनके जैसे देश के नमकहरामों की आत्मा को ही परलैसिस का अटैक आ जाना चाहिए.

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 3, 2012

    राहुल भाई..!! अर्थशास्त्री होने के नाम पर क्या क्या करते रहेंगे देश की जनता और गरीबों के साथ हमारे प्रधानमंत्री और इनके सहयोगी लोग..?? गरीब अमीर के बींच बढती खाई ने स्थिति को वासत्व में गम्भीर कर दिया है|

चन्दन राय के द्वारा
June 1, 2012

वासुदेव जी , सरकार अपनी घटिया आर्थिक नीतियों ,उत्पादन और आयत निर्यात के असंतुलित समीकरण को रूपए की गिरती घाटियाँ बहाने से ढापने की कोशिश कर रही है , कच्चे तेल खुद पर बेकार इल्जाम लिए है , पर ओढने दीजिये इनको ये ढाल यही हाल रहा तो मंदी खुद बा खुद इनको नंगा कर देगी

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 3, 2012

    चन्दन जी, नीतियाँ असंतुलित हैं क्योंकि उनका निर्धारण जनता के हित में नहीं कार्पोरेट के हित में हो रहा है..!! वैसे नंगा ये हमें गरीबों को ही कर रहे हैं… खुद ऐश कर रहे हैं!!!

satyavrat shukla के द्वारा
June 1, 2012

वासुदेव जी बहुत ही अच्छा और ज्ञान वर्धक लेख है जिस तरह से आपने आंकड़े प्रस्तुत करके वर्तमान परिपेस्ख को उजागर कियाहै वो kabil-e-tareef है |पोलिसी परलिसिस शब्द का सही वर्णन कियाहै और कहीं न कहीं ये सब जिस कारन से गधा जा रहा है उसको भी आपने सही दर्शाया है |

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 3, 2012

    हार्दिक आभार सत्यव्रत जी|

bharodiya के द्वारा
May 31, 2012

भरत में अर्थव्यवस्था की खराबी राजकिय कारण से ही है आर्थिक कारण से नही । चीन के बाद भारत ही है जीसमे काम करनेवाली यंग जनरेशन सब से ज्यादा है । अर्थव्यवस्था उद्योग धन्धे पर चलती है । और ये यंग जनरेशन करती भी है । लेकिन योरोप की बुढी जनरेशन और हमारी सरकार ईस जनरेशन को गधा ही समजती है । उसे बस गधों की तरह काम ही करना है । “कर्म किये जा फल की ईच्छा ना कर ऐ ईन्सान” ये ईन की ही देन है, कोइ शास्त्र का वाक्य नही है । ये गघे अगर ज्यादा काम कर के बचत भी कर लेते हैं तो उस की बचत को ही खा जाते चलन को गीरा के । मुझे लगता है ईलुमिनिटी का पहला शिकार भारत ही है । -

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 31, 2012

    भरोदिया जी, यह आपने सही कहा है कि खराबी राजकीय है आर्थिक संसाधनों की कमी भारत में बिलकुल नहीं है..!! आंकड़ों के आधार पर एक संशोधन करना चाहूँगा कि युवा जनसँख्या के मामले में भारत विश्व में नंबर दो पर नहीं नंबर एक पर है, चीन इस मामले में हमसे काफी पीछे हैं और वो वृद्ध होती जनसँख्या की समस्या झेल रहा है| चीन की युवा जनसख्या में अभी जो कमी ई है वह शायद ६% से भी कुछ अधिक है| किन्तु भारत इस शक्ति का यथोचित लाभ उठा नहीं पा रहा है| …आभार!

jlsingh के द्वारा
May 31, 2012

वासुदेव जी, नमस्कार! घोर अन्धकार ! जनता लाचार! भ्रष्ट सरकार! लोबिंग ब्यापार! किडनी ब्यापार ! अर्थशास्त्री का ही अनाचार! ….और कितना खून चूसोगे यार !

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 31, 2012

    जवाहर जी नमस्कार! आपने जो कुछ लिखा है सब सच ही है!! नीचे प्रतिक्रिया में आपने पूंछा ये हालत और बात हजम नहीं होती तो ये आम आदमी के हजम करने की चीज नहीं है, निगल ली हो तो तुरंत उगल दीजिये…. ये बड़े पेट दुरुस्त हाजमे वाले लोग ही हजम कर सकते हैं और वो छोड़ेंगे भी नहीं आपके लिए जो हजम करना पड़े…!!!

anoop pandey के द्वारा
May 31, 2012

मित्र वासुदेव जी , नमस्कार, अमूमन इस विषय पर प्रतिक्रिया देना मै उचित नहीं समझाता क्यों की मेरी आमदनी भी डॉलर में होती है तो रुपये का टूटना मेरे लिए फायदे का सौदा है किन्तु आप से जुड़ाव के कारण मन की बात कह देता हूँ.आपने यूरोप की बात की तो सारे यूरोपी देशों ने जब से एक मुद्रा ले ली तभी से उनका बुरा हाल है. मेरे कुछ रोमानियन और क्रोएट मित्र इसे त्रासद पूर्ण फैसला मानते हैं.पहले उनकी मुद्रा का मूल्य उनके देश की अर्थव्यवस्था के अनुसार था और अब यकायक तो विकसित देशो के सामने खुद को खड़ा पा रहे हैं और दिन बी दिन कर्जे में डूबते जा रहे हैं. भारत की बात अलग है , जैसा की मै पहले भी कह चूका हूँ की सराफा बाज़ार का भाव और डॉलर का भाव समझ से परे है…..पर एक बात जरूर पता है की परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर प्रतिबंधों की भरमार थी तब भी रूपया आज से अच्छी हालत में था. कहने का अर्थ ये है की यदि तेल को निकाल दें तो भारत की अर्थव्यवस्था स्वयं में ही इतनी आत्मनिर्भर है की किसी और बात की जरूरत नहीं. और तेल तो खाड़ी के देशों से मिलता है……तो तेल का भाव कम ज्यादा होने से दीनार का भाव कम ज्यादा होना चाहिए……ये डॉलर का उतार चड़ाव किस कारण है ये नहीं समझा. कुल मिला कर बात ये है की मेरा अर्थशास्त्र का ज्ञान अत्यंत अल्प है पर एक बात तो मेरी मोटी बुद्धि से नहीं निकल रही की अर्थशाष्त्री कहते है भारत सबसे बड़ा बाजार है….मतलब की हम खरीददार हैं तो मर्जी हमारी चलेगी की हम किस भाव लेंगे, पर यहाँ तो सब उल्टा हो रहा है. ये नीतियों को लकवा नहीं मार गया है बल्कि लकवाग्रस्त नीतियाँ चलन में लायी जा रही है.

    jlsingh के द्वारा
    May 31, 2012

    पांडे जी और वासुदेव जी, युगल प्रणाम!! समझ में तो हमको भी कुछ नहीं आ रहा है कि ई सब क्या हो रहा है ????? जहाँ बंगाल, बिहार, उडीसा (पुराना संयुक्त प्रान्त) पहले से ही जर्जर है, आज भी कौनो ख़ास सुधार नहीं हुआ है फिर IPL मालिकों को ‘सोने की चेन’…… ये बात कुछ हजम नहीं हुई! …..कोई हाजमोला ????? … मनमोहन जी तो यही सब देख सुनकर कटे हैं महंगाई बढ़ी है इसका मतलब लोगों की आमदनी बढ़ी है …. पेट्रोल पम्प पर भीड़ कम हो गया क्या??? आप दोनों मिलकर हमको समझाइए! आभार सहित !

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 31, 2012

    अनूप भाई, ये अर्थशास्त्र एक ऐसा विषय रहा है जिससे मेरा कभी संबंध नहीं रहा…. डिमांड सप्लाइ सीआरआर सीएलआर से अधिक कुछ नहीं पढ़ा। ये लेख तो आप समझ लो कि मुझसे लॉबिस्ट लोगों ने जबर्दस्ती लिखवाया है। मैं हर दिन पॉलिसी पैरालिसिस का राग सुन सुन कर जब पक गया तो मैंने इस पर कुछ दिमाग चलाने की सोंची… अन्यथा इक्नोमिक्स के नाम से ही मैं इतने दिनों से उपेक्षा कर रहा था। फिर मैंने रिजर्व बैंक के कुछ आंकड़े जुटाये, जीडीपी के आंकड़े देखे, आंकलन किया तो ये सच मुझे हाथ आया। मेहनत तो मैंने बस थोड़ा ज्ञानवर्धन व सच जानने के लिए की थी फिर लगे हाथों लेख भी लिख दिया। ये लेख वैसे सामान्य बुद्धि का ही विषय है… पोल खोलने के लिए इतना काफी भी है। हो सकता है अर्थशास्त्र के अनुसार कुछ नुख्तचीनी निकले लेकिन व्यावहारिक अर्थशास्त्र तो यही है…!!! ये लॉबिंग मुझे भी पढ़ाई गई इसलिए मुझे खूब इसकी भाषा शैली समझ आती है… रही बात भाई आपके लाभ कि… तो डॉलर जब घर भेजते होंगे तो ज्यादा रुपए बनके मिलता होगा… लेकिन उस लाभ से ज्यादा मार आपके घर वालों पर तब पड़ती होगी जब वो उस रुपये मे बदले डॉलर को यहाँ खर्च करते होंगे। अगर घर नहीं भेजते हैं तो कुछ लाभ आपको नहीं होता होगा यदि निवेश आदि नहीं करते होंगे। कुल मिलाकर यदि आपके परिवार के कुछ सदस्य यहाँ हैं तो आप लाभ मे नहीं हो सकते!! :)


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