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राष्ट्रपति की औपचारिकता का औचित्य

Posted On: 15 Jun, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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presidentभारतीय संविधान अपनी कई विशेषताओं के कारण विश्व में अनूठा माना जाता है किन्तु इसका सबसे बड़ा अनूठापन यह है कि लाखों बलिदानों के मूल्य पर जब भारत को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से मुक्ति मिली और अपना तन्त्र स्थापित कर स्वतन्त्रता प्राप्ति का अवसर आया तो दुर्भाग्य से हमारे नीति निर्णायकों अथवा संविधान निर्माताओं ने वही तन्त्र व व्यवस्था देश पर थोप दी जिसके विरुद्ध पिछली दो सदी अनवरत संघर्ष किया गया था। भारतीय संविधान के लिए निर्माण के स्थान पर संकलन शब्द अधिक उपयुक्त है क्योंकि संविधान के ढांचे में विभिन्न देशों से जिस तरह व्यवस्थाएं जैसे कि अमेरिका से संघीय ढांचा व राष्ट्रपति, ब्रिटेन से संसदीय रूपरेखा, रूस से मौलिक कर्तव्य व संविधान की उद्देशिका (प्रिएम्बेल) की भाषा तक ऑस्ट्रेलिया से लाकर जोड़ी गई वह विभिन्न जाति के अंगों को जोड़कर एक नया शरीर बनाने जैसा था। भारतीय संविधान अंग्रेजों के बनाए नियम क़ानूनों पर आज तक काम कर रहा है यह सर्वविदित है। दुर्भाग्य से यह स्थिति तब बनी जब गांधी जी स्वयं कहा करते थे कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं!
संविधान की यह विडम्बना भारतीय राष्ट्रपति पद के संदर्भ में स्पष्टतः परिलक्षित होती है। नागरिक शास्त्र के रूप में जब बच्चा भारतीय संविधान का क ख ग घ सीखता है तभी से उसके मन में यह प्रश्न उठना प्रारम्भ हो जाता है कि राष्ट्रपति की वास्तव में शक्तियाँ अधिकार व औचित्य क्या क्या हैं किन्तु इसका उत्तर अन्त तक संभवतः एक पहेली ही बना रहता है। राष्ट्रपति के अधिकारों के संदर्भ में जिन शब्दों का प्रयोग संविधान में होता है उनमें पहला मुख्य शब्द है “सलाह”। यह शब्द सुनिश्चित करता है कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद (council of ministers) की सलाह और व्यवहार में इच्छा के बिना कुछ नहीं करेगा। प्रयोगिक रूप से राष्ट्रपति को ठप्पा मात्र सिद्ध करने के लिए यह शब्द स्वयं में पर्याप्त है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति को चार अधिकार प्राप्त हैं कि मंत्रिपरिषद कब तक सत्ता में रहेगी, नए राज्यों के निर्माण अथवा पुनर्निर्धारण जैसे कानून संसद राष्ट्रपति की अनुशंसा पर ही प्रस्तावित करेगी, उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति विधि विशेषज्ञों की सलाह पर करेगा एवं नए राज्य के निर्माण अथवा उससे संबन्धित निर्णयों में राष्ट्रपति उस राज्य की विधानसभा से विचार विमर्श करेगा। वास्तविक धरातल पर राष्ट्रपति के इच्छाकाल का आशय सरकार के कार्यकाल मात्र से होता है तथा राष्ट्रपति के नाम पर राज्यों के गठन से लेकर न्यायाधीशों की नियुक्ति में विचार विमर्श व निर्णय मंत्रिपरिषद ही करती है। भाषाई आधार पर आंध्र प्रदेश के निर्माण को स्वीकृति देकर नेहरू सरकार ने 1953 में जो भूल की थी वह पं राजेंद्र प्रसाद संभवतः नहीं करते यदि राष्ट्रपति के रूप में उनके हाथ में वास्तविक अधिकार होते! तेलंगाना पर मचे बवाल में भी इन पाँच सालों में प्रतिभा पाटिल का नाम शायद किसी ने भी नहीं सुना होगा। यदि और अधिक धरातल पर आकर देखा जाए तो इन सभी अधिकारों की चाभी मंत्रिपरिषद के हाथ भी न होकर दस जनपथ की सुप्रीमो के हाथ में ही है, बावजूद इसके कि गठबंधन धर्म की मजबूरियां सामने रहती हैं। सत्ता के विकेन्द्रीकरण के आदर्श पर टिके लोकतन्त्र में सत्ता का एक जगह केन्द्रित होने का यह हास्यास्पद सच संविधान की विचित्र विडम्बना है।
राष्ट्रपति के संदर्भ में यह संवैधानिक विडम्बना तब और भी अधिक जटिल व सोचनीय हो जाती है जब संविधान की दृष्टि में इस सर्वोच्च पद की नियुक्ति भी व्यक्ति विशेष की दया अनुकम्पा के आधार पर की जाती है। आगामी राष्ट्रपति को लेकर जिस तरह से सियासी उठापटक का दौर चल रहा है उसे सियासी तमाशे का एक अद्भुत नमूना ही कहा जा सकता है। अपने बूते राष्ट्रपति बना पाने में असमर्थ होने के बाद भी कॉंग्रेस किसी भी कीमत पर दस जनपथ के विश्वसनीय को ही राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे देखना चाहती है क्योंकि कई बार निर्णय लेने में अक्षम होने पर भी राष्ट्रपति से निर्णयों को रोकने जैसे काम बखूबी कराये जा सकते हैं। यह तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब कॉंग्रेस भी यह जानती है कि ये पाँच साल यदि पूरे हो भी जाएँ तो भी अगली बार सत्ता से काफी दूर ही महफिल जमानी पड़ेगी।
यदि कॉंग्रेस ने वास्तव में प्रणब मुखर्जी पर ही अंतिम निर्णय लिया है तो स्पष्ट है कि इस बार कॉंग्रेस केवल संकेत समझने वाला नहीं वरन संकेत समझने वाला राजनैतिक बुद्धिजीवी राष्ट्रपति के रूप में चाहती है। जहां तक हामिद अंसारी का प्रश्न है सोनिया उन्हें ऐसी गोट के रूप में प्रयोग करना चाहती हैं जो वास्तव में प्रणव को मजबूत करने के लिए ही चली गई है क्योंकि अंसारी के नाम पर ममता मुलायम दोनों की असहमति है अतः कॉंग्रेस को उम्मीद है कि अंसारी के मुक़ाबले प्रणव विकल्प रूप में स्वीकार कर लिए जाएंगे। ममता मुलायम ने अपनी मर्जी से तीन नाम रखकर जो दांव चला है उससे कॉंग्रेस भले ही असहज दिख रही हो किन्तु इतना तो तय है कि अंतिम निर्णय दस जनपथ की पसंद से ही होगा भले ही वह थोड़ा सीधे सामने आए अथवा और अधिक राजनैतिक तमाशे के बाद। तीन साल दिल्ली पर हेकड़ी चला चुकीं ममता अब भले ही बंगाल की कुर्सी से संतुष्ट हो जाएँ किन्तु सौदेबाजी में सिद्ध मुलायम अभी कॉंग्रेस से काफी लाभ लेना चाहेंगे, विशेषकर तब जब उनके पास भाजपा नीत किसी भी विकल्प पर विचार करने की कोई संभावना नहीं है। इस द्वंद की वास्तविकता तथा परिणाम चाहे कुछ भी हो किन्तु इतना तय है कि पहले से ही संविधान द्वारा एक ठप्पे के रूप में स्थापित राष्ट्रपति पद की अब गरिमा भी दांव पर है। डॉ कलाम जैसे व्यक्ति के साथ जहां देश के आम आदमी की सहानुभूति के साथ साथ भाजपा सहित कथित रूप से मुलायम ममता आदि का समर्थन भी है किन्तु फिर भी जिस तरह से दस जनपथ की पसंद नापसंद के कारण उन्हें किनारे किया जा रहा है उससे राष्ट्रपति चुनाव की उस प्रक्रिया की कलई भी खुल जाती है जिसमें जनसंख्या के आधार पर विधायकों व सांसदों के वोट का मूल्य निर्धारण कर यह माना जाता है कि विधायक व सांसद राष्ट्रपति चुनने में जनता का प्रतिनधित्व करेंगे।
ऐसे में देश के प्रथम नागरिक के रूप में चुनकर कोई भी आए लेकिन इतना निश्चित है कि वर्तमान संवैधानिक आधार पर तो भविष्य में देश को कृपापात्र राष्ट्रपति ही अधिक मिलेंगे जो स्वयं पर की गई कृपा का ऋण उतारने के लिए अपने कृपालु के सम्मुख नतमस्तक रहेंगे और सपरिवार विदेश यात्राओं पर आम आदमी के खून पसीने की कमाई के 200-300 करोड़ खर्च कर देश को अपनी सेवाएँ देते रहेंगे।
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यह लेख राजनैतिक आंकलन पर लिखा गया था, अब जबकि चित्र स्पष्ट हो गया है और वैसा ही हुआ जैसा की राजनैतिक जोड़-घटाने के आधार पर लेख में अनुमान लगाया गया था। मुलायम कॉंग्रेस के साथ चले गए हैं और ममता किनारे हो गईं हैं ऐसे में प्रणब का राष्ट्रपति बनना भले ही तय हो गया हो लेकिन मुलायम ने कॉंग्रेस को ठग लिया है भले ही कुछ विश्लेषक ममता को ठगा समझ रहे हैं। अब कॉंग्रेस का सत्ता में 2014 तक टिकना लगभग असंभव हो गया है लेकिन फिर भी अगले पाँच सालों के लिए रायसीना हिल 10 जनपथ की पक्की पकड़ में जा चुका है।
-वासुदेव त्रिपाठी

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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pritish1 के द्वारा
October 29, 2012

क्या लिखते हो भैया……….आपके लेख आंखें खोलने वाले होते हैं किसी भी क्षेत्र में लिखे हो आपने……..!! वन्दे मातरम

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 29, 2012

बहुत अद्भुत अहसास…सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद . सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला –

yogeshkumar के द्वारा
June 20, 2012

जनाब…..राष्ट्रपति पद को लेकर सारी बहस गैर जरूरी लगती है… कुछ काम का नहीं यहाँ का राष्ट्रपति …मात्र रबर स्टैम्प है….. कोई भी बने उसे जिंदगी के आखिरी वक्त के मजे लेने हैं… घूमना है..मस्ती करनी है… देश दुनिया की तफरीह करनी है… और फिर…..!!!!!!!!!!!!

चन्दन राय के द्वारा
June 18, 2012

मित्र , मुझे तो राष्ट्रपति चुनाव की गहमागहमी और राजनेतिक पार्टिओं की पेतरेंबाजी ,जाने अनजाने देश का भला करती सी प्रतीत होती है , किसी इक व्यक्ति का निर्विरोध इस गरिमामय पद पर आसीन होना ,व्यक्ति विशेष के चरित्र का प्रमाणपत्र नहीं है और देश हित में भी नहीं लगता , आपसी विरोध ,असहमति और गठबंधन मज़बूरी नहीं ,लगाम है जिसे राजनेतिक पार्टियां अपनी गलतियो और नकारिओं को ढापने का बहाना समझती है इस विषय पर सर्वसम्मति ना होना ,व्यक्ति विरोध ,चर्चा, इक मंथन की तरह है , जो मजबूर करता है उचित व्यक्ति का आकलन और मानसिक जाग्रति को , यही कारन है की सोई अन्ना टीम को प्रणब के कुकृत्यों की याद आ गई आपके उठाये मुलभुत मुद्दों पर निश्चित ही बदलाव की आवशयकता है

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 17, 2012

अत्यंत सुन्दर विश्लेषण !एतदर्थ विश्लेषक को कोटिशः बधाई !’ निर्माण के स्थान पर संकलन ‘ अच्छा लगा ! पुनश्च !

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 17, 2012

    आचार्य जी, धन्यवाद| मैंने तो इस लेख को विश्लेषण के रूप में न लिखकर सुस्पष्ट को शब्द देने का प्रयास किया था क्योंकि राष्ट्रपति व इस सन्दर्भ में मैं संविधान को असफल मानता हूँ और यह सुस्पष्ट ही है!! ..साभार!

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 17, 2012

मेरी तो बस इतनी अभिलाषा है की राष्ट्र का पति चाहे जो कोई भी बने बस वोह लंबित फांसी के केसों पर उचित फैसला लेकर अपना राष्ट्र धर्म निभाए जय भारत http://krishnabhardwaj.jagranjunction.com/2012/06/17/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 17, 2012

    राजकमल जी, इस बात को तो मैं सम्मिलित करना चाहता था फिर मैंने सोचा अफजल कसाब को भले ही जिंदगी मिल गई हो किन्तु कॉंग्रेस सरकार की उम्र पूरी हो गई है इसलिए जाने दो…!!! जय भारत

kuldeepsinghbais के द्वारा
June 17, 2012

वासुदेव जी आपका लेख पड़कर ऐसा लगा जैसे मै कुलदीप नैयर जी को पड़ रहा हु मै आपसे बिलकुल सहमत हु एक और बात कहना चाहूँगा की अब समय आ गया है की हम ब्रिटेन की नक़ल वाले संबिधान प्रणाली को छोड़ दें और अमेरिका की तरह राष्ट्रपति प्रणाली की तरह नया कानून और संविधान प्रणाली बनाये

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 17, 2012

    कुलदीप जी,वास्तव में किसी भी देश का संविधान उसकी अपनी संस्कृति व परिदृश्यों के अनुसार होता है.. किसी भी देश का संविधान दुसरे देश के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता.! हाँ कुछ अनुकरणीय बाते कही से भी ली जा सकती हैं किन्तु उन्हें लागू अपने राष्ट्रीय परिवेश के अनुसार hii किया जा सकता है| दुर्भाग्य से ये बात संविधान निर्माताओं ने संज्ञान के बाहर रखी!

rajuahuja के द्वारा
June 17, 2012

प्रिय वासुदेव जी ,साधुवाद ! विडम्बना है की इस देश के राजनीतिज्ञों का ज़मीर लगभग मृतप्राय: है !इनसे लोकहित की अपेक्षा कैसी ? ऐसे में किंकर्त्तविमूढ़ सा बुद्धिजीवी-वर्ग अवाक् है ! मुह तो खुला है लेकिन शब्द …नदारद !

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 17, 2012

    राजू जी, सहमत हूँ आपके शब्दों से! बुद्धिजीवी वर्ग अपनी सीमा में संकुचित है जो कि अंधेर नगरी को बढ़ावा दे रहा है! .साभार!

pritish1 के द्वारा
June 16, 2012

प्रिय मित्र…….आपके लेख से प्रभावित हूँ……. मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है……..मेरी कहानियां ऐसी ये कैसी तमन्ना है…१ और ऐसी ये कैसे….२ पर अपने विचार प्रकट करैं आशा करता हूँ आपको अच्छे लगेंगे… आपके सुझावों की प्रतीक्षा मैं……..

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 16, 2012

    pritish जी, बिलकुल आपकी कहानियों को पढूंगा, कहानियां तो वास्तव में बड़ी प्रभावशाली विधा होती है.. कम लोग ही कहानीकार हो पाते हैं!!

allrounder के द्वारा
June 16, 2012

प्रिय भाई वासुदेव आपके आलेख सदा ही ज्वलंत मुद्दों को लेकर और तथ्यपरक होते हैं, और एक बार फिर से देश के इस सबसे बड़े ज्वलंत मुद्दे पर सशक्तता से चली तुम्हारी लिखने के लिए बधाई !

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 16, 2012

    सचिन जी, हार्दिक आभार!

chaatak के द्वारा
June 16, 2012

भारत के एकलौते लेकिन सबसे ताकतवर और सबसे निरीह ठप्पे के बारे में आपकी ये पोस्ट काफी पसंद आई| इस संकलित/आयातिक संविधान से आज भी उसी गुलामी की दुर्गन्ध आती है जिससे मुक्त होने के लिए व्यर्थ कुर्बानियां दी गईं | वैसे रायसीना एक और काठ के उल्लू का स्वागत करने को तैयार है जिसका रिमोट (सबको पता है किसके पास है)| अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 16, 2012

    चातक जी, ये रिमोट वाली परंपरा के साथ लोकतंत्र तो हास्यास्पद ही है!! वासतव में ऐसे लोकतंत्र का कोई महत्व नहीं और इसमें भी दो राय नहीं कि कहीं न कहीं ये हमारे संविधान की विफलता ही है!! ..आभार!

bharodiya के द्वारा
June 16, 2012

वसुदेव भाई नमस्कार एक डॉक्टर की तरह राष्ट्रपति पद की नाडी चेक करते हैं तो लगता है अब ईस में जान नही बची है । डॅथ-सर्टि दे देना चाहिए । ताकी क्रिया करम जल्दी हो सके ।–

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 16, 2012

    भरोदिया जी, नमस्कार! मुझे तो लगता है संविधान निर्माता इसमें जान डालना ही भूल गए.. केवल पुतला बनाकर छोड़ दिया!!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 15, 2012

इसीलिए मेरा भारत महान है. सार्थक लेख. बधाई.

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 16, 2012

    धन्यवाद कुशवाहा जी!

jlsingh के द्वारा
June 15, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, नमस्कार! सबकुछ १० जनपथ के इशारे से ही चलने वाला है, फिर इतना नाटक क्यों? मेरे ख्याल में तो राष्ट्रपति प्रधान मंत्री जैसे प्रमुख पदों का चुनाव आम जनता के द्वारा ही होना चाहिए भले ही उसके लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता हो, प्रश्न यह है की यह संशोधन करेगा कौन? ….चाहेगा कौन? आपके विश्लेष्णात्मक आलेख निश्चित ही आम आदमी के ज्ञानवर्धन करने वाला है और चिंतनीय भी है! भारत भविष्य क्या होने वाला है, यह भी भविष्य के गर्भ में है…. आभार!

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 16, 2012

    आदरणीय jl जी, नमस्कार! ये नाटक लोकतंत्र के नाम पर करना होता है.. अन्यथा सच तो आप भी जानते हैं और वो भी!! rashtrapati के चुनाव सम्बन्धी विचार से काफी सीमा तक मैं सहमत हूँ किन्तु इसके लिए मौलिक ढांचे को ही बदलना होगा.. मात्र चुनाव जनता द्वारा करा दिए जाने से भी समाधान नहीं होगा!! ..आभार!

nishamittal के द्वारा
June 15, 2012

वासुदेव जी,निश्चित रूप से हमारे संविधान को जोड़तोड़ कर प्रस्तुत किया गया है,दुसरे शब्दों में भानुमती का कुनबा बना कर ,यद्यपि संशोधन समय समय पर हुए परन्तु संविधान में राष्ट्रपति,राज्यपाल जैसी व्यवस्थाओं के अतिरिक्त बहुत सी व्यस्थाओं को बदलने की आवश्यकता है,परन्तु अधिकांश संशोधन सदा (कांग्रेस पार्टी के अधिकतर सत्ता में रहने के कारण ) हो सके जो सरकार के हित में थे.

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 16, 2012

    आदरणीय निशा जी, आपने संशोधन की बात की तो संशोधन तो आप जानती ही होंगी कि शाहबानो के मामले में जिस तरह संशोधन किया गया था और अब मुलायम सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविधान विरुद्ध होने के कारण केंद्र को मुस्लिम आरक्षण पर लताड़े जाने के बाद संशोधन से संविधान को ही बदल डालने की बात कर रहे हैं.. वह भी संविधान की मूल भावना ही क्योंकि अनुच्छेद १५ को बदलना पड़ेगा!! कांग्रेस के लिए कुछ बड़ी बात नहीं!!!

dineshaastik के द्वारा
June 15, 2012

आदरणीय  वासुदेव जी, नमस्कार। मैं नहीं समझ  पा रहा कि हमारे संविधान  में ऐसी कौन सी विशेषतायें हैं कि मैं उसके गुणगान करूँ। मुझे तो उसमें अवगुण  ही दिखाई देते हैं। दूषित चुनाव प्रणाली, मंत्रियों के स्वविवेक, अप्रत्यक्ष  राजतंत्र, आजादी का संसद में कैद होकर रह जाना, विधायकों और सांसदों का पार्टी सुप्रिमों के निर्देश  पर ही मत  प्रकट करना, यह सब क्या प्रजातंत्र का मजाक  नहीं है। ऐसे अनेक  उदारहण  हैं जिसे मैंने अपनी एक  कविता क्या यह गणतंत्र है में उद्धत  किया है। अब समय  आ   गया है संविधान की समीक्षा करने का। आज  80 प्रतिशित जनता कलाम साहब को राष्ट्रपति के रूप में दुबारा चाहती  है, लेकिन 20 प्रतिशत की चाहत वाला यदि राष्ट्रपति बन  जाय  और कोई कहे  आओ  जश्न  मनायें हमारा संविधान  महान है। तो भाई मैं तो ऐसे  जश्न में शामिल होने से रहा।

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 16, 2012

    आदरणीय दिनेश जी, नमस्कार! जहाँ तक मेरा मानना है संविधान को भारतीय परिवेश में ढाला नहीं गया और मात्र दुसरे देशों की देखा देखी में ये मान लिया गया कि यही ढांचा भारत में भी काम करेगा जब इन देशों में कर रहा है.. जबकि प्रत्येक देश का अपना परिवेश व पृथक पृष्ठभूमि होती है.! कुछ विशेष लोगों की मानसिकता अंग्रेजी व्यवस्था व सोंच की मानसिक गुलाम थी इसी कारण गुलामी के कानूनों तक को आदर्श मानकर स्वतंत्र भारत के माथे मढ़ दिया गया और आज भी न्याय भारत में अनुपलब्ध है|


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