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आश की गूढ़ रचना

Posted On: 18 Jun, 2012 में

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भावना को है समर्पण।

मुक्ति को यह विश्व अर्पण।

उर्मियों की कृति क्षणिक हो,

पर वेग में विश्वास मेरा,

वेग से है तृप्ति तर्पण॥

**

नक्त के भी स्वप्न अगणित।

ध्वान्त में पुष्पित फलित।

स्वीकृत करेंगी अंशु रवि की?

सृष्टि को उद्वेगना है!

संबल दिये है आश विगलित॥

**

मौन के यह नाद नीरव।

चिर पुरातन नव्य कैरव।

भावना के गीत सुनकर,

कह रहे दुष्कर नहीं कुछ,

स्वांस के उन्मुक्त कलरव॥

**

तुम कहो ये मूढ़ता है।

शून्य में क्या ढूँढता है।

किन्तु मेरी दृष्टि में जब,

मरुभूमि ही प्रस्तर यहाँ हो,

मरु-प्रासाद की यह मूढ़ रचना,

भी स्वयं में गूढ़ता है॥

***

-Vasudev Tripathi

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 23, 2012

…………… मौन के यह नाद नीरव। चिर पुरातन नव्य कैरव। भावना के गीत सुनकर, कह रहे दुष्कर नहीं कुछ, स्वांस के उन्मुक्त कलरव॥ प्रिय त्रिपाठी जी गूढ़ रचना …सुन्दर शब्द बंध …सुन्दर सन्देश ….सच में यदि दृढ संकल्प और आशा हमारे साथ रहे तो कुछ भी दुष्कर नहीं ….कठिन शब्दों के अर्थ लिखने से सब को सहज होती ….जय श्री राधे भ्रमर ५

chaatak के द्वारा
June 21, 2012

स्नेही वासुदेव जी, सादर अभिवादन, आपकी इस रचना को कई बार पढ़ा लेकिन कोई टिप्पड़ी करने का साहस न कर सका| स्वीकार करना चाहूंगा कि इस रचना के सम्पूर्ण तो क्या एक चौथाई अर्थ तक भी नहीं पहुँच सका|

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 21, 2012

    चातक भाई, मुझे खेद है कि कविता के भाव सरलता से स्पष्ट नहीं हो सके तथापि मेरा मानना रहा है कविता का सौंदर्य संक्षिप्ततम मे अधिकतम रस प्रवाह व भाव के साथ कहना होता है यद्यपि मैं इसमें निष्णात नहीं हूँ क्योंकि मैं स्वयं को कवि मानता भी नहीं! इस कविता का उत्प्रेरक भाव है कि आशा जीवन का पर्याय है, मरुभूमि अर्थात रेगिस्तान ही जब दूर दूर तक हमे घेरे है तो ऐसी स्थिति में रेत का महल अथवा आश्रय बनाने के प्रयास भी स्वयं में मूढ़ता लगते हुए भी ऐसी आशा का प्रतीक है जो उस मरुभूमि में भी जीवन की स्थापना कर सकती है। आज असत्य स्वार्थ व पापों से घिरा संसार उस मरुभूमि जैसा ही है जहां सत्य त्याग परमार्थ के मूल्यों का भवन वह भी मरुभूमि की ही रेत से बनाने का प्रयास यदि आप करते हैं तो संसार आपके इस कृत्य को मूढ़ता ही कहेगा किन्तु वास्तव में असंभव तुल्य यह प्रयास भी स्वयं में जीवन का गूढ ही सही पर जीवन्त अस्तित्व है..!!!!! प्रत्येक पद के भाव की व्याख्या यहाँ पर नहीं कर सकता क्योंकि वह काफी विस्तीर्ण हो जाएगा फिर भी आपने कहा तो चौथाई भाग अर्थात एक पद का अर्थ स्पष्ट करता हूँ केंद्रीय भाव के साथ इससे आप कविता के भावों की व्याख्या सरलता से कर सकेंगे। जैसे कि द्वितीय पद- रात्रि की भी आँखों में अंधेरे में पुष्पित पोषित अनगिनत स्वप्न हैं, किन्तु प्रश्न यह है कि क्या प्रभात की सूर्य किरणें रात्रि के इन स्वप्नों को स्वीकृति दे पाएँगी.? सृष्टि में मन में इसे लेकर अत्यधिक उद्वेग है तथापि एक क्षीण सी आश सहारा दिये हुए है॥ …साभार!!

yogeshkumar के द्वारा
June 20, 2012

मैं थोड़ा कविता के मामले में मोटी बुद्धि का हूँ….. आपकी क्लिष्ट भाषा में कविता का मतलब थोड़ा कम ही समझ पाया ……….. मगर फिर भी आप अपनी कविता का उद्देश्य और निष्कर्ष बताएँगे तो बड़ी कृपा होगी ….. साधुवाद……

    yogeshkumar के द्वारा
    June 20, 2012

    वाकई बहुत गूढ़ रचना…………

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 21, 2012

    योगेश जी, इस कविता में कुछ ऐसे शब्द हैं जोकि संभवतः विदेशी भाषाओं के अतिक्रमण व व्यवहार में क्षीण होती हिन्दी के कारण सामान्य नहीं रहे किन्तु चूंकि मैं प्रॉफ़ेशनल कवि हूँ नहीं अतः अपनी रुचि के अनुसार ही अधिक लिखता हूँ। मुझे हिन्दी शब्दों में जो गूढ़ता गंभीरता विस्तार व सुगठित भाव मिलते हैं वह कहीं नहीं मिलते अतः शुद्ध हिन्दी शब्दों का ही प्रयोग अधिक करता हूँ! वैसे आप थोड़ा समझने का प्रयास करेंगे तो पूरा चित्र स्पष्ट हो जाएगा जिसकी आप अपने अनुसार किसी भी सीमा तक व्याख्या कर सकते हैं। कविता का उत्प्रेरक भाव है कि आशा जीवन का पर्याय है, मरुभूमि अर्थात रेगिस्तान ही जब दूर दूर तक हमे घेरे है तो ऐसी स्थिति में रेत का महल अथवा आश्रय बनाने के प्रयास भी स्वयं में मूढ़ता लगते हुए भी ऐसी आशा का प्रतीक है जो उस मरुभूमि में भी जीवन की स्थापना कर सकती है। आज असत्य स्वार्थ व पापों से घिरा संसार उस मरुभूमि जैसा ही है जहां सत्य त्याग परमार्थ के मूल्यों का भवन वह भी मरुभूमि की ही रेत से बनाने का प्रयास यदि आप करते हैं तो संसार आपके इस कृत्य को मूढ़ता ही कहेगा किन्तु वास्तव में असंभव तुल्य यह प्रयास भी स्वयं में जीवन का गूढ ही सही पर जीवन्त अस्तित्व है..!!!!!

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 21, 2012

    हार्दिक आभार!

allrounder के द्वारा
June 20, 2012

प्रिय भाई वासुदेव आपकी लेखनी का एक अलग ही रूप देखा इस रचना मैं, किन्तु लेखन का उद्देश्य वही लोगों मैं ओज पैदा करना ! एक तेजस्व पैदा करती रचना पर बधाई आपको !

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 20, 2012

    सचिन जी, रूप अलग है फिर अंततोगत्वा स्वरुप तो वही है.! :) हार्दिक आभार!

pritish1 के द्वारा
June 20, 2012

नमस्ते………… आपके शब्द आने वाले आधुनिक दिनकर सा प्रतीत होता है…….मरु-प्रासाद की यह मूढ़ रचना, भी स्वयं में गूढ़ता है॥……………….आपके लेखनी को मेरा नमन……….प्रीतीश

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 20, 2012

    प्रीतीश जी, दिनकर और मुझमे जमीन आसमान का अंतर है, दिनकर जी काव्य के शिखर पुरुष हैं और मैं उधर कभी कभार घूमने वाला पथिक.! फिर भी आपको पंक्तियाँ पसंद आई हार्दिक आभार!

alkargupta1 के द्वारा
June 19, 2012

वासुदेव जी , आपके विशिष्ट तथ्यपूर्ण आलेख तो पढ़ती थी तो बहुत जानकारियां मिलती थीं आज मैंने आपकी सुन्दर शब्दों से सुसज्जित काव्य सौन्दर्य से परिपूर्ण साहित्यिक कृति पढ़कर हर्ष विभोर हो गयी…गहन भावों से पुष्पित पल्लवित उत्कृष्ट कृति के लिए बधाई !

    jlsingh के द्वारा
    June 20, 2012

    बस यही बात मैं भी कहना चाहता हूँ! वासुदेव जी को बधाई!

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय अलका जी एवं जवाहर जी, राजनीति, विश्वनीति, अर्थ व समाज पर आधारित होने वाले मेरे लेखों ने मेरे ब्लॉग को ब्लॉग के उस सहज चेहरे से हटा सा दिया है जिसमे ब्लॉगर्स अपनी छोटी सहज बाते बांटते हैं! यद्यपि मेरा रूचि विषय है भी वैसा ही है जैसा मैं लिखता हूँ, कविता मैं व्यक्तिगत अपने लिए ही लिखता हूँ और प्रायः अपने व अपनों तक ही रखता हूँ किन्तु फिर भी ब्लॉग पर कुछ स्वाद बदलने के लिए मैंने ये पंक्तियाँ डाल दी.! ये चार पंक्तियाँ आपको रुचिकर लगी, मुझे प्रसन्नता हुई है! ..हार्दिक आभार!

yogi sarswat के द्वारा
June 19, 2012

तुम कहो ये मूढ़ता है। शून्य में क्या ढूँढता है। किन्तु मेरी दृष्टि में जब, मरुभूमि ही प्रस्तर यहाँ हो, मरु-प्रासाद की यह मूढ़ रचना, भी स्वयं में गूढ़ता है॥ वाह , वासुदेव जी ! आज आपकी रचनात्मकता का एक और सुन्दर रूप देखा ! सुन्दर अभिव्यक्ति !

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 20, 2012

    आभार सारस्वत जी.!

yamunapathak के द्वारा
June 18, 2012

वाह!!!!!!!!!!! इतनी सुन्दर भाषा त्रिपाठीजी. गद्य की तरह पद्य भी अलंकृत.

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय यमुना जी, वस्तुतः अपने मौलिक स्वरुप में हिन्दी भाषा परम सुन्दर है.., एक एक शब्द में जो गंभीरता व भाव है वह अद्भुत है किन्तु दुर्भाग्य से आज हिन्दी की ऐसी दुर्दशा हो गई है कि अधिकांशतः लोगों को पराये शब्द अपने लगने लगे हैं और अपने शब्द पराये.. मौलिक शब्दों को क्लिष्ट कहकर प्रयोगवाह्य करते जा रहे हैं इसी कारण हिन्दी व साहित्य की हत्या होती जा रही है! मुझे तो शुद्ध हिन्दी ही सुन्दर लगती है! ..साभार!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, सादर रस लिया है स्वाद नहीं, वो भी लूँगा. बधाई

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी, जितना भी रस संभव हो रस भी लीजिये और स्वाद भी! :)

dineshaastik के द्वारा
June 18, 2012

वासुदेव जी, नमस्कार। बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण  अभिव्यक्ति…बधाई…..

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरणीय दिनेश जी, हार्दिक आभार!

चन्दन राय के द्वारा
June 18, 2012

वासुदेव मित्र , मौन के यह नाद नीरव। चिर पुरातन नव्य कैरव। भावना के गीत सुनकर, कह रहे दुष्कर नहीं कुछ, स्वांस के उन्मुक्त कलरव॥ आपका विमोहनकारी कवि रूप का अवतार ,आश की गूढ़ रचना ही नहीं कहता , इक विश्वाश रोपता है नव सृजन का ! बहुत सुन्दर रचना !

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 20, 2012

    चन्दन जी, कविता इस मंच पर मैं यद्यपि लिखता नहीं हूँ किन्तु फिर भी यह अवतार बिलकुल नया नहीं है क्योंकि इससे पहले एक कविता मैं यहाँ और लिख चुका हूँ..!! आपको यह स्वरुप विमोहनकारी लगा, मुझे प्रसन्नता है! ..साभार!

pritish1 के द्वारा
June 18, 2012

वासुदेव जी आप क्या लिखते हैं……….आपकी काव्य अभिव्यक्ति से मन के चिंतन का परिवर्तन संभव है……..अति सुन्दर लेखन………..

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 20, 2012

    प्रीतीश जी, कविता का वास्तविक प्रभाव तभी है जब मन के तार झंकृत हो सके किन्तु मैं स्वयं को उस कोटि में समझता नहीं क्योंकि कवितायेँ मैं लिखता नहीं.. यदा कदा छोड़कर.!! ..साभार!


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