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सुरजीत की रिहाई से उभरते सवाल

Posted On: 29 Jun, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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surjपाकिस्तान में कैद भारतीय बंदी सरबजीत की रिहाई का मामला जिस तरह से पुनः सामने आया और पाकिस्तान ने जिस तरह सरबजीत सुरजीत में भ्रमित किया अथवा उसने पलटी मारी उससे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की जमकर किरकिरी हुई है। पाकिस्तान के लिए इस तरह की स्थिति बहुत नयी बात नहीं है किन्तु सुरजीत की रिहाई के बाद भारत की अपने राष्ट्रीय हितों के लिए काम करने वाले नागरिकों के प्रति गैरजिम्मेदाराना उपेक्षापूर्ण रवैया जिस तरह सामने आया है वह निराशाजनक है। सुरजीत सिंह पाकिस्तान में भारतीय खुफिया एजेन्सी रॉ के लिए जासूसी करने गए थे और 1980 में पाकिस्तान द्वारा कैद कर लिए गए थे। सुरजीत सिंह ने अपने जीवन के 32 साल अपने परिवार व देश से दूर कैद में बिताए क्योंकि उन्होने देश के लिए इतना बड़ा जोखिम उठाया था। भारत वापसी के समय सुरजीत ने यह स्वीकार भी किया कि वे पाकिस्तान भारत के लिए जासूसी करने गए थे लेकिन पाकिस्तान में उनके पकड़े जाने के बाद भारत की सरकार व एजेंसियों ने उन्हें पूरी तरह नजरंदाज कर दिया। सुरजीत ने कहा कि जिस तरह उनकी उपेक्षा की गई उस विषय में वे मुंह नहीं खोलना चाहते अन्यथा उनके दिल में बहुत कुछ कहने को है।
एक राष्ट्र के नागरिक का यह राजनैतिक कर्तव्य होता है कि आवश्यकता पड़ने पर वह राष्ट्र की रक्षा के लिए प्राण बलिदान तक के लिए समर्पित रहें, साथ ही प्रत्येक राष्ट्र का भी प्रथम कर्तव्य होता है कि वह अपने नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहे। किन्तु देश के लिए अपने आप को संकट में डालने वाले अपने एक नागरिक से जिस अंदाज में मुंह मोड़ा गया वह अपने नागरिक के प्रति देश के कर्तव्य निर्वहन के साथ साथ सुरक्षा प्रणाली की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है। जिस जासूस को एक देश अपने हितों को साधने के लिए दूसरे देश भेजता है पकड़े जाने पर वही जासूस उसके लिए संकट बन सकता है, ऐसे में यह अनिवार्य हो जाता है कि देश की सरकार अपने जासूस को छुड़ाने के लिए प्रत्येक संभव कदम उठाए। इसके अतिरिक्त यह एक राष्ट्र के आत्मविश्वास व अपने सैन्यतंत्र को लेकर समर्पण व सजगता को भी स्पष्ट करता है। इस सन्दर्भ में भारत को अमेरिका जैसे देशों से सीख लेने की आवश्यकता है। अमेरिका अपने नागरिकों व विशेषकर गुप्तचरों के हितों के लिए किस सीमा तक समर्पित रहता है इसका उदाहरण कुछ दिनों पहले पाकिस्तान में पूरे विश्व के सामने आया था जब लाहौर में दो पाकिस्तानी नागरिकों की हत्या के बाद सीआईए एजेंट रेमंड एलेन डेविस को पाकिस्तान ने गिरफ्तार कर लिया था। अमेरिका ने डेविस को छुड़ाने के लिए पाकिस्तान को दो टूक चेतावनी दे डाली थी जबकि अमेरिका यह भलीभांति जानता था पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह तर्क दिया जा सकता है कि भारत अमेरिका के बराबर हैसियत नहीं रखता और न ही पाकिस्तान अमेरिका की तरह भारत के दबाब में है किन्तु सशक्त स्थिति के बाद भी इस लाचारी के लिए उत्तरदायी कौन है? और यदि भारत पाकिस्तान में अमेरिका की तरह हस्तक्षेप करने व दबाब बनाने में सक्षम नहीं भी है तो भी भारत के सामने ऐसी कौन सी मजबूरी हैं कि वह रोज नयी वार्ताओं के लिए तो तैयार रहता है किन्तु अपने नागरिकों के बचाव के लिए एक भी बिन्दु अथवा शर्त वार्ता में रखने का साहस नहीं कर पाता? यद्यपि भारत की जेलों में भी कई पाकिस्तानी छोटे बड़े मामलों में बंद हैं तथापि भारत वैश्विक पटल पर पाकिस्तान की आतंकवादी देश की पहचान का लाभ उठाकर दबाब बना सकता है व पाकिस्तान में कैद अपने नागरिकों व जासूसों के मामलों को भारत में कैद पाकिस्तानियों के मामलों से काफी हद तक अलग कर सकता है। वास्तविकता भी यही है कि भारत के जासूस यदि पाकिस्तान जाते हैं तो पाकिस्तान की बुरी मंशाओं का पता लगाना उनका उद्देश्य होता है जबकि पाकिस्तानी आईएसआई जासूस भारत में बुरी मंशाओं को अंजाम देने आते हैं। भारत में अब तक की सभी आतंकवादी गतिविधियों में आईएसआई का हाथ रहा है। किन्तु दुर्भाग्य से भारत हाफिज़ सईद जैसे आतंकवादियों के मुद्दों पर ही पाकिस्तान पर दबाब बनाने में सफल नहीं हो पाता कि आगे सरबजीत और सुरजीत जैसे नागरिकों की मुक्ति को भी मुद्दा बनाया जा सके।
हमें यह याद रखना चाहिए कि एक देश अपने राजनैतिक व सामरिक हितों की रक्षा के लिए जासूसी गतिविधियों की उपेक्षा नहीं कर सकता। जासूसी सदैव से कूटनीति का अनिवार्य अंग रहा है और एक जासूस सीमा पर सीधे लड़ रहे सैनिक से कम महत्वपूर्ण नहीं होता है। वर्तमान समय में जासूसी सैन्यनीति का इतना अनिवार्य अंग हो चुकी है कि लगभग सभी देश युद्ध की दूर दूर तक संभावनाएं न होते हुए भी विश्व के अन्य देशों में अपने जासूस तैनात करके रखते हैं। वर्तमान के अविश्वासात्मक वैश्विक परिदृश्य में यह इतना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि एक देश अपने घनिष्ठ मित्र देश के भी आर्थिक, राजनैतिक व सामरिक मामलों की जासूसी करने से नहीं चूक रहा है। अभी कुछ ही महीने पूर्व फ़रवरी में कोची में रह रहा एक इसराएली युगल जासूसी के सन्देह में भारतीय गुप्तचर एजेंसियों के लेन्स में आया था जिसे बाद में इसराएल वापस भेजने के आदेश दिए गए थे, जबकि सभी जानते हैं कि भारत-इसराएल के संबंध काफी मित्रतापूर्ण रहे हैं। चीन, पाकिस्तान, अमेरिका जैसे देशों से भारत को लगातार एजेंट व साइबर जासूसी का खतरा रहता ही है। जापान में चीनी राजदूत पर ही जासूसी के आरोप लगे हैं। चीन ने अमेरिका के लिए जासूसी के आरोप में अपने ही सुरक्षा अधिकारियों को इसी महीने गिरफ्तार किया है। रूस जिस तरह अमेरिका भारत आदि में जासूसी के लिए खूबसूरत औरतों का प्रयोग करता है वह भी कई बार सामने आ चुका है। ऐसे तमाम उदाहरण यह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं कि आज भले ही विश्व के देशों के बींच साइबर जासूसी की होड़ लगी हो किन्तु मानव जासूसों की उपयोगिता बिलकुल भी कम नहीं हुई है। अतः यदि भारत के सुरजीत जैसे जासूस 32 साल बाद देश लौट पाने के बाद यदि भरे मन से कहते हैं कि उनके अपने ही देश ने उन्हें संकट में पड़ने पर छोड़ दिया तो यह देश का अपने सैन्य हितों व नागरिकों के प्रति समर्पण पर गम्भीर प्रश्नचिन्ह लगाता है। हमें याद रखना चाहिए कि कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों व सैन्य हितों की उपेक्षा करके सुरक्षित नहीं रह सकता।
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गृह सचिव के इस बयान के बाद कि सुरजीत भारत के जासूस नहीं थे और लोग ऐसा ख्याति पाने के लिए करते हैं, लेख को लेकर कुछ पाठकों की शंकाएँ हैं। स्पष्ट करना चाहूँगा कि यह लेख व्यक्तिगत सुरजीत पर नहीं वरन उन नीतियों पर केन्द्रित है जो देश के व नागरिकों के हितों की रक्षा करने में असमर्थ हैं। मैं इस बात से पूर्णतयः सहमत हूँ कि राष्ट्रहित में इसे खुले आम यह नहीं स्वीकारा जा सकता कि भारत पाकिस्तान में अपने जासूस भेजता है अथवा गृहमंत्रालय का बयान सही भी हो सकता है कि सुरजीत भारत के जासूस न हों। तथापि मूल प्रश्न पूर्णतयः प्रासंगिक रहते हैं जो सुरजीत की रिहाई और उसके बयान के बाद उठते हैं। एक तरीका अमेरिका अमेरिका का अपने खुफिया एजेन्टों को बचाने का है और एक तरीका भारत का है जो अपने नागरिकों के लिए भी सशक्त तरीके से बात तक नहीं उठा पाता!!! यदि सुरजीत भारतीय एजेंट नहीं भी थे तो भी वे भारत के नागरिक तो अवश्य थे और सरबजीत जैसे और भी कितने नागरिक अपने देश के नीतिनियंताओं की दुमहिलाऊ नीतियों के कारण पाकिस्तानी जेलों में बंद हैं…!!! यदि नीतियों में आत्मविश्वास हो तो अपने जासूसों को भी अमेरिका की तरह निर्दोष नागरिक की भांति निकालकर लाया जा सकता है। क्या भारत जैसे देश की ऐसी ही स्थिति है कि पाकिस्तान जैसे देश के आगे दुमहिलाऊ अंदाज में बार बार खड़ा दिखे..??
-वासुदेव त्रिपाठी

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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chaatak के द्वारा
July 1, 2012

स्नेही वासुदेव जी, पोस्ट विचारणीय है लेकिन हिदुस्तान की हालत इस मामले में दयनीय है| जो देश सामान्य नागरिक को जासूस साबित किये जाने पर भी जुबान पर ताला लगाए बैठा रहता है वह जासूस की सुरक्षा करने के बारे में अमेरिका की बराबरी क्या करेगा| वैसे हमारे देश के जासूसों को कांग्रेस के रहते विदेशों में गिरफ्तार होने का भय भी नहीं है उनका प्रमुख कार्य तो कांग्रेस-हित में अन्य दलों और नेताओं की जासूसी मात्र है जिससे उनके पास ऐसे सुबूत रहें ताकि जब जरूरत पड़े उनकी नाक दबाई जा सके और सरकार मनमानी कर सके| अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

    vasudev tripathi के द्वारा
    July 2, 2012

    बिलकुल सही कहा चातक जी! हमारे नेता नागरिकों के प्रति राष्ट्रिय दायित्यों से बेखबर हैं.. देश के अन्दर भी और देश के बाहर भी! हार्दिक आभार!

अजय कुमार झा के द्वारा
July 1, 2012

बहुत सारी बातों को स्पष्ट किया आपने अपनी पोस्ट में । बढिया विश्लेषणात्मक पोस्ट । संवाद को आमंत्रित करती हुई ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    July 2, 2012

    हार्दिक आभार अजय जी!

jagojagobharat के द्वारा
July 1, 2012

देश लुटने से फुर्शत मिले तब तो ये निति नियंता अपने नागरिको के अधिकारों की सोचे .बहुत सुन्दर लेख

    vasudev tripathi के द्वारा
    July 2, 2012

    हार्दिक आभार!

shashibhushan1959 के द्वारा
June 30, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, सादर ! आदरणीय भ्रमर जी की बात विचारणीय है ! और आपने जो नागरिकों के हित की बात उठाई है, वह उचित अवश्य है, पर इस सन्दर्भ में वह अनुचित है ! श्री सिंह क्या किसी दबाव में जासूसी करने गए थे ? आप आग पर चलना स्वीकार करेंगे तो पाँव जलने की शिकायत क्यों ? आज पाकिस्तान से जैसे सम्बन्ध हैं, उन हालातों में इनकी स्वीकारोक्ति कि वह जासूसी करने गए थे, अन्य भारतीय बंदियों के भविष्य पर कितना असर डालेगा, यह नहीं सोचा ! ऐसा कह कर वे पाकिस्तान की ही मदद कर रहे हैं !

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 30, 2012

    आदरणीय शशीभूषण जी, यह अवश्य सत्य है कि सुरजीत यदि जासूस बनकर भी गए थे तथापि उन्हें राष्ट्रहिट मे ऐसा बयान नहीं देना चाहिए था तथापि मैं इसे उनकी हृदयगत पीड़ा की भावनात्मक अभिव्यक्ति मानता हूँ। यदि उनके बयान को आप देखेंगे तो उन्होने कहा कि बहुत कुछ ऐसा है जिसे वे कहना नहीं चाहते!!! अर्थात उन्हें भी इस बात का खयाल था किन्तु अपने देश के नीतिनिर्णायकों द्वारा घोर उपेक्षा की पीड़ा यदि उनके मन में हो तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता!!! यदि वे जासूस नहीं भी रहे तो भी यह तो सत्य सामने आता ही है कि भारत अपने पाकिस्तान में कैद नागरिकों के लिए पर्याप्त संवेदनशील नहीं है!!! यह लेख सुरजीत पर बहस पर केन्द्रित न होकर इसी बिन्दु पर केन्द्रित है क्योंकि सुरजीत जासूस था या नहीं यह न ही लेख से सिद्ध किया जा सकता है और न ही इसकी आवश्यकता है किन्तु प्रश्न यह है कि एक ओर अमेरिका का अपने नागरिकों के बचाव के लिए तरीका और एक भारत की ढुलमुल नीतियाँ!!!

    shashibhushan1959 के द्वारा
    July 1, 2012

    आदरणीय वासुदेव जी, सादर ! “भारत अपने पाकिस्तान में कैद नागरिकों के लिए पर्याप्त संवेदनशील नहीं है!!!” जब ये लुच्चे निति नियामक अपने लाभ के लिए देशवासियों का खून पी रहे हैं , देश को गिरवी रख रहे हैं, तो इनसे किसी अन्य देश में कैद हिन्दुस्तानी के प्रति संवेदनशीलता का अंदाजा लगाया जा सकता है ! बहाने भी कितने अच्छे — कूटनीतिक कारणों से ! कसाब, अफजाल और ऐसे अन्य कितने ही आतंकवादियों को ये इन्हीं “कूटनीतिक कारणों” से शायद ज़िंदा रखे हुए हैं ! ये कौन से “कूटनीतिक कारण” हैं जनता आज तक समझ नहीं पाई !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 30, 2012

मान्य भाई वासुदेव त्रिपाठी जी , सप्रेम नमस्कार ! यहाँ की राजनीति और राजनीतिज्ञ दोनों ही संवेदनहीन हो गए हैं ,इन्हें सिर्फ अपनी और अपनी कुर्सी की चिंता के अलाबा देश के हित से जुडी अन्य चिंताओं से कोई लेना-देना नहीं है | भगवान् ही बचाए इस देश को | आप का आलेख मानवीय मूल्यों और उनकी संवेदनाओं से जुडी है | हार्दिक बधाई ! पुनश्च !1

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 30, 2012

    आचार्य जी, नमस्कार! निश्चित रूप से विषय मानवीय संवेदना का भी किन्तु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है यह मानवीय संवेदनाएं राष्ट्र का दायित्व भी हैं!! राजनेताओं में समर्पण व आत्मविश्वास का आभाव है!! ..हार्दिक आभार!

SAVI के द्वारा
June 30, 2012

त्रिपाठी जी, जब भी किसी खुबसूरत इमारत को देखते हैं तो हमें वो इमारत दिखती है पर उसके नींव में लगे पत्थर नहीं दिखाई देते| वो तो दफन हो जाते है खुबसूरत इमारत को बनाने में सहयोग हेतु| ऐसे ही जासूसी, यह कार्य ही ऐसा है जिसमे जोखिम बहुत है इसलिए अक्सर जासूसों को यह आदेश दिया जाता है कि कभी भी दुश्मनों के हाथ जिन्दा न पड़े आत्महत्या करनी पड़े तो वह भी उचित है| शुक्र है सुरजीत को रिहा कर दिया गया, परन्तु इसमें बहुत से प्रश्न है| जो दर्द आपको हुआ मानवता के नाते वही दर्द सुरजीत के लिए मुझे भी है, परन्तु देशहित सर्वोपरि है इससे हम इंकार नहीं कर सकते| सुरजीत के लिए भारत सरकार कुछ करती भी परन्तु उनका ३२ साल पहले खुद को भारत का जासूस स्वीकार कर लेना अनुचित था| तब हालात बहुत विपरीत थे और फिर कहूँगी देशहित सर्वदा सर्वोपरि होता है|

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 30, 2012

    सावी जी, लेख मुख्यतः सरबजीत पर केन्द्रित नहीं है और न ही सवाल उसे लेकर है वरन सवाल नागरिकों को लेकर असंवेदनशीलता को लेकर हैं! लेख के अंत में मैंने पुनः स्पष्ट किया है जैसा कि कुछ पाठकों का प्रश्न था! आपकी इस बात से पूर्णतः सह्म्मत हूँ कि राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है!! …साभार!

    rekhafbd के द्वारा
    July 1, 2012

    आदरणीय वासुदेव जी ,मे सवी जी से पूर्णतया सहमत हूँ ,जासूसी बहुत ही जोखिम भरा कार्य होता है और उन्हें सदा कवर में रहना पड़ता है क्यों किदेश हित सर्वोपरि है ,आपका आलेख विचारणीय है ,आभार

divya के द्वारा
June 30, 2012

पाकिस्तान का जन्म ही राजनैतिक खेल से हुआ, जो उस समय राजनीती खेली गयी वो राजनीती के अंश अभी तक दोनों जगह फलफूल रही है जिस तरह पाकिस्तान कि कथनी और करनी मे अंतर हमेशा देखा जाता है वैसे ही भारत कि राजनीती मे देखा जा सकता है |  नीतियां देश को मध्यनजर रख के नहीं स्विस बैंक के खाते को देख के बनती है ऐसा लगता है | वासुदेव जी आप के सभी लेख पढ़े है बहुत ही विस्तृत और जानकारी से भरपूर होते है |

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 30, 2012

    दिव्या जी, बिलकुल सही कहा आपने पाकिस्तान का जन्म ही राजनैतिक खेल से हुआ है! पाकिस्तान पर विश्वास नहीं किया जा सकता यह हर प्रकार से सिद्ध हो चुका है! नीतियाँ भारत में कैसे भी निर्धारित होती हों किन्तु इतना अवश्य है कि बहुधा वे देश के हित में पर्याप्त नहीं सिद्ध होती हैं!! जानकार अच्छा लगा कि आप मेरे सभी लेख पढ़ती हैं!

yamunapathak के द्वारा
June 30, 2012

हमेशा की तरह आप ने बहुत साधा हुआ ब्लॉग लिखा है वासुदेवजी.सुरेन्द्रजी की प्रतिक्रया के मद्देनज़र दुसरे पहलु को भी ब्लॉग का हिस्सा बनाएं ताकि हमें पूर्ण और संतुलित जानकारी मिल सके.आपके ब्लॉग मुझे बेहद पसंद हैं . धन्यवाद

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 30, 2012

    आदरणीय यमुना जी, हार्दिक आभार! जानकर अच्छा लगा कि आपको मेरे लेख पसंद आते हैं! आपकी सलाह पर मैंने लेख के अंत में अपना मत स्पष्ट कर दिया है, इस लेख के शीर्षक से ही मैंने कहने का प्रयास किया था कि सवाल एकवचन में सुरजीत और उसके बयान का नहीं है वरन बहुत से सवाल हैं जो देश की नीतियों पर अपने नागरिकों के हितों को लेकर असंवेदनशीलता को लेकर उठाते हैं.!!

allrounder के द्वारा
June 30, 2012

पकिस्तान के दोगलेपन से तो हम ही नहीं अपितु पूरा विश्व भलीभांति परिचित है, और इस मामले मैं भी दिग्भ्रमित करने मैं उसने एक पर फिर अपने दोहरे चरित्र का प्रदर्शन किया है अन्तराष्ट्रीय मंच पर, किन्तु ऐसे मामलों मैं हमारी सरकारों की जो नीतियाँ और प्रयास रहे हैं वे सचमुच सोचनीय और नाकाफी हैं !

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 30, 2012

    सचिन जी, पाकिस्तान की दोगली नीति सबसे अधिक भारत के प्रति ही सामने आती है किन्तु ऐसा लगता है कि भारत ही उसे समझने मे सबसे अधिक भूल करता है!

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
June 30, 2012

भारत के सुरजीत जैसे जासूस 32 साल बाद देश लौट पाने के बाद यदि भरे मन से कहते हैं कि उनके अपने ही देश ने उन्हें संकट में पड़ने पर छोड़ दिया तो यह देश का अपने सैन्य हितों व नागरिकों के प्रति समर्पण पर गम्भीर प्रश्नचिन्ह लगाता है। तिवारी जी बड़ी दुविधा पूर्ण स्थिति बन गयी है अब भी एक तरफ सुरजीत जी ने मुंह खोला क्षतिपूर्ति मांग रहे हैं ३१ साल का और वे जासूसी करने गए थे मान रहे हैं दूसरी तरफ लगातार गृह सचिव सिंह जी रा के जासूस के रूप में उस तरफ जाने का खंडन कर रहे हैं ..क्या यहाँ प्रश्न नहीं उठता की जान बचाने के लिए पाकिस्तान की बातों में उलझे हों ? वह इन्हें इस्तेमाल कर रहा हो सरबजीत को तो उसने नहीं छोड़ा ,,, अब यहाँ आकर सुरजीत का पाक के साथ बोलना पाक को बल नहीं मिलेगा क्या ? की भारत ने ऐसे जासूस लगा रखे हैं … जासूसों का भरपूर समर्थन हो हम भी ये मानते हैं लेकिन कूटनीति बहुत कुछ कहती है ………… सुन्दर लेख ..तमाम जानकारी मिली भ्रमर ५

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 30, 2012

    आदरणीय सुरेन्द्र जी, आपके विचारों के लिए आभार!! लेख व्यक्तिगत रूप से सुरजीत पर नहीं नागरिकों के हितों पर केन्द्रित है अतः इस विषय पर लेख के अंत में विषय को स्पष्ट किया है। जहां तक सुरजीत का प्रश्न है वह जासूस हों न हों किन्तु कम से कम एक नागरिक के रूप में उनका दर्द जायज है कि अपना ही देश अपने नागरिकों की उपेक्षा कर रहा है।

dineshaastik के द्वारा
June 30, 2012

वासुदेव जी मुझे लगता है कि हमारी विदेश  नीति में ही खामी है। लचर  विदेश  नीति का ही  परिणाम है कि एक  छोटा सा देश  हमारा मजाक  उड़ाकर शान से मुस्करा रहा है। क्या हमें  अमेरिका जैसी सशक्त  विदेश  नीति नहीं अपनाना चाहिये। सुरजीत का कृ्त्य क्या देश  द्रोही की श्रेणी में नहीं आना चाहिये। देश  की आलोचना किसी भी  कीमत पर बरदास्त नहीं की जानी चाहिये। वाह रे भारत, तुझे डायन कहने वालों को मंत्री बना दिया जाता है। कृपया इसे पढ़कर अनुगृहीत करें- मंदिरों की लूट भारत की बरबादी http://dineshaastik.jagranjunction.com/2012/06/30/%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B2%E0%A5%82%E0%A4%9F-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%B0/

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 30, 2012

    दिनेश जी, आपके इस मत से मैं पूर्णतयः सहमत हूँ कि ये हमारी लाचार नीतियाँ ही हैं जो हमारी छीछालेदर कराती हैं, हमे सुदृढ़ नीतियाँ ही अपनानी होंगी। किन्तु आपके इस कथन को मैं स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ कि सुरजीत के कथन को देशद्रोह की श्रेणी में रखना चाहिए! एक व्यक्ति जिसने देश की सेवा के लिए अपना जीवन संकट में डाला और 32 साल विदेशी करागार मे बिताए यदि वह अपनी पीड़ा व्यक्त करता है तो देशद्रोह कैसा..? उसने देश की नहीं वरन देश के तंत्र की आलोचना की, इसे देशद्रोह नहीं कहा जा सकता अन्यथा देश का हितचिंतक भी देशद्रोही हो जाएगा। हाँ डायन कहने वाले आजम खान जैसे यदि मंत्री बने तो क्या कहा जा सकता है!!! ….साभार!!!

jlsingh के द्वारा
June 30, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, सादर अभिवादन! प्रश्न गंभीर है .. पर समाधान???? सुरजीत भी तो अपनी नियत सजा से ५ साल अधिक सजा काट कर आए हैं इसमें भारत और पकिस्तान दोनों में से किसकी महानता साबित होती है?

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 30, 2012

    JL singh जी, विडम्बना है कि समाधान के लिए आवश्यक मनोबल हमें देखने को नहीं मिल रहा!! ham dabte रहेंगे और लोग दबाते रहेंगे!! ..साभार!!

rajuahuja के द्वारा
June 29, 2012

त्रिपाठी जी , सर्वथा सत्य है की हमारी सरकारें वैश्विक-पटल पर, सामरिक हितो की रक्षा करने में सदैव असफल रही हैं !बात रिहाई की हो अथवा आतंकवादी प्रत्यार्पण की हमारा नेतृत्व कभी भी गंभीर नहीं रहा ! हमारी सत्ता लोलुप सरकारें ,आज़ादी के ६५ वर्षों में देश के नागरिक को संविधान प्रद्दत मूल-भूत अधिकार तक उपलब्ध नहीं करा पाई वे कैसे उसकी रक्षा कर पाएंगी ? यक्ष प्रश्न है !

    vasudev tripathi के द्वारा
    June 30, 2012

    राजू जी, आपके कथन से मैं सहमत हूँ कि जो सत्ता लोलुप सरकारें आज़ादी के ६५ वर्षों में देश के नागरिक को संविधान प्रद्दत मूल-भूत अधिकार तक उपलब्ध नहीं करा पाई वे कैसे उसकी रक्षा कर पाएंगी ? यह सत्य है कि जब सरकारे सत्ता लोलुप होती हैं तो सबसे पहले नागरिकों के हितों का ही शोषण होता है!! ..हार्दिक आभार!!


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