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टीम अन्ना के राजनीति में प्रवेश के निहितार्थ

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0दस दिन तक चले टीम अन्ना के अनशन के समाप्त होने पर एक भी उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकी जिसके लिए अनशन प्रायोजित था किन्तु टीम अन्ना की ओर से राजनीति में उतरने की अनपेक्षित घोषणा ने लोगों को चौंका अवश्य दिया। इससे अन्ना समर्थकों और यहाँ तक कि उनके खेमे में भी दो फाड़ हो गए हैं। टीम अन्ना के राजनीति में उतरने के निर्णय को समझने से पहले हमें इस चरण के अनशन के घटनाक्रम को समझना होगा।
25 अगस्त से प्रारम्भ हुआ यह अनशन मुख्य रूप से भ्रष्ट मंत्रियों के विरुद्ध त्वरित कार्यवाही की मांग पर केन्द्रित था। यहाँ तक कि जनलोकपाल को भी एक सीमा तक टीम ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था, यह स्वयं अन्ना ही थे जो जनलोकपाल की मांग दोहराते रहे। उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इस बार अनशन का प्रारम्भ अन्ना द्वारा स्वयं न करके अरविन्द केजरीवाल व मनीष शिसोदिया द्वारा किया गया। यद्यपि इसके पीछे टीम अन्ना के स्वास्थ्य को कारण बताने का प्रयास करती रही किन्तु इसमें सुदृढ़ आधार दिखाई नहीं देता। अन्ना संभवतः अनशन के लिए तैयार थे और पाँच दिन बाद वे अनशन पर बैठ भी गए और पाँच दिन तक अनशन पर स्वस्थ भी रहे। प्रश्न उठता है कि क्या टीम अन्ना नहीं चाहती थी कि अन्ना इस बार अनशन पर बैठें? स्वास्थ्य के प्रश्न पर बात को कैसे टाला जा सकता है जबकि आप आमरण अनशन पर बैठे हों और बलिदान देने की बात कर रहे हों? अतः कहीं न कहीं यह शंका उठती ही है कि क्या टीम अथवा टीम के कुछ सदस्यों की मंशा अन्ना के स्थान पर अरविन्द केजरीवाल को आंदोलन के मुखिया के रूप में आगे करने की थी? इस शंका को तब और बल मिलता है जब इस बार अभियान की प्रचार शैली पर हम ध्यान देते हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स, जोकि टीम अन्ना के प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम रहा है, पर अन्ना की अपेक्षा केजरीवाल अधिक छाए रहे। टीम अन्ना के एक प्रमुख सदस्य कुमार विश्वास के पेज पर तो सिर्फ और सिर्फ केजरीवाल के समर्पण और बलिदान के कसीदे दिखते रहे जिस पर मैंने प्रश्न भी किया था कि अन्ना कहाँ हैं? स्वास्थ्य तो केजरीवाल का भी ठीक नहीं था क्योंकि वो मधुमेह (शुगर) के रोगी हैं किन्तु इसके कारण टीम ने उन्हें अनशन के लिए नहीं रोका अपितु इसे अधिक से अधिक प्रचारित करने का प्रयास किया गया कि अरविन्द बलिदान देने का संकल्प ले चुके हैं। स्वयं अरविन्द भी दोहराते रहे कि वे बलिदान देने से पीछे नहीं हटेंगे। दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न आंदोलन के उद्देश्य व संकल्प को लेकर उठता है। जिस प्रकार केजरीवाल लगातार यह दोहराते रहे कि इस बार लड़ाई आर-पार की है और वे पीछे नहीं हटने वाले जब तक सरकार उनकी मांग मान नहीं लेती, उससे आम समर्थकों को पुनः आशा जगी थी। किन्तु जिस तरह आंदोलन को दसवें दिन बिना किसी निष्कर्ष व सार्थक कारण के चुपचाप समाप्त कर दिया गया उससे न सिर्फ जनता को निराशा हाथ लगी अपितु आन्दोलन की सार्थकता व टीम-अन्ना की कार्यशैली पर भी प्रश्नचिन्ह लग गए हैं। प्रश्न उठता है कि क्या केजरीवाल और टीम को यह आशा थी कि वे दस दिनों में ही वह हासिल कर लेंगे जिसके लिए उन्होने बलिदान के नारे के साथ आन्दोलन के इस चरण का श्रीगणेश किया था.? इतना तो देश का आम से आम आदमी भी जानता था कि सरकार इतना शीघ्र झुकने वाली नहीं है, क्या पिछले कई दौर का अनुभव लिए टीम अन्ना को यह बात नहीं पता थी? यदि पता थी तो ऐसी कौन सी नई परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गईं कि अनशन को बेनतीजा बींच में ही छोड़ देना पड़ा.?
राजनैतिक दल बनाने की घोषणा का जहां तक प्रश्न है तो यह नहीं स्वीकारा जा सकता कि यह एक-दो दिन में उपजा विचार है। इतना बड़ा निर्णय तात्कालिक नहीं हो सकता भले ही टीम अन्ना समर्थकों से राय देने की बात कहकर इसकी सुनियोजितता को छुपाना चाहती हो। समर्थकों को भी मात्र दो दिन इतने बड़े विषय पर अपनी राय देने के लिए दिए गए। यदि फिर भी निर्णय तात्कालिक है तो निश्चित रूप से अपरिपक्व है और लंबे समय तक टिकने वाला नहीं, और यदि पूर्वनिर्धारित था तो इसे अनशन के दसवें दिन तक क्यों नहीं सामूहिक किया गया.? इस समूचे घटनाक्रम से जो तर्कसंगत निष्कर्ष निकलता है वह यह कि या तो अन्ना आंदोलन रणनीतिक दिशाहीनता की स्थिति में पहुँच चुका है अथवा इस चरण के अनशन का एकमात्र उद्देश्य राजनीति में उतरने के निर्णय के लिए माहौल बनाकर घोषणा करना था।
जहां तक अन्ना का प्रश्न है इसके बहुत अधिक कारण नहीं हैं कि राजनीति का विचार उनकी उपज हो और अरविन्द केजरीवाल व मनीष शिसोदिया की जनता के मध्य आज भी अन्ना जैसी छवि नहीं है कि उन पर जनता अन्ना सा विश्वास व्यक्त कर सके। यदि अन्ना फैक्टर को भुनाया भी जाता है तो भी राजनीति की राह इतनी आसान नहीं होने वाली। राजनैतिक दल के गठन के लिए न तो टीम अन्ना के पास तन्त्र है और न ही अनुभव। जनसमर्थन का सैलाब भी अब सिमट सा चुका है जैसाकि इस अनशन से स्पष्ट था। इसके अतिरिक्त टीम अन्ना के लिए 2014 तक पूरे देश में वह संगठन खड़ा कर पाना भी संभव नहीं होगा जो राष्ट्रीय सफलता के लिए किसी दल को चाहिए होता है। निष्कलंक ईमानदार प्रत्याशियों का चयन, वह भी जिताऊ, इसके बाद की वह टेढ़ी खीर है जिसे पकाना सरल नहीं! अंत में सुस्थापित राजनीति में प्रत्याशियों को जिता पाना वह चुनौती होगी जिसमें रणनीति व राजनीति के महापुरोधाओं के दांत खट्टे हो जाते हैं। टीम अन्ना तो अभी चंद सदस्यों की टीम का ही प्रबंधन नहीं कर पा रही है। प्रायः एकदूसरे के बयान को व्यक्तिगत कहकर टीम कन्नी कटती रहती है। टीम में कोई प्रशान्त भूषण सा कश्मीर पर पाकिस्तानी रुख का समर्थक है तो कुछ नक्सलियों के शुभचिंतक व सेना के विरुद्ध अभियान चलाने वाले! इस सबके बाद भी यदि मान लिया जाए कि कुछ सीटें केजरीवाल व सहयोगी निकाल भी लेते हैं तो भी चंद सीटों से न तो लोकपाल आने वाला है और न भ्रष्टाचार ही समाप्त होगा। इससे कहीं न कहीं कांग्रेस को ही लाभ होगा जिसके भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना आन्दोलन का जन्म हुआ था| फिर शायद केजरीवाल को भी उसी तरह के राजनैतिक समझौते करने पड़ें जैसे कि उत्तर प्रदेश में एक दूसरे को भरपेट गाली देने वाली सपा-बसपा-कॉंग्रेस केंद्र में तथाकथित सांप्रदायिक ताकतों को रोकने की विवशता के चलते करते हैं। भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ कार्यवाही के लिए अनशन करने वाले केजरीवाल ऐसा नहीं करेंगे यह भी कैसे कहा जा सकता है जबकि उन्हें अपने आन्दोलन को सेकुलर बनाए रखने की मजबूरी के चलते इमाम बुखारी से दर पर चलकर जाना पड़ता है बाबजूद इसके कि कोर्ट बुखारी को गंभीर आरोपों के तहत गैरजमानती वारंट जारी कर चुकी है व भगोड़ा तक घोषित कर चुकी है!
यद्यपि हम भ्रष्टाचार के विरुद्ध दृढ़ता से अन्ना के साथ हैं किन्तु टीम अन्ना के लिए अभी यही बेहतर होगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनजागृति को लक्ष्य कर के जमीन पर काम करे| एक बड़े परिवर्तन की उम्मीद तभी की जा सकती है जब हमें राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं व समझौतावादी प्रकृति से रहित जयप्रकाश जैसा कुशल दूरदर्शी नेतृत्व व सरदार पटेल जैसा दृढ़ व्यक्तित्व मिले।
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-वासुदेव त्रिपाठी

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22 प्रतिक्रिया

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Darshan के द्वारा
August 10, 2012

वासुदेव त्रिपाठीजी केजरीवाल क्या आप भी आंदोलन का मुखिया बनने का प्रयास कर सकते हैं और हम आप और युवायों के साथ हैं | आंदोलन अन्ना से नहीं अपितु जन -आन्दोलन था | केजरीवाल भी अन्ना आंदोलन के मुख्य और अभिन्न साथी रहे हैं | केजरीवाल आंदोलन के मुखिया बनने कि कोशिश करें तो क्या हर्ज़ है यह सब तो आनेवाला वक़्त बतायेगा किसने क्या किया | यह अवश्य नहीं कि केजरीवाल ने अपनी मर्जी से अनशन छोड़ा हो | चाहे दोषपूर्ण हो यह टीम अन्ना का निर्णय था | आपने सत्य कहा आजादी बलिदान मांगती है… बलिदान के दावे नहीं। हाँ टीम अन्ना को सोच – समझ कर सारे देश में अन्दोलन चलाने होंगे | टीम अन्नाजी के पीछे भी अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, मनीष सिसोदिया औरे दुसरे निस्वार्थ अन्दोलन कर्त्तायों के प्रति हमें सम्मान की भावना रखनी चाहिए | आदमी गलती का पुतला है | कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिससे गलतियें न हों | एक भजन याद आगया : प्रभु ना बिसारिये हिम्मत न हारिये | हस्ते मुस्कराते हुये जिंदगी गुजारिये || आपकी सोच और कहनी से मैं प्रभावित हूँ | प्रयास, पुरषार्थ और जोश को कभी न छोड़े | आप कहनी और करनी में विश्वास रखनेवाले व्यक्तित्व है | परमात्मा हमें सबुद्धि दे और हम अपनी संस्कृति, संस्कारों और और सब भाषाओँ कि माँ संस्कृत की रक्षा कर सकें | अभार |

Darshan के द्वारा
August 10, 2012

वासुदेव त्रिपाठीजी केजरीवाल क्या आप भी आंदोलन का मुखिया बनने का प्रयास कर सकते हैं और हम आप और युवायों के साथ हैं | आंदोलन अन्ना से नहीं अपितु जन -आन्दोलन था | केजरीवाल भी अन्ना आंदोलन के मुख्य और अभिन्न साथी रहे हैं | केजरीवाल आंदोलन के मुखिया बनने कि कोशिश करें तो क्या हर्ज़ है यह सब तो आनेवाला वक़्त बतायेगा किसने क्या किया | यह अवश्य नहीं कि केजरीवाल ने अपनी मर्जी से अनशन छोड़ा हो | चाहे दोषपूर्ण हो यह टीम अन्ना का निर्णय था | आपने सत्य कहा आजादी बलिदान मांगती है… बलिदान के दावे नहीं। हाँ टीम अन्ना को सोच – समझ कर सारे देश में अन्दोलन चलाने होगे | टीम अन्नाजी के पीछे भी अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, मनीष सिसोदिया औरे दुसरे निस्वार्थ अन्दोलन कर्त्तायों के प्रति हमें सम्मान कि भावना रखनी चाहिए | आदमी गलती का पुतला है | कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिससे गलतियें न हों | एक भजन याद आगया : प्रभु ना बिसारिये हिम्मत न हारिये | हस्ते मुस्कराते हुये जिंदगी गुजारिये || आपकी सोच और कहनी से में प्रभावित हूँ | आप कहनी और करनी में विशवास रखनेवाले व्यक्तित्व है | परमात्मा हमें सबुद्धि दे और हम अपनी संस्कृति, संस्कारों और और सब भाषाओँ कि माँ संस्कृत कि रक्ष कर सकें |

Darshan के द्वारा
August 9, 2012

वासुदेवजी अनशन २५ जूलाई से शुरू हुआ ना की 25 अगस्त को | जनलोकपाल अन्ना टीम ने नहीं सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल रखा है | अरविन्द केजरीवाल को आमरण अनशन से पहले सरकार कैसे – कैसे तंग कर चुकी है यह किसी भी बुद्धिजीवी से छुपा नहीं है | ऐसे में अगर टीम अन्ना अरविन्द केजरीवाल को आंदोलन के आगे करती है तो उसमें कोई बुराई नहीं | सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर केजरीवाल को अगर अधिक से अधिक प्रचारित किया गया तो वोह उनके कब्लियाय और आंदोलन में नंबर दो होने के कारण | मधुमेह (शुगर) के रोगीहोते हुए भी उन्होंने जान और सेहत जोखम में डाली | बलिदान का संकल्प और यह दोहराते रहना कि इस बार लड़ाई आर-पार की है इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि अरविन्द ने धोखेबाजी की है यां उनका aawshya कोई स्वार्थ रहा होगा | हाँ मैं आपसे सहमत हूँ कि जिस तरह आंदोलन को दसवें दिन बिना किसी निष्कर्ष व सार्थक कारण के चुपचाप समाप्त कर दिया गया उससे न सिर्फ जनता को निराशा हाथ लगी | सरकार शीघ्र झुकने वाली नहीं है क्यूंकि नेतालोग स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त हैं | आपतो जानते हैं कि कैसे अग्निवेश जैसा गद्दार अन्नाजी के आंदोलन में सरकार का इन्फोर्मर बना हुआ था | ऐसे और भी लोग आंदोलन को प्रभावित करने और सलाह देने के लिए अवश्य आंदोलन में घुसे हुये हैं | अरविन्द का स्वास्थ्य गिर रहा था और वोह मधुमेह के कारण कोमा में जा सकता था तो सामूहिक रूप से तात्कालिक निर्णय ले लिया गया हो सकता है | समस्या के समाधान का राजनितिक विकल्प तो पहले से रहा होगा | समर्थको को इतने बढ़े राष्ट्रीय मुद्दे पर राय देने के लिये मात्र दो दिन जचते नहीं हैं । हाँ आपका यह अवलोकन पूरन्तया सही है कि तात्कालिक निर्णय अपरिपक्व था | अन्ना का आंदोलन दिशाहीन तो कदापि नहीं अपितु गुमराह हो गया था | राजनीति में उतरने के जगह अगर महात्मा गाँधी कि तरह असहयोग आंदोलन का रास्ता अपनाते तो जनता अन्ना सा विश्वास प्राप्त कर लेते । आपकी दूरदर्शिता का मैं कायल हूँ कि जनसमर्थन का सैलाब भी अब सिमट सा चुका है और टीम अन्ना के लिए 2014 तक पूरे देश में राजनितिक संगठन खड़ा करना असम्भव नहीं तो कठिन चुनौती अवश्य है । केवल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर स्थापित राजनितिक दलों और राजनीति के मंझे हुये खिलाडियों/प्रत्याशियों को का मुकाबला अत्यंत कठिन है | राजगद्दी, सरकारी तंत्र और पैसे कि ताक़त होते हुए टीम अन्ना के नौसिखिये खिलाडी कैसे पुराने और मंझे हूए भ्रष्ट और अपराधी नेताओं के दांत कैसे खट्टे कर सकते हैं | अज्ज्दी खून मांगती है | देश, जाती, धर्मं त्याग मांगते हैं | लाला लाजपतराय के बलिदान का बदला टीम भगत सिंह ने अंग्रेजी सांड सान्द्रस को मारकर भलीभांति ले लिया था | इन भ्रष्टाचारियों, चालबाजों और गद्दारों का क्या इलाज है जो वोटों के लिये धरती के लालों धरतीमाँ छीन लेते है और अपने ही देश में खुलकर वोटों के लिये बांग्लादेशियों को बसाते हैं और और उनको हथियार और ट्रेनिंग दिलवा कर अपने ही नागरिको पर हमले करवाते हैं | यह ठीक है कि चंद सीटों से न तो लोकपाल आने वाला है और न भ्रष्टाचार ही समाप्त होगा। क्या आप जानते हैं कि शीला दीक्षित कि बेटी का निकाह शाही इम्माम बुखारी के भाई से हुआ हुआ है | जयप्रकाश जैसा कद्दावर और दूरदर्शी नेता हमारे पास नहीं है पर अन्नाजी से हमें बहुत उमीदे हैं | आप जैसे युवा भी सो नहीं रहे हैं और आनेवाली नस्लों से भी हमें बहुत उम्मीदे हैं |

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 9, 2012

    दर्शन जी, चूंकि मैं लेख 4 अगस्त को लिख रहा हूँ अतः 25 अगस्त तो नहीं ही होगा… त्रुटि का दर्शन कराने के लिए धन्यवाद। केजरीवाल को आगे करने न करने मे बुराई है अथवा नहीं यह मेरा विषय नहीं था किन्तु अन्ना को दबा के केजरीवाल को आगे करना जनता को तो पसंद नहीं ही आयेगा क्योंकि आप भी जानते होंगे कि जनता केजरीवाल से अन्ना से जुड़ी… मैं अन्ना हूँ ये नारा था न कि मैं केजरीवाल हूँ! अन्ना की अपेक्षा केजरीवाल पर ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास हुआ ये आप सोश्ल नेटवर्किंग साइट्स पर देख सकते हैं…. कुमार विश्वास के एफ़बी पेज को देख लीजिए। मैं श्रद्धा का विषय बनाने के स्थान पर इसके निहितार्थ देखता हूँ…!! सरकार तो हर उस व्यक्ति को परेशान करती है जो उसके विरोध में होता है चाहे वह कैसा हो… यह इस बात का प्रमाणपत्र नहीं है कि आप निस्वार्थ भाव से किसी कार्य मे लगे हैं! आप अग्निवेश की बात करते हैं…. अभी देखिये कितने और गद्दार निकलते, वो तो अच्छा हुआ टीम ही अन्ना ने भंग कर दी..!! मैं केजरीवाल का विरोध नहीं कर रहा वरन यह कह रहा हूँ कि केजरीवाल आंदोलन का मुखिया बनने का प्रयास करेंगे तो रहा बचा भी अधिक दिन अनहि चलेगा क्योंकि आंदोलन अन्ना से था न कि टीम के किसी सदस्य से..!! जो मैंने का कहा है वह यह कि जब आप बलिदान देने के नारे से मैदान मे उतरे तो स्वस्थ्य गिरने का भय आपकी विश्वसनीयता को कमजोर ही करता है…. आप कह सकते हैं कि यह और लोगों को भय था, किन्तु अंततोगत्वा यह सभी को पता होता है कि स्वस्थ्य गिरने पर अनुरोध भी आएगे और दबाब भी अतः श्रेष्ठ यह होता कि बलिदान की बात बार बार न दोहराई जाती। जैसा कि आपने कहा आजादी बलिदान मांगती है… बलिदान के दावे नहीं। यह मैं बार बार इसलिए दोहरा रहा हूँ क्योंकि इससे जनता मे पहले तूफानी जोश पैदा होता है और बाद मे उतनी ही बड़ी निराशा हाथ लगती है। आज अन्ना से जनता को उम्मीदें हैं सही है, किन्तु बेहतर होगा अन्ना को अन्ना रहने दिया जाए। मेरा लेख का जो उद्देश्य है वह यह कहना कि बेहतर होता कि टीम भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनजागृति को लक्ष्य कर के जमीन पर काम करे न कि राजनीति। राजनीति का कदम आत्मघाती सिद्ध होगा, यह भविष्य मे स्वयं सिद्ध हो जाएगा॥ ….आभार॥

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
August 9, 2012

क्या केजरीवाल और टीम को यह आशा थी कि वे दस दिनों में ही वह हासिल कर लेंगे जिसके लिए उन्होने बलिदान के नारे के साथ आन्दोलन के इस चरण का श्रीगणेश किया था.? इतना तो देश का आम से आम आदमी भी जानता था कि सरकार इतना शीघ्र झुकने वाली नहीं है, क्या पिछले कई दौर का अनुभव लिए टीम अन्ना को यह बात नहीं पता थी? जो भी ये बड़े बड़े प्रश्न चिन्ह लगे वासुदेव जी कोई अभी सफाई देने वाला नहीं लोग आंकते रहे जांचते रहे कुछ को पहले ही भ्रम था सरकार इनकी ये मंशा पहले से चिल्ला रही थी और इस बार इनको किनारे फेंक दिया था लोग मजाक उड़ा रहे थे ..मत बिभिन्नता तो हुयी ..अब राज क्या है अन्दर की बात क्या है क्या ले ये सामने आते हैं क्या सफाई देते हैं ये देखना है आन्दोलन/नीति में जान है लोग जुड़े हैं नब्ज पकड आ जाए तो दवा हो भ्रमर ५

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 9, 2012

    सुरेन्द्र जी, सहमत हूँ आपसे नब्ज पकड़ आ जाये तो दवा है.!

K PRASAD के द्वारा
August 8, 2012

इस लेख को पढ़कर एक कहानी याद आ गयी ,एक कुत्ता था,धीरे -धीरे कराह रहा था ,एक आदमी ने उससे पुछा क्यों रो रहे हो ,कुत्ते ने कहा की मैं जहाँ बैठा हूँ ,वहां कटे हुए पेड़ का कुछ हिस्सा है जो गढ़ रहा है .तो उस आदमी ने कहा की वहां से उठ कर कहीं और क्यों नहीं बैठ जाते ,कुत्ते ने कहा की गढ़ रहा है लेकिन उतना नहीं की बर्दाश्त न हो सके .वैसे ही हम हिन्दुस्तानी ,भ्रस्टाचार गढ़ रहा है लेकिन उतना नहीं की बर्दाश्त न हो सके.एक व्यक्ति ७५ साल का भ्रस्टाचार से लड़ने के लिए उठा, साथ में कुछ युवा चेहरे उसका साथ देने के लिए उठे तो आप लोग लगे खोजने की कैसे टांग खिंची जाय.एक बात मुझे जरूर बताइयेगा अरविन्द केजरीवाल या टीम अन्ना के लोग क्या इतना बुरा कर रहें हैं जितना ऐ राजा ,सुरेश कलमाड़ी ,चिदम्बरम और बाकी के कांग्रेस के मंत्रियों ने किया ,क्या रोबेर्ट वढेरा की असलियत और कारनामे आपको पता है ,अगर नहीं तो सियासत की पूरी जानकारी लीजिये .मैं टीम अन्ना का सदस्य नहीं ना ही कोई बहुत बड़ा प्रसंसक ,लेकिन अगर ऐसे लोगों ने पहल की है तो उनका साथ दीजिये .क्यों की अब बहुत अच्छा ढूडने से बेहतर है की कम बुरे की तलाश हो .

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 9, 2012

    प्रसाद जी, यह मान लेने से कि टीम अन्ना के सदस्य बहुत बढ़िया कर रहे हैं भटका हुआ आंदोलन रास्ते पर तो नहीं आ जाता..!! उसके लिए आवश्यक कि पहले आप वह काम करे जो करने आए थे। छोटा सा आंदोलन यदि 10 दिन नहीं संभला तो सवा अरब के देश की राजनीति कैसे संभलेगी? अच्छा होने भर से तो सफलता नहीं मिलती… उसके लिए योग्यता, सामर्थ्य और रणनीति चाहिए होती है। अब बात कलमाड़ी, ए राजा और टीम अन्ना के सदस्यों की… कलमाड़ी राजा ने तो देश को अपने लाभ के लिए चूना लगाया किन्तु खुला विरोध तो नहीं किया… टीम के उन लोगों को देश की जनता कलमाड़ी राजा जैसों से बेहतर कैसे मान ले जो डंके की चोट पर देश की अखंडता संप्रभुता को चुनौती देते हैं, अफजल के लिए आंदोलन करते हैं, भारतीय सेना के खिलाफ कश्मीर से असम तक यात्रा निकलते हैं…????

    S N SHARMA के द्वारा
    August 27, 2012

    बढेरा की असलीयत आपने बतानीचाहियेथी अब बता दो

Dr. Utsawa K. Chaturvedi, Cleveland,USA के द्वारा
August 8, 2012

यह तो भविष्य ही बताएगा की अन्ना ने पार्टी बनाकर अच्छा किए या भूल की, मगर अब जब अन्ना टीम ने यह निर्णय ले ही लिया है तो उन्हें अपनी कमियों ,  वर्तमान राजनीतिक परिवेश और आम भारतीय की मनोदशा देखते  हुए निम्न बातों पर ध्यान  देना चाहिए. १. अन्ना टीम को राजनीती की शुरुआत ग्राम पंचायत स्तर से करना चाहिए. ग्राम पंचायतों और मनरेगा  जैसी परियोजनाओं  में  जितना भ्रष्टाचार व्याप्त  है, वह किसी से छिपा नहीं है. यदि अन्ना की टीम एक एक करके ग्राम पंचायतों पर कब्जा करती गयी और उस स्तर पर सचमुच भ्रष्टाचार  हटा  सकी तो न केवल आगे की राजनीती के लिए उन्हें ताज़ी हवा  मिलेगी बल्कि लोग देखेंगे  की ये दल  जो कहता  है, करता भी वही है. २. ग्राम / नगर के  स्तर के  बाद उन्हें उन प्रदेशो की राजनीती लक्ष्य करनी होगी  जो अति पिछड़े हों और जहाँ के नेता भ्रष्टतम हों. ऐसे एक भी प्रदेश में यदि अन्ना सत्ता पर कब्ज़ा करके अपनी कथनी को करनी में बदल सके तो केंद्र पर अन्ना दल का दबाव अपने आप बढ़ जायेगा और वे बहुत सी अच्छी बातें  केन्द्रीय सरकार से केवल बन्दर घुड़की देकर मनवा लेंगे. ३. यदि अन्ना दल के लोग  कभी संसद में आये तो उन्हें न केवल सशक्त लोकपाल के लिए जूझना पड़ेगा वरना  संविधान  में व्यापक संशोधन करके हर तरह के आरक्षण को केवल आर्थिक आधार पर देने, राष्ट्रपति के कार्यकाल को सात साल करने और किसी को केवल एक ही बार राष्ट्रपति बन सकने जैसे गंभीर  मुद्दों पर भी करो या मरो की नीति अपना कर संघर्ष करना पड़ेगा. अन्ना दल को शुभकामनाएं !! डा ० उत्सव कुमार चतुर्वेदी , क्लीवलैंड, अमेरिका

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 9, 2012

    उत्सव ji, आपके सभी बिन्दुओं से मेरी सहमति है। निश्चित रूप से प्रारम्भ जमीनी स्तर से करने की आवश्यकता है। अन्ना ग्राम सभाओं को सशक्त करने की बात भी कहते आ रहे हैं, यह उनका मुख्य एजेंडा भी रहा है। राजनीति या व्यापक परिवर्तन कोई फल नहीं है जिसे झटके मे लपक लिया जाएगा। …. हार्दिक आभार।

yamunapathak के द्वारा
August 6, 2012

वासुदेव जी आपका लेख बहुत kuchh bayaan कर रहा है.padhakar इस घटना क्रम की jaankaaree bhee milee. mujhe ek hee baat se दुःख है की राजनीती के दांव पेंच में अन्ना जी फंस कर रह गए,हालांकि आज अपने ब्लॉग में उन्होंने नकारा है की वे koi raajneeti nahin karenge par yah baar-baar badalate bayaan baajee se वे apnee chhavi hee to kharaab कर rahe hain isliye aam janataa bhramit है unkaa avishvaas panap रहा है. लेख की सारगर्भिता के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई.

Deepak Dwivedi age 27 के द्वारा
August 6, 2012

नमस्कार समय के साथ समय के बाद ये उपजी शुरुआत

Ajay Singh के द्वारा
August 5, 2012

वासुदेव जी नमस्कार,    औरों के बारे में तो नहीं जानता किन्तु अन्ना जी,अरविन्द केजरीवाल एवं किरन बेदी के बारे में संदेह  करने का कोई औचित्य नहीं जान पड़ता। सभी टीमों में हर तरह के लोग होते हैं लेकिन देखना यह है कि  उनका नेतृत्व कैसा है। जिस सिस्टम में एक क्लर्क के यहां भी करोड़ों का काला धन मिलता हो उसी सिस्टम  में आयकर आयुक्त जैसे पद को त्याग कर धरना,प्रदर्शन,अनशन करने वाले पर संदेह करना ,आलोचना करना देश व समाज के लिये सोचने वालों को हतोत्साहित करना ही है।   आन्दोलन जनजागरुकता के उद्देश्य में पूरी तरह सफल रहा है और यदि ये लोग  सच में राजनैतिक विकल्प देने में सफल हो गये तो बाकी काम जनता वोट डाल कर पूरा कर देगी।प्रचारशैली,कौन आगे अनशन पर बैठा कौन बाद में ये बहुत छोटी बातें हैं।   इस आन्दोलन का एक मात्र उद्देश्य राजनीति में उतरना था यह एकदम अतार्किक निष्कर्ष है क्योंकि अरविन्द केजरीवाल जी ने यह कह दिया है कि अभी भी एक वर्ष से अधिक समय है,यदि सरकार  जनलोकपाल,राइट टू रिजेक्ट,राइट टू रिकाल विधेयक पास कर दे तो वह चुनाव में नहीं उतरेंगे।

manoranjanthakur के द्वारा
August 5, 2012

सुंदर मानसिकता में रची बसी behtar रचना

vasudev tripathi के द्वारा
August 4, 2012

आदरणीय भरोदिया जी, जवाहर जी व दिनेश जी आपने कहा इस बार अन्ना ने नया हथियार उठाया है. लेख के केंद्र मे यही प्रश्न है कि राजनीति का नया हथियार अन्ना ने उठाया है अथवा ये हथियार वो बंदूक है जिसे अन्ना के कंधे पर रखकर चलाने प्रयास किया जा रहा है..? बारीक विश्लेषण से तो उत्तर नकारात्मक ही अधिक लगता है क्योंकि जैसा कि मैंने लेख मे कहा है कि अन्ना जैसा विश्वास टीम मेंबरों पर नहीं किया जा सकता क्योंकि उनके पास अपना ऐसा कुछ भी रेकॉर्ड नहीं है। टीम में भूषण जैसे बड़े लोगों के अधिवक्ता भी हैं जो अभी तक अफजल की वकालत करते आये हैं और कश्मीर को भारत का अंग मानने में जिन्हें आपत्ति रही है.., अथवा संदीप पाण्डेय जैसे लोग जो भारतीय सेना के विरुद्ध और अफजल गुरु की फांसी माफी के लिए अभियान चला रहे हैं.! संजय सिंह को भ्रष्टाचार के विरुद्ध सजे मंच से गुजरात दंगों की याद आती है और उन्हें मोदी को आदमखोर कहना पड़ता है ताकि सेकुलरिस्म सुरक्षित रहे। केजरीवाल को, जैसा कि मैंने लिखा, बुखारी के खिलाफ आपराधिक मुकदमों को भूलकर उसके पास जाना पड़ता है और उन्हें नक्सली समर्थक स्वीकार हैं किन्तु भाजपाई संघी नहीं (इस हिसाब से देश की आधी से भी अधिक जनता तो उनके लिए खारिज ही हो गई)..!! टीम मे सबके अपने-अपने मतभेद व अलग-अलग राग हैं.! किन्तु इस सब को जनता ने किनारे कर दिया क्योंकि मुद्दा भ्रष्टाचार का था और कोई क्या सोचता है अर्थ नहीं रखता। किन्तु राजनीति में तो ऐसा नहीं होने वाला..!! पार्टी तभी चल सकती है जब उसकी अपनी एक विचारधारा हो, एक एजेंडा हो और अपना एक ढांचा और संगठन हो.! ऐसे मे टीम अन्ना कहाँ और कैसे खड़ी होगी? अन्ना और किरण बेदी को छोड़कर और कौन टीम मे ऐसा है जिसपर जनता विश्वास करे.? और ये दोनों भी राजनीति आने को तैयार नहीं.! अतः जिस संकल्प का न आधार हो न लक्ष्य उसके साथ देश कितना चल सकता है… मेरा व्यक्तिगत मानना है, जैसाकि मैंने लेख मे लिखा, कि बेहतर यही होगा कि टीम अन्ना भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनजागृति को लक्ष्य कर के जमीन पर काम करे क्योंकि आज अभियान जमीन पर ही कमजोर हो चला है|

bharodiya के द्वारा
August 4, 2012

वासुदेवभाई नमस्कार नास्तिक लोगों का सामना हो सके ऐसे आपके सब लेख मुझे एक वर्ड फाईल में डालके ईमेल करो. अभी एन.आर.आई गुजरातीयों का मगज ठिकाने लाना है । बहुत निंदा करते हैं हिन्दु धर्म और जीवन शैली की । जैसे मिठाई खा रहे हो ऐसे चटकारा भर रहे हैं शास्त्रों के प्रसंगों को लेकर । है तो बडे विद्वान लोग पर उन की विद्वानी गलत जगह जा रही है । उन की हवा निकालनी पडेगी । मुझे आप की मदद चाहिए ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 4, 2012

    भरोदिया जी, नमस्कार! जहाँ तक नास्तिकता का प्रश्न है मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं है.. मुझे नहीं लगता कि यदि कोई ईश्वर के अस्तित्व को नहीं स्वीकारता तो इससे कोई आपत्ति होनी चाहिए.! किन्तु मैं ईश्वर मे विश्वास करता हूँ और यह दृढ़तापूर्वक कह सकता हूँ कि मैंने जितने भी नास्तिक देखे उनमे से अधिकांश ने अपने मस्तिष्क को बंद कर रखा होता है यद्यपि उन्हें लगता है कि वे बहुत ही वैज्ञानिक और आधुनिक सोच वाले हैं.! वस्तुतः अधिकांश विज्ञानं के विषय में कुछ नहीं जानते। इस विषय पर मैं अधिकतम तार्किक स्टीफन हाकिन्स को मानता हूँ और उनकी एक प्रशिद्ध पुस्तक मैं इस समय पढ़ रहा हूँ किन्तु अधिकांश नास्तिकों का ज्ञान तो उसका भी 100वां हिस्सा नहीं होता है। यह एक ऐसा विषय है जिसमें आप 360 डिग्री अपने मस्तिष्क की सीमाओं को खोल दें जैसा कि मुझे आइन्सटाइन के विषय मे लगता है। समस्या लोगों के साथ तब उत्पन्न होती है जब हिन्दू धर्म की ब्रम्होंमुखी प्रक्रिया के प्रारम्भिक चरण को अब्राहमिक मतों के परमज्ञान/परमलक्ष्य के साथ घालमेल करके प्रस्तुत कर जाता है। ऐसा करने वालों का अज्ञान भी होता है और द्वेष भी.! आप उन्हें हिन्दू धर्म की वह महानता उनके लेखों पर प्रतिक्रियाओं में नहीं समझा सकते जो दर्शन से लेकर क्वांटम फ़िज़िक्स तक के सूत्रों से परिभाषित होती है। हाँ फिर भी उन लोगों को जोकि हिन्दू धर्म को अपमानित करने का काम कर रहे हैं, ऐसा प्रतिउत्तर दिया जाना आवश्यक है जोकि उनके मुंह पर एक करारे तमाचे के रूप में इस तरह बैठे कि दूसरे लोग उसकी छाप दूर से ही देख लें और वे अन्य बहुत ज्ञान न रखने वाले आम लोग उनकी बाचाली से पथभ्रमित न हों.!! मैंने अपनी स्कूली पढ़ाई घर पर ही की है अतः स्कूल से घर से आने के बाद खेलने कूदने व कोचिंग वगैरह के बाद भी बहुत समय बचता था…. तब भारतीय धर्मग्रन्थों के अध्ययन का खूब अवसर मिलता था। हिन्दुत्व के आलोचकों से भी मैं तभी से परिचित हूँ क्योंकि कई बड़े हिन्दू धर्म के आलोचकों की पुस्तके लाकर पढ़ता था। भारत मे हिन्दू धर्म को तो आप गाली भी लिखकर छाप सकते हैं। तब हिन्दू धर्म पर मैंने काफी कुछ लिखा। किन्तु बचपन का लिखा बहुत सुरक्षित नहीं रहा। ग्रेजुएशन के लिए घर से बाहर निकलते ही वह क्रम टूट सा गया… अतः जो लेख जागरण ब्लॉग पर हैं वही सुरक्षित हैं… शेष या तो प्रकाशकों तक पहुँच गए अथवा पुरानी स्कूल की कापियों के पीछे लिखे ही कभी कभार घर मे सफाई के समय निकलते हैं..!! तथापि आपके किसी भी प्रयास मे मैं पूर्णतयः आपके साथ हूँ। आप मुझे लिंक भेज दिया करिए मैं उनके संक्रमण का इलाज करता रहूँगा जहां तक मुझसे संभव होगा..!! व्यस्तता कुछ बाधाएँ बढ़ाती है… प्रॉफेश्नल लेखक और निःशुल्क लेखक के बींच का द्वंद है..!! :) :)

bharodiya के द्वारा
August 4, 2012

एक भैंसा है वासुदेवभाई, जो अपने घास के साथ साथ दुसरे का घास भी खा जाता है, और तगडा हो गया है । बलवान हो गया है । दूसरे को पागलों की तरह परेशान करता है । उसे काबू करना जरूरी था । अन्ना कुछ हथियार ले के आ गये । अनशन का हथियार पहले उठाया । लोगों को पसंद भी आया और ताली भी बजाई । लेकिन भैंसा काबूमें नही आया । उल्टा अपने सिंग, दांत को ओर मजबूत और तिक्ष्ण बनाने में लग गया, अपनी चमडी भी मोटी कर ली ताकी अनशनकी लाठी असर ना करे । अनशन का हथियार बूठा बेअसर हो गया लोगोंने तालिया बजाना भी छोडा । अन्ना क्या करते उठाया दुसरा हथियार राजनीति का । भैंसे को नंदी या सांढ ही हरा पाएगा । ईस हथियार की मेरे जैसे कुछ ही लोकों को शंका थी की ये हथियार होगा, बाकी को कल मालुम पडा । कुछ डर गए, कुछ खूश हो गए । हम खूश तो हुए लेकिन उलजन में पड गये । तीन तीन नंदी एक साथ खडे हो गये । मोदी, रामदेव और अन्ना । तिनों को एक साथ करना जरूरी है वरना आपसमें ही एक दुसरे को निपटा देंगे । और भैंसा बडी शान से मुस्कुराता रहेगा । वसुदेवभाई, अच्छे लोग कहां कहांसे गुजरे, क्यों गुजरे, उस का ईतिहास भुगोळ तपासने की जरूरत नही है । कुछ गलत जगह पैर पड गये हो तो उसे नजरांदाज करने में ही भलाई है । ईन लोगों से अच्छे आदमी आप कहां से लाओगे । जो है यही है । उन्हें ही सपोर्ट करना है । वो सब एक हो जाय ऐसे उपाय सुजाना है । राजकारण मे आदर्श्वाद कोइ काम का नही है ।

    jlsingh के द्वारा
    August 4, 2012

    आदरणीय वासुदेव भाई, नमस्कार! बहुत हद तक मैं भरोदिया साहब के विचारों से सहमत हूँ! जनता उधेड़ बुन में है, टीम अन्ना भी अपरिपक्कव है, बाबा रामदेव की अपनी महत्वकांक्षाएं हैं. भाजपा भी पूर्ण रूपेण संगठित नहीं है. विकल्प नजर नहीं आ रहा है. जनता चमत्कार चाहती है और सरकार की चमड़ी मोटी हो चुकी है. मीडिया भी इस बार बंटा हुआ नजर आया …. बहुत सारे अनशनकारी विभिन्न मुद्दों पर अपनी जान तक गँवा चुके हैं. रास्ता क्या है? सभी राजनीतिक दल अपने अपने स्वार्थ में उलझे हुए हैं … देख लीजिये टीम अन्ना को भी और बाबा रामदेव को भी …… एक बात तो साफ़ है जबतक राजनीति में अच्छे लोग नहीं आएंगे स्वार्थी तत्व अपनी रोटी सेंकते रहेंगे. आपके विश्लेषण से सहमति रखते हुए परिवर्तन की आशा रखता हूँ!

    dineshaastik के द्वारा
    August 4, 2012

    आदरणीय वासुदेव जी, सादर नमस्कार। भरोदिया जी की बातें अक्षरतः सही हैं तथा मैं भरोदिया जी एवं जवाहर जी की बातों से इत्तफाक  रखता हूँ। अच्छे लोंगो को राजनीति में आकर व्यवस्था में आमूल जूल परिवर्तन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता भी नहीं है।

    nishamittal के द्वारा
    August 5, 2012

    सही और ईमानदार लोगों का राजनीति में आना तो सोने में सुहागा है परन्तु भ्रमित करने वाली बयानबाजी,अधर में मामले को लटकाना जनता के विशवास को डिगता है,सही कहा है वासुदेव जी ने इतनी जल्दी सम्पूर्ण देश से ऐसे सज्जनों को खोजना कोई बाएं हाथ का भी काम नहीं है.


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