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लोकतन्त्र में इस्लाम का खौफ

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15 अगस्त 1947 को स्वतन्त्रता प्राप्ति तक हिन्दुओं ने कासिम से औरंगजेब तक इस्लाम के नाम पर जघन्य अत्याचार झेले थे किन्तु स्वतन्त्रता के समय तक उन्हें काफी हद तक भुला दिया गया था और भुला दिया जाना भी चाहिए था। सदियाँ और पीढ़ियाँ बीत चुकी थी.! किन्तु दुर्भाग्य से औरंगी मानसिकता अभी तक जीवित थी जो भारत-पाकिस्तान के विभाजन के रूप में सामने आई। विभाजन मात्र भारतवर्ष का विभाजन ही नहीं था वरन लाखों-करोड़ों हिन्दू सिक्खों के लिए इस्लामिक आक्रमण काल का पुनर्योदय था जिसने उनकी संपत्ति, परिवार, पत्नी-बहन-बेटियाँ और घर सब कुछ छीन लिया। वे लुटे पिटे भारत आए।
भारत ने हिन्दू परिवारों को आश्रय तो दिया किन्तु भारत में बसे मुसलमानों से उसके एवज में बसूली नहीं की.! वे भयभीत तो थे किन्तु हिन्दू उदारता ने उनके भय को निरर्थक सिद्ध कर दिया। भारतीय राजनीति और संविधान ने भी पूरी सहिष्णुता का परिचय दिया, अंततोंगत्वा सहिष्णुता तो उचित ही थी और हिन्दू मूल्यों के अनुरूप भी! किन्तु भारत के दुर्भाग्य का दूसरा अध्याय फिर प्रारम्भ हो गया जब हिन्दू सहिष्णुता को छुद्र स्वार्थों के लिए कुछ गद्दारों ने पुनः छलना प्रारम्भ कर दिया। भारत की एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापना को हिंदुओं ने उस समय भी स्वीकार लिया जब मजहब के आधार पर उन्होने अपने देश के दो (तीन) टुकड़े होते हुए देखे थे और मजहब के आधार पर ही हिन्दुओं को लुटते और हिन्दू औरतों का बलात्कार होते देखा था, किन्तु उदारता और आधुनिकता का चोला ओढ़े संकीर्ण राजनीति ने उसमें भी हिन्दुओं के साथ छल किया। पंथनिरपेक्ष राष्ट्र का संविधान स्थान-स्थान पर हिन्दू मुसलमानों के सन्दर्भ में अलग अलग बातें करता दिखाई देने लगा। फिर चाहे वह कश्मीर हो, विवाह अधिनियम हो, हज सब्सिडि हो, अल्पसंख्यकों के नाम पर करदाताओं के पैसों से दी जाने वाली भेदभावपूर्ण विशेष सुविधाएं हों, मस्जिदों को स्पेशल छूट और मंदिरों से बसूला जाने वाला कर हो अथवा मस्जिदों के लिए सरकारी जमीन और मंदिरों का सरकारी अधिग्रहण हो, प्रत्येक स्थान पर हिन्दू पंथनिरपेक्षता का बोझ ढोता रहा है।
सतत मुस्लिम परस्त होती पंथनिरपेक्षता की परिभाषाओं से स्थित इतनी बिगड़ गई कि अब तो संविधान भी नागरिक समानता की रक्षा करने में असमर्थ होता जा रहा है, जितना यह चाहता भी है! बात अब तक कश्मीर में कश्मीरी पण्डितों की, अमरनाथ यात्रा की, असम में बोडो हिन्दुओं की अथवा केरल में जेहादी शोर की ही थी जहां कानून और सत्ता बेबस खड़ी तमाशा देखती रहती है किन्तु अब तो देश की राजधानी में भी शासन और प्रशासन संगठित कट्टरतावाद के चरणों में नतमस्तक दिखाई देने लगे हैं। दिल्ली के चाँदनी चौक क्षेत्र में, जहां कि प्रसिद्ध लालकिला और जामामस्जिद स्थित हैं, मेट्रो की खुदाई के दौरान पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए थे जिसके बाद जमीन पुरातात्विक विभाग (एएसआई) के पास चली गयी। किन्तु एएसआई कुछ निष्कर्ष निकाले और जमीन के विषय में कुछ निर्णय हो इससे पहले ही वहाँ के मुसलमानों ने उसे शाहजहाँकालीन कालीन अकबरावादी मस्जिद घोषित कर दिया और रातों रात उस पर मस्जिद भी बना डाली। यह निर्माण किसी गाँव अथवा कस्बे में नहीं वरन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के हृदय क्षेत्र चाँदनी चौक में किया गया किन्तु आश्चर्य कि दिल्ली पुलिस, जिसका स्लोगन है “हम तुरंत कार्यवाही करते हैं”, को खबर तक नहीं लगी.! कम से दिल्ली पुलिस का ऐसा ही कहना है। न्यायालय द्वारा जमीन पर किसी भी प्रकार के धार्मिक क्रियाकलाप पर रोक लगाने का आदेश भी जारी हुआ किन्तु कई दिनों तक नमाज़ पढ़ने से रोकने का साहस दिल्ली सरकार अथवा दिल्ली पुलिस नहीं कर सकी। विश्वहिंदू परिषद आदि हिन्दू संगठन इस अतिक्रमण के खुले विरोध में उतर आए और हिन्दू महासभा की याचिका पर न्यायालय ने अवैध मस्जिद को तत्काल गिरने का आदेश जारी कर दिया। यह आदेश मिलते ही दिल्ली पुलिस की सारी वास्तविकता सामने आ गयी। दिल्ली पुलिस ने न्यायालय में निर्लज्जता से हाथ खड़े करते हुए कह दिया कि अवैध मस्जिद गिराना उसके बस की बात नहीं है.! यह इस बात का सूचक है कि जिन मुसलमानों को राजेन्द्र सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र समिति जैसे सरकारी आडंबरों का प्रयोग कर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनेता दबा कुचला पिछड़ा और वंचित बताकर तुष्टीकरण का घिनौना खेल खेल रहे हैं, उस मुसलमान समुदाय की वास्तविक स्थिति देश में क्या है। बात-बात पर देश की अखंडता, राष्ट्रीय हितों और संविधान को पलीता लगाकर अपने दीनी हक़ का शोर मचाने वाले समुदाय की मानसिकता एवं शासन और प्रशासन का इस मानसिकता के सामने भीगी बिल्ली बनकर मिमियाना देश की संप्रभुता और संविधान के मुंह पर तमाचा ही कहा जा सकता है। यह तमाचा स्वयं में अनोखा नहीं है, दिल्ली उच्च-न्यायालय लम्बे समय से जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर रहा है किन्तु दिल्ली पुलिस की हिम्मत नहीं पड़ रही कि वह बुखारी को गिरफ्तार करे! दिल्ली पुलिस न्यायालय में जाकर बताती है कि उसे बुखारी नाम का कोई सख्श इलाके में मिला ही नहीं.! पूर्व में शाही इमाम रहे अब्दुल्लाह बुखारी ने तो दिल्ली के रामलीला मैदान से खुली घोषणा की थी कि वो आईएसआई का एजेंट है और यदि भारत सरकार में हिम्मत है तो उसे गिरफ्तार कर ले.! सरकार और पुलिस तमाशा देखने के अतिरिक्त और कर ही क्या सकते थे.? यदि देश में राष्ट्रीय हितों की राजनीति हो रही होती तो कैसे मान लिया जाए कि कोई बुखारी राष्ट्रीय भावना और कानून से ऊपर हो सकता है अथवा भारत माँ को डायन कहने वाला कोई आज़म खाँ एक प्रदेश की सरकार में मंत्री बन सकता है??
प्रश्न उठता है कि क्या शासन और प्रशासन को इतना भय किसी बुखारी अथवा आज़म से लगता है कि देश का कानून बार बार बौना साबित होता रहे.? यह भय उस मानसिकता से है जो देश से पहले दीन-ए-इस्लाम को अपना मानती है। निश्चित रूप से हर मुसलमान को हम इस श्रेणी में नहीं रख सकते और न ही रखना चाहते हैं किन्तु यह सत्य है कि बहुमत इसी मानसिकता के साथ है अन्यथा शाहबानों जैसे मामले में संविधान और सर्वोच्च न्यायालय को धता बताकर कानून नहीं बदले गए होते, मोहनचन्द्र शर्मा के बलिदान पर सवाल नहीं खड़े किए गए होते, अफजल की फांसी को लटकाकर नहीं रखा जाता और बुखारी पर केस वापस लेने की अर्जी लेकर दिल्ली सरकार न्यायालय के पास नहीं गिड़गिड़ाती.! गिलानी जैसे गद्दार देश की राजधानी में आकर बेधड़क चीखकर चले जाते हैं कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है और भारत सरकार उनके कार्यक्रम को सरकारी सुरक्षा मुहैया कराने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर पाती है.!
तर्क दिया जाता है कि बुखारी को गिरफ्तार करने अथवा अवैध मस्जिद को गिराने से दंगे भड़क उठेंगे, प्रश्न उठता है कि सैकड़ों साल पुराने हिन्दू मंदिरों को सरकारी आदेश पर जब गिरा दिया जाता है या अधिग्रहण कर लिया जाता है अथवा हिन्दुओं के शीर्ष धर्मगुरु कांची शंकराचार्य को दीपावली के अवसर पर सस्ते आरोपों में गिरफ्तार कर लिया जाता है तब दंगे क्यों नहीं भड़क उठते.? तब विरोध अधिकतम शासन और प्रशासन तक ही सीमित क्यों रहता है? क्या यह 1919-24 के खिलाफत आंदोलन की मानसिकता नहीं है कि इस्लाम का शोर उठते ही सामाजिक राष्ट्रीय प्रत्येक हित को किनारे लगा दिया जाता है और शुरुआत दंगों से होती है? भारत-पाकिस्तान विश्व कप में फ़ाइनल सेमीफ़ाइनल खेल रहे हों तो भारत के शहरों में अघोषित कर्फ़्यू लगता है, पाकिस्तान में ओसामा मारा जाता है तो भारत में शोकसभाएं होती हैं अथवा अमेरिका में कुरान जलाने की बात होती है तो भारत में हिंसा भड़क उठती है.!
इतिहास की मानसिकता अभी तक जीवित है अतः वर्तमान में इतिहास का प्रतिबिम्ब भी झलकता है। यदि भारत को जीवित रखना है तो भारत को पाकिस्तान बनने से रोकना होगा और इसके लिए आवश्यक है कि कट्टरपंथ के आगे घुटने टेकने की आदत को बदला जाए। वास्तविक पंथनिरपेक्षता को आखिर समान संवैधानिक क़ानूनों से परहेज क्यों होना चाहिए.? अन्यथा यह प्रश्न तो उठना स्वाभाविक ही है कि 21वीं सदी के लोकतन्त्र में इस्लाम से यह खौफ और हिन्दुओं के साथ ही दोगला व्यवहार क्यों.?
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वासुदेव त्रिपाठी

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Himanshu Nirbhay के द्वारा
September 6, 2012

त्रिपाठी जी, आपके वेदना और हिन्दुओं एवं भारत के प्रति देश की निर्लज्ज सरकार/गद्दारों के अति उदासीन रवैये से उत्पन्न इस्लामिक आतंक से मेरे सहित भारत मन का हर सपूत कष्ट मैं है… गाँधी , नेहरू और उनके वंशजों तथा वोट बैंक के रोटियां सकने वाले अनेक दुष्टों के विरुद्ध हिन्दुओं का एकजुट न होना, हमारी कमजोरी है जो उन सभी को बल देती है… हम सभी को एकजुट होकर इन आताताइयों का विनाश करना ही पड़ेगा… ऐसा शीघ्रातिशीघ्र हो, प्रभु से प्रार्थना है… जय जय

S N SHARMA के द्वारा
August 23, 2012

भाई  वासुदेव आपने सही लिखा है.मै इस के लिए सबसे ज्यादा गान्धी को जुमेवार मानता हूं  दो नम्बरपर जार्ज नेहरू था इन दोनो ने हमे बी कलास नागरिक बना दिया दोनो लुचे थे  गान्धी को मैडलीन सलैड मिली नेहरू को लेडी माऊन्ट बैटन  व इन ने हमे आजाद नही  होने दिया  गान्धी तो 1944 मे ही जेल मे स्वराज का नारा छोड चुका था बदले मे मैडलीन सलैड मिली जिस  के साथ नगां हो कर सोता था सविंधान 1932 मे  अंग्रेजो ने डोमीनियन स्टेट के लिए जो  एक्ट बनाया था वही लागू हुआ 1949 मे नेहरू ने लन्दन मे क्राउन की वफादारी पर दस्तक किए वाह हमारे नेता डोमीनियन स्टेट का ताज नेहरूको मिला जो तय था गदारो ने अपना नाम सैकुलर  रख लिया जिस  देश भगत का कद बढता दिखाई दिया उसे कत्ल कर दिया लाल बहादुर ललितनारायन मिश्रा शामाप्रसाद मुकरजी दीनदयाल उपाध्याय आदि का कद नेबरू व गान्धी से ऊंचा हो गया  ईसीलिए मरवा दिए. भारत मे मुस्लिम भी गान्धी नेहरू की साजिस के तहत रखेथे

rahulpriyadarshi के द्वारा
August 17, 2012

संवेदनशीलता राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों की अपेक्षा मजहबी वाकयों पर इनका यूँ विद्रोही रुख इख्तियार करना कुछ ऐसा ही है जिस प्रकार आपने आलेख में बताया है,यह वो पीढ़ी नहीं है जो देश की उन्नति चाहती है,ये वो पीढ़ी है जो मजहबी जेहाद के नाम पर अपने सहोदर की बलि चढाने से भी नहीं चूकती,ऐसे लोगों की नजर में लोकतंत्र सर गैर-मझाबियों का चोंचला है जिनमे उनके कुछ मजहबी भी फंस गए हैं,हर तंत्र की स्थापना के कुछ सौ वर्षों बाद ही उनकी खामियां लोगों को नजर आती हैं,और तब उसका विकल्प सामने आता है,वैसे लोकतंत्र अभी युवा हैं,किन्तु लोकतंत्र संविधान से चलता है तब तक उसका स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है,अन्यथा कितने ही लोग अल्पायु में ही चल बसते हैं.संविधान लोकतंत्र को ताकतवर बनता है,किन्तु बदजात नेता इसे जबरन नपुंसक बनाना चाहते हैं.अगर किसी मजहब को तरजीह नहीं देनी है तो किसी मजहब को नहीं देना चाहिए,फ़र्ज़ कीजिये कि ये दंगाई ‘एक ख़ास मजहब’ के ना होकर मजहब से मुक्त भी हों तो क्या उनकी यह हरकतें एक प्रभुतासंपन्न देश का जमीर जगाने के लिए काफी नहीं है,खैर इसे नजरअंदाज करने में ही सबकी भलाई है,क्यूंकि यहाँ तो यह भी इल्जाम नहीं लगाया जा सकता की इसके पीछे आर एस एस का हाथ है,क्यूंकि दंगाइयों के दादा के परदादा को संघ के एक कारसेवक के दूर के रिश्ते के मौसा के नाना ने अपने यहाँ काम पर रखने के लिए पेशावर से बुलाया था.

yogi sarswat के द्वारा
August 13, 2012

इतिहास की मानसिकता अभी तक जीवित है अतः वर्तमान में इतिहास का प्रतिबिम्ब भी झलकता है। यदि भारत को जीवित रखना है तो भारत को पाकिस्तान बनने से रोकना होगा और इसके लिए आवश्यक है कि कट्टरपंथ के आगे घुटने टेकने की आदत को बदला जाए। वास्तविक पंथनिरपेक्षता को आखिर समान संवैधानिक क़ानूनों से परहेज क्यों होना चाहिए.? अन्यथा यह प्रश्न तो उठना स्वाभाविक ही है कि 21वीं सदी के लोकतन्त्र में इस्लाम से यह खौफ और हिन्दुओं के साथ ही दोगला व्यवहार क्यों.? मित्रवर वासुदेव , एक और पाकिस्तान का बनना निश्चित है , भले थोड़ी देर लगे लेकिन बनेगा जरूर ! हमारे नीति निर्माता इतनी घटिया सोच के बैठे हैं ! बहुत ही सटीक और साहसिक लेखन !

Chandan rai के द्वारा
August 13, 2012

त्रिपाठी जी , यदि यह एक वैचारिक समीक्षा भर है ,तो सर्वथा की तरह आपके इस बेहतरीन लेख की मुक्त प्रशंशा करने में कोई गुरेज नहीं ! पर यदि लेख से अलग भी ये आपके निजी विचार है तो मित्र दिल को बहुत दुःख होता है ! आप युवा है आपके कंधो पर एक उज्जवल एकजुट भारत का भार है ! क्या हमारा योगदान एक धरम -वर्ग -रंग तक सिमित रहना चाहिय ! मे चाहता हूँ आप अपनी ऊर्जा एकजुटता में लगें ! मित्र आप एक प्रतिभाशाली युवा है

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 13, 2012

    मित्र यदि आँख बंद कर लेने में ही भारत के भार समाधान व समाज देश की सेवा है तो इसके लिए हमें ऊर्जा की क्या आवश्यकता..??? आँख बंद करने में तो कोई ऊर्जा नहीं लगने वाली..??

    MUKESH के द्वारा
    August 19, 2012

    चन्दन जी, एकजुट भारत से आपका क्या आशय है ? वासुदेव जी का लेख भारत की एकजुटता को कहाँ नुकसान पंहुचा रहा है ? आपने कुछ भी स्पस्ट नहीं किया है. क्या आप भी मनमोहन सिंह जी जैसी ही शांति चाहते है, जो उन्होंने आसाम में कहा है कि, अब हम सब को बंगलादेशी घुसपेठ से आँख बंद कर के शांति से रहना चाहिए. कोई आपके घर में घुसकर आपको बहार खदेड़ दे तो क्या आप शांति राग अलापेंगे, या आक्रान्ता को निकालेंगे ? शांति राग अलापते- अलापते देश का और कितना विभाजन कराओगे ?

    DHARAMSINGH के द्वारा
    August 23, 2012

    चन्दन साहब अपनी सोच सही करो तुम जैसे सुधारक जयचन्द मानसिंह व गान्धी के चेले ही हमारी  गुलामी के काररण बने सिरफ सता बदली है हम आज भी गुलाम हैं मानवता के भार का ठेका सिरफहिन्दुओ पर है  मुसलमान राज करने के लिए हैं मनमरजी करना उनका  अधिकार है हिन्दू बहन बेटियो की ईजत लूटना   जान से मारना जायदाद लूटना व नष्ट करना मुसलमनो का अधिकार है हिन्दुओ का रोना भी अपराध है   सहने के लिए हिन्दू हैं जब तुम जैसे काठ के उलू ओ के विचार  पढता हूं तो रोना आता है कि ये हिन्दू हैं या मुसलमानो के एजेंट हर साम्रगायिक दंगा मुसलमानो से शुरूहोता है पर किसी को सजा नही मिलती   किसी मुसलमान को नसीहत देकर देखो पता चल जायेगा छठी सदी के  बाद गुलाम थे गुलाम हैं गुलाम रहेंगे

kishan sharma के द्वारा
August 12, 2012

Its not the persons but the IDEOLOGY, ( only one religion is true rest all are false. Non-believers must be converted or beheaded. Only one God and one Messenger be worshipped . 72 Hoors are waiting in Jannat for the believers who fought & killed others or being killed for the religion. Jihad, Taqiyya, Jazia, No HUman Rights for minorities in their societies, but claim to get more rights in multicultural societies, as minorities) that needs to be fought at every level, social, political, legal, every one must visit 2 Sites….politicalislam.com & religion of peace.com…….must study their Book to combat them. For Global peace, there must not be any room for VIOLENCE IN ANY FORM.

jagojagobharat के द्वारा
August 12, 2012

बहुत बढ़िया आलेख बधाई

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 13, 2012

    हार्दिक आभार!

chaatak के द्वारा
August 12, 2012

स्नेही वासुदेव जी, सादर अभिवादन, साम्प्रदायिक मानसिकता से ग्रसित सभी सभ्यताएं धर्म को भुला कर सिर्फ सम्प्रदाय पर आश्रित हो रही है इसका प्रमुख कारण है कि सम्प्रदाय में आक्रामकता होती है जबकि धर्म पूर्णतयः बौद्धिक| लोकतंत्र में इस्लाम के खौफ का प्रमुख कारण यही है कि जहां सनातन विचारधारा धर्म पर बल देती है वही इस्लाम सिर्फ सम्प्रदाय पर यानी कि सनातन हिन्दू जहाँ आत्मोथान, मोक्ष और सर्वे भवन्तु सुखिनः की और जाने के कारण अपनी मारक क्षमता (भीड़ और उत्तेजना) को खो देता है वहीँ इस्लाम में धर्म के नाम पर सिर्फ सम्प्रदाय का बोध मात्र उसकी मारक क्षमता को बढा देता है| लोकतंत्र वास्तव में कोई शासन प्रणाली न होकर एक हवा-महल है जो जल में बने हुए प्रतिबिम्ब को असली दिखा कर वास्तविक शासन के दुर्ग तक कभी जनता को पहुँचने नहीं देता| परिणामतः भीड़ बनाना और उसकी ताकत दिखाकर शासन और प्रशासन को प्रभावित करना ही लोकतंत्र का एक मात्र मकसद बन जाता है| सम्प्रदाय भीड़ को बढ़ावा देकर इस्लाम को लोकतंत्र पर हावी करने का पूरा मौका और सारी आवश्यक सामग्री प्रदान करता है जबकि हिंदुत्व इसके विपरीत सिर्फ शासन के नियमो, सदाचार के नियमो और मानवता के लिए आत्म-चिंतन और स्वयं में जो कमियां हैं उनके लड़ना सिखाता है न कि भीड़ बनाकर लोकतंत्र पर हावी होना| यहीं पर भीड़ गायब हो जाती है यही पर हिंदुत्व का लोकतंत्र पर वास्तविक अधिकार लुप्त हो जाता है (मेरी इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण आप मित्र दिनेश अग्रवाल जी की प्रतिक्रिया में देख सकते हैं| अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

nishamittal के द्वारा
August 10, 2012

वासुदेव जी ,मेरे विचार से अति सभी क्षेत्रों में हानिकारक है,फिर चाहे उदारता हो या कुछ और.पहले यह उदारता थी अब राजनैतिक नेताओं ने तुष्टिकरण को वोट राजनीति के कारण अपरिहार्य मान लिया है जो भी सत्ता में आता है व्यवस्था परिवर्तन का साहस नहीं जुटा पाता क्योंकि उनको लगता है कि हमको कोई कट्टर न कह दे और यही कारण है कि सभी आतंक ,पक्षपात सह कर भी जनता भी चुप रहती है.

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 13, 2012

    बिलकुल सही कहा आपने निशा जी,! अब तो लोग राष्ट्रवाद शब्द से कतराने लगे हैं कि कहीं उन पर कट्टरपंथी होने का आरोप न लग जाए..!! निराशाजनक व अशुभ संकेत है यह सब.!!!

dineshaastik के द्वारा
August 10, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, आपका आलेख पढकर बहुत मनन किया कि इन सबका कारण क्या है। िहिन्दुओं पर जितने अत्याचार हुये शायद ही विश्व की किसी कौम  पर कभी इतने अत्याचार हुये हों। गजनवी के दस हजार सैनिक सोमनाथ राज्य के एक लाख सैनिकों के रहते हुये भी सोमनाथ को लूटकर ले गई। कैसे…….. इसका मूल कारण है जाति प्रथा। जिसके कारण बहुसंख्य हुन्दुओं का अल्पसंख्य  जैसा हो जाना। दूसरे धर्म के उन लोंगो को जिनके पूर्वज कभी हिन्दु थे, क्यों नहीं  वापस सम्मान के साथ अपने धर्म में विलय करते हैं। यदि जाति प्रथा को हिन्दु धर्म  से समाप्त कर दिया जाय तो सारी समस्याओं का निराकरण हो जायगा। बुन्देलखण्ड का एक गाँव है, जिसे कभी किसी मुस्लिम सेनापति में घेर कर इस्लाम धर्म स्वीकार करने को विवश कर दिया था। वह क्षत्रियों का गाँव था। आज पूरा का  पूरा गाँव मुसलमानों का गाँव है। वह लोग बताते हैं कि कभी हमारे पूर्वज क्षत्री थे। क्या हि्दु धर्म के धर्मगूरु उन्हें वापस अपने धर्म में लाने का प्रयास नहीं कर सकते थे। यदि हमने अपनी नीतियाँ और सोच नहीं बदली तो कालान्तर में हिन्दु धर्म एक इतिहास  बनकर रह जायगा। मैं साम्प्रदायिकता के खिलाफ हूँ, लेकिन संस्कृति पर आक्रमण बरदास्त नहीं कर सकता। हिन्दु एक संस्कृति है। हमें इसकी रक्षा के लिये सार्थक पहल करना चाहिये। अब केवल लिखने और बोलने से काम नहीं चलेगा। सभी जातियों के हिन्दुओं को एक साथ  लाना होगा। जातिगत भेदभाव को भुलाना होगा।  

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 13, 2012

    आदरणीय दिनेश जी, यह सत्य है कि हिन्दू समुदाय ने बलात धर्मांतरित किए गए हिन्दुओं को पुनः अपने समाज में स्वीकार नहीं किया जिसके परिणाम स्वरूप 8वीं शताब्दी में जो क्षेत्र धर्मांतरित मुसलमानों से भर गए थे वे 1191 आते आते हिंदुस्थान के लिए मर्म स्थान से बन चुके थे, सिंधु पार का क्षेत्र अब भारत के विरुद्ध खड़ा हो था। यह हिन्दू जाति की महानतम भूल थी जिसका परिणाम बाद की सदियों तक देश ने भुगता, बाबजूद इसके कि हिन्दू धर्म ग्रंथ धर्मभ्रष्ट कर दिए जाने वाले को पुनः धर्म में समाहित होने की पूरी व्यवस्था करते हैं। सदियों से निष्कंटक जीवन व्यतीत कर रही यह जाति यह भूल चुकी थी उसके लिए भी संकट आ सकता है। किन्तु जहां तक जाति व्यवस्था का प्रश्न है ऐतिहासिक रूप से यह हमारी दासता का कारण रही हो ऐसा नहीं है, कम से कम मुस्लिम आक्रमण काल के समय तो बिलकुल नही.! ऐसा हमे बताने का प्रयास किया जाता है… राजीव दीक्षित जी कहा करते थे कि मैंने 50,000 से अधिक आधिकारिक दस्तावेज़ पढे और समझे हैं, हम जाति व्यवस्था के कारण हार गए ये कोरी भावुकता है। मेरा इतना व्यापक अध्ययन तो नहीं है किन्तु यह मैंने जाना और समझा है कि इतिहास का generalization नहीं किया जा सकता..!!!! प्रत्येक घटना के पीछे एक या अधिक विशिष्ट कारण होते हैं। हम जाति के कारण हार गए, मुस्लिम कालीन इतिहास को सामान्य रूप से पढ़ने समझने पर यह तर्क थोथा लगने लगता है। यहाँ एक-एक घटना का उदाहरण देकर तो नहीं दिया जा सकता और उसकी आवश्यकता भी नहीं है। आप स्वयं विद्वान हैं, इतिहास की एक-एक घटना का विश्लेषण करेंगे और उसके कारणों को ढूंढेगे तो समझ जाएंगे। मैं यहाँ जाति व्यवस्था की रूढ़ता का समर्थन नहीं कर रहा किन्तु हम इतिहास पर अपनी मन-मर्जी से जो चाहे थोप भी नहीं सकते। ऐसा बहुधा वामपंथी इतिहासकार करते हैं और उन्हें करना भी चाहिए क्योंकि उनका उद्देश्य रहता है कि हिन्दू सभ्यता को नीचा दिखाना… हम तो कहते हैं हमें जब आप प्रमाण देंगे हम तब तुरंत मान लेंगे..!!!

bharodiya के द्वारा
August 9, 2012

एक तरफ पाकिस्तान, एक तरफ बंगलादेश, बिचमें हिदुस्तान की गद्दार हिंदुओ की फौज. उस के ही पक्षमें खडा होता दुनिया का हवादार अमरिका ( अमरिका का आज का बयान सुना ही होगा । भारत के हिन्दु-मुस्लिम के बारे में ) ये चार विलन एक तरफ है । सच्चा हिन्दु अकेला ही रह गया है । संभलेगा नही तो मरना या कन्वर्ट होना तय है ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 13, 2012

    भरोदिया जी,  उदारता के विरुद्ध कट्टरपंथ सर उठाए खड़ा है… परिणाम स्वरूप कट्टरपंथ ही बढ़ेगा। यह कितना उचित और कितना अनुचित सिद्ध होगा भविष्य ही बताएगा।

drbhupendra के द्वारा
August 9, 2012

secular ke naam par hinduo ko dabana razniti ka chalan ho gaya hai… jab ASI ne ayodhya me mandir ki pusti ki to in sabne nahi mana tha.. vaise inki puroi jamaat tark sabut aadi par bharosa nahi rakhati.. mai aapko apne blog par aamantrit karata hu.. http://drbhupendra.jagranjunction.com/2012/08/09/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6/

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 13, 2012

    भूपेन्द्र जी, लोकतन्त्र में यह दोहरा व्यवहार ही लोकतान्त्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। देश को तोड़ने में सबसे पहला कारण है! हार्दिक आभार॥

Dr. Anwer Jamal Khan के द्वारा
August 9, 2012

हिन्दुओं के साथ ही दोगला आखिर व्यवहार क्यों.?

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 13, 2012

    धन्यवाद अनवर साहब आपको बात समझ आई…!!


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