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यह कैसी राष्ट्रीयता?

Posted On: 13 Aug, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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amar jawan 2राष्ट्रीयता स्वयं में एक आस्था है व राष्ट्र स्वयं में विशिष्ट पहचान, संभवतः इसी भावना के आधार पर पंथनिरपेक्ष राष्ट्र की कल्पना की गई होगी। किन्तु असम व म्यांमार हिंसा की प्रतिक्रिया में मुम्बई समेत देश के कई स्थानों पर जो हुआ वह संविधान की धर्मनिरपेक्ष कल्पना के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
मुम्बई में रजा अकैडमी के तत्वाधान में 12 अगस्त को विरोध का आयोजन किया गया जिसमें तीन परिवहन बसों समेत दर्जन भर से अधिक वाहनों व मीडिया वैनों को तोडफोड डाला गया अथवा आग के हवाले कर दिया गया। पुलिस एवं मीडियाकर्मियों पर जिस तरह हमला हुआ व उन्हें बेरहमी से पीटा गया वह दंगाइयों के बेखौफ जुनून को स्पष्ट करता है। दो जिन्दगी अचानक भड़की इस हिंसा की भेंट चढ़ गईं तथा पचास से अधिक गंभीर रूप से घायल हुए हैं जिनमें अधिकांश पुलिस तथा मीडियाकर्मी हैं। देश में इस प्रकार की हिंसक घटनाएँ निश्चित रूप से असाधारण नहीं हैं किन्तु जिस विषय को लेकर यह आयोजन रचा गया तथा जिस आधार पर यह भयंकर हिंसा हुई वह देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के सामने गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
असम में भड़के दंगे हिन्दू-मुस्लिम अथवा मन्दिर-मस्जिद की पृष्ठभूमि के बिलकुल भी नहीं थे। यह असम मूल के बोडो भारतीयों एवं बांग्लादेश के अवैध घुसपैठियों के बींच का संघर्ष था। बंगलादेशी घुसपैठिए न सिर्फ असम की संस्कृति व व्यवस्था के लिए खतरा हैं अपितु असम के अस्तित्व के लिए भी चुनौती हैं। वे असम को भविष्य में दूसरा कश्मीर बनाने की राह पर ले जा रहे हैं जैसा कि असम के कुछ क्षेत्रों में दिखने भी लगा है। अतः पूर्ण स्पष्टता के साथ कहा जाए,जैसा कि मैंने पिछले लेख में लिखा, तो यह राष्ट्रीयता का संघर्ष है। भारत की भूमि व भारत के संसाधनों पर मात्र भारतीयों का अधिकार है। यह किसी भी कोण से न्यायसंगत व नैतिक नहीं ठहराया जा सकता कि भारत के नागरिक आभाव व गरीबी में जीवनयापन करें, उनके बच्चे दो समय के दूध से वंचित कुपोषण की हालत में दम तोड़ें जबकि देश के संसाधनों पर विदेश से आए घुसपैठिए बेरोक-टोक मौज उड़ायेँ और बदले में भारतीयों को उनसे लूट खसोट, हिंसा-हत्या, स्मग्लिंग व विघटन के उपहार मिलें! असम में बांग्लादेशियों का यही योगदान है।
बांग्लादेशियों के कुकृत्यों को यदि प्राथमिक विषय न भी माना जाए तो भी भारतीय मुसलमानों को उनका समर्थन क्यों करना चाहिए.? क्या बस इसीलिए कि वे मुसलमान हैं और दीने-इस्लाम से ताल्लुक रखते हैं.? यह पैंतरेबाजी काम नहीं आ सकती कि असम में बंगलादेशियों की आड़ में मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है! असम का सत्य नग्न सत्य है और बंगलादेशी घुसपैठियों की बाढ़ आंकड़ों से प्रमाणित है। स्वयं घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि हिंसा मुसलमानों द्वारा प्रारम्भ की गई तथा बाद में हजारों लाखों बोडो व आदिवासियों को निशाना बनाया गया। मरने वाले केवल बंगलादेशी ही नहीं हैं, असमियों की भी बड़ी संख्या में हत्या की गई तथा उनके घरों को जलाया गया। आंदोलन सिर्फ मुसलमानों के लिए ही क्यों.? यदि भारतीय मुसलमानों की फिक्र का प्रश्न था तो बांग्लादेशियों के खिलाफ तो आवाज उठनी चाहिए थी! उत्तर स्पष्ट है, आंदोलनकारियों के मंसूबों और मानसिकता इससे ही समझा जा सकता है कि केवल असम में बंगालदेशी ही उनके एजेंडे में नहीं थे वरन म्यांमार में दंगों में मर रहे मुसलमान भी उनके दिलों की तकलीफ का बड़ा कारण हैं। म्यांमार में मुस्लिम-बौद्ध संघर्ष में मर रहे मुसलमानों की फिक्र पूरी दुनिया के मुसलमानों में छाई है, इंटरनेट पर इसके लिए पूरे ज़ोर से आंदोलन चलाये जा रहे हैं जिसमें बौद्धों को एकतरफा दोषी बताया जा रहा है, इस तथ्य पर बात किए बिना कि म्यांमार दंगे मुसलमानों ने एक बौद्ध लड़की का बलात्कार कर हत्या करके व बौद्धों पर हमला करके प्रारम्भ किए हैं। भारतीय मुसलमान, मौलवी, संगठन, व इंडियन इस्लामिक कल्चरल सेंटर जैसी सरकारी संस्थाएं भी इस अभियान में ज़ोर-शोर से लगी हैं। असम दंगों के बाद राष्ट्रीयता व राष्ट्रीय संप्रभुता एकता को ताक पर रखकर उस अभियान में असम को भी जोड़ लिया गया जिसकी परिणिति मुम्बई की हिंसा व हैदराबाद पुणे एवं देश के अन्य भागों में नॉर्थ-ईस्ट के लोगों तथा भारत की एकता के विरुद्ध हमलों के रूप में देश के सामने आ रही है।
बताते हैं कि इस आज़ाद मैदान में इकट्ठा होने के लिए नारा दिया गया था कि “मुसलमानों हुकूक की हिफाजत के लिए आवाज़ उठाओ”। इस्लाम की आवाज पर मुम्बई के एक आजाद मैदान में 50,000 मुसलमान इकट्ठा हो गए जबकि आयोजकों के अनुसार केवल 1000 का अनुमान एवं व्यवस्था थी। भाषण देने वाले चंद मुल्ला मौलवियों तथा आवामी नेताओं के साथ साथ जुटी भीड़ से अनुमान लगाया जा सकता है कि देश के अंदर मजहबी मानसिकता के लिए देश और दीन में कौन बड़ा है.? मुसलमानों की ऐसी ही जुनूनी भीड़ कभी कश्मीर की एकता के लिए, कश्मीरी पण्डितों पर हुए अत्याचार के खिलाफ अथवा 26/11 जैसे आतंकी हमलों के खिलाफ क्यों नहीं उमड़ती.? सीमाएं उस समय टूट जाती हैं जब मुम्बई आन्दोलन में एक जेहादी मजहबी जुनून में शहीदों की स्मृति में बनी “अमर जवान ज्योति” तक तोड़ डालता है। स्पष्ट है कि यह मानसिकता एक सांस्कृतिक राष्ट्र में विश्वास नहीं करती अपितु इसके लिए उम्मह या दारुल-इस्लाम की भावना ही एक मात्र आदर्श व ध्येय है। इससे इन्कार करने वालों को बताना होगा कि अन्यथा यदि स्वतन्त्रता पूर्व तुर्की में खलीफा के विरुद्ध यदि अंग्रेज़ कोई कार्यवाही करते तो क्यों भारत में खिलाफत आन्दोलन खड़ा होता है और मालाबार में हजारों हिंदुओं की हत्या कर दी जाती है? क्यों धर्म के आधार पर एक पाकिस्तान की मांग उठती है और क्यों उसका समर्थन होता है? क्यों एक कश्मीर तैयार होता है जहां से सदियों से कश्मीरी विरासत सँजोये कश्मीरी पण्डितों को मारकर लूटकर भगा दिया जाता है? क्यों भारत में पाकिस्तान के क्रिकेट जीतने पर पटाखे दगाए जाते रहे हैं.? क्यों इस्राइल-फिलिस्तीन के आपसी झगड़े में भारत में लोगों को दर्द उठता है? क्यों भारतीय हितों को ताक पर रखकर कल्बे सादिक़ जैसे बड़े और पढ़े लिखे मुस्लिम मौलाना उलेमा अमेरिका से सम्बंध तोड़ने, अमेरिकी दूतावास बंद करने जैसी मूर्खतापूर्ण मांगें करते हैं? क्यों बुश या अन्य अमेरिकी नेताओं के भारत आने के खिलाफ मुसलमान सड़कों पर उतरता है? क्यों ओसामा के मारे जाने पर भारत में शोक सभाएं आयोजित होती हैं? क्यों सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन यहाँ पैदा होते हैं और मदद पाते हैं.? क्यों असम में अपने राष्ट्रभाइयों के दर्द समझने की जगह बंगालदेशी मुसलमानों के पक्ष में रैलियाँ होती हैं और देश के जन-धन को नष्ट किया जाता है?
प्रश्न भले ही इसके आगे अभी बहुत हों किन्तु उत्तर एक ही है। हमे उस उत्तर को तलाशना नहीं है वरन स्वीकारना है और इसके लिए बौद्धिक मुस्लिमों को सबसे पहले आगे आने की आवश्यकता है।
आपकी आस्था भले ही मक्का में हो किन्तु भारत का अस्तित्व जिस संस्कृति व विचारधारा से है वह अरब से नहीं आती। दारुल-इस्लाम के स्थान पर भारतीय संप्रभुता में निष्ठा लानी होगी, भारतवर्ष के हित के लिए क्या बांग्लादेश पाकिस्तान और क्या ईरान, ईराक सीरिया, सऊदी अरब, सभी को एक कोने में डालने का हौसला जगाना होगा। राजनेताओं को भी उपयोगी शिक्षा के स्थान पर रूढ़िवादी मदरसों को प्रोत्साहन देने, कट्टरपंथ को शह देने व घुटने टेकने जैसी हरकतों से बाज आना होगा। अन्यथा जब तक राष्ट्र की अखंडता के विरुद्ध मुम्बई जैसे दंगे होते रहेंगे तब तक प्रश्न खड़े होते ही रहेंगे कि यह कैसी राष्ट्रीयता है जिसके लिए मजहब राष्ट्रधर्म से बड़ा है.!!
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-वासुदेव त्रिपाठी

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81 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
September 7, 2012

वासुदेव जी आपकी तार्किक रचना शक्ति के लिए प्रसंशा के शब्द बहुत लघु होंगे,हाँ ,जिन मुद्दों पर भी आप की लेखनी उठाती है वह विचारोतेजक होते हैं .कभी-कभी लगता है यह सब सत्य है फिर भी भारत कब तक अतिथि देवो भाव और कल्याणकारी भूखंड होने की बीन बजाता रहेगा? saabhaar

sinsera के द्वारा
August 23, 2012

वासुदेव जी नमस्कार, बेस्ट ब्लॉगर बनने की बहुत बधाई.. आपने बेबाकी भरा लेख लिख कर सच्चा लेखक धर्म निभाया है..लेकिन एक सच ये भी है कि भारत की सम्पूर्ण मुस्लिम जनसँख्या ऐसी नहीं है, बहुतेरे राष्ट्रवादी भी मिलें गे लेकिन ज़रा सोचिये ..जब भारत की मिटटी में जन्म लेने , यहीं पलने बढ़ने के बाद भी जब मुस्लिमों को हिन्दुओं द्वारा नीची नज़र से देखा जाता है , छूत पात की भावना या अलगाववादी विचारों का सामना करना पड़ता है , घरों में बच्चों के मुस्लिम दोस्तों के बर्तन अलग रखे जाते हैं, या उन्हें बचपन में हुए धार्मिक संस्कार का आधार ले कर व्यंगात्मक नाम दिया जाता है.. ..(जो हमारे समाज में बहुतायत से व्याप्त है )…तब उन्हें कैसा लगता होगा… क्या उन्हें आपने पूर्वजों द्वारा भारत में ही बसने के निर्णय पर अफ़सोस न होता होगा…. मेरे हिसाब से तो उनकी स्थिति धोबी के कुत्ते जैसी हो गयी है…..जो देश उनके लिए बनाया गया, वो अलग गृह युद्ध की आग में जल रहा है..और जो मुस्लिम भारत में रह गए, उनमे से अधिकांश तो असमंजस में हैं जैसा कि आपने लिखा कि उन्हें खुद नहीं पता कि वे क्या करें….और बाकियों को भारत तो क्या सारे विश्व में कोई भी सम्मान देने वाला नहीं है….

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 23, 2012

    सरिता जी, हार्दिक आभार.! मुझे विश्वास है कि यदि आपने समस्या की जड़ को गंभीरता से समझा होता तो आपको आपके प्रश्न का उत्तर स्वयं मिल जाता| हिन्दू मुसलमानों के वर्तन अलग रखते हैं इसलिए अलगाव की भावना पनपती है, कहने में तो दमदार लगता है किन्तु वास्तविकता में कहीं नहीं ठहरता.! हिन्दू इस तरह की दूरी गावों में बनाकर रखते हैं, किन्तु गावों में हिन्दू मुसलमान दंगे नहीं होते। वहाँ आज भी भाई-चारा देखने को मिलता है, वहाँ मुसलमान केवल यह जनता है कि वह मुसलमान है, इस्लाम, शिर्क, काफ़िर उसे नहीं आता, संस्कृति व यहाँ तक आस्था भी एकरस है! दंगे शहरों में होते हैं, शहरों में छुआछूत अब विलुप्तप्राय हो गई है, उससे भी महत्वपूर्ण कि जीवन नितान्त व्यक्तिगत होता है। उपरोक्त घटना मुम्बई जैसे मेट्रो शहर की है..!! यदि इसे भी जाने दें तो… यूरोप और अमेरिका के बारे मे आप क्या कहेंगी..?? वहाँ यह अलगाववाद इसी तरह विस्फोटक है.! उनके अपने देश पाकिस्तान मे तो हिंदुओं को राजनैतिक अधिकार भी नहीं हैं… वहाँ हिन्दू मुसलमान की बराबरी करने की सोच भी नहीं सकता, वहाँ यह अतिक्रमण क्यों.? यदि व्यक्तिगत भेदभाव कारण है तो यहाँ बैठकर अमेरिका से दुश्मनी क्यों.? ओसामा के लिए शोकसभाएं क्यों? कश्मीर क्यों.? यदि उन्हें अपने पूर्वजों के यहाँ बस जाने पर अफसोस होता तो सत्ता और समाज के सामने हर बात पर सीना तान खड़ा होने की हिम्मत कहाँ से आती.? दारुल-इस्लाम का नारा हिंदुस्थान के भीतर क्यों दिया जाता.? और फिर जैसा कि आपने कहा कि उनका अपना देश आग मे जल रहा है उसके लिए जिम्मेदार कौन.? हिन्दुओं द्वारा अपने वर्तन न देना.?? यदि हिन्दुओं द्वारा अपने वर्तन न देने के कारण मुसलमान अपने पूर्वजों के यहाँ बसने पर अफसोस करते हैं तो तीन करोड़ बांग्लादेश से यहाँ क्यों घुस आए जबकि बांग्लादेश की खुद की जनसंख्या ही 15 करोड़ है.?? उन्हें वर्तन की चिन्ता क्यों नहीं हुई.? अभी आप इन्हीं प्रश्नों के आधार पर निर्णय करें, मेरे पास तो कहने को बहुत कुछ है किन्तु विस्तार का यहाँ कोई औचित्य नहीं है क्योंकि सभी जानते हैं कि छुआछूत मेल की स्पीड से घट रही है जबकि इस्लामी कट्टरपंथ कम से कम एक्स्प्रेस की स्पीड से बढ़ रहा है। यह सभी मुसलमानों पर प्रश्नचिन्ह नहीं है, यह विचारधारा के पुनरोद्धार का आवाहन है। स्वीकार न करना बेईमानी होगी कि विचारधारा उत्तरदाई नहीं है जोकि आज भी औरंगजेब की बुराई स्वीकार नहीं करती और अपने पूर्वजों के यहाँ बसने पर अफसोस की जगह उनके द्वारा हिन्दुओं पर किए गए अत्याचारों को अपना गौरव समझती है, पहले पाकिस्तान बनाने के बाद अब भारत मे ही शरीयत लागू करने का ख्वाब रच रही है। मुसलमानों ने तो सदियों हिन्दुओं पर अत्याचार किए, भेदभाव तो दलितों के साथ हुआ… दलित तो आज अलगाववाद को नहीं पाल रहे हैं वरन बदलते समय के साथ भेदभाव कम होता जा रहा है और समाज समांगीभूत होता जा रहा है…!!! पूरे विश्व में मुसलमानों के साथ ही क्या समस्या है.??? (बेचारे गिने चुने सुधारवादी उदारवादी मुसलमान कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा अलग थलग कर दिये जाते हैं)

    sinsera के द्वारा
    August 23, 2012

    वासुदेव जी, मैं भी उन्ही “बेचारे गिने चुने सुधारवादी उदारवादी मुसलमान ” भाईओं की बात कर रही हूँ, जो दिल से राष्ट्रवादी होते हुए भी तिरछी नज़र से देखे जाते हैं… मुसलमानों की ज़िन्दगी गारत करने के लिए ही उन्हें अलग देश बना कर दिया गया..उन्हें तो अब हमेशा ऐसे ही बंजारापन झेलना होगा..सैकड़ों वर्षों पहले किसी आक्रमणकारी ने जो जाहिलपन दिखाया उसका बदला सारे मुसलमानों से सभ्य लोगो द्वारा लिया जाता रहेगा..उसके बदले में गंवार और बेवकूफ मुसलमान भारत का खा कर पाकिस्तान के गुण गायें गे..फिर वो तो अपनी जहालत में खुश रहेंगे लेकिन व्यंग्य और अलगाव के ताने वो भी सुनेंगे जो खुद को सच्चा भारतीय मुसलमान मानते हैं…मैं ने खुद गाँव में ही नहीं शहर में भी हमारे आपके जैसे सभ्य लोगों के घर में, उनके बर्तन अलग होते देखा है…. आपके लेख में जो फोटो लगी है , वो इन्सान कहलाने लायक व्यक्ति नहीं है, यदि वह मुस्लिम है तो उसने सारे मुस्लिम समुदाय को शर्मसार किया है. मेरी सहानुभूति सिर्फ उन मुस्लिमों के साथ है जो ह्रदय से सच्चे भारतीय होते हुए भी व्यंग्य व अलगाववाद का शिकार होते हैं…

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 23, 2012

    धन्यवाद.! किसी भी राष्ट्रवादी मुस्लिम के प्रति द्वेष सहन नहीं किया जा सकता। फिलहाल यहाँ लेख बढ़ती हुई मुस्लिम कट्टरता पर केन्द्रित है जो राष्ट्रीयता को नहीं इस्लाम को महत्व देता है। बात-बात पर देश भर मे होने वाली रैलियाँ, मुद्दे जिन पर मुस्लिम वोट बैंक आकर्षित होता है, आतंकी गतिविधियो के विरोध में खड़ा न होना, असहनशीलता का चरम प्रदर्शन उदाहरण हैं कि संक्रामण कितना गहरा है…!!! राष्ट्रवादी मुस्लिमों पर ताने की बात तभी तक सटीक बैठती है जब तक वो दीनी अतिवाद का खुलकर विरोध नहीं करते क्योंकि इससे जिहाद की मानसिकता को मौन स्वीकृति देने वालों में विभेद नहीं हो पाता। वास्तविक राष्ट्रवादी मुसलमान मैं समझता हूँ खुलकर विरोध करता है और ऐसे मुसलमानों पर कोई उंगली नहीं उठाता.! हिन्दूवादी कहे जाने वाले दल भाजपा व संघ जैसे संगठनों में भी आपको मुस्लिम दायित्व संभाले दिखते हैं। पृथक देखिये तो कौन बड़े से बड़ा हिन्दू कलाम साहब पर उंगली उठाता है.? कलाम साहब को राष्ट्रपति बनाने और पुनः समर्थन की घोषणा करने वाले हिन्दूवादी ही तो थे..?? आम हिन्दू जनमानस समर्थन मे था.! हिन्दूवाद इसीलिए तो स्वयं को राष्ट्रवादी कहते हैं क्योंकि वे मौलाना जौहर अली की तरह घोषणा नहीं करते कि महात्मा गांधी भले ही कितने महान व्यक्ति हों लेकिन मैं उन्हें एक तुच्छ मुसलमान से नीचा मानता हूँ क्योंकि आखिरात में वो काफिर ही हैं..!!! जौहर आज भी मुसलमानों के बड़े आदर्श माने जाते हैं… अधिकांश हिन्दू तो उन मुसलमानों पर भी उंगली उठाने में रुचि नहीं रखता जो आज़ाद मैदान जैसे दंगो मे सम्मिलित होते हैं…!!! आप विरोध करिए देखिए आपके विरोध में खड़े पाँच लोगों में से तीन हिन्दू होंगे…, मीडिया से लेकर जनता तक और ब्लॉग में आप तक ;) उदाहरण है..!!

    sinsera के द्वारा
    August 25, 2012

    हे परम आक्रोशित वासुदेव भ्राता… इस बार आपने मुझे ही राष्ट्रविरोधी ठहरा दिया.. यह सच है कि मूक रहना सहमति की निशानी होती है.लेकिन कभी कभी समर्थन न मिलने का डर भी किसी को मूक रहने पर मजबूर कर सकता है..डॉ.कलाम, या मुख़्तार अब्बास नकवी बस…मुझे इन दोनों के सिवा कोई तीसरा नहीं दीखता जिसे हम आदर्श मुसलमान कह सकें ..फिर भी बात जौहर अली , मदनी, या सिमी संगठन या दारुल इस्लाम की मांग करने वाले स्वार्थी तत्वों की नहीं बल्कि सामान्य जन की है जिसका इस राजनैतिक उठापटक या चाल पेंच से कोई फायदा नहीं, बल्कि नुकसान ही है…और नुकसान के रूप में वही घृणा ….जो आपके लेख में स्पष्ट दिख रही है.. अगर कुछ जाहिलों या स्वार्थी लोगों की करनी के लिए पुरे समुदाय को घृणा की दृष्टि से देखा जाये , या बदला लिया जाये तो क्या आप 84 के दंगों में सिखों को चुन चुन के मारे जाने को सही ठहराते हैं……????

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 25, 2012

    आदरणीय सरिता जी, आक्रोश नहीं प्रश्नों को बस थोड़ी धार देकर रख देता हूँ..! सार्थक बहस में भी एक बड़ा दोष आता है कि प्रायः लोग circle run way पकड़ लेते हैं… किन्तु मेरा भी एक दोष है कि मैं वैसे तो कई जगह उपेक्षा करता हूँ किन्तु जहां टिकता हूँ वहाँ सामने वाले को circle run way नहीं पकड़ने देता… ;) मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया था और फिर उसे सुस्पष्ट भी कर दिया कि व्यक्तिगत किसी हिन्दू मुसलमान अथवा सिख की बात ही नहीं है, प्रश्न है विचारधारा का। मैं कलाम और असफाक जैसों का उदाहरण दे रहा हूँ …….सामान्य जन की दीन के नाम पर उमड़ती भीड़ और राष्ट्रहित के नाम चुप्पी ही तो परेशान करती है..!! उदाहरण के लिए ऊपर की टिप्पड़ी और लेख पुनः देखें। समर्थन न मिलने का डर….. यही तो मुख्य बिन्दु है..! अभी मामला मुम्बई में रातोंरात 50,000 की भीड़ का हो अथवा कुछ वर्ष पहले 1 लाख 20 हजार की भीड़ का.! अतः दीन के नाम पर रातोंरात बेफिक्र भीड़ और देश के नाम पर इसलिए गिनेचुने लोगों को समर्थन नहीं मिलना क्या सूचित करता है..?? उत्तर तो आपने स्वयं ही अपने प्रश्न को दे दिया है। आपने पहले भी कहा भी आप बात गिने चुने लोगों की कर रही हैं… अब दोबारा यह मत कहिएगा कि गिने चुने लोगों पर तोहमत क्यों… इसके लिए मैं ऊपर प्रतिक्रिया दे ही चुका हूँ, और मैंने उसमे आप को राष्ट्रविरोधी नहीं ठहराया बल्कि उन लोगों के साथ खड़ा किया है जोकि जाने अनजाने सच से आंखे मूँदे हैं और जेहादी लोगों के प्रति उदारवाद का प्रदर्शन कर जाते हैं..!! circle break…!

DHARAMSINGH के द्वारा
August 22, 2012

इसका बीज गान्धी की महत्वकाक्षा मे निहीत है जो  हिन्दुओ के कन्धो पर पैर रख उपर उठा नेता बना  उन्ही हिन्दुओ से गदारी की मुसलमान तो उसे नेता मानते नही थे उनकी नजर मे नेता  बनने के लिए  हर कदम पर हिन्दुओ का बुराकिया हिन्दुओ पर हुए अत्याचार पर कभी  इतराज नही किया चाहे मालाबार हो या दूसरी जगह   . जनसख्या आधार पर देस बटा पर 20 करोड मुसलमान रखे वह सार्व भौम नेता बन शान्ति का नोबल पुरसकार लेना चाहता थाइसी चक्र मे बटवारे मे 5 लाख हिन्दू मरवा दिए जो आज भी चालू है  लुचा था पराई औरतो संग नंगा सोता थासरला सुशीला मनी आभा मैडलीन  सलैड  उनके नाम थे नमकहराम था खाता हिन्दुओ का था पर भला मुसलमानो का करताथा 1944 मे जेल से छूटने पर स्वराज का नाराछोडा बदले मे मैडलीन सलैड मिली  यानी जेल मे समझोता  पटेल की जगह उसी ने नेहरू को आगे किया जो पूर्णरूप से  हिन्दुओ के खिलाफ था देश कभी आजाद हुआ ही नही सिर्फ सता बदली थी नेहरू रानी का  प्रतिनिधी था1949 मे लन्दन मे नेहरू ने क्राऊन का वफादार रहने वाले पैकट पर साईन किए आज देश की 90 प्रतिसत समस्या ईन दोनो की देन है  गदारो ने अपने नाम सैकुलर रख लिए है जयचन्द व मानसिंह बहुत है चन्द्र शेखर आदि कम है

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
August 22, 2012

सच्चाई है भाई ,,,,

Satyen Singh के द्वारा
August 21, 2012

Hallo Sir , आप के लेख को पढ़ कर हृदय आंदोलित हो गया इसके लिए आप को बधाई , और साथ ही साथ हमें आपनी राजनेताओ की स्वार्थी एवं स्तरहीन सोच पर तरश आ रहा था जो केवलअपने राजनेतिक हितो को ही साधेने में लगे रहेते हैं . हमें आपनी कायरता पर भी तराश आ रहा है जो की हमारे अन्दर हज़ार सालो की गुलामी के कारन हमारे रक्त में मिल चूका है जिसे हम धर्मन्निर्पक्षेता एवं उदारवादी का लबादा पहन कर छिपाते रहते हैं जिसके कारण हम हर स्त्तेअर पर रक्ष्तामाक नीतियों पर चलते है . इस रास्त्र में जयचंद एवं मीरजाफर तो हमेसा थे और रहेगे भी जिनका कोई रास्त्र धर्मं नहीं होता वो केवल अपने नीजी हितो को ही श्रेष्ठ मान कर चलते हैं . अता हमें एक स्पस्ट रास्त्रवादी नीतिओ की जरोरत है जो रस्ट्रभावना को प्रेरित करे और रास्त्र हित में भी हो . अंत आप की विचारो का हम स्वागत करते हैं और आसा करते है हर ब्लोगर आप के विचारो को अपने मित्रो/ परिवार में चर्चा करके पुनह प्रसारित करेगा. धनयवाद

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 21, 2012

    आपकी भावना को नमन| आज सच को निरावृत्त करना ही देश और समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है क्योंकि सच को राष्ट्रविरोधी व स्वार्थी तत्वों ने प्रवंचनाओं के बेंच कैद कर रखा है| ..हार्दिक आभार!

D33P के द्वारा
August 20, 2012

सबसे पहले  ब्लॉगर ऑफ दा वीक बनने की हार्दिक बधाई. ये हालत देश के सत्ताधारको को पता क्यों नज़र नहीं आते ……..सब अपने हित साधने में लगे हुए है ,देश में क्या हो रहा है किसी को चिंता नहीं . ज्वलंत समस्या की उम्दा प्रस्तुति .

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 21, 2012

    आज स्वार्थनीति राजनीति पर हावी है..! हार्दिक आभार.!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 20, 2012

ब्लॉगर ऑफ दा वीक बनने की हार्दिक बधाई…

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 20, 2012

    हार्दिक आभार आदरणीय कुशवाहा जी.!

vishnu के द्वारा
August 20, 2012

वासुदेव जी आपका लेख वास्तव मे सोचने को वाध्य करता है कि हम लोग अब भी नहीं सुधारे तो भविष्य मे हमारी संताने भी हमे कोशैगी जैसे हम ? हिन्दुओ मे काफी धर्मनिपेक्च मिल जायेंगे लेकिन मुसलमानों कोई एसा नहीं जो गलत को गलत कह सके I उन हिन्दू धर्मनिपेक्च (कायरो) को सोचना चाहिए कम से कम सही बात पूरी दृढ़ता से कहे I यह कैसी धर्मनिरपेक्षता जब हिन्दू मरता है तो कुछ नहीं अगर मुसलमान मरता है तो एसे वयकत करते है जैसे इनके घर मे मौत हो गई है I क्या कश्मीर मे हिदुओ कि मौत दिखाई नहीं दी गुजात मे अगर प्रत्क्रियवश मुस्लमान मर गया तो दस सालो मे भी मोदी को नहीं छोड़ते I

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 20, 2012

    दोहरा व्यवहार, दोहरी मानसिकता घातक है.! हमें इसे बदलना ही होगा.!

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
August 19, 2012

मान्य वासुदेव त्रिपाठी जी , सप्रेम नमस्कार !……… देश आज अजीबोगरीब दौर से गुज़र रहा है ! नेतृत्व दिशाहीन और निहायत ही स्वार्थी तत्वों के हाथों कठपुतली बनी हुई है ! स्थिथि बड़ी ही भयावह है | समसामयिक और विचारोत्तेजक आलेख के लिए हार्दिक बधाई !

    Rita Singh, 'Sarjana' के द्वारा
    August 20, 2012

    अच्छी पोस्ट वासुदेव जी बधाई मोस्ट विउद ब्लोगर बन्ने के लिए

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 20, 2012

    हार्दिक आभार आचार्य विजय जी.! आपके विचारों से मेरी सहमति है|

MUKESH के द्वारा
August 19, 2012

वासुदेव जी, बंगलादेशी घुसपेठियो की विकराल होती समस्या, इसके बढ़ते खतरे, सरकार की रास्ट्रहितो की अनदेखी पर आपका लेख पढ़कर आपको धन्यवाद दिए बिना नहीं रह सका. बड़े खेद का विषय है, कि देश पर मंडराते इतने बड़े खतरे खतरे के बाद भी बहुसंख्य देश वाशी ऐसी उदासीनता प्रकट कर रहे हैं, जैसे ये किसी दूसरे लोक में हो रहा हो. क्या हम एक और विभाजन की ओर बढ़ रहे हैं ?

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 20, 2012

    सही कहा आपने मुकेश जी, देशवासियों की उदासीनता समस्या को और भी विकराल बना देती है.! हार्दिक आभार!

ashokkumardubey के द्वारा
August 19, 2012

त्रिपाठीजी , राष्ट्रीयता की परिभाषा को दुबारा परिभाषित करने की जरुरत आज आन पड़ी है आज सत्ता में काबिज कांग्रेस ने धर्मनिरापेक्छाता के नाम पर केवल मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए हीं सारे मसौदे बनाती है और चुनाव दर चुनाव केवल एक हीं अजेंडा इनका रहता है कैसे मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ मिलाया जाये और कामो बेश गैर पार्टियाँ जैसे की समजवादी पार्टी जो अभी यूपी में भारी बहुमत से जीती है उसको भी मुस्लिमों के वोट पर हीं नजर थी और मुस्लिम वोट मिले भी उसी पार्टी को और वे बिजयी हुए अब ये कैसी त्राश्दी है की हिन्दू बहुल देश में नेता केवल मुस्लिमों पर भरोसा कर के हीं वोट की राजनीत करते हैं उसके लिए चाहे देश में अलगाववाद क्यूँ न पनपे यह किस राष्ट्रीयता की मिशाल है जहाँ सम्विधान इस बात की इजाजत देता है की राष्ट्रिय नीतियाँ भी धर्म के आधार पर तय होती हैं जब भारत में रहना है तो भारतीय बनकर रहना है न की मुस्लिम हिन्दू बनकर एक दुसरे के बीच नफरत के बीज बोने हैं, जरुर सर्कार को हर हाल में राष्ट्रीयता को सर्वोपरि मानकर हिन् नीतियों का निर्धारण करना चाहिए अगर आबादी एक समस्या है तो वह मुस्लिम आबादी के लिए भी है और अगर उनका धर्म परिवार नियोजन को धर्म के खिलाफ बताता है तो इसकी इजाजत भी नहीं मिलनी चाहिए और जरुर अधिक बच्चे पैदा करने पर सरकारी सुविधाओं से उनको वंचित करने का भी प्रावधान लाना चाहिए कानून बनाना चाहिए ताकि चार चार शादियाँ कर ये देश के ऊपर आबादी का बोझ न बदहा सकें . एक अच्छा लेख लिखने के लिए बधाई

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 20, 2012

    जब तक आप सामान नागरिक संहिता लेन से डरते हैं समानता की बात एक व्यंग मात्र है.! हार्दिक आभार अशोक जी.!

yogeshkumar के द्वारा
August 19, 2012

त्रिपाठीजी आपका वही सत्य से भरा उम्दा विश्लेषण… मगर इस छद्म सेकुलर वादी इस सत्य को झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं… हम जब इतिहास को पढ़ते हैं तो उस समय की भूलों को देखते हैं… तो हमें लगता है की उस समय के शासन कर्ताओं को कुछ उदार वादी होने के बजाय क्रूरता से आक्रमण कारियों का दमन करना चाहिए … मगर आज स्थिति अगर हमारे सामने फिर से हम हताश महसूस कह रहे हैं… लगता है.. पिछले हज़ार सालों की गुलामी की वजह से भारतवासी अपना आत्मविश्वास खो चुके हैं.. यहाँ के सत्ता धरी राज़ करना भहो चुके हैं… एक ख़ास वर्ग का वोट पाने के चक्कर में उस वर्ग को एक जगह में बढ़ावा देना ये केवल इतना भर नहीं हैं… इन बातों की जड़ें और भी गहरी हैं और लोग इन बातों को मानते नहीं …जब एक खास वर्ग के अलग क़ानून होते हैं समस्या यही से शुरू हो जाती है…

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    योगेश जी, हम यदि इतिहास को समझने का प्रयास करें और आज के परिदृश्य को देखें तो बहुत कुछ एक सा दीखता है.! हमें इतिहास से सीखने की आवश्यकता है. हार्दिक आभार!!

    yogeshkumar के द्वारा
    August 21, 2012

    महाशय मैं आपकी तिलमिलाहट समझ सकता हूँ… ये बात बहुत से लोगों को समझ में नहीं आ रही है… सब अपने घर में मजे लेने में व्यस्त हैं और इस विश्वाश में जी रहे हैं कि उनके साथ कुछ नहीं होने वाला… मगर इतिहास के आकड़ें भयावह हैं…वास्तव में वर्तमान के आकड़ें भी बड़े गंभीर संकेत दे रहे हैं…जयचंद जो कि मुहम्मद गोरी कि बड़ी मदद करता था बाद में वो भी मुहम्मद गोरी के हाथों मारा गया….और उसके बाद क्या हुआ इतिहास गवाह है….जजिया कर देकर और अपनी बहु बेटियों को लुटा कर हिन्दुओं कि आत्मा मर गई है….. आज कांग्रेस असम में जिसे अपना बड़ा वोट बैंक समझ रही है वो ही आने वाले सालों में उसके लिए बड़ी चुनौती बनने वाला है… ये बात तरुण गोगोई को महसूस होने लगी है…. एक तरफ ये तथाकित शांति प्रिय लोग हैं जिन्होंने अपने असम ( घुसपैठ) और बर्मा (बौद्ध लड़कियों के साथ बलात्कार) के भाईयों की गलत हरकत से इस देश का जीना मुहाल कर रखा है.. वही दूसरी तरफ हिंदूओ जैसे बेवक़ूफ़ भी हैं जो पाकिस्तान में मारे जा रहे हिन्दुओं और उनकी लड़कियों के साथ बलात्कार और धर्म परिवर्तन की घटनाओं पर साम्प्रदायिक सौहाद्र की बातें कर रहे हैं… वाह क्या बात!!!!!!!! जहाँ एक हिन्दू एक तरफ श्री कृष्ण के बड़े भक्त हैं वही हिन्दू गीता के मूल सन्देश को भूल गए…. वास्तव में मुझे लगता है ये सनातन धर्म जो गीता पे विश्वाश करने वाला था कई साल पहले ही ख़त्म हो गया मात्र हिंदुत्व के अवशेष मात्र रह गए हैं… अफ़सोस होता है…. ये देखकर …

rajuahuja के द्वारा
August 19, 2012

त्रिपाठी जी ,ज्वलंत प्रश्न के लिए साधुवाद ! मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीती इस देश में धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र की कीगयी कल्पना के ताबूत में कील ठोंकने जैसा कृत्य है ! कट्टर-पंथी / मज़हबी ज़ुनुनीयों की सरपरस्ती करता राजनैतिक दृष्टिकोण देश की अखंड-संप्रभुता के लिए खतरा हो चला है ! समर्थन के लोभ में इस तरह के संरक्षण देश के लिए खतरनाक हैं ! राजनैतिक सत्ताओं से राष्ट्र-हित सर्वोपरि है ! इसे ठीक से समझने और समझाने का वक़्त आ गया है !

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    आहूजा जी, आपके इस कथन का मैं पूर्ण समर्थक हूँ कि मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीती इस देश में धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र की कीगयी कल्पना के ताबूत में कील ठोंकने जैसा कृत्य है ! आज इस बात को समझने की महती आवश्यकता है.!

Santosh Kumar के द्वारा
August 17, 2012

आदरणीय वासुदेव जी ,..कटु सत्य को तथ्य सहित साफगोई से रखने के लिए हार्दिक अभिनन्दन आपका ,..जब देश का प्रधान यह कहता है की देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है तो धर्मनिरपेक्ष तानाबाना अपने आप बिखर जाता है ,..कट्टरता के आगे बौने नेता देश नहीं चला सकते हैं ..धर्मनिरपेक्षता एक ढोंग के आलावा कुछ नहीं है ,..इसका मकसद हिन्दुस्तान को बर्बाद करना है ,..हालिया घटनाओ पर सिर्फ दुःख नहीं प्रगट किया जा सकता है ,.सबके लिए यह गंभीरता से सोचने का विषय है . उत्तम लेखन को सम्मान मिलने की हार्दिक बधाई ,..सादर आभार सहित

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    कट्टरता के आगे बौने बौने नेता देश नहीं चला सकते.! बिलकुल उम्दा बात कही है आपने संतोष जी.! निश्चित रूप से हमें गंभीर सोच की आवश्यकता है.! ..साभार!

munish के द्वारा
August 17, 2012

आदरणीय त्रिपाठी जी एक कडवा सच जो आपने मलहम के साथ लिखा, निसंदेह राष्ट्रीयता पर मजहब भारी है अन्यथा हमारे कथित धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में किसी एक धर्म के तुष्टिकरण की राजनीति न होती धर्म के नाम पर दंगे न होते बहुत अच्छी बेबाक राय

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    मुनीश जी.! महजबी उन्माद अराष्ट्रीयता को जम देता है और ऐसा ही हो रहा है.! हार्दिक आभार||

vikramjitsingh के द्वारा
August 17, 2012

सब वोटों की राजनीति है वासुदेव जी…..पाकिस्तान से आये हिन्दुओं के रहने के लिए जगह नहीं है….इस देश में…….लेकिन मुसलमान बंगलादेश तो क्या चाहे किसी भी और देश से क्यों ना आये हों….ये कांग्रेस उन्हें शुरू से ही सर-माथे पर बैठाती रही है…..क्योंकि ये उसका वोट-बैंक जो है…… और तो और……ये हिंसा तो आज की बात है…लेकिन जो हिंसा नक्सलवादियों ने फैला रखी है इस देश में….उसे कौन नहीं जानता…….अब तो इन्होने छत्तीसगढ़ के देहात में हथियारों के कारखाने और वर्कशॉप भी खोल दी हैं……..हजारों सुरक्षाकर्मी बलि चढ़ चुके हैं….और आये दिन चढ़ रहे हैं…….लेकिन इस सरकार के कानों पर जूं नहीं सरकती……संसद के दोनों सदनों में विपक्ष की तरफ से कई बार मांग करने के बावजूद इस नक्सलवाद को राष्ट्रीय आपदा घोषित नहीं किया जा रहा…….क्या है ये….??? अति उत्तम और विचारणीय आलेख……. आप ही…..सही सम्मान के हकदार थे……..वासुदेव जी……जो आपको मिला…….

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    विक्रम जी.! सही कहा आपने, हर और से वोट की राजनीति हावी है.! दोष हमारा भी है, हम सच से या तो मुंह मोड़ते हैं या जानकर भी अन्जान रहते हैं.! हमारी सीमायें संकीर्ण हो रही हैं..! हार्दिक आभार.!

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
August 16, 2012

जिनके लिए राष्ट्र मजहब से बड़ा है वो हिन्दू हों अथवा मुस्लिम मेरे लिए समान हैं किन्तु जो भारत के सीने पर बम फोड़कर मजहब की पपीहरी बजा रहे हैं उनके लिए राग भारतीय हमारे संगीत शास्त्र में नहीं है।.. प्रिय वासुदेव जी ..सार्थक लेख ..अच्छे मुद्दे ऐसा कुछ न कहा सुना जाए जिससे ज्वाला भड़के ..आज वैसे ही सब अंगारे पर पाँव रखे चल रहे हैं कहीं नक्सलवाद कहीं भ्रष्टाचार कहीं जातिवाद तो कहीं पूर्वोत्तर असम की आग ..अब कर्नाटक और आंध्र को भी अपने चपेट में ले चुकी हैं सब शांति बनाये रखें और प्रेम की राह चुने कृपा कर … बधाई हो आप को बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक बनने पर भ्रमर ५

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    इस राष्ट्र में प्रेम और सौहार्द की हमें नितांत आवशकता है.. यही हमारी परिपाटी रही है किन्तु अब समय है इसे तोड़ने वालों को पहचाना जाये.. चुप रहने से शांति नहीं आती.. प्रतिरोध करने से ही राष्ट्र बचेगा||

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    इस राष्ट्र में प्रेम और सौहार्द की हमें नितांत आवशकता है.. यही हमारी परिपाटी रही है किन्तु अब समय है इसे तोड़ने वालों को पहचाना जाये.. चुप रहने से शांति नहीं आती.. प्रतिरोध करने से ही राष्ट्र बचेगा|| ..सादर!

अजय यादव के द्वारा
August 16, 2012

tripathi ji,सादर नमस्ते | ऐ जुल्‍म के मारो ! लब खोलो , चुप रहने वालों , चुप कब तक ? कुछ हश्र तो इनसे उट्ठेगा , कुछ दूर तो नाले जायेंगे. ऐ खाकनशीनो ! उठ बैठो, यह वक्‍त करीब आ पहुंचा है जब तख्‍त गिराये जायेंगे , जब ताज उछाले जायेंगे. अब टूट गिरेंगीं जंजीरें , जब जिन्‍दानों की खैर नहीं, जो दरिया झूम के उट्ठे हैं , तिनकों से न टाले जायेंगे. कटते भी चलो , बढते भी चलो , बाजू भी बहुत हैं , सर भी बहुत – चलते ही चलो , कि अब डेरे … मंजिल पे ही डाले जायेंगे. > – फैज

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    अजय यादव जी, एक अच्छी काव्य शैली में प्रतिक्रिया के लिए आभार.! निश्चित रूप से हमें इसी विश्वास व हौसले की आवश्यकता है.

Harish Bhatt के द्वारा
August 16, 2012

वासुदेव जी प्रणाम, ब्‍लॉगर ऑफ द वीक चुने जाने पर हार्दिक बधाई

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    हार्दिक आभार हरीश जी.!

aryaji के द्वारा
August 16, 2012

Sach mat likhye.yeh kisi ko sunai nahe detaa.

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 17, 2012

    आर्य जी.. इसलिए झूठ भी तो नहीं लिख सकते ..!!!S

jlsingh के द्वारा
August 16, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, नमस्कार! वैसे तो आपका हर पोस्ट राष्ट्रीय भावना से ओत प्रोत रहता है, आपने हमेशा तथ्यों को साथ रखकर अपने विचार प्रस्तुत किये हैं. इस आलेख पर आपको ‘ बेस्ट ब्लोग्गर ऑफ़ द वीक’ सम्मान मिलने पर बधाई! आपकी नई कविता हमें ऐसी आजादी नहीं चाहिए पर प्रतिक्रिया सबमिट नहीं हो पा रही है वह भी नायाब है. उसकी भी बधाई आप यही पर स्वीकार करें! श्री कृष्ण जन्माष्टमी के विशेष अवसर पर वासुदेव जी को सम्मान मिलनी ही चहिये थी! पुनश्च!

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 17, 2012

    तो फिर यह जन्माष्टमी की ही महिमा है आदरणीय जवाहर जी,, :) हार्दिक आभार.!

anugunja के द्वारा
August 16, 2012

आपका लेख बहुत अच्छा लगा।आपने सच्चाई का आईना दिखाया है,जिसमें बहुत कुरूप नजर आती है हमारी राष्ट्रीयता।आपको बहुत बहुत बधाई।

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 17, 2012

    हार्दिक आभार.!

vaidya surenderpal के द्वारा
August 16, 2012

त्रिपाठी जी नमस्कार, बहुत ही सार्थक लेख….। देश की सत्ता और राजनीति ही अल्पसंख्यक वोट बैंक को सर पर चढ़ाए हुए है । मूल समस्या की अनदेखी करके और लीपापोती करके देश को गुमराह किया जा रहा है । ऐसा लगता है जैसे देश को लुटने के लिए खुला छोड़ दिया गया है । आज केन्द्र मेँ इस नपुंसक सरकार की जगह एक दृढ़ इच्छाशक्ति वाली राष्ट्रवादी सरकार चाहिए । संगठित व जागरुक हिन्दु समाज ही सभी समस्याओँ का हल है । …ब्लागर आफ द वीक बनने पर शुभकामनाएँ ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 17, 2012

    हार्दिक आभार सुरेंदर जी.! सही कहा आपने देश की सत्ता और राजनीति ही अल्पसंख्यक वोट बैंक को सर पर चढ़ाए हुए है ।

alkargupta1 के द्वारा
August 16, 2012

वासुदेव जी, बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक का सम्मान मिलने पर हार्दिक बधाई ! बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया है …ऐसा राष्ट्र तो प्रश्नों के चक्रव्यूह से कभी बाहर नहीं हो सकता है जिसके लिए मज़हब राष्ट्र धर्म से बढ़ कर है….. राष्ट्र भावनाओं से ओतप्रोत सार्थक आलेख की प्रस्तुति के लिए बधाई

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 17, 2012

    प्रत्येक राष्ट्र की एक आत्मा होती है आदरणीय अलका जी.! और दो ही विकल्प होते हैं या तो आप उसे आत्मसात कर लें अथवा उसकी हत्या.! हार्दिक आभार!

kya kahen ! के द्वारा
August 16, 2012

ek aur purskaar vitran shuru. waise hi blogging ki watt lagi hui hai is puruskaar vitrana samarahon se. lage raheeye..apne logon ko baantTe raheeye.

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 17, 2012

    क्या कहें जी.., आपकी कुछ न कह पाने की स्थिति को मैं समझ सकता हूँ…. मैं केवल ब्लॉग ही नहीं लिखता, और भी बहुत कुछ लिखता हूँ। जानकर अच्छा लगा कि आपको लोगों को बांटने को लेकर चिंता है। अभी हो सकता है कि आज़ाद मैदान वाले कुछ भाई लोग भी मुझे ऐसी ही पाक सलाह देने आयें….

dineshaastik के द्वारा
August 16, 2012

ब्लॉगर ऑफ दा वीक बनने की हार्दिक बधाई…..

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 17, 2012

    हार्दिक आभार दिनेश जी.

bhanuprakashsharma के द्वारा
August 16, 2012

मित्रवर सार्थक लेख। बधाई। 

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 17, 2012

    हार्दिक आभार भानु प्रकाश शर्मा जी.!

yogi sarswat के द्वारा
August 16, 2012

मित्रवर , आपकी भावनाएं आपकी राष्ट्रभक्ति आपके लेखन से स्पष्ट हो जाती है ! किन्तु समय कही और जा रहा है , ऐसा मालूम होता है की हम एक और पाकिस्तान बनाये जाने का रास्ता दिखा रहे हैं ! बहुत बढ़िया लेख

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 17, 2012

    आदरणीय योगी जी, समय तो गलत निःसंदेह जा रहा है किन्तु हम इतनी सरलता से जाने भी नहीं देंगे.! विश्वास बनाये रखिये. :)

dineshaastik के द्वारा
August 16, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, ”यह आजादी स्वीकार नहीं” नामक पोस्ट पर प्रतिक्रिया सम्मिट नहीं हो रही है, अतः यहाँ सम्मिट कर रहा हूँ। मैं आपकी इस रचना को केवल कविता नहीं मानता। इसमें एक देशभक्त की पीड़ा मुखर हुई है। लेकिन अब इस पीड़ा में क्राँति का ज्वाल होना जरूरी है। जब तक जाति विहीन समाज की कल्पना नहीं की जाती, इस देश पर इन गद्दारों की ही शासन रहेगा। व्यवस्था परिवर्तन  अनिवार्य है। इसके हिन्दुओं का सशक्त होना अनिवार्य है। इसके लिये जाति विहीन समाज प्रथम शर्त  है। इस संबंध में कोई सार्थक पहल करें। हिन्दु केवल हिन्दु बनकर रहे। ब्राह्मण या हरिजन बनकर नहीं।

yamunapathak के द्वारा
August 15, 2012

वासुदेव जी आपका यह ब्लॉग भी अन्य सभी ब्लॉग की तरह विषय की सटीक विवेचना प्रस्तुत करता है जो सहज ही आपके संकलन को पढ़ने को विवश करता है और मैं पूर्णतः सहमत इस बात से भी हूँ की भारत में शरणार्थी और घुस्पठियों को आने से इसलिए रोकना ज़रूरी है की देश वासी के लिए ही सुविधाओं को समुचित मुहैय्या नहीं किया जा रहा पहले अपने देश वासियों के लिए सम्पूर्णता से सोचे सरकार फिर शेष अतिथि देवो भवो की दया भावना दिखाए. साभार

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 15, 2012

    हार्दिक आभार आदरणीय यमुना ji, जो राष्ट्र अपनी सीमाओं को सुरक्षित नहीं रख सकता वह अपनी स्वतंत्रता को भी सुरक्षित नहीं रख सकता.!

shashibhushan1959 के द्वारा
August 15, 2012

आदरणीय त्रिपाठी जी, सादर ! “”राजनेताओं को भी उपयोगी शिक्षा के स्थान पर रूढ़िवादी मदरसों को प्रोत्साहन देने, कट्टरपंथ को शह देने व घुटने टेकने जैसी हरकतों से बाज आना होगा। अन्यथा जब तक राष्ट्र की अखंडता के विरुद्ध मुम्बई जैसे दंगे होते रहेंगे तब तक प्रश्न खड़े होते ही रहेंगे कि यह कैसी राष्ट्रीयता है जिसके लिए मजहब राष्ट्रधर्म से बड़ा है.!!”" बहुत सही और सार्थक बात !

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 15, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी, हार्दिक आभार!

rahulpriyadarshi के द्वारा
August 14, 2012

अगर कोई राष्ट्रवादी नहीं है,तब भी स्वीकारे जाने योग्य है,लेकिन जो राष्ट्र-विरोधी है,उसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए,और उस गन्दी नाली के कीड़े को यह भी पता नहीं था की जिन दो वीर सेनानियों की याद में वो अमर जवान ज्योति जल रही थी उनमे से एक वीर मुसलमान ही थे,इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इन जुनूनियों की निगाह में कोई मुसलमान जो देश के लिए अपनी जान लगा दे,सम्मान के योग्य नहीं है,लेकिन मैं दुखी हु उन मुसलमान भाइयों से जो इन जुनूनियों से खुद को अलग कर उसे ही अपने ईमान की इन्तहा मान लेते हैं,जब उनमे इतनी भी हिम्मत नहीं बची जो गलत रास्ते पर जाते अपने मजहब के लोगो को रोक सके,फिर कैसा ईमान और कैसा मुसलमान.तो या तो वो अपने मुसलमान होने का फ़र्ज़ अदा करने में अल्लाह से चोरी कर रहे हैं या उनकी अनुमति भी इन हरामजादों के साथ है,तीसरा कोई आप्शन एक मुसलमान के पास नहीं हो सकता,क्यूंकि जिसका सच्चा ईमान हो वही मुसलमान होता है,पांच वक़्त की नमाज भर पढ़ लेने से कोई मुसलमान नहीं हो जाता.

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 15, 2012

    बिलकुल सही कहा आपने राहुल भाई.. जो देश के लिए सच्चा ईमान रखता हो वही सच्चा मुसलमान है, पांच वक़्त की नमाज भर पढ़ लेने से कोई मुसलमान नहीं हो जाता.! जुनूनियों के तीव्र विरोध की आवश्यकता है!

nishamittal के द्वारा
August 14, 2012

राष्ट्रधर्म प्रधान है यह सत्य देश के हिन्दू मुस्लिमों को समझना होगा इसकी पहल; बुद्धिजीवी ही कर सकते हैं.

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 15, 2012

    सच यह है कि आज बुद्धिजीवी का तमगा उनके सर है जिनकी बुद्धि हमेशा यही खोजती रहती है कि किस तरह भारत की संस्कृति को समाज को नीचा दिखाना है.! वास्तविक बुद्धिजीवियों को आत्मविश्वास पैदा करना होगा और आगे आना होगा.!

dineshaastik के द्वारा
August 14, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, सादर नमसमकार। आपके आलेख एवं विचारों से मैं सहमत हूँ। लेकिन इन समस्याओं का मूल कारण क्या है। हम उनपर विचार क्यों नहीं करते। उन्हें नजर अन्दाज कर देते हैं। यदि हमें इन समस्याओं से निजात पाना है तो हिन्दु समाज से जातिगत भेदभाव को मिटाना होगा। छुआछूत को नष्ट करना होगा। जातियों को तोड़कर केवल हिन्दु बनकर रहना होगा। अतिसहिष्णुता के सिन्द्धाँत को व्यवहार में भूलना होगा। किन्तु यह बात भी सत्य है कि कुछ मुसलमान ही कट्टरता का समर्थन करते हैं, लेकिन वे इतने अधिक शक्तिशाली हैं कि आम सच्चा भारतीय मुसलमान उनका विरोध नहीं कर पाता। ऐसे मुसलमानों को आगे आना चाहिये। मुझे लगता है कि असम शासकीय षडयंत्र है। असम में काँग्रेसी शासन को स्थायित्व प्रदान करने के लिये यह नीति अपनाई जा रही है। हमारी कोशिश हो कि इस बार केन्द्र में काँग्रेसी तथा उसकी विचारधारा से  संबंधित पार्टियाँ केन्द्र में न आ पायें। आपके राष्ट्रवादी विचारों का समर्थन, किन्तु साम्प्रदायिकता का……….

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 14, 2012

    जातिभेद तो टूटने ही चाहिए और यह सुखद है कि हिन्दू समाज तेजी से बदल रहा है| समाज में विकृतियाँ सदैव परिस्थितियोंवश जन्मती हैं और पुनः भी धीरे धीरे ही बदलती हैं| एक बात कि कुछ ही मुसलमान कट्टरता का समर्थन करते हैं… मुझे लगता है यह धीरे बदल रहा है| जैसे जैसे अरब देशों का इस्लाम हावी होता जा रहा है भारतीय संस्कृति की छाप मनोमस्तिष्क से हटती जा रही है| इसके लिए मुसलामानों का प्रमुख दोष नही है, दोषी वह विचारधारा है जो समाज को संक्रमित कर रही है! यदि कट्टरपंथ बढ़ न रहा होता और मुस्लिम बहुमत इसका समर्थन में न उतर रहा होता तो राजनीति कट्टरपंथ के तुष्टीकरण के लिए दिन प्रतिदिन विवश क्यों होता जा रहा है? क्यों मुलायम सिमी का समर्थन करके मुसलमानों के सबसे चाहीते बन जाते हैं? जब आज़म खान कहते हैं कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है तो क्यों मुस्लिम समाज से विरोध नहीं उठता…. क्यों वे उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े नेता बने रहते हैं? और भारत माँ को डायन…. असम और केरल में मुस्लिम किसका समर्थन कर रहे हैं? मुम्बई मे रातों-रात 50,000 लोग असम और म्यांमार के लिए खड़े हो जाते हैं… यह उत्साह और जगह क्यों नहीं दिखता.? कई प्रश्न हैं, कुछ लेख में भी हैं। मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि हर मुस्लिम कट्टर है। कट्टरता के खिलाफ सोचने वाले कुछ मुस्लिम मेरे मित्र हैं और वो मेरे समर्थक भी हैं किन्तु बहुमत क्या कह रहा है? दोष विचारधारा मे है और ये फैल रही है। हम भी उन्हें मुख्यधारा में लाने का प्रयास करने के स्थान पर मदरसों को बढ़ावा देते हैं तो कभी इमामों के लिए सरकारी वेतन बांधते हैं..!! उपासना पद्धति से समस्या नहीं होती…. समस्या होती है इस विचारधारा से। सच बोलोगे तो सांप्रदायिकता का ठप्पा लगेगा…. और फिर हम तुरंत अपने कपड़े झाड़ने लगते हैं ताकि हम उदार और आधुनिक दिख सके.! सहिष्णुता कम करने की आवश्यकता नहीं है मेरे अनुसार, बस भय को खत्म करना पड़ेगा। सत्य को देखेंगे तो स्वीकारेंगे.,स्वीकारेंगे तो समाधान भी निकलेगा। फिर राष्ट्र सर्वोपरि होगा तो क्या फर्क पड़ता है आप नमाज़ पढ़ते हैं या मंदिर मे फूल चढ़ाते हैं.!!!

jlsingh के द्वारा
August 14, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, namaskaar! “प्रश्न भले ही इसके आगे अभी बहुत हों किन्तु उत्तर एक ही है। हमे उस उत्तर को तलाशना नहीं है वरन स्वीकारना है और इसके लिए बौद्धिक मुस्लिमों को सबसे पहले आगे आने की आवश्यकता है।” मैं जोड़ना चाहूँगा बौद्धिक हिन्दुओं को भी पहल करने की जरूरत है. साथ ही हिन्दुओं मे भी वह एकता जगाने की कोशिश करनी है, दंगा से भिड़ाने के लिए नहीं दंगा रोकने के लिए! इसके लिए राजनीतिक के साथ साथ सामाजिक प्रयास की भी जरूरत है!

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 14, 2012

    आपके विचारों से सहमत हूँ जवाहर जी.! राष्ट्रहित में सभी को एक होना ही चाहिए… यही एकमात्र विकल्प है. साभार!

Chandan rai के द्वारा
August 13, 2012

वासुदेव जी , आपके लेख के मूलार्थ से में सहमत हूँ ! राष्ट्रीयता मजहब से ऊपर है ! पर कंही ना कंही हिन्दू- मुस्लिम के बीच एक परिपाटी खींचता आपका आलेख आपके लेख के ही अर्थ का विरोधाभास है हमेशा की तरह एक बेहतरीन लेखन !

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 13, 2012

    चन्दन जी, मेरे लेख के कोई भी दो अर्थ नहीं हैं.! इसका एक ही अर्थ और वह बिलकुल स्पष्ट है| मेरे आलेख में क्या साहस कि हिन्दू-मुस्लिम के बींच रेखा खींच दे…. लेख सिर्फ सच को कह रहा है सच को बदल नहीं रहा। सच को बदलने की क्षमता मुझमे नहीं है… संभवतः किसी मे भी नहीं है। हाँ झुठलाया अवश्य जा सकता और वही हो रहा है। यदि आपको लगता है कि लेख मे कुछ ऐसा अनुचित या असत्य है जो बींच में रेखा खींच रहा है तो उन पंक्तियों को तर्क व प्रमाण के साथ बताये, मुझे भी विचार करने का अवसर प्राप्त होगा। और यदि तथ्य के आधार पर सत्य है तो ऑस्ट्रिच अप्रोच अपनाने से काम नहीं चलने वाला..!!! रेत में आँख बन्द कर चोंच घुसेड़ देने से भी क्या सत्य बदल जाएगा.? जिनके लिए राष्ट्र मजहब से बड़ा है वो हिन्दू हों अथवा मुस्लिम मेरे लिए समान हैं किन्तु जो भारत के सीने पर बम फोड़कर मजहब की पपीहरी बजा रहे हैं उनके लिए राग भारतीय हमारे संगीत शास्त्र में नहीं है। हम अपनी कायरता को मानवता मानवता चिल्लाकर कब तक अपने आपको महान समझकर अपनी पीठ ठोंकते रहेंगे.? इससे न इतिहास बदला है और न वर्तमान या भविष्य ही बदलेगा..!!! हार्दिक आभार।

    Chandan rai के द्वारा
    August 14, 2012

    वासुदेव मित्र , आपके उत्तर को पढ़कर बेहद प्रसन्नता हुई ! आपके विचारों का हार्दिक अभिनन्दन

bharodiya के द्वारा
August 13, 2012

ईन की राष्ट्रियता भारत जीतने छोटे टुकडे के साथ नही है । उन्हें पूरी दुनिया चाहिए । पूरी दुनिया पर राज करना चाहते हैं । कोइ काफर राज करे ये कैसे हो सकता है ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 13, 2012

    इसे ही दारुल-इस्लाम की कल्पना कहते हैं.! दारुल-हरब को दारुल-फ़ित्ना और फिर दारुल-फ़ित्ना को दारुल-इस्लाम में तब्दील करने की मानसिकता बड़ी घातक है! कम से कम भारत के मुसलमानों को तो एकजुट होकर इसे छोड़ना ही चाहिए.! हमारे सामने कलाम साब जैसे आदर्श हैं.. उन्हीं का अनुगमन किया जाना चाहिए न कि बुखारी जैसों का.!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 13, 2012

पढ़ा.

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 13, 2012

    हार्दिक आभार!

    rajuahuja के द्वारा
    August 19, 2012

    माननीय कुशवाहा जी ,प्रणाम ! सत्य कड़वा होता है ,और कड़वा जल्दी गले से नहीं उतरता !


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