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यह आजादी स्वीकार नहीं है

Posted On: 15 Aug, 2012 में

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पाकिस्तानी झण्डे फहरें और तिरंगे जलते हैं।
भारत के सीने पर निर्भय आतंकी पलते हैं।
अफजल के जूतों के नीचे न्याय यहाँ कुचला जाता।
भारत की संप्रभुता का सम्मान यहाँ मसला जाता।
कोई गिलानी दिल्ली आकर भारत को भभकी देता है।
गीदड़ सिंहों की छाती पर चढ़-चढ़कर धमकी देता है।
भारत के गद्दारों को अधिकार यहाँ बांटे जाते।
राष्ट्रप्रेम के दीवाने हैं दर-दर की ठोकर खाते।
कश्मीरी पण्डित के बच्चे भूखे नंगे रोते हैं।
लालचौक पर अगर तिरंगा फहराओ दंगे होते हैं।
यह तो भारत की आजादी का कोई प्रतिमान नहीं है।
यह तो लाखों बलिदानों के सपनों का सम्मान नहीं है।
कैसे कह दूँ यह सुभाष के भावों का व्यापार नहीं है?
मुझको तो यह झूठी बेबस आजादी स्वीकार नहीं है॥
—————————————————-
आधा तो वह काश्मीर अब पाक चीन की थाती है।
उसी आग में यहाँ असम की भी अब जलती छाती है।
अमरनाथ की श्रद्धा है मोहताज जेहादी नखड़ों पर।
मालिक जैसे जिन्दा हो कुत्तों के डाले टुकड़ों पर!
सदियों की परिपाटी बेबस सहमी हक्की-बक्की है।
सरकारों के गलियारों में फिर भी मसान सी चुप्पी है।
बलिदानों पर यहाँ सियासत की जाती कालिख पोती।
और मुजाहिद्दीनों की चौखट पर सत्ता रोती.!
चौराहों पर ही नारी की अस्मत लुटना जारी है।
हे भारत माँ! आज़ादी की यह कैसी लाचारी है.?
कहीं हजारों हैं शराब की बोतल पर फूंके जाते।
कहीं कहीं भारत के बेटे हैं श्मशान भूखे जाते।
यह तो भारत के जन-गण-मन का कोई गान नहीं है।
यह तो भारत की परिपाटी का कोई उपमान नहीं है।
यहाँ इण्डिया के आगे कुछ भारत को अधिकार नहीं है।
मुझको तो यह झूठी बेबस आजादी स्वीकार नहीं है॥
.
© वासुदेव त्रिपाठी
15 अगस्त 2012

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
September 7, 2012

बहुत ही विचारोतेजक आह्वान है आपकी लेखनी को सलाम

yogi sarswat के द्वारा
August 21, 2012

आधा तो वह काश्मीर अब पाक चीन की थाती है। उसी आग में यहाँ असम की भी अब जलती छाती है। अमरनाथ की श्रद्धा है मोहताज जेहादी नखड़ों पर। मालिक जैसे जिन्दा हो कुत्तों के डाले टुकड़ों पर! सदियों की परिपाटी बेबस सहमी हक्की-बक्की है। सरकारों के गलियारों में फिर भी मसान सी चुप्पी है। बलिदानों पर यहाँ सियासत की जाती कालिख पोती। मित्र वासुदेव जी , आपके ज्वलंत और धधकते शब्द सार्थक और एकदम सही हैं ! लेकिन लोग कहने वाले ये भी कहेंगे की आप धर्म निरपेक्ष नहीं हैं ! असल में आज हिंदुस्तान की बात करने वाला आदमी धर्म निरपेक्ष नहीं रह गया है ! बेहतरीन

मनोज कुमार सिंह 'मयंक' के द्वारा
August 18, 2012

वाह उम्दा..बेहतरीन..अब तो जार जार रोना ही पड़ेगा..क्योंकि भारत ने अपने भाग्य में जेहादियों से ठुकना लिखवा रखा है..बधाई आपको

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 18, 2012

आदरणीय त्रिपाठी जी, सादर बहुत सुन्दर भाव एवं प्रस्तुति. कैसी है ये आजादी. वाह

vikramjitsingh के द्वारा
August 18, 2012

वासुदेव जी….सादर…. इतना बेबस होना भी उचित नहीं……उम्मीद पर दुनिया कायम है……. दूसरे लफ़्ज़ों में कहा जाये तो……”वो सुबह कभी तो आएगी……….”

ashishgonda के द्वारा
August 18, 2012

मित्र! सादर,,,, अत्यंत आक्रोश और देशप्रेम की भावना,,,नमन आपकी भावनाओं को,,, ईश्वर से प्रार्थना है सभी भारतीय नौजावानों को यही भावना मिले. इतनी बेहतरीन पोस्टिंग के लिए ह्रदय से आभार,,,,,,,

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
August 17, 2012

मालिक जैसे जिन्दा हो कुत्तों के डाले टुकड़ों पर! सदियों की परिपाटी बेबस सहमी हक्की-बक्की है। सरकारों के गलियारों में फिर भी मसान सी चुप्पी है। वसुदेव जी, आपने वास्तविकता के साथ ही जो आंतरिक पीड़ा को इस रचना में घोला है वह निश्चित ही द्रवितकारी और सोचनीय है। ये वे यक्षप्रश्न हैं जिनका उत्तर अगर अभी न दिया गया तब शायद आगे देने की जरूरत ही न पड़े क्योंकि तब हालात और भी ज्यादा दुष्कर होंगे। सुंदर रचना के लिए बधाई….

rekhafbd के द्वारा
August 17, 2012

वासुदेव जी यह तो भारत के जन-गण-मन का कोई गान नहीं है। यह तो भारत की परिपाटी का कोई उपमान नहीं है। यहाँ इण्डिया के आगे कुछ भारत को अधिकार नहीं है। मुझको तो यह झूठी बेबस आजादी स्वीकार नहीं है॥,आपकी इस कविता में आक्रोश और पीड़ा की झलक है ,बढ़िय प्रस्तुति

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    हार्दिक आभार आदरणीय रेखा जी|

Santosh Kumar के द्वारा
August 17, 2012

आदरणीय वासुदेव जी ,.सादर अभिवादन राष्ट्रभक्त की पीड़ा को मुखरित स्वर देने के लिए कोटिशः आभार वन्देमातरम

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    आदरणीय संतोष जी, सगर्व वन्देमातरम.! हार्दिक आभार.

dineshaastik के द्वारा
August 17, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, सादर नमस्कार। मैं आपकी इस रचना को केवल कविता नहीं मानता। इसमें एक देशभक्त की पीड़ा मुखर हुई है। लेकिन अब इस पीड़ा में क्राँति का ज्वाल होना जरूरी है। जब तक जाति विहीन समाज की कल्पना नहीं की जाती, इस देश पर इन गद्दारों की ही शासन रहेगा। व्यवस्था परिवर्तन अनिवार्य है। इसके हिन्दुओं का सशक्त होना अनिवार्य है। इसके लिये जाति विहीन समाज प्रथम शर्त है। इस संबंध में कोई सार्थक पहल करें। हिन्दु केवल हिन्दु बनकर रहे। ब्राह्मण या हरिजन बनकर नहीं।

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    आपसे सहमत दिनेश जी! हार्दिक आभार.! आप प्रतिक्रिया पहुँचाने का जितना प्रयास करते हैं वह आपके समर्पण को स्पष्ट करता है.!

jlsingh के द्वारा
August 17, 2012

चौराहों पर ही नारी की अस्मत लुटना जारी है। हे भारत माँ! आज़ादी की यह कैसी लाचारी है.? कहीं हजारों हैं शराब की बोतल पर फूंके जाते। कहीं कहीं भारत के बेटे हैं श्मशान भूखे जाते। हमें भी ऐसी आजादी स्वीकार नहीं है, पर रास्ता किधर है २०१४ के पहले ……

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 19, 2012

    2014 भी दूर नहीं है जवाहर जी.. हाँलाकि यह नासूर अब बढ़ चुका है अतः उपचार झटके में संभव नहीं किन्तु फिर भी २०१४ आते आते दमदार आरम्भ तो हो ही जाये.! ..साभार!

vasudev tripathi के द्वारा
August 16, 2012

…!55


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