RASHTRA BHAW

"प्रेम भी प्रतिशोध भी"

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एक और आपातकाल की ओर?

Posted On: 25 Aug, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Graphic2लोकतन्त्र में यदि सरकार सच को स्वीकारने की अपनी अक्षमता के चलते अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के हनन की सीमा तक पहुँच जाए तो यह स्वयंसिद्ध हो जाता है कि सरकार लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पूर्णतः असफल हो चुकी है। ऐसी सरकार को लोकतान्त्रिक व्यवस्था में बने रहने का नैतिक अधिकार ही नहीं रह जाता है। 1975 के आपातकाल के बाद आज पुनः एक बार सरकार यदि उस स्थिति में नहीं तो उस मनोदशा में अवश्य पहुँच गई है।
वर्तमान सरकार जनता, सत्ता और संविधान के प्रति किए गए अपने अपराधों की मुखर आलोचना सुनने की सहनशीलता खो चुकी है और उसी का परिणाम है कि सरकार झुंझलाहट भरे आलोकतांत्रिक व्यवहार पर उतर आई है। सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर शिकंजा कसने के सरकार के प्रयास इसी झुंझलाहट की असंतुलित प्रतिक्रिया है जिसे कि वह कई बहानों के चोले से ढंकने का प्रयास कर रही है। बाबा रामदेव का आंदोलन रहा हो अथवा अन्ना का अभियान, सरकार व कॉंग्रेस की तरफ से जिस तरह की प्रतिक्रिया व बयानबाजी की गई वह उसकी हताशा व अवसाद को बखूबी स्पष्ट करती है। उत्तर प्रदेश में कॉंग्रेस की असफलता के साथ साथ राहुल गांधी का औंधे मुंह गिरना और उसके बाद एक और बड़े राज्य आन्ध्र प्रदेश में सूपड़ा साफ होना कॉंग्रेस और सोनिया गांधी की हताशा के ऊपर और कई मन का बोझ बढ़ा गया। निश्चित रूप से इन असफलताओं में कॉंग्रेस नीत केंद्र सरकार के काले इतिहास का बहुत बड़ा योगदान है।
इसे दुर्भाग्य कहा जाए या भ्रष्ट मानसिकता का दुराग्रह कि सत्तासीन अपने इन पापों को स्वीकारने व सुधारने के स्थान पर सतत सीनाजोरी का रास्ता अपनाए हुए हैं! इसी दुराग्रह के चलते सरकार अन्ना के विरुद्ध भद्दी बयानबाजी और रामदेव पर सस्ते आरोप लगाकर अपनी साख बचाने का बचकाना प्रयास करती रही है और अब उसी बचकानी सोच का परिणाम है कि सरकार सोशल नेटवर्किंग साइट्स को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है। गूगल सहित फेसबुक व ट्विटर जैसी वेबसाइट्स से सरकार लंबे समय से आमने-सामने की स्थिति में है। हाँलाकि सरकार भले ही सांप्रदायिक सौहार्द और अश्लीलता जैसे तर्क देकर अपने सर्वालोचित निर्णय को सही सिद्ध करने में जुटी हो किन्तु वास्तविकता यही है कि इंटरनेट सरकार और विशेषकर काँग्रेस की आलोचना का एक गढ़ बनता जा रहा है जहां छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी जानकारी एक लहर के साथ उठती है और आम जनमानस से टकराकर एक ज्वार में बदल जाती है। यद्यपि यह सत्य है कि कई बार पोस्ट्स और प्रतिक्रियाएँ भद्रता की सीमा का उल्लंघन कर जाती हैं तथापि हम इससे इंकार नहीं कर सकते कि यह आम आदमी के आक्रोश का अनियंत्रित प्रकटीकरण ही है। दिग्विजय सिंह जैसे नेता, जोकि अभी तक अनर्गल और अभद्र बयानबाजी करके भी सीना ताने रहते थे, आज सोशल मीडिया की इस तपिश को बखूबी महसूस कर रहे हैं। इन नेताओं के साथ साथ मीडिया के भी एक तबके को सोशल मीडिया ने यह अहसास करा दिया है कि जनता न तो मूर्ख है और न गूंगी ही..!! इंटरनेट के इस युग ने पहली बार जनता को बोलने का मौका दिया है अतः अब जनता धमककर बोल रही है।
जहां तक अश्लीलता और सांप्रदायिकता का प्रश्न है इसके पीछे दो महत्वपूर्ण बातें हैं। एक तो अश्लीलता को लेकर सरकार चिन्तित हुई हो ऐसा बिलकुल नहीं है क्योंकि इंटरनेट पर अश्लील वेबसाइट्स की भरमार है और आंकड़ों के अनुसार यह खजाना प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है किन्तु इससे सरकार को कोई लेना देना नहीं है। दूसरा, सांप्रदायिक आस्थाओं को ठेस पहुंचाने वालों की संख्या कुल यूजर्स की तुलना में बहुत कम हैं, साथ ही ऐसा करने वाले किसी एक समुदाय से संपर्क नहीं रखते किन्तु कॉंग्रेस सरकार व कुछ अन्य वोट बैंक की राजनीति करने वाले यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि ये केवल बहुसंख्यक ही हैं जो अल्पसंख्यक भावनाओं पर प्रहार कर रहे हैं। मुलायम सिंह तो एकतरफा मांग भी कर चुके हैं कि मुस्लिम विरोधी पेजों को बंद किया जाना चाहिए। वास्तविकता में इंटरनेट एक वैश्विक पटल है जहां इस्लाम की अधिकतर आलोचना/समालोचना पश्चिमी देशों से चलने वाली ईसाई अथवा यहूदी वेबसाइट्स के द्वारा की जाती है। बहुधा भारत में लोग वहीं से सामाग्री लाकर सोशल साइट्स पर डालते हैं। इसी प्रकार हिन्दूविरोधी पेजों की भी कमी नहीं है। किन्तु जो भीड़ है वो उन लोगों की है जो सरकार को भ्रष्टाचार से लेकर तुष्टीकरण तक आड़े हाथों ले रहे हैं। यही कारण है कि असम दंगों में अफवाह के नाम पर सरकार अपने विरोधियों पर निशाना साधने में जुटी है। कॉंग्रेस का पूरा प्रयास है कि संघ जैसे संगठनों को अफवाह फैलाने का दोषी सिद्ध किया जाए। इसीलिए सुनियोजित तरीके से हिन्दू संगठनों का नाम उछाला जा रहा है। एक भी गिरफ्तारी अथवा सबूत के बिना मनगढ़ंत आशंकाओं का हवाला देकर कहने का प्रयास हो रहा है कि एसएमएस फैलाने वालों में 10-20% हिन्दू संगठन भी हैं! यदि ऐसा है भी तो भी प्रतिशोध की धमकी देने वालों और प्रतिशोध से बचने के लिए सजगता की अपील करने वालों को आप एक तराजू में कैसे तौल सकते हैं? हम सभी जानते हैं कि संघ आदि संगठनों ने बंगलौर जैसे शहरों में पूर्वोत्तर भारतीयों को भय के माहौल में आश्वासन के साथ सड़कों से लेकर रेलवे स्टेशन तक सुरक्षा और खाद्य सहायता उपलब्ध कराने का ही कार्य किया था।
वस्तुतः मुद्दा अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों का ही था किन्तु यह राजनैतिक संकीर्णता का एक निंदनीय खेल मात्र है जिसने वर्तमान परिदृश्य को बहाना बनाकर इंटरनेट पर एकजुट होती सामाजिक आलोचक शक्ति पर निशाना साधा है। कॉंग्रेस सरकार तो अपने आलोचकों की जुबान बंद करने के लिए पहले से ही सोशल साइट्स और गूगल से तकरार कर रही थी।
यथार्थ यह है कि इंटरनेट पर मशक्कत करने जैसा कुछ भी नहीं है क्योंकि यह सहजता से समझा जा सकता है कि करोड़ों लोगों की इंटरनेट पर व्यक्तिगत स्तर पर निगरानी नही की जा सकती। धर्म-विशेष, व्यक्ति-विशेष अथवा समुदाय विशेष के प्रति घृणा अथवा अश्लीलता फैलाने वाली पोस्ट्स के विरुद्ध फेसबुक जैसी साइट्स के पास पहले से ही नियम हैं कि उन्हें आप सीधे रिपोर्ट कर सकते हैं। क्यों नहीं सरकार सीधे लोगों से अपील करती है कि वो इस तरह की सामग्री को जागरूकतापूर्वक रिपोर्ट/ब्लॉक करें.? स्थिति स्पष्ट है कि सरकार की चिंता सामुदायिक सद्भाव को लेकर नहीं अपितु अपने विरूद्ध इंटरनेट के माध्यम से फैल रहे असंतोष को दबाने की है अन्यथा हिन्दू देवी देवताओं व आस्थाओं के खिलाफ न जाने कितनी ही किताबें सरकार से कॉपी-राइट लेकर धड़ल्ले से छप रही है और फिल्मों से लेकर विज्ञापनों तक में खुले आम सांप्रदायिक आस्थाओं का मज़ाक उड़ाया जा रहा है। सरकार और कॉंग्रेस पार्टी जानती है कि 2012 के हालात 1975 से काफी अलग और मीलों दूर हैं। आज बाजारवाद के युग में मीडिया सरकार के लिए चुनौती नहीं है किन्तु सोशल मीडिया के रूप में एक नई चुनौती उभर चुकी है। यह स्पष्ट है कि आज परिस्थियाँ और तकनीक अनुमति नहीं देतीं कि कॉंग्रेस सरकार की अपने विरोधियों का मुंह बंद करने की यह मंशा सफल हो सके किन्तु फिर भी यह प्रश्न तो उठता ही है कि क्या यह अभिव्यक्ति के संविधान प्रदत्त अधिकारों के विरुद्ध आपातकाल की मानसिकता के अवशेषों का पुनरोदय नहीं है.?
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-वासुदेव त्रिपाठी

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chaatak के द्वारा
September 2, 2012

स्नेही वासुदेव जी, आपका आंकलन बिलकुल सही है, मेरे विचार से कालान्तर में इस आपातकाल को मीडिया द्वारा आरोपित और राजनीति-पोषित आपातकाल के नाम से जाना जाएगा| हार्दिक बधाई!

Sanjay के द्वारा
August 30, 2012

जैसे माँ बाप अपने बच्चे को खिलौना दे कर बहलाते है वैसे ही राजनेता जनता को आरक्षण, जाति और मजहब के खिलोने दे कर बेवकूफ बना रहे है . कभी कर्जा माफ़ी कभी सब्सिडी जैसे जाल फैंकते ही रहते है.

ashokkumardubey के द्वारा
August 30, 2012

वासुदेवजी , आपका आलेख बहुत ही संतुलित और समझदारी से लिखा गया एक उत्तम प्रस्तुति है और प्रभावी भी है . अब कांग्रेस सोंच रही हो की वह ७५ वाला आपातकाल लगाकर जनता का मुह बंद कर देगी या अन्ना हजारे के टीम को भंग कर उनको तीन खेमे में बाँट देगी या रामदेव पर इनकम टैक्स के छापे डलवा कर अपने खिलाफ भ्रष्टाचार की उठते आवाज को बंद कर देगी तो उसकी यह भूल है ,पर दुःख तो यह है की यह सोशल मिडिया भी कितने लोगों के बीच पढ़ी और समझी जाती है मेरी समझ से अभी इसका भी दायरा उतना नहीं बढ़ा जितना बढ़ना चाहिए था क्यूंकि लोगों के अलग अलग पसंद है कोई इन साईटों पर अपने मन के भड़ांस को कई गलत बातों को लिखकर निकालता है तो कोई कुछ और लिखता पढ़ता है सामाजिक सरोकार बहुत कम लोगों का होता है और यही कारन है की इन आंदोलनों में जो मजबूती जो समर्थन मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिल रही है और मिला जुलकर कांग्रेस की तानाशाहियत चल रही है और मुझे नहीं लगता यह सरकार २०१४ से पहले सत्ता को छोड़ने वाली है क्यूंकि जो अपने को कांग्रेस विरोधी कहते हैं वे भी केंद्र में सरकार के समर्थन में है और राज्यों में विरोधी हैं और सौदेबाजी हो रही है कोई पार्टी का मुखिया कहता है मेरी सीबीआई की फाईल बंद रखो मैं तुम्हारी सर्कार को समर्थन दूंगा और यह सर्कार जो जनविरोधी नीतियों के तहत काम कर रही है जिस सरकार को जनता की समस्यायों से कोई सरोकार नहीं वह साल दर साल अपना कार्यकाल निकालते जा रही है चाहे वह नित नए घोटाले करे महंगाई चरम सीमा पर हो जाये लोगों को दो वक्त की रोटी की मुश्किल हो , बच्चे कुपोषण के शिकार हों इन सब समस्यायों को यह सरकार तो दर किनार कर दे रही है और एन केंन प्रकारेन सत्ता पर काबिज रहने को ही अपनी जीत समझ रही है आज कोई मजबूत विपक्छ भी नहीं है पहले हम कमजोर प्रधानमंत्री का रोना रोते थे अब मजबूत बिपक्छ को रोते हैं जनता के हिस्से में तो रोना तड़पना ही बाकि बचा है क्यूंकि जनता इन भ्रष्ट नेताओं को चुनने की जिम्मेवार है ऐसा नेता चिल्ला चिल्ला कर कह रहें हैं और ठीक कह रहे हैं जब वोट देने की बरी आती है तो लोग छुट्टियाँ मानते है और जब अपराधी और भ्रष्ट सताने लगते हैं तो यही जनता शोर मचाती है यही बयां आज नेता चारो तरफ प्रचारित कर रहे हैं और साडी बुराई और नाकामी को जनता के ऊपर ही दाल रहे हैं जनता को अपने लिए सडकों पर आना होगा धरना प्रदर्शन को बधन होगा गाँव गाँव शहर शहर इन भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ लम बंद होना होगा अगर जनता में एकता आएगी तभी यह सरकार सत्ता से जाएगी वरना यह अपने खिलाफ प्रचार को भिन्न तरीकों से रोने का ही प्रयास करेगी और सोशल मिडिया पर लगाम उसी और उठे जानेवाला सरकारी कदम है . अंत में एक अच्छा लेख और बेस्ट ब्लागर कहे जाने को बधाई

rajuahuja के द्वारा
August 29, 2012

सदा की भांति एक सशक्त लेख के लिए साधुवाद ! सत्ता में बने रहने के लोभ के चलते देश के नेतृत्व का नैतिक पतन चरम पर है ! वोट की राजनीति / जाती विशेष का तुष्टिकरण एक आम बात हो गई है ! बेशर्मी की हद तो तब होती है जब, धर्मान्ध लोग हुकूक की लड़ाई का फतवा दे कर, देश की सम्पदा को आग के हवाले कर देते हैं, और नेतृत्व इसे, मात्र प्रतिक्रिया की नज़र से देखता है ! यदि ऐसा है तो प्रतिक्रिया का प्रतिउत्तर भी होता है, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है !इस सब के बावजूद हिन्दू विचार-धारा ही दोषी ठहराई जाती है ! बंगला देशी घुस-पैठ के चलते पूर्वोत्तर-राज्यों के जन-मानस में भय का माहौल है !वे स्वयं को हिन्दोस्तानी नगरों में असुरक्षित महसूस करने लगे हैं !

pawan के द्वारा
August 29, 2012

what a comment sir jee… i most liked it. pawan

aman kumar के द्वारा
August 28, 2012

बासुदेव जी आपका आकलन बहुत सही है | कांग्रेस अपनी कब्र खोद रही है | पर समस्या ये है की किया क्या जाये ? एस बार का चुनाव जितना इनको ये सिखा गया है की जनता तो पागल है कुछ भी करो | कुछ नही होंगा . ओर्र हा कोन्रेस सही सोच रही है | मेरा लेख जनता को विकल नही रोटी ….. को देखे ……….|

yogi sarswat के द्वारा
August 28, 2012

वासुदेव जी , आपके लेखन में हमेशा ही एक नवीनता , स्पष्टवादिता और जोश होता है ! आपने ये तो सुना ही होगा की जब दिया बुझने वाला होता है तो वो जलने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता है , उसे स्वीकार ही नहीं होता है की उसे भी कभी न कभी बुझ जाना ही है , कोई अज़र नहीं कोई अमर नहीं किन्तु सोनिया गाँधी को शायद प्रकृति का ये सिधांत पता नहीं है , उन्हें यही लगता है की जब तक वो हैं सत्ता उनके ही हाथ में होनी चाहिए , शायद बिना सत्ता के वो कैसे जी पायेगी , मैं नहीं जानता ! लेकिन इतना जरूर जानता हूँ की वो इंदिरा गाँधी नहीं है , इंदिरा को भी इस देश की जनता ने सत्ता से हटा दिया था ! अपनी खोई हुई साख को बचाने के चक्कर में कांग्रेस सही और गलत का अंतर भूल गयी है ! बढ़िया लेख

Chandan rai के द्वारा
August 28, 2012

वासुदेव मित्र , एक बेहतरीन लेख के लिए मेरा हार्दिक अभिनन्दन स्वीकारें !

dineshaastik के द्वारा
August 28, 2012

वासुदेव जी मेरी अवधारणा है कि अमस दंगा, मुम्बई का आतंक पूर्णतः राजनेताओं द्वारा सुनियोजित है। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के लिये एक सरकारी षडयंत्र है। जनता सब जानती है किन्तु अफसोस कि जागती नहीं है। उसके पास विकल्प भी तो नहीं है। एक साँपनाथ तो दूसरा नागनाथ और तीसरा कालिया नाग। सारगर्भित एवं तार्किक आलेख की प्रस्तुति के लिये बधाई…….

Santosh Kumar के द्वारा
August 27, 2012

vaasudev jee ,.saadar abhivaadan vinaash kaale vipreet buddhi ,…sarkaari gundagardi hai ,..saarthak lekh ke liye haardik badhaai vandematram

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 27, 2012

इन्हें देश की चिंता नहीं है. ये अपने लिए डर रहे हैं. राष्ट्र के नागरिको को जागरूक होकर भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है. सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग भाई भाई हैं बस एकता और विशवास बनाये रखें की वे भारतीय हैं. बधाई.

munish के द्वारा
August 27, 2012

बहुत सार्थक विषय पर सार्थक लेख, स्वयम सरकार कहती है की अफवाह फैलाने में पाकिस्तान का हाथ था तो फिर हिन्दू संगठनों की साईट बंद क्यों ?

bharodiya के द्वारा
August 25, 2012

The page you have requested has been blocked, because the URL is banned. अब काफी जगह यह मेसेज मिलता है और ओर ज्यादा मिलेगा ।

DHARAMSINGH के द्वारा
August 25, 2012

सुन्दर ऴेख के लिए बधाई कांग्रेस एक बिदेशी सस्था है इसका काम हिन्दुओ पर राज करना है इसके तीन टूल हैं पहला सी बी आई दूसरा प्रिन्ट मिडीया जिसको 1947 से अब तक  बहुत अर्थहीन विज्ञापन दिएशायद बजट से भी ज्यादा  तीसरा कोर्ट अन्दाजा लगाईये कितने जज 15-8-1947 से आज तक  कमीशन अध्यक्ष नाम की रिश्वत खा चुके है देश मे चार कानून हैं पहला मुसलमानो के लिए जो सिर्फबच्चे पैदा करने के लिएहै पालने के लिय गुलाम  हिन्दू जो है दूसरा काग्रेस के लीडरो के लिए जो तथा कथित संविधान सेऊपर  हैं तीसरा कानून अपराधियो के  लिए जिसे धन बल से खरीदते है  चौथा कानून हि न्दुओ के लिए कोरटो मे धके खाने के वासते ईस सब के लिए खुद हिन्दू जुमेवारहैं लम्बी दासता से जमीर मरलगई हैबेटियो की ईजत  लुटवाकरजयचन्द मानसिंह की श्रेणी मे नाम लिखवा चुके हैं

nishamittal के द्वारा
August 25, 2012

वासुदेव जी ,सरकार द्वारा अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए ऐसे कुत्सित प्रयास कोई नवीन नहीं हैं वैसे भी हिन्दू संगठनों पर आरोप थोप कर जनता को भ्रमित करना चाहते हैं,हाँ यदि पोस्ट में कुछ अशोभनीय,समाजविरोधी या राष्ट्र विरोधोई कुछ है तो नियमों का कडाई से पालन करते हुए उन पोस्ट्स या सामग्री पर नियंत्रण लगायें.

manoranjanthakur के द्वारा
August 25, 2012

सुंदर जानकारी देती सर्गार्वित रचना बहुत बधाई

vikramjitsingh के द्वारा
August 25, 2012

”विनाशकाले…….विपरीत बुद्धि….. ” या ये कहिये… ”खिसियानी बिल्ली……खम्बा नोचे……”

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 27, 2012

    हाँ विक्रमजीत जी., यह कहावत काफी चरितार्थ होती है सरकार पर.!!

jlsingh के द्वारा
August 25, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, नमस्कार! अगर ऐसा ही है, तब तो यही कहा जा सकता है कि आपत्काले विपरीत बुद्धि! लेकिन कोई एक सर्वमान्य, लोकमान्य तो दिखे और आगे बढ़कर नेतृत्व करे!

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 27, 2012

    नमस्कार JL सिंह जी, सर्वमान्य तो कभी कोई हुआ ही नहीं किन्तु लोकमान्य अवश्य हुए हैं और आज भी हो सकते हैं.! किन्तु समस्या यह है कि लोकमान्य यदि आज बढ़ते हैं तो चंद लोग जो उन्हें अमान्य मानते हैं इतना शोर मचाते हैं कि लोक स्वयं संदेह में पड़ जाता है कि क्या यह व्यक्ति वास्तव में लोकमान्य हो सकता है..!!! शोर मचाने के तंत्र और संयंत्र इन्हीं चंद लोगों ने हथिया रखे हैं..!!

drbhupendra के द्वारा
August 25, 2012

वासुदेव जी TIMES OF INDIA ने बड़ा बड़ा हेडिंग लिखा था की २०% अफवाह फ़ैलाने में हिन्दू संघठन शामिल थे .. ये कैसी मानसिकता है इन मीडिया वालो की जो की ये लिखने से बचते है की ८०%सामग्री किसने बाटी .. ये भी कुत्ते ही है .. जो टुकड़ा देख कर या खा कर दूम हिला रहे है .

    vasudev tripathi के द्वारा
    August 27, 2012

    भूपेन्द्र जी, लेखनी यह भय है अथवा भेदभाव.. किन्तु जो भी है घातक है.! हार्दिक आभार.!


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