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कार्टून पर असीम बवाल

Posted On: 11 Sep, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी ने सोशल मीडिया को इन दिनों गरम कर रखा है। फेसबुक से लेकर ट्विटर तक विचारों, सलाहों, गिरफ्तारी के विरोध व असीम के समर्थन में गरम बाजार में मेरी भी उपस्थिति रही किन्तु मात्र अपने विचार व्यक्त करने तक! किन्तु कई मित्रों द्वारा चर्चा में मुझे घसीटे जाने व भावुकता में बहते जन सैलाब द्वारा हकीकत से परे तर्कों की बाढ़ ने मुझे इन दिनों की बेहद व्यस्तता के बाद भी मजबूर किया कि मैं इस पर लिखूँ! बहुत संभव है कि कई लोग इस विषय पर मेरे विचारों से सहमत न हों क्योंकि प्रायः बहाव में भावुक होकर बह जाने की प्रवत्ति जनसामान्य में होती है किन्तु मेरा प्रयास रहता है कि मैं वास्तविकता को तथ्यों के धरातल पर देखूँ और उसी आधार पर लिखूँ। लेखन की दुनिया में मैंने पहले शब्द सीखा था “विश्वसनीयता” (Credibility) और यही शब्द मैंने देश के हर उस शिखर के पत्रकार के मुंह से सुना है जिनसे भी मुझे मिलने का मौका मिला.!
जहां तक बात असीम त्रिवेदी की है उन्हें किसी भी रूप में देशद्रोही ठहराए जाने को मैं प्रासंगिक नहीं समझता। किन्तु सोशल मीडिया पर असीम का समर्थन करने वाला बड़ा तबका मात्र भावनाओं में बह रहा है जोकि हम भारतीयों का एक बड़ा गुण भी है और दोष भी.! यह इसी भावुकता का परिणाम है कि बड़ा तबका असीम की गिरफ्तारी का ठीकरा सीधे सरकार के सिर फोड़ रहा है और कॉंग्रेस को गाली देने में जुटा है। भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबी कॉंग्रेस की तीखी आलोचना मेरे लेखों में किसी को भी स्पष्ट दिखेगी किन्तु निरर्थक आरोपों का मैं बिलकुल भी समर्थन नहीं करता चाहे वह व्यक्ति विशेष के प्रति हो अथवा पार्टी विशेष के प्रति। वस्तुतः असीम पर दर्ज किए गए केस का कॉंग्रेस सरकार से कोई भी सीधा संबंध नहीं है। असीम के विरुद्ध रिपोर्ट मुम्बई के एक वकील ने लिखवाई है जिसने उनके कार्टूनों को राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति अपमानजनक पाया। असीम कोई ऐसी सख्शियत नहीं है जिनके कार्टूनों ने सरकार अथवा कॉंग्रेस की नाक में दम कर दिया हो अथवा किसी बड़ी जनक्रांति जैसी स्थिति संभावना पैदा कर दी हो और सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया हो!
यद्यपि यह सच है कि असीम ने अपने कार्टूनों के माध्यम से भ्रष्टाचार पर प्रहार करने का प्रयास किया था किन्तु इससे इस तथ्य को बदला नहीं जा सकता कि उनके कार्टून राष्ट्रीय चिन्हों को विकृत रूप में प्रस्तुत करते हैं। भारत माता का बलात्कार होते दिखाना भले ही आपकी दृष्टि में यह संदेश दे रहा हो कि भ्रष्टाचार भारत को लूट रहा है किन्तु इस तस्वीर का प्राथमिक स्वरूप स्वयं में शिष्ट नहीं है। चित्र का आशय तो उसमें निहित वस्तु है, किन्तु चित्र स्वयं में क्या है? यही कि भारत माँ का बलात्कार किया जा रहा है! आपको याद होगा कि एम एफ हुसैन ने भी एक पेंटिंग बनाई थी जिसमे उन्होने भारत माँ का बलात्कार चित्रित किया था। बाद में उन्होने भी यही कहा था कि मेरी पेंटिंग 26/11 हमले को चित्रित करती है किन्तु जनभावना ने उसकी कड़ी आलोचना की थी। असीम के संदर्भ में यह सत्य है कि उसमें अपवित्र भावना बिलकुल नहीं थी अतः उसकी हुसैन से तुलना नहीं की जा सकती तथापि अभिव्यक्ति के लिए जो तरीका असीम ने चुना वह जनभावना व भारतीय मूल्यों के अनुकूल नहीं था। भारतवासियों के लिए भारत के संदर्भ में माँ शब्द एक शब्द मात्र नहीं वरन एक शुद्ध भावना है जैसे कि एक कोख से जन्म देने वाली माँ के लिए होती है, और किसी के प्रति आक्रोश व्यक्त करने के लिए अपनी सगी माँ के बलात्कार की तस्वीर पुत्र नहीं बना सकता.! यह भारतीय संस्कृति व भावनात्मक मूल्य के विरुद्ध है। उसी प्रकार राष्ट्रीय चिन्ह में शेरों के स्थान पर मुंह में खून लगे भेड़ियों को असीम ने चित्रित किया जिसमे चक्र के स्थान पर खतरे के निशान में दिखाई जाने वाला हड्डी और कपाल तथा “सत्यमेव जयते” के स्थान पर “भ्रष्टमेव जयते” लिखा हुआ था। यदि असीम इसे भ्रष्टाचारियों का चिन्ह कहते तब भी एक सीमा थी किन्तु उन्होने इस पर “राष्ट्रीय चिन्ह” भी लिख दिया। नेता भ्रष्ट हो सकते हैं, सत्ता भ्रष्ट हो सकती है किन्तु इससे भ्रष्टाचार राष्ट्रीय चिन्ह नहीं बन जाता। असीम तो अन्ना हज़ारे के समर्थक हैं, उन्होने तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध देश का आक्रोश देखा ही होगा। राष्ट्रीय चिन्ह देश के जनमानस को व देश की संस्कृति व आदर्शों को व्यक्त करता है न कि देश के भ्रष्टों को।
Ar0120201वस्तुतः असीम आज विवादों मे आकर चर्चित भले ही हो गए हों किन्तु वे उन कार्टूनिस्ट में से हैं जिनके अंदर कला का परिपक्व हुनर नहीं है अपितु कम्प्युटर ने जिन्हें कार्टूनिस्ट बनाया है। जिस तरीके के असीम ने कार्टून बनाए उनमें मौलिकता कम विकृत चित्रण अधिक है। मौलिक कार्टूनिस्ट के विचारों में अनूठी चोट होती है जोकि पूर्णतः नवीन खोज होती है। इसके लिए आप कुछ राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय कार्टूनिस्ट को देख सकते हैं। संसद को असीम ने शौचालय के रूप में दिखाया जबकि टाइम्स ऑफ इण्डिया के कार्टूनिस्ट अजीत नैनन ने एक कार्टून बनाया था, दोनों में परिपक्वता व अपरिपक्वता का भेद साफ समझा जा सकता है। असीम के ब्लॉग को मैंने खंगाला तो उसमें दिग्विजय सिंह के कार्टून थे जिसमें उन्हें सूअर के रूप में दिखाया गया था और दिग्विजय के स्थान पर पिग्विजय शब्द का प्रयोग किया गया था जोकि आजकल सोशल मीडिया पर दिग्विजय के ऊटपटाँग बयानों के कारण आलोचकों ने रख रखा है। सोशल मीडिया पर लिखने वाले आम लोग सिर्फ गुस्सा निकालते हैं अतः असीम उसी श्रेणी में हैं। मीडिया लोकतन्त्र का एक स्तम्भ है जिसके नैतिक दायित्व होते हैं अतः वह दिग्विजय जैसे नेताओं के लिए भी असंसदीय भाषा का प्रयोग नहीं कर सकती। आम आदमी तो नेताओं को देशी गालियों से भी नवाजता है, क्या मीडिया अथवा परिपक्व कार्टूनिस्ट/व्यंगकार गालियों का प्रयोग करने लगेगा.? विकृतिकरण/अशिष्टता और कला में गंभीर अन्तर है।
आवश्यकता है कि हम परिपक्व बनें, नैतिक अनैतिक, संवैधानिक असंवैधानिक के बींच अंतर को समझें। कुछ लोग कहते हैं असीम गिरफ्तार किए गए किन्तु नेता संसद मे अथवा बाहर जो आचरण करते हैं वह देश व लोकतन्त्र का अपमान नहीं है? नेताओं पर उनके आचरण के लिए उनकी आलोचना की जानी चाहिए, मुकदमे डालने चाहिए न कि दोषारोपण का खेल खेलना चाहिए और असंवैधानिक कार्टून का समर्थन होना चाहिए। हमें सोचना चाहिए कि क्या राष्ट्रीय चिन्हों के विकृत चित्रण से भ्रष्ट नेताओं द्वारा राष्ट्र के अपमान का बदला निकल आएगा अथवा विकृत प्रस्तुति से कोई क्रांति आ जाएगी.? इससे भविष्य में उन लोगों को बढ़ावा मिलेगा जो भारत को अपमानित करने की फिराक मे रहते हैं।
असीम पर नेशनल ऑनर एक्ट 1971 के तहत मुकदमा दायर किया गया है और हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि इस कानून के तहत राष्ट्रीय अस्मिता, सम्मान के प्रतीकों का विकृत प्रस्तुतीकरण (misrepresentation) वर्जित है। मामला सरकार का नहीं बल्कि न्यायालय का है अतः हमें अपने संविधान व न्यायालय की प्रक्रिया पर थोड़ा विश्वास व धैर्य रखना चाहिए। असीम का मामला कोई अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र नहीं है जिसमें वकील व जज सभी खरीद लिए जाएंगे। हम जानते हैं कि असीम के कार्टूनों का उद्देश्य गलत नहीं था अतः हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि न्यायालय में जज भी यह बात समझने में सक्षम होंगे। देशद्रोह व त्रुटिपूर्ण अभिव्यक्ति में न्यायालय अवश्य अन्तर जानता है। असीम का काम देशद्रोह नहीं है अतः उन्हें सजामुक्त होना ही चाहिए किन्तु कम से कम असीम व उनके जैसे अपरिपक्व नवयुवकों को यह एहसास भी करना ही चाहिए कि जिस तरह से व्यावहारिक जीवन की मर्यादाएं होती हैं उसी तरह संवैधानिक मर्यादाएं भी होती हैं। राष्ट्रीय चिन्ह हमारे अपने ही गौरव व आत्मसम्मान के प्रतीक हैं। अमर्यादित नेताओं की आलोचना के लिए हम अपनी ही मर्यादा व सांस्कृतिक श्रद्धा पर चोट कैसे कर सकते हैं.? परिपक्वता आवश्यक है क्योंकि असीम ने जिस तरह अपरिपक्व कार्टून बनाए और उनकी गिरफ्तारी को मुद्दा बनाकर लोगों ने जिस तरह शोर मचाना शुरू कर दिया उससे लगता है राष्ट्र की युवा पीढ़ी को, जिसके कंधों पर देश के भविष्य का बोझ है, अभी काफी कुछ सीखना है।
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वासुदेव त्रिपाठी

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chaatak के द्वारा
September 13, 2012

स्नेही वासुदेव जी, आपकी पोस्ट को पढने के बाद भी मैं आपसे पूरी तरह सहमत नहीं हो पा रहा हूँ क्योंकि राष्ट्र के ये प्रतीक ना तो हमारी सहमति हैं और ना हमारी आस्था के केंद्र हम एक जिम्मेदार नागरिक की तरह सिर्फ इन्हें ढो रहे हैं| अभी मैं अपनी बात सिर्फ राष्ट्रीय चिन्ह तक ही सीमित रखता हूँ- जहाँ तक मुझे याद है इस चिन्ह पर एक हाथी, एक वृषभ, एक घोडा और एक शेर भी अंकित है| यदि ऊपर के चार शेरों की जगह एक तस्वीर में भेदिये बना देने मात्र से राष्ट्र का अपमान हो जाता है तो फिर गोवंश का वध करके बाकायदा पार्टी करना आप किस श्रेणी में रखेंगे| मैं बहुत संतुलित मूर्धन्य समालोचक या मीडिया के गुण दोष समझने वाला व्यक्ति नहीं हूँ बल्कि उसी सवा अरब भीड़ का एक गुमनाम चेहरा हूँ जिसे सोसल मीडिया के गैरजिम्मेदार और भावुक लोग होने की संज्ञा दी जाती है इसीलिए शायद आपके अच्छे तर्कों में से भी कुछ तर्कों के मैं नहीं स्वीकार कर पा रहा| इस मामले में मैं कम समझदार भीड़ में ही शामिल रहूँगा| विनम्र असहमति प्रतिक्रिया में प्रेषित है|

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 13, 2012

    चातक जी, राष्ट्र चिन्ह के लिए भले ही कुछ और समीचीन चिन्ह हो सकते थे किन्तु अभी ये हमारे राष्ट्र चिन्ह ही हैं, इनका जो भी आशय स्वीकारा गया है वह हमारी विरासत व संस्कृति को किन्ही सन्दर्भ में प्रदर्शित करते हैं.! भेडिये बनाकर उस पर राष्ट्रिय चिन्ह लिख दो तो क्या आशय है.? भेडिये हमारे राष्ट्र की संस्कृति के सूचक हैं.? यदि कहे भ्रष्ट नेताओं को प्रदर्शित किया है तो भी बचकाना है… भ्रष्टाचारी नेता न तो सवा अरब की आबादी के मूल्यों के सूचक हैं और न ही हजारों सालों की इस संस्कृति के ही..!! वैसे हमें इस पर इतनी बहस की आवश्यकता नहीं है… असीम ने इतना नहीं सोचा था… यह उनका बचकाना ढंग था जैसे बच्चे किसी पर अपना गुस्सा निकालते हैं तो उसका नाम बिगाड़कर चिढाते हैं..!! आपने गोहत्यारों की बात कही तो मैं लेख में उठाया प्रश्न ही दोहराऊंगा… एक जघन्य पाप का उदहारण देकर किसी अन्य भूल को जायज नहीं ठहराया जा सकता..!!!

yamunapathak के द्वारा
September 13, 2012

वासुदेव जी, आप के संतुलित और मर्यादित विचार इस ब्लॉग में स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं आप के ब्लॉग के साथ प्रतिक्रिया के उत्तर के स्वरुप में तर्क भी मैंने पढ़े .आपके किसी भी अच्छे ब्लॉग की तरह यह ब्लॉग भी आपकी तार्किक क्षमता और तथ्यों को विवेकपूर्ण और परिपक्व तरीके से रखने की एक मिसाल है. पुनः एक नए ब्लॉग की प्रतीक्षा में…..

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 13, 2012

    आदरणीय यमुना जी! आप गंभीरता से मेरे लेखों के लिए सतत समय देती हैं यह सुखद है| गंभीर पाठक की दृष्टि में लेख द्वारा स्वयं को संतुलित सिद्ध कर पाना लेख का प्राथमिक उद्देश्य होता है! आपकी प्रतीक्षा को शीघ्र ही तृप्त करूँ इसी विश्वास के साथ…

yogeshkumar के द्वारा
September 13, 2012

त्रिपाठी जी आपकी बातें तो सत्य है कि राष्ट्रीय चिन्हों का सम्मान होना चाहिए ..मगर इस समय स्थिति काफी बिगडती जा रही है जिस तरह से कांग्रेस देश का शासन चला रही है उसको लेकर लोगों के दिलों में काफी गुस्सा है… और वो गुस्सा इस तरह से निकल रहा है… आपने लिखा कि विरोध सवैंधानिक तरीके से होना चाहिए मगर वो सवैंधानिक तरीका भी कुछ कारगर नहीं रहा कांग्रेस कि बेशर्मी कि खाल बहुत मोटी हो गयी है ..उसपर कुछ असर नहीं हो रहा है…यहाँ देश का लाखों करोड़ रूपया बाहर पड़ा हुआ जिसमें कि बहुत बड़ा भाग कांग्रेसियों का है.. देश की फिर टूटने कि स्थिति चल रहा है… मगर कांग्रेसी हर बात को हलके में ले रहे हैं…. ये कार्टून भी एक तिलमिलाहट है… ये एक गुस्सा है… अभी मैं एक जल सत्याग्रह का आन्दोलन देख रहा था टीवी में जिसमें लोग अपनी जमीन बचाने के लिए कई दिनों से पानी के अन्दर है.. मगर कोई उनको पूछ नहीं रहा यहाँ तक की कोई नेता उनको ये नहीं समझा रहा की ये गलत या सही है… सवैंधानिक तरीके के आन्दोलन कहीं समाचार पत्र या टीवी चैनल की एक छोटी सी स्टोरी में गुम हो जाते है फिर उन्हें कोई नहीं पूछता … मुझे ये समझ नहीं आ रहा इस देश के वासी अति अहिंसा वादी या अहिंसावाद के परदे में डरपोक हैं या मरे हुए है……

    yogeshkumar के द्वारा
    September 13, 2012

    और एक बात .. राष्ट्रीय चिन्ह या राष्ट्रीय प्रतीक राष्ट्र की स्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं या अभिव्यक्त करते हैं ..क्या इस समय मूल राष्ट्रीय चिन्ह राष्ट्र को अभिव्यक्त कर रहा है?? मूल राष्ट्रीय चिन्ह में चार शेर चारों दिशाओं में देश की रक्षा कर रहे हैं… मगर ये कैसी रक्षा?? जब अन्दर के भेड़िये इसे नोच नोच कर खा रहे हैं….

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 13, 2012

    योगेश जी, मैं आपके कथन से पूर्णतः सहमत हूँ, यह आम आदमी का ही गुस्सा है और असीम का कार्टून उसी श्रेणी में है| एक परिपक्व व्यंगकार अथवा कलाकार परिपक्व तरीके अपनाता है| यही बात मैंने लेख में लिखी है और इसीलिए अंत में लिखा है कि नागरिकों को अभी परिपक्व होने की आवश्यकता है| आपने लिखा कि राष्ट्रीय चिन्ह देश की स्थिति को अभिव्यक्त करते हैं… किन्तु ऐसा नहीं है| राष्ट्रीय चिन्ह देश की संस्कृति, गौरव तथा आदर्शों व मूल्यों को अभिव्यक्त करते हैं.! देश की स्थिति तो हर ५-१० साल में बदल सकती है, किन्तु संस्कृति, गौरव, आदर्श व मूल्य क्षणभंगुर नहीं होते.!

nishamittal के द्वारा
September 12, 2012

निष्पक्ष विश्लेषण पर बधाई आपको वासुदेव जी.तथ्यात्मक प्रस्तुति.

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 12, 2012

    हार्दिक आभार आदरणीय निशा जी.!

bharodiya के द्वारा
September 12, 2012

वासुदेवभाई राष्ट्रिय चिंह बादमे आता है पहेले राष्ट्र आता है । जब राष्ट्र पर ही थू थू हो रहा हो तो राष्ट्र चिंह की क्या बात है । राष्ट्र चिंह की फिकर छोडो राष्ट्र की फिकर करो । राष्ट्र बचेगा तो हजार नये चिन्ह बन जाएंगे । चिन्ह का मोह सिर्फ अंधविश्वास है । जब आदमी जाहिल थे तब तरह तरह की राष्ट्रिय चीजें बना के रख्खी थी राजाओं ने । प्रजा को नत मस्तक बनाने, प्रजा को कंट्रोल करने । आज की प्रजा सब चालाकी जान गई है । प्रजा के लिए अब देश ही सब कुछ है ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 12, 2012

    आपकी बातों से पूर्णतः सहमत हूँ भरोदिया जी! राष्ट्र पहले आता है और निःसंदेह इस समय राष्ट्र पर थू थू हो रही है, किन्तु राष्ट्रीय चिन्हों को, जोकि हमारी संस्कृति व अतीत के गौरव के द्योतक हैं, विकृतकर अपना विरोध करें क्या इससे राष्ट्र बच जायेगा..?? विरोध और व्यंग के भद्र, संवैधानिक तरीके भी होते हैं और वे अधिक प्रभावी भी होते हैं., उदाहरण के लिए मैंने एक कार्टून लगाया भी है.! चिन्ह का मोह सिर्फ अन्धविश्वास नहीं आस्था है और राष्ट्रवाद भी तो एक आस्था ही है.. उसके लुप्त होते राष्ट्र बचाने की बात ही कहाँ रह जाएगी.? आस्था को तो प्रतीकों का आसरा होता है.!!

S N SHARMA के द्वारा
September 12, 2012

राष्टीय चिन्हो का तो खुद कांग्रेस ने मजाक बनाया हुआ है देस के झण्डे जैसा कांग्रेस का झण्डा क्यूं हर कांग्रेसी अपनी गाडी पर लगाए घूम रहा है गान्धी नेहरू इन्दिर राजीव के जन्म मृत्यु दिवस  पर करोडो के विज्ञापन क्यूं   मुसलमानो के लिए अलग कानून क्यो  कहां जाए हिन्दू  कहां है संविधान क्या इजत होगी इसकी-  प्रधान मन्त्री राष्ट्रपति के भाषण देखो क्या गरिमा है उनकी उसमे कुछ योगदान असीम ने भी डाल दिया  तो खास फर्क नहीं पडता क्योकि राष्ट्रीय अस्मिता नाम की कोई वस्तु कांग्रेस ने छोडी ही नही बस कुर्सी चाहिए धन चाहिएबाकी कुछ नही- ये मर्यादा  सिर्फ हिन्दुओ के लिए है इसका कारण भी पता चल गया है

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 12, 2012

    पाकिस्तान में तिरंगा जलाया जाता है इसलिए हम विरोध प्रदर्शन के लिए तिरंगे का विकृत चित्रण क्यों करें.? हमारा विरोध तो इसीलिए है क्योंकि हम तिरंगे का सम्मान करते हैं, सम्मान बचाने के लिए स्वयं ही अपमान नहीं कर सकते न..!! कांग्रेस जो कर रही है उसके लिए कांग्रेस पर कार्टून बनें, जो असंवैधानिक है वो रास्ता हम न चलें तब ही हमारी मर्यादा है!

ajaykumarsingh के द्वारा
September 12, 2012

आपकी बात कुछ ठीक ही है वासुदेव जी लेकिन राष्ट्र के प्रतीक से खिलवाड़ करने वाले को जेल मे डाल दीजिये किन्तु जो लोग सीधे राष्ट्र से खिलवाड़ कर रहे हैं उनको भी तो उनकी गति मिलनी चाहिये। भारत मां को डायन कहने वाला आज मंत्री पद को सुशोभित कर रहा है। देश के संसाधनों को लूटने वाले देश चला रहे हैं, देश का धन विदेश में जमा करने वालों चोरों के सरदार तिरंगा फहरा रहे हैं! और इन्ही लोगों ने असीम को ऐसे कार्टून बनाने के लिये विवश किया। क्या देशद्रोह है , क्या देश प्रेम है फिर से समझना होगा।

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 12, 2012

    एक नेता भारत माँ को डायन कहता है तो हम आलोचना करते हैं और एक व्यक्ति विरोध करने के लिए भारत माँ का गलत चित्रण कर डालता है तो हम उस चित्र का समर्थन कैसे कर सकते हैं.? मैंने कहा कि असीम का उद्देश्य गलत नहीं था अतः उस पर कड़ी कार्यवाही नहीं होनी चाहिए किन्तु नेता गलत कर रहे हैं इसलिए आप भी गलत कैसे करने लग सकते हैं..??


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