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आस्था इतनी असहनशील क्यों?

Posted On: 18 Sep, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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यमन, मिस्र, सूडान, लीबिया, यरूशलम, फिलिस्तीन, लेबनान, सोमालिआ, ट्यूनीसिया, अल्जेरिया, नाइजीरिया, कुवैत, बहरीन, कतर, जॉर्डन, इराक, ईरान, टर्की, एम्स्टर्डैम, इंडोनेशिया, मलेशिया, मालदीव, श्रीलंका, पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, मोरक्को, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और भारत! ये विश्व भूगोल के मानचित्र का शाब्दिक चित्रण नहीं बल्कि उन देशों की सूची के कुछ नाम हैं जो इस समय एक फिल्म की आग में जल रहे हैं। फिल्मों में अवास्तविक दुनिया कई काल्पनिक तरीकों से जलती दिखाई जाती है, विशेषकर हॉलीवुड फिल्मों में, किन्तु एक फिल्म के कारण वास्तविक दुनिया जल रही है, क्या यह स्वयं में विचित्र नहीं है?
अमेरिका में सैम बेसाइल नामके किसी व्यक्ति द्वारा इस्लाम पर बनाई गई फिल्म “इनोसेन्स ऑफ मुस्लिम्स” कथित रूप से इस्लाम को कैंसर के रूप में तथा पैगंबर मोहम्मद को व्यभिचारी व हिंसक रूप में चित्रित करती है। इंटरनेट पर फिल्म के सामने आने के बाद सबसे पहले लीबिया के बेंघाजी में हिंसक शुरुआत हुई जिसमें अमेरिकी दूतावास पर हुए हमले में अमेरिकी राजदूत समेत तीन अन्य अमेरिकी नागरिक मारे गए। इसके बाद से तो हिंसा आव आगजनी का जो दौर समूचे विश्व में प्रारम्भ हुआ है वह थमने का नाम नहीं ले रहा। अब तक इस हिंसा में एक दर्जन से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और यह संख्या किसी भी समय कितनी भी अधिक पहुँच सकती है।
“इनोसेन्स ऑफ मुस्लिम्स” फिल्म दो तरीके से इस्लाम के विरुद्ध ठहराई जा रही है; एक तो फिल्म में पैगंबर मोहम्मद को एक अभिनेता द्वारा चित्रित किया गया है जोकि स्वयं में इस्लाम विरोधी है, दूसरा यह कि चित्रण स्वयं में मोहम्मद साहब के व्यक्तित्व को निंदनीय ढंग से प्रस्तुत करता है। निःसन्देह एक विकसित मानव सभ्यता में किसी व्यक्ति विशेष अथवा समुदाय विशेष की आस्थाओं को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए किन्तु दूसरी ओर इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता कि एक स्वस्थ सभ्यता में आलोचनाओं व उनकी स्वीकृति के लिए पर्याप्त स्थान होना चाहिए। मोहम्मद साहब का चित्रण निश्चय ही यह मुसलमानों के लिए गैर-इस्लामी हो सकता है किन्तु ईसाइयों यहूदियों अथवा अन्य गैर-मुस्लिमों के लिए मोहम्मद साहब मात्र एक ऐतिहासिक पात्र भी हो सकते हैं जिनका वे चित्रण कर रहे हों! मुसलमान अपनी इस्लामी मान्यताएँ समूचे विश्व पर लादने की जिद कैसे कर सकते हैं.? श्रीराम अथवा कृष्ण को कितने ही लोग हिन्दुओं की मूल आस्था के विपरीत ईश्वर नहीं मानते, इसी देश में बहुसंख्यक हिन्दुओं के बीच ही देश की सरकार उच्चतम न्यायालय मे शपथपत्र देती है कि श्रीराम का कभी कोई अस्तित्व ही नहीं रहा.! क्या मात्र इतने के लिए हिन्दुओं ने लोकतान्त्रिक विरोध के अतिरिक्त दंगे हिंसा आदि का मार्ग अपनाया अथवा उन्हें अपनाना चाहिए था.? इसी प्रकार जीसस क्राइस्ट के सन्दर्भ में ईसाई धर्म की मूल मान्यता है कि वे ईश्वर के इकलौते बेटे थे और मृत्यु के बाद वे पुनः जी उठे थे, किन्तु कितने ही विद्वानों ने इसे ऐतिहासिक दृष्टि से देखा और जीसस के पुनर्जीवित होने को पुस्तकों व डॉक्युमेंट्रीज में सिरे से नकारा है। बहुचर्चित फिल्म “द विंची कोड” में जीसस के सम्पूर्ण जीवन को ही दूसरी दृष्टि से चित्रित किया गया है, क्या बहस अथवा सभ्य विरोध के अतिरिक्त इस्लामी तरीके की प्रतिक्रिया ईसाई जगत में उठी अथवा उठनी चाहिए थी.? निश्चिय ही सर्वप्रथम दोषी वह दुराग्रहवादी मानसिकता है जोकि न केवल स्वयं ही नए दृष्टिकोण को स्वीकारना नहीं चाहती वरन अपनी मानसिकता दूसरों पर भी थोपने का हठ करती है।
दूसरा प्रश्न मोहम्मद साहब के व्यक्तित्व विश्लेषण का है। हमें यहाँ भी वही मूल बात याद रखनी चाहिए कि एक मुस्लिम होकर भले ही आप मोहम्मद साहब को या फिर हिन्दू होकर राम कृष्ण को श्रद्धा के बाहर आकर देखना न चाहते हों किन्तु एक अन्य व्यक्ति के लिए वे एक मात्र ऐतिहासिक अथवा साहित्यिक पात्र भी हो सकते हैं जिनका वह श्रद्धा के चश्मे को उतारकर विश्लेषण करना चाहता हो! हम उससे असहमत हो सकते हैं, हम उसका खण्डन व आलोचना कर सकते हैं किन्तु प्रतिक्रिया के नाम पर हिंसा हत्या का नग्न नृत्य न ही विकसित सभ्यता का द्योतक है और न ही धार्मिक सहनशीलता का परिचायक.! मानवीय मनोविज्ञान को देखते हुए अधिकतम यह प्रायोगिक कहा जा सकता है कि आस्थाओं पर प्रहार से आक्रोशित व उत्तेजित मुस्लिम समाज फिल्म निर्माता की जान का दुश्मन बन जाए किन्तु मात्र इसीलिए कि फिल्म निर्माता अमेरिका में रहता है समूचे विश्व के मुसलमानों का अमेरिका को कट्टर दुश्मन के रूप में देखना, पश्चिमी दूतावासों व कम्पनियों-रेस्टोरेंट्स पर हमला, आम नागरिकों की हत्या सामुदायिक दीवालियेपन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है.!
afghan australiaइस घटना से पहले भी डेनमार्क के कार्टूनिस्ट विवाद जैसे और भी उदाहरण हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि यह स्थान विशेष अथवा देश विशेष की चिन्ता नहीं वरन विचारधारा की एक वैश्विक समस्या है। इस बात के प्रमाण है ऑस्ट्रेलिया व पश्चिमी देशों के मुसलमान.! वर्तमान विरोधों की कड़ी में पहली भयावह तस्वीर अफ़ग़ानिस्तान व दूसरी ऑस्ट्रेलिया के सिडनी की है जोकि स्पष्ट करती हैं कि किस तरह शिक्षित समृद्ध माँ-बाप रूढ़ मानसिकता के अंधे गड्ढे में अपने बच्चों को धकेल रहे हैं। अभी ऑस्ट्रेलिया में ही 8साल की एक बच्ची ने हजारों की भीड़ में “Muslims love jihad” नाम से भाषण दिया और मुसलमानों से काफिरों के खिलाफ जिहाद की अपील की। अफगानिस्तान व ऑस्ट्रेलिया के इन बच्चों की शिक्षा समृद्धि में भले ही महान अन्तर हो किन्तु मानसिकता, विचारधारा व संस्कार एक ही है। भारतीय परिदृश्य में समस्या दोगुनी गम्भीर है क्योंकि जिस तरह इस्लामी देशों की तर्ज पर चेन्नई, हैदराबाद, कश्मीर व श्रीनगर में फिल्म के तथाकथित विरोध में प्रदर्शन हुए और जिस तरह का पिछले डेन्मार्क कार्टून जैसे मामलों पर भारतीय मुसलमानों का इतिहास रहा है वह मध्यकालीन मानसिकता का वैसा ही संकुचित स्वरूप है जैसा कि अरब से अफ़ग़ानिस्तान तक समूचे इस्लामी जगत में देखने को मिलता है। अगस्त की मुम्बई के आजाद मैदान व उसके अनुसरण में देश भर में हुई हिंसक इस्लामी प्रतिक्रिया का उदाहरण भी अभी ताजा है। एक अन्य उदाहरण उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद में 14 सितंबर को हुए दंगे का है, दंगा मात्र इसलिए भड़का क्योंकि गाज़ियाबाद के एक छोटे से स्टेशन डासना पर एक मुसलमान को कुरान का फटा हुआ पेज पड़ा मिला था। प्रतिक्रिया में इकट्ठा हुई भीड़ ने 80 वाहनों समेत अन्य जनसंपत्ति को तोड़ा फोड़ा व आग लगा दी तथा पुलिस स्टेशन पर हमला बोल दिया। यह असहनशीलता की पराकाष्ठा है। कल्पना कीजिये यदि कुरान के स्थान किसी को रामायण अथवा धम्मपद के फटे पन्ने मिले होते, अधिक होता 10-20 लोगों की आलोचना सुनने को मिल जाती.!
धर्म एक सतत शोध व विकास की परम्परा है, यहाँ तक कि सदियों तक रूढ़ रही ईसाइयत, जिसने इस्लाम की ही तरह ईशनिन्दा के नाम पर न जाने कितने स्त्री-पुरुषों को निर्मम मौत मार डाला, आज अपेक्षाकृत सहनशील रूप में हमारे सामने है। पश्चिमी देशों में पदार्थवादी नास्तिक रोज न जाने कितने ही तरीकों से जीसस क्राइस्ट का अपमान करते रहते हैं। हिन्दू देवी देवताओं का अपमान, बहुधा ईसाइयों द्वारा ही, आए दिन होता रहता है, कभी चप्पलों अथवा अन्तःवस्त्रों पर उनकी फोटो बनाकर, कभी देवी-देवताओं के नाम से शराब का ब्राण्ड निकालकर, तो कभी विडियो गेम्स में हिन्दू देवी का अभद्र चित्रण कर.! “सीता सिंग्स ब्लू” नामक फिल्म भी बनाई गई और नेट पर खुले रूप से डाली गई जिसमें माँ सीता का अभद्र चित्रण किया गया था, कुछ एक ऑनलाइन विरोध याचिका आदि मर्यादित विरोध के अतिरिक्त हिन्दुओं ने कितनी बार पश्चिमी देशों के दूतावासों अथवा रेस्टोरेंट्स पर हमला किया अथवा पूरे अमेरिका से ही दुश्मनी ठानकर बैठ गए.? बड़ा ही रोचक है कि कथित इस्लाम विरोधी फिल्म के आने के बाद इस्लामी आस्था का शोर मचाने वाले कई इस्लामी लेखक ब्लॉगर वे हैं जो स्वयं हिन्दू धर्म व धर्मग्रंथों को नीचा दिखाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते रहते हैं। किन्तु कुरान हदीस आदि में युद्धबंदी औरतों को रखैल बनाने, बेंच देने, काफिरों के खिलाफ जिहाद जैसे क़ानूनों को आज भी नकारने का साहस इनमें नहीं होता.!
वस्तुतः धर्म जीवन का सम्पूर्ण दर्शन है जहां मौलिक सिद्धान्त व मौलिक दर्शन तो अपरिवर्तित रह सकता है जैसे प्रकृति के सिद्धान्त लाखों वर्षों से वैसे ही हैं किन्तु जीवन व्यवहार के कानून सदियों तक एक जैसे नहीं रह सकते क्योंकि प्रत्येक सदी नयी होती है, प्रत्येक वर्ष अलग होता है। अतः धर्म की आलोचना समालोचना धर्म की प्रथम आवश्यकता है जोकि अंधश्रद्धा से नहीं धैर्य व क्षमा से संभव है। यही कारण है कि “धृतिःक्षमा दमोंsस्त्येम्…” के भारतीय दर्शन में धैर्य को धर्म का पहला व क्षमा को दूसरा लक्षण बताया गया है। यही बात मुस्लिम बुद्धिजीवियों को मुस्लिम समाज को समझाने की महती आवश्यकता है ताकि पुराने रूढ़िवादी इस्लाम से निकलकर आधुनिक समयानुकूल इस्लाम की ओर बढ़ा जा सके और एक सहनशील शान्त सुखी इस्लामी जगत की स्थापना हो सके।
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-वासुदेव त्रिपाठी

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
September 20, 2012

 वासुदेव त्रिपाठी जी, ज्वलंत समस्या पर अत्यंत मौलिक, चिंतन-प्रधान एवं पठनीय आलेख के लिए हार्दिक बधाई व साधुवाद !

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 20, 2012

    हार्दिक आभार संतलाल जी!

yogi sarswat के द्वारा
September 20, 2012

वासुदेव जी , आपके लेखन का मैं बहुत बड़ा प्रशंशक हूँ और शायद ही आपके लेख बिना पढ़े छोड़ता हूँ ! ज्यादातर लेख , मेरे अपने विचारों से मेल खाते हैं किन्तु यहाँ कुछ अलग कहना चाहता हूँ ! कोई भी धर्म हो , उसे दूसरे धर्म का या उसके महापुरुषों का अपमान नहीं करना चाहिए ! इस्रायल के फिल्मकार ने ये गलत किया है !

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 20, 2012

    योगी जी, आपने इस लेख को थोड़ा कम समय दिया! मैंने प्रारम्भ मे ही लिखा है- “निःसन्देह एक विकसित मानव सभ्यता में किसी व्यक्ति विशेष अथवा समुदाय विशेष की आस्थाओं को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए” मेरा यही मत है, किन्तु स्वस्थ सभ्यता मे आलोचना का भी एक स्थान होना चाहिए। यदि आलोचना निंदा अथवा अपमान भी बन जाये तो भी मानव सभ्यता को इस प्रकार परिपक्व होना चाहिए कि उसका उत्तर शब्दों से व बहस से हो बम हथियारों से नहीं! और फिर एक अमेरिकी ने फिल्म बनाई उसके लिए आप जो भी अमेरिकी हाथ लगेगा उसकी जान ले लेंगे यह सभ्यता क्या मनुष्यता ही नहीं है.! अमेरिका का कानून ऐसी अभिव्यक्ति को भी कानूनी मानता है। मैंने लिखा कि न जाने कितनी बार जीसस का अपमान होता रहता है, हिन्दू धर्म के अपमान के मैंने कुछ उदाहरण दिये, तब तो वैश्विक दंगा नहीं हुआ.? इस्लाम के साथ ही ऐसा क्यों है? क्या इस्लाम को अन्य धर्मों की तरह परिपक्व व सहनशील नहीं होना चाहिए? यही इस लेख का आशय है न कि इस्लाम की आस्था पर प्रहार को सही ठहराना! इसीलिए मैंने लेख का अन्त इस आशा के साथ किया है कि बुद्धिजीवियों को आवश्यकता है कि वे धैर्य व सहनशीलता के पाठ का प्रारम्भ करें ताकि पुराने रूढ़िवादी इस्लाम से निकलकर आधुनिक समयानुकूल इस्लाम की ओर बढ़ा जा सके और एक सहनशील शान्त सुखी इस्लामी जगत की स्थापना हो सके।

    yogi sarswat के द्वारा
    September 21, 2012

    क्या इस्लाम को अन्य धर्मों की तरह परिपक्व व सहनशील नहीं होना चाहिए? ये बात हकीकत है वासुदेव जी की इस्लाम अपने आप में सबसे अलग धर्म है , कट्टरपन है वहां , किन्तु उनके अपने नियम कानून हो सकते हैं , कोई उन्हें क्यूँ चुनौती देना चाहता है ! आपने कहा – हिन्दू धर्म पर जब कोई बात आती है तो वैश्विक दंगा क्यूँ नहीं होता ? उसके अपने कारण हैं -हम संख्या में इतने ज्यादा नहीं हैं , हमने क्षेत्रफल भी इस दुनिया का बहुत कम घेरा हुआ है और सबसे बड़ी बात , हमारे घरों में बच्चों को अहिंसा का पाठ पढाया जाता है , हिंसा का नहीं ! ये हमारे धर्म की अच्छा ही है ! हम अपने आपको किसी और के कहने से या किसी और को देखकर क्यूँ बदलें ! बल्कि विश्वभर में लोग हिन्दू धर्म से सहनशीलता और अहिंसा सीख रहे हैं तब हमें और ज्यादा अपने आपको गौरवान्वित होने की जरुरत है ! इस्लाम , शुरू से ही खून्खाराबबे में लिप्त रहा है लेकिन इसका मतलब ये नहीं की हम , अगर कोई उनके महापुरुषों का अपमान करे तो उसका समर्थन करें ! ये गलत परंपरा होगी , और इसके साथ साथ इस्लाम के मानने वालों को भी ये ध्यान रखना चाहिए की वो भी और धर्मों का सम्मान करना सीखें ! आपके लिखे शब्द हमेशा आकर्षित करते हैं !

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 21, 2012

    योगी जी, आपने कहा हिन्दू कम है इसलिए दंगा नहीं होता… किन्तु भारत में तो उत्पात कर सकता था जब जब हिन्दू आस्थाओं पर प्रहार हुआ.? ईसाई तो मुसलमानों से ज्यादा है, क्यों वैश्विक दंगा नहीं करता.? कारण सीधा सा और एक ही है जो आपने बाद मे कहा- हमे अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है। क्या इसी ओर मुसलमानों को बढ़ने की आवश्यकता नहीं है.? मुसलमानों ने जो दंगे किए उनमें मुसलमान ही सर्वाधिक मरे, क्या मुसलमानों को यह नहीं समझना चाहिए.? अपमान को समर्थन तो लेख का आशय निकाला ही नहीं जा सकता, प्रारम्भ में ही मैंने स्पष्ट लिखा है कि किसी की आस्था पर प्रहार को उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेख का विषय है कि इस्लाम को सहनशीलता की ओर बढ़ना चाहिए। सहनशील इस्लाम की वकालत करना भी मुसलमानों की आस्था को चुनौती देना है? क्या सहनशील इस्लाम की वकालत में मुस्लिमों का हित नहीं है.?

Ravindra K Kapoor के द्वारा
September 18, 2012

एक बहूत ही विचारशील लेख जिसमे आपने कुछ ऐसे तथ्यों को रक्खा है जो की निसंदेह विचार करने वाले हैं पर हमें यहभी ध्यान रखना होगा कि मुस्लिम भाई बन्धु शायद अभी इतने जागरूक और सहनशील नहीं हैं कि उस मानसिकता से निकल सकें जिसने सदियों से और विशेसरूप से पिछले कुछ दशकों से उनके दिल दिमाग पर अधिकार कर रक्खा है. शायद हमारी आपकी बात एक दिन वो स्वयं समझ सकेंगे और तब भी कोई स्वपरिवर्तन संभव हो सकेगा. वासुदेवजी मैं रामायण को अंग्रेजी में एक मुक्त कविता के रूप में रखने का प्रयास कर रहा हूँ और मैं इस विषय में अपने किएगए एक अंश को Jagran Junction पर भी रक्खा है. इस विषय में मैं आपकी टिका टिपण्णी के लिए आभारी रहूँगा. सुभकामनाओं के साथ . रवीन्द्र

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 20, 2012

    रवीन्द्र जी, हमारे मुस्लिम भाई ही जागरूक और सहनशील क्यों नहीं है? यही मूल प्रश्न है जिसका उत्तर मेरे अनुसार यही है कि अंधविश्वास और कट्टरता की सभी विचारधाराओं को समय के अनुसार बदलना होगा| तभी सुख शांति का मार्ग संभव है| आपके प्रयास के लिए आपको साधुवाद, मैं अवश्य आपके ब्लॉग तक आऊंगा|

dineshaastik के द्वारा
September 18, 2012

जो है नहीं उसके नाम से जो है उनकी हत्या करना वहशीपन के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। मुहम्मद साहब निःसंदेह एक महान समाजशास्त्री थे। जंगली लोगों को संगठित करके एक राष्ट्र का सृजन उन्हें निश्चत ही महान बनाता है, उस समय वहाँ के जंगली किसी तरह के नियम एवं कानून नहीं मातने थे। अतः मुहम्मद साबह ने उन लोगों के अंदर डर उत्पन्न करने के लिये खुदा की कल्पना करके उन जंगलियों के अंदर खुदा का खौप भरा। अरब समाज को संगठित करने के लिये उन्होंने कुछ नियम  बनाये और लोगों में यह बात फैलादी कि यह खुदा का आदेश है। असभ्य, जंगली एवं अशिक्षित लोगों ने इस बात पर यकीन कर लिया। जिन्होंने उन नियमों को नहीं माना उनके लिये यह कहा गया कि खुदा का  आदेश है कि इन काफिरों का कत्ल कर दो। शायद एक राष्ट्र को संगठित करने के लिये यह अनिवार्य था। क्योंकि खुदा की कल्पना करने ही और उसका नाम लेकर ही कत्ल को जायज ठहराया जा सकता था। इसके लिये उन्हें कई लड़ाईयाँ लड़ना पड़ी। जिससे हजारों की संख्या में सैनिक मारे गये। औरतें विधवा  हो गई। समाज में अनैतिकता न फैले इसके लिये कहा गया कि पुरुष को की शादी करने का अधिकार  खुदा ने दिया है। शायद यह उस समय की परिस्थिति के अनुसार उचित था। उस समय के नियम या कानून उस समय के हिसाब से सही थे किन्तु आज के परिवेश में वह व्यर्थ हैं।कुरान एक प्राचीन सभ्यता की कानूनी पुस्तक है। अन्य धार्मिक पुस्तकें भी तत्कलीन समय की कानूनी  पुस्तकें हीं थी। जिन्हें हम अपनी अज्ञानता के कारण धार्मिक मान लेते हैं। उस समय के लिये वह अनिवार्य थी किन्तु आज के परिवेश में उनका कोई औचित्य नहीं है।जैसे कि हमारे संविधान में आरक्षण आजादी के बाद कुछ समय के लिये जरूरी था किन्तु अब वह अनावश्यक है। जो धर्म नैतिकता को त्याग दे, हिंसा का समर्थन करे, वह मानवीय कदापि नहीं हो सकता।यदि वाकई खुदा है तो क्या वह हिंसक हैं। भाई ये ईश्वर और धर्म की बातें तो मेरी समझ के परे हैं। मुझे जहाँ  भी धर्म दिखता है वहाँ अज्ञानता, अधर्म,  हिंसा, लूटपाट, भेदभाव और कुरीतियाँ ही दिखती हैं। धर्म की शराब पीने के बदले मुझे इन्द्रासन भी प्राप्त हो जाय तो मैं उसे त्याग दूँगा। यह देखकर दुखा होता है कि जब व्यक्ति इंसान न बनकर मुसलमान, हिन्दु, सिक्ख तथा ईसाई बनना बेहतर  समझता है। हम इंसान तो बन नहीं पाये और बनने चले हिन्दु या मसलमान। मानव बनना हमारी वास्तविकता है और किसी धर्म जाति का बनना कृत्रिमता्।

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 20, 2012

    आपकी बैटन से सहमत हूँ, किन्तु एक महत्वपूर्ण बात.. अरब में उस समय जंगली लोग ही बसते थे, जैसा की आपने कहा, सत्य नहीं है| अरब में कबीले होते थे और उनमें वैर झगडा भी होता था किन्तु उनकी अपनी सभ्यता संस्कृति थी| तत्कालीन अरब व्यवहार से लेकर वैश्विक व्यापार तक में एक विकसित भूभाग था| कबीले बहुदेववादी थी, इनके के अतिरिक्त ईसाई व यहूदी भी अच्छी संख्या में थे, आप देखेंगे तो कुरआन में ईसाईयों यहूदियों का बार बार उल्लेख है| जहाँ तक आज के समय का प्रश्न है धार्मिक सहनशीलता लानी ही होगी, विदेश में किसी के फिल्म अथवा कार्टून बनाने से अपने घर में उपद्रव करना और अपने ही भाइयों का जीवन नष्ट करना तो मूर्खता ही है! यही इस लेख का आशय है|

santosh kumar के द्वारा
September 18, 2012

वासुदेव जी ,..समयानुकूल सार्थक आलेख ….बहुत बधाई

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 20, 2012

    हार्दिक आभार संतोष जी!


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