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टीम अन्ना बनाम टीम केजरीवाल

Posted On: 20 Sep, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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आजादी की दूसरी लड़ाई के नारे के साथ जिस आंदोलन का श्रीगणेश हुआ था उसका अंतिम मुकाम एक विखराव होगा, अपने काम काज को ठप्प करके पूरे जोश से देश भर में तिरंगा लहराने वाले समर्थकों को संभवतः ऐसी आशा नहीं रही होगी। काफी उतार चढ़ाव देखने के बाद टीम अन्ना का अन्तिम हश्र वही हुआ जो एक दूरदर्शी नजर देख सकती थी। अन्ना ने अब यह खुले शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि वो राजनैतिक पार्टी बनाने का समर्थन नहीं करते और केजरीवाल आदि अपनी मर्जी के अनुसार निर्णय करने को स्वतन्त्र हैं किन्तु वे उनके नाम अथवा फोटो का प्रयोग आगे से नहीं कर सकते!
इस बात के स्पष्ट संकेत काफी पहले से ही मिलने लगे थे कि टीम अन्ना में दो धड़े उभर चुके थे, एक तो वह धड़ा जो अन्ना में विश्वास रखता था और दूसरा वह जो अपने अन्ना के मंच पर तो था किन्तु वो अपने रास्ते चलना चाहता था। अरविन्द केजरीवाल इसी दूसरे धड़े के मुखिया थे और मनीष सिसोदिया, दोनों भूषण, व संजय सिंह जैसे चेहरे केजरीवाल के खास सहयोगी। हाँलाकि बींच बींच में दो धड़ों का यह विभाजन थोड़ा उभर भी जाता था किन्तु फिर भी एक समय ऐसा लगने लगा था कि अन्ना पर टीम अन्ना हावी है। हिसार चुनाव जैसे कई अवसर आए जब स्पष्ट हो रहा था कि केजरीवाल गुट के निर्णय अन्ना को चाहे अनचाहे मानने पड़ रहे थे। हिसार चुनाव में चुनाव प्रचार के लिए जाना टीम अन्ना का पहला आत्मघाती निर्णय था। यदि देखा जाये तो कहीं न कहीं यह अरविन्द केजरीवाल की महत्वाकांक्षा का ही परिणाम था कि या तो वे अपनी राजनैतिक शक्ति का प्रदर्शन करना चाहते थे अथवा स्थापना.! एक सीट के चुनाव से कॉंग्रेस लोकपाल लाने के लिए विवश हो जाएगी अथवा किसी बड़े दबाब में आ जाएगी, मुझे नहीं लगता केजरीवाल इतनी छोटी सी बात नहीं समझते होंगे! अन्ना तब भी राजनीति के समर्थन में नहीं थे और उस 4 अगस्त को भी नहीं जब अरविन्द केजरीवाल ने पार्टी बनाने की घोषणा की थी। सूत्रों के अनुसार अन्ना ने तुरन्त ही मंच पर राजनीति समर्थक केजरीवाल गुट से अपना असंतोष व्यक्त कर दिया था। निश्चित रूप से अन्ना ने जो टीम बनाई थी उसे वो बिना किसी उद्देश्य सिद्ध हुए टूटते नहीं देखना चाहते थे यही कारण था कि अन्ना को कई बार अपनी आवाज़ दबानी पड़ रही थी, किन्तु टीम के एक गुट द्वारा राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं खुले रूप से व्यक्त कर देने के बाद अन्ना को शायद लगने लगा था कि अब और अधिक आवाज दबाना संभव नहीं होगा। थोड़े ही दिनों बाद टीम भंग करके अन्ना ने यह स्पष्ट भी कर दिया। टीम अन्ना आधिकारिक रूप से भले ही भंग हो गई हो किन्तु केजरीवाल गुट ने जहां आवश्यकता पड़ी अन्ना के नाम को भुनाने के प्रयास बंद नहीं किए, यह बात और है कि अपने प्रचार में टीम ने अन्ना को नेपथ्य में धकेलते हुए केजरीवाल को हाइलाइट करने की शुरुआत पहले से ही कर दी थी। केजरीवाल ने अन्ना को पार्टी बनाने के लिए भी राजी करने का पूरा प्रयास किया क्योंकि केजरीवाल यह बखूबी जानते हैं तमाम प्रचार के बाद भी अन्ना का टैग हटने के बाद उनके पास वो चमक और विश्वास नहीं रहेगा जिस पर पूरे आन्दोलन की नींव रखी गई थी। किन्तु अन्ना इस बार अटल रहे क्योंकि निश्चित रूप से यह आन्दोलन के सम्पूर्ण उद्देश्य व छवि का प्रश्न था। किरण बेदी और जस्टिस संतोष हेगड़े पहले ही अरविन्द केजरीवाल के विपरीत अन्ना के साथ खड़े थे। अन्ना द्वारा केजरीवाल खेमे को यह निर्देश अथवा चेतावनी दिया जाना कि वो अपने राजनैतिक अभियानों के लिए उनकी फोटो अथवा नाम भी प्रयोग नहीं कर सकते, इस बात को स्पष्ट करता है कि संभवतः इस घोषणा से पहले अन्ना ने केजरीवाल टीम को समझाने का भरपूर प्रयास किया होगा कि वो राजनीति में न फंसे, हाँलाकि केजरीवाल पहले कहते आए थे कि यदि अन्ना मना कराते हैं तो वो पार्टी नहीं बनाएँगे। यही बात जब पत्रकारों ने अन्ना से पूंछी तो उनका उत्तर था कि यदि ऐसा है तो पार्टी नहीं बननी चाहिए! केजरीवाल के खास सहयोगी बन चुके कुमार विश्वास ने फेसबुक पर यहाँ तक लिखा कि अन्ना ने कहा कि पार्टी बनाने व राजनीति करने वालों को वो अपने मंच पर चढ़ने भी नहीं देंगे!
अब चूंकि वह सब स्पष्ट हो चुका है जिस पर बहुत लोग पहले विश्वास नहीं कर पा रहे थे अतः अब प्रश्न यह है कि केजरीवाल अपनी राजनैतिक इच्छाओं को लेकर कितना आगे जा पाएंगे? निश्चित रूप से केजरीवाल के लिए आगे कोई सुखद संभावनाएं नहीं है। अब जबकि लोकसभा चुनाव कभी भी होने की संभावना लगातार बनी हुई है, यह निःसन्देह असंभव है कि इतने समय में केजरीवाल एक पार्टी खड़ी कर, अपने मानकों के अनुसार प्रत्याशी ढूंढकर आगे की जटिल प्रक्रियाओं व आवश्यकताओं को पूरा कर कुछ सीटें भी जीतने में सफल हो जाएंगे! एक राष्ट्रीय चुनाव और जन्तर-मन्तर के एक धरने में जमीन आसमान का अन्तर होता है। इसके बाद प्रश्न खड़ा होता है उस चेहरे का और उस विचारधारा एवं मुद्दों का जिन के बल पर चुनाव लड़ा जाता है! अब न तो केजरीवाल के पास अन्ना का चेहरा है और न कोई रणनीति! देश का चुनाव केवल जन-लोकपाल के नाम पर नहीं लड़ा जा सकता! अरविन्द केजरीवाल के पास जो चेहरे बचे हैं उनमें या तो भूषण जोड़ी है जिसके पास वकालत के पेशे अथवा कई बार राष्ट्रविरोधी बयानों के अतिरिक्त और कोई पहचान नहीं है अथवा फिर मनीष शिशोदिया या संजय सिंह जैसे लोग हैं जिन्हें टीवी पर कभी-कभार देखने वाले गिने चुने लोगों को भी शायद उनके नाम तक याद नहीं होंगे। धरातल पर यह चर्चा यहाँ तक भी ले जाने की आवश्यकता नहीं है किन्तु देखना यह होगा कि अन्ना व उनकी सलाह को किनारे करके राजनीति की जिद पकड़ने वाले केजरीवाल कितनी देर से यह हकीकत समझ पाते हैं.! फिलहाल अन्ना अपनी राह पर हैं और केजरीवाल गुट से मीटिंग के बाद उन्होने पत्रकारों से न सिर्फ अपनी पुरानी रणनीति दोहराई वरन स्वामी रामदेव व पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह के साथ बैठक करके भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी जंग जारी रखने का संदेश भी दिया। संतोषजनक यह है कि तमाम कयासों व आशंकाओं के बाद भी बाबा रामदेव राजनीति के मोह में नहीं फंसे और अब दोनों आसानी से साथ मिलकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध आगे बढ़ सकेंगे।
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-वासुदेव त्रिपाठी

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
September 24, 2012

आपका लेखन पढ़ा वासुदेव ji ! ये दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा की एक सही उद्देश्य लेकर शुरू हुआ आन्दोलन इस स्टार तक आकर ख़त्म होगा ! ये न केवल भारत के भविष्य के लिए दुर्भाग्य की बात है बल्कि भारत वासियों के मन में जो एक आशा जगी थी उसका भी भविष्य नहीं रहा है ! अरविन्द केजरीवाल की राजनीतिक इच्छा क्या रूप लेगी ये अलग बात है किन्तु इस वक्त अन्ना और अरविन्द दोनो का ही इम्तहान है ! बेहतरीन , हमेशा की तरह

shashibhushan1959 के द्वारा
September 22, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, सादर ! निश्चित रूप से परिस्थितियाँ बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बन गई हैं ! अन्ना जी की देश के प्रति समर्पण और उनकी नैतिकता संदेह से परे है ! उन्हें लम्बी लड़ाइयों का अनुभव है, पर उनकी टीम इस आन्दोलन की वृहदता को, इसकी विशालता को समझ नहीं पाई और उस नासमझी का परिणाम समस्त देश को भुगतना पड़ रहा है ! सादर !

Santlal Karun के द्वारा
September 22, 2012

वासुदेव त्रिपाठी जी, अन्ना, बाबा रामदेव और केजरीवाल पर यह आलेख अत्यन्त स्पष्ट एवं विश्लेषणात्मक है, हार्दिक साधुवाद !

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
September 22, 2012

,बहुत ही खुबसूरतआलेख के लिये बधाई हो ,,,,,,,,,,,,

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
September 22, 2012

आदरणीय त्रिपाठी जी, सादर प्रतीक्षा है मुझे. लेख hetu badhai.

nishamittal के द्वारा
September 21, 2012

वासुदेव जी,देश का दुर्भाग्य ही कहा जाए या कांग्रेस का शातिर दिमाग ,जैसे ही कांग्रेस के पैर उखड़ने के आसार दीखते है,वोपैर उखाड़ने का प्रयास करने वालों को ही कभी कोर्ट के माध्यम से तो कभी अन्य माध्यमों से झूठे सच्चे प्रचार से जनता को यह सन्देश देती है कि राजनीति में सभी एक जैसे हैं और जनता दिग्भ्रमित हो जाती है.भले ही बाद में सच कुछ और सामने आये.आज .जनता को ऐसे किसी करिश्माई नेता की जरूरत है जो अपने सहयोगियों के माध्यम से जनता को ये सन्देश दे सके कि जिन कारणों से जनता त्रस्त है,हां हाकार मचा है,उसको दूर कर कर एक ठोस विकल्प जनता को मिलेगा. केजरीवाल और अन्ना के विचारों में संभवतः असहमति प्रारम्भ से ही रही होगी परन्तु अन्ना स्वयम को उनसे अलग पहले नहीं कर पाए या यूँ कहे कि केजरीवाल ने प्रचार पाने के लिए अन्ना की लोकप्रियता का लाभ उठाया. फिलहाल ऐसी स्थितियां पीडादायक हैं क्योंकि २०१४ दूर नहीं.

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 21, 2012

    बिलकुल निशा जी! किन्तु फिलहाल अन्ना ने न केवल अपना मत स्पष्ट कर दिया है वरन साथ ही स्पष्ट भी कर दिया है आगे से केजरीवाल उनके नाम का भी प्रयोग नहीं कर सकते। मेरा मानना है कि पार्टी बनाने का निर्णय प्रयोगिक नहीं ही था, अब अन्ना की बात को किनारे करके यदि केजरीवाल राजनीति मे उतरते हैं तो निश्चित है उनकी महत्वाकांक्षाएं काम कर रही हैं। केजरीवाल अभी तक कहते आ रहे थे कि यदि अन्ना मना करते हैं तो वो अपना निर्णय बदल देंगे…. निर्णय तो उन्होने नहीं बदला लेकिन बात बदल दी., राजनीति की पहली शुरुआत..!!

Ravindra K Kapoor के द्वारा
September 21, 2012

त्रिपाठीजी आपने इस सुन्दर लेख में आपने बहूत ही सटीक और सही निष्कर्षों को निकाला है. रात अधिक होने के कारण कल में इस लेख को पूरा दुबारा पढूंगा और अपनी प्रतिक्रिया दूंगा. सुभकामनाओं के साथ …

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 21, 2012

    हार्दिक आभार आदरणीय रवीन्द्र जी.!

bharodiya के द्वारा
September 20, 2012

वासुदेवभाई नमस्कार केजरीवाल अब खतम समजो । अन्न के छातेमें था । निकल के बाहर आया । अपने कार्य कर्ताओं को केजरी टोपी पहनाई । बडी भूल की । पार्टी बनाना गलत नही था , मोदी को भ्रष्टाचारी कहा और धर्मनिर्पेक्षता का नाटक करने लगा तो मामला बिगड गया । कोंग्रेस का छुपा साथी साबित हो गया । लोगों को लोकपाल के गाजर खिलाते जाओ भाजप के वोट तोडते जाओ और आखीर में तुष्टिकरण के सिध्धांत के अनुसार हम से मिल जाओ । किरण बेदी और अन्ना ये बात जान गये हैं । अपना सिक्का खोटा निकला तो कुछ बोल भी नही पाते हैं ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 20, 2012

    भरोदिया जी, नमस्कार! पार्टी बनाना हर भारतीय का राजनैतिक अधिकार है किन्तु आदर्शवाद का गलत सहारा लेना तो जायज नहीं.! केजरीवाल ने पहले साफ़ कहा था कि वे पार्टी तभी बनायेंगे जब अन्ना की सहमति होगी, अन्ना मना करेंगे तो पार्टी बनाने का निर्णय वापस ले लूँगा.! लेकिन अब..?? किरण बेदी और अन्ना प्रायोगिक सोच सोचते हैं जबकि केजरीवाल के विषय में ऐसा नहीं लगता|

jlsingh के द्वारा
September 20, 2012

फिलहाल अन्ना अपनी राह पर हैं और केजरीवाल गुट से मीटिंग के बाद उन्होने पत्रकारों से न सिर्फ अपनी पुरानी रणनीति दोहराई वरन स्वामी रामदेव व पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह के साथ बैठक करके भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी जंग जारी रखने का संदेश भी दिया। संतोषजनक यह है कि तमाम कयासों व आशंकाओं के बाद भी बाबा रामदेव राजनीति के मोह में नहीं फंसे और अब दोनों आसानी से साथ मिलकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध आगे बढ़ सकेंगे। आदरणीय वासुदेव जी, सादर अभिवादन! आप काफी दिनों से इतिहास और पुरानों का हवाला देकर हम बर्तीयों का मान बढ़ाते रहे हैं. पर वस्तुस्थिति क्या है और आज हम किस कदर तक नीचे जा चुके हैं वह भी आप भलीभांति जानते हैं … एक विकल्प देने में हम सक्षम नहीं हैं … कांग्रेस या नेहरू परिवार की जितनी भी बुराई कर लें, जबतक विकल्प नहीं देंगे जनता का भला कौन करेगा? राजनीति और इमानदारी दो अलग अलग चीजें हैं. भाजपा में भी अंतर्कलह कम नहीं है. चुनाव की संभावना बनती दीख रही है पर अभी तक प्रधान मंत्री का उम्मीदवार और सहयोगी पार्टियों का रुख स्पष्ट नहीं दीख रहा … जनता के पास विकल्प क्या है ? वही जातिगत, धर्मगत, या भाषागत विभेद? … भविष्य बड़ा अन्धकारमय दीख रहा है. उधर शिंदे साहब कहते हैं – जनता बोफोर्स की तरह कोलगेट को भी भूल जायेगी ….. आपका आभार !

    vasudev tripathi के द्वारा
    September 20, 2012

    आदरणीय जवाहर जी, हम भारतीयों के सनातन गौरव पर किसी को शंका नहीं है, यदि आज की वस्तुस्थिति की बात की जाये तो निःसन्देह स्थिति अनुकूल नहीं है तथापि हम इतना नीचे नहीं जा चुके हैं कि उठ न सकें। गुलामी का बाद आजादी मिली तो जनता लूटी पिटी थी, गरीबी में सबसे पहले पेट दिखाता है उसी का लाभ उठाकर नेताओं ने जनता की दृष्टि को बांध दिया। अधिकांश बहुत दूर तक नहीं सोच पा रहे हैं अथवा समय नहीं है। किन्तु परिवर्तन भी कोई खेल नहीं होता जो एक दो दिनों अथवा दो तीन वर्षों मे आ जाए। अब लोगों ने सोचना आरंभ कर दिया है तो स्थिति बदलेगी भी! भावुकता से समस्या हल नहीं होती, पहले बेहतर विकल्प चुनना होगा उसके बाद पूरा खरा! हाँलाकि पूरा खरा तो कभी होता नहीं! हमे प्रयोगिक मार्ग अपनाने होंगे अन्यथा कभी यही मुलायम जी और लालू जी समाजवाद के मसीहा के रूप मे जाने जाते थे…!!! जागरूकता प्रथम आवश्यकता है।


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