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केजरीवाल का राजनैतिक भविष्य

Posted On: 14 Oct, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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अरविन्द केजरीवाल की राजनैतिक मंशाओं के संकेत काफी पहले से मिलने लगे थे जोकि जुलाई 2012 के जन्तर-मन्तर पर अनशन के आते आते सामने आ गईं। अन्ना के विशुद्ध जन-आंदोलन के माध्यम से राजनीति की जमीन तैयार करना एक सरल काम बिलकुल नहीं था क्योंकि अन्ना की छवि व उद्देश्य पूर्णतयः अराजनैतिक थे, किन्तु केजरीवाल व उनके उनके सहयोगियों ने इसमें काफी हद तक सफलता पायी भले ही बाद में अन्ना को निराश होकर केजरीवाल टीम को बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा हो। अब जबकि केजरीवाल टीम पार्टी व पार्टी के एजेंडा की भी घोषणा कर राजनीति की राह उन्होने अपने अंदाज में पकड़ चुकी है यह प्रश्न जनमानस में उठता है कि केजरीवाल की पार्टी का भविष्य व भारतीय राजनीति पर इसका दूरगामी परिणाम क्या होगा?
केजरीवाल की अभी तक अनाम पार्टी पर चर्चा के पहले हमें वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य के साथ-साथ राजनीति के मौलिक नियम व आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखना होगा। भारत में कोई भी राजनैतिक दल पहले क्षेत्रीय स्तर पर ही उभरता है तथा अधिकांश नए दलों के मुद्दे भी क्षेत्रीय भी होते हैं। कॉंग्रेस व भाजपा को छोडकर शेष राष्ट्रीय दल केवल नाम के राष्ट्रीय दल हैं। भारत का दूसरा सबसे बड़ा राजनैतिक दल भाजपा भी दक्षिण व पूर्व में लगभग शून्य की स्थिति में है, बसपा कहने को राष्ट्रीय दल है किन्तु उत्तर प्रदेश के बाहर उसका कोई खास अस्तित्व नहीं जबकि भाजपा व बसपा ने क्रमशः हिन्दुत्व एवं दलितवाद के नाम पर राजनीति प्रारम्भ की थी जोकि स्वयं में प्रभावी राष्ट्रीय मुद्दे थे। केजरीवाल के पास बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार का है किन्तु इसके अतिरिक्त उनके पास कोई और मुद्दा भी नहीं है जबकि जनता से दिल्ली की कुर्सी मांगने से पहले आपको गाँव से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों तक अपना दृष्टिकोण व रणनीति स्पष्ट करनी होती है। केजरीवाल भ्रष्टाचार के अपने इकलौते प्रभावी मुद्दे पर अपना एकाधिकार जताने का प्रयास कर रहे हैं और उन्हें अन्ना से काफी निकटता से जुड़े रहने का लाभ भी मीडिया कवरेज के रूप में मिल रहा है। किन्तु सच यह है कि आज कॉंग्रेस नीत यूपीए सरकार में एक के बाद एक कई बड़े घोटाले उजागर होने के बाद भले ही देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध वातावरण बना हुआ है किन्तु इसमें केजरीवाल का कोई विशेष योगदान हो ऐसा नहीं है। अन्ना ने भी खुद को केजरीवाल से न सिर्फ अलग ही कर लिया है वरन उनकी राजनैतिक इच्छाओं पर खेद भी जताया है। टीम केजरीवाल अब अन्ना के नाम का किसी तरह उपयोग नहीं कर सकती।
भ्रष्टाचार के भंडाफोड़ का विशेष प्रारम्भ, जिससे कि देश में एक आक्रोश पनपा, 2G मामले से हुआ और उसका श्रेय निश्चित रूप से सुब्रमण्यम स्वामी को जाता है। अन्य बड़े घोटालों को उजागर करने में मीडिया, कैग व विपक्षी दलों की ही विशेष भूमिका रही। राष्ट्रमंडल घोटालों को सामने लाने के लिए निश्चित रूप से मीडिया की सराहना करनी होगी जबकि कोयला घोटाले को सबसे पहले भाजपा के एक सांसद ने उठाया था और उसकी परतें उधेड़ने में कैग की निष्पक्षता निर्णायक रही। चूंकि जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर सरकार का निर्णायक पतन देखना चाहती थी किन्तु वर्तमान राजनीति व व्यवस्था में ऐसा संभव नहीं हो सका अतः उसका सीधा प्रभाव मुख्य विपक्षी दल होने के नाते भाजपा पर पड़ा और मीडिया सहित जनता के भी एक वर्ग में उसकी छवि कमजोर विपक्षी दल की बन गई। केजरीवाल इस माहौल का लाभ उठाने के प्रयास में आरोप की राजनीति कर रहे हैं। कोयला घोटाले पर संसद में आक्रामक भाजपा के सामने स्वयं कॉंग्रेस रक्षात्मक एवं दबाब की स्थिति में थी किन्तु केजरीवाल अपने कुछ सौ समर्थकों के साथ प्रदर्शन कर रहे थे कि “भाजपा कॉंग्रेस भाई-भाई, दोनों ने मिलकर मलाई खाई”। तभी से केजरीवाल अपने आप को भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक मात्र विकल्प दिखाने के प्रयास में मुद्दों को हाईजैक करने के लिए संघर्ष कर हैं। रॉबर्ट वाड्रा मामले में केजरीवाल अपने आप को क्रूसेडर के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं जबकि वाड्रा पर डीएलएफ़ सहित अन्य कई गंभीर आरोप भी काफी समय पहले ही सुब्रमण्यम स्वामी ने लगाए थे, हाँलाकि तब मीडिया ने उन्हें इतना महत्व नहीं दिया था। मुद्दों को हथियाने की व्यग्रता के चलते “आज तक” द्वारा “ऑपरेशन धृतराष्ट्र” चलाकर जैसे ही सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट में घोटाले के भंडाफोड़ किया गया केजरीवाल टीम वाड्रा मामले को छोडकर सलमान खुर्शीद के पीछे लग गई। इसी तरह बिजली के मुद्दे पर जिस तरह केजरीवाल नियम कानून को ताक पर रखकर दो घरों में जाकर कनैक्शन जोड़ आए जोकि बिल न देने के कारण काट दिये गए थे वो भी लोकप्रियता की राजनीति को ही स्पष्ट करता है। केजरीवाल अपने साथ मीडिया को ले जाना भी नहीं भूले। राजनीति निश्चित रूप से कोई कोई बुरी बात नहीं है किन्तु इस तरह के राजनैतिक हथकंडे कहीं न कहीं आदर्शों के खोखलेपन को ही दर्शाते हैं। यह खोखलापन पहली बार तभी सामने आ गया था जब केजरीवाल अपनी राजनैतिक मंशा को अन्ना के सर डाल रहे थे व यहाँ तक कह दिया था कि अन्ना मना करें तो हम अपना निर्णय तुरन्त बदल देंगे, जब अन्ना ने खुलकर मना किया तो केजरीवाल ने अन्ना को चुपचाप किनारे कर दिया। बयान बदलना आज की राजनीति की पहली सीख है।
भ्रष्टाचार के अतिरिक्त यदि केजरीवाल की पार्टी के अन्य मुद्दों पर गौर करें जो 2 अक्टूबर को पार्टी की घोषणा करते समय सामने रखे गए थे उनमें कुछ अवास्तविक वायदों के अतिरिक्त कुछ खास नहीं है। उनका कहना है कि अपनी पार्टी के प्रत्याशियों का चुनाव वे स्वयं नहीं बल्कि जनता करेगी। क्या केजरीवाल चुनाव से पहले अपने प्रत्याशियों को टिकट देने के लिए एक और चुनाव कराएंगे? अथवा कोई अन्य प्रयोगिक व पारदर्शी रास्ता भी है? पार्टी के ऐसे ही कुछ अन्य वायदे हैं जिनमें आदर्शों का अवास्तविक चित्रण करने का प्रयास किया गया है। कुछ अन्य मुद्दों पर केजरीवाल उसी राजनीति का हिस्सा नजर आते हैं जिनसे जनता ऊब चुकी है। जाति आधारित राजनीति को ध्यान में रखते हुए केजरीवाल ने दलितों के लिए विशेष अधिकार का राग भी अपने एजेंडे में जोड़ा है तथा तुष्टीकरण की अनिवार्यता को देखते हुए अल्पसंख्यकों को विशेष सुविधाएं देने का वायदा भी किया है। आर्थिक नीतियों पर वे अभी तक मौन हैं और जो वायदे किये है वो भी मात्र लोगों को लुभाने के तरीके अधिक प्रयोगिक कम लगते हैं। टीम केजरीवाल के अनुसार सभी आवश्यक वस्तुओं के मूल्य आम जनता तय करेगी! किस तरीके से यह संभव होगा व किस तरीके से यह अर्थव्यवस्था पर लागू होगा कहा नहीं जा सकता और कहना संभव भी नहीं है! इसके अतिरिक्त निःशुल्क शिक्षा चिकित्सा के वायदे हैं जोकि पहले से ही चल रहे हैं और उसमें कुछ भी नया नहीं है। राष्ट्रीय राजनीति में कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भारत के दावे के उलट अलगाववादी दृष्टिकोण रखने वाले प्रशान्त भूषण जैसे लोगों को भी जनता स्वीकार करेगी, ऐसा नहीं लगता।
राजनीति में वायदों व रणनीतियों के अतिरिक्त भी सबसे पहली आवश्यकता है जमीनी स्थिति समझने की। यथार्थ में केजरीवाल को अन्ना आंदोलन से जुड़े रहने के कारण भले ही मीडिया में अच्छा खासा कवरेज मिल रहा हो किन्तु फिर भी उनके किसी भी प्रदर्शन में पहुँचने वाले समर्थकों की संख्या एक हजार भी नहीं पहुँच रही है। अन्ना वाली भीड़ अब गायब हो चुकी है। केन्द्र में सरकार बनाने के लिए 272 सांसदों की आवश्यकता होती है, इतने सांसदों के लिए न तो केजरीवाल के पास दिल्ली के बाहर पूरे भारत में पहचान है और न ही तन्त्र। मीडिया भी लगातार केजरीवाल पर इतना समय भविष्य में नहीं दे पाएगी, उस स्थिति में केजरीवाल के समक्ष अपनी पहचान बनाए रखने की चुनौती होगी। दिल्ली की क्षेत्रीय राजनीति में केजरीवाल के लिए कुछ संभावनाएं अवश्य हैं और संभवतः दिल्ली विधानसभा व म्यूनिसिपल ही केजरीवाल का लक्ष्य भी है।
बाबा रामदेव के आंदोलन के समय केजरीवाल ने जिस तरह उनके मंच पर हिन्दू पहचान वाले नेताओं पर खुली आपत्ति व्यक्त की, अन्ना के आंदोलन के अराजनैतिक चेहरे के बाद भी संघ जैसे संगठनों से दूरियाँ बनाई किन्तु अहमद बुखारी के पास चलकर समर्थन मांगने गए, जन्तर-मन्तर पर संजय सिंह के माध्यम से मोदी पर उन्हें हत्यारा बताते हुए निशाना साधा गया व जिस तरह की विचारधारा से टीम केजरीवाल का संबंध है उससे स्पष्ट होता है कि धर्मनिरपेक्षता पर टीम केजरीवाल की नीति लगभग वही है जो कॉंग्रेस समेत अन्य गैर-भाजपा दलों की है। अतः यदि दिल्ली की क्षेत्रीय राजनीति से बाहर केजरीवाल 10-12 संसदीय सीटें जीतने में सफल भी हो जाते हैं तो या तो वो संसद में किसी भी छोटे दल की तरह बैठेंगे अथवा कुछ मुद्दों पर मोलभाव करके कॉंग्रेस अथवा संभावित तीसरे मोर्चे का समर्थन करेंगे। किसी भी स्थिति में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होने वाला है और न ही एक व्यापक दृष्टिकोण व ढांचे के आभाव में केजरीवाल के राजनैतिक कैरियर की बहुत विस्तृत संभावनाएं ही हैं।
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-वासुदेव त्रिपाठी

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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
October 17, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, मुझे राजनीतिक दाँव-पेंच की समझ नहीं है, पर आप के आलेख से आभास होता है कि भारतीय राजनीति के गर्भ में जहाँ केजरीवाल कुलबुला रहें हैं, जैसे वहाँ का अल्ट्रा साउण्ड आप ने कर लिया हो | मीडिया में केजरीवाल की इधर की छवियों से मुझे वे अति जिद्दी और अति संघर्षी प्रतीत होते हैं | पर कौन जाने ऊँट किस करवट बैठे — उनकी सफलता-असफलता पर अनेक प्रश्नचिह्न तों हैं ही | भारतीय राजनीति बहुत-बहुत विषाक्त जो है | इसलिए आप ने जिन संभावनाओं को रखा है, वे भी मुझे सबल ही लगती हैं | देश की राजनीतिक वैचारिकता में आप के इस योगदान के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 18, 2012

    हार्दिक आभार संतलाल जी!

R.D.Verma के द्वारा
October 17, 2012

kejriwal was basically bureaucrate and his wife is still an officer in revenue department. Though he nurtured the ambition of becoming a great politician lack of political background and inexperience are quite evident in his movement.He is experimenting a short cut method generally successful in small countries. India is too big multi ethenic, thousands castes,multilingual population, diversent geografic areas and above all multiple problems in different states.Even after 65 years there is non expect Congress could develop as national party in real sense of the term.India has seen nuber of political outfits and political leaders emersing in different region or states and have been successful only in limited areas. Developing a political party on national level appears to be next to impossible for new commers as Kejriwal. If he concentrate only on delhi state he may expect one or two M.P.got elected. In present senario he can not expect becoming Mulayam or Maya or Mamta or Sharad pawar. Time is very short for Kejriwal. Moreover he has confused public as a whole. When there is hot topic price rise -in food grains,petrol,diesel,manure,LPG and other essential commodities he was cocentrating on Jan lok pal bill.HE IS DEAF AND DUMB so far as poor persons in villlages are concerned due to price hike.He did not and could not prove the effects of corruption on price rise or he conveniently avoided. How can he garner the poor peoples vote. It is certain no one get chance to lead country without caring village population,poor population.

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 18, 2012

    Verma ji, what you wrote about political future of Mr. Kejriwal is almost same I described in article, I agree with you on the same. Definitely to establish yourself in a country like India you would have to have a broader vision and a wide public reach which kejriwal lacks. Regards…

shashibhushan1959 के द्वारा
October 17, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, सादर ! किसीके भविष्य का आकलन और विश्लेषण मैं कर सकूं, ऐसी मेरी क्षमता नहीं है, पर इस वर्तमान भ्रष्ट राजनैतिक परिवेश में एक सम्पूर्ण और सार्थक बदलाव की जो बात केजरीवाल ने उठाई है, उससे इनकार भी नहीं किया जा सकता ! आज देश की जनता के मानस में जो मंथन चल रहा है, और जो आवश्यक था, उसका प्रारंभ केजरीवाल ने मजबूती से किया इससे इनकार करना नासमझी होगी ! भविष्य में क्या होगा, क्या नहीं होगा, वह तो समय बताएगा, पर क्या मीडिया, क्या राजनेता, और क्या जनता, सभी ने वर्तमान दौर के राजनितिक परिदृश्य पर और उसकी खूबियों-खामियों पर गंभीरता से आत्म-मंथन शुरू कर दिया है, यह केजरीवाल की कमतर उपलब्धि नहीं कही जायेगी ! सादर !

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 18, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी, यद्यपि इस लेख का मुख्य विषय केजरीवाल की पार्टी के भविष्य का आंकलन ही था किन्तु फिर भी मैंने कुछ बिन्दुओं पर संक्षेप में प्रकाश डाला है| यदि तथ्य की बात करें तो जनता में जो मंथन चल रहा है वह महंगाई व UPA सरकार के एक के बाद एक बड़े घोटालों के उजागर होने से हुआ है जिसमें कि जन-आन्दोलनों ने घृतवत कार्य किया है| घोटाले एक भी केजरीवाल ने उजागर नहीं किये, हाल के जिन मामलों में उन्होंने प्रदर्शन आदि कर मीडिया में सुर्खियाँ बटोरी वो भी उनके उजागर किए हुए नहीं थे| इसे ही मैंने लेख में स्पष्ट किया है| जनांदोलन का जहाँ तक प्रश्न है उसके लिए जनता अन्ना व रामदेव से जुडी! अतः केजरीवाल के कारण वातावरण बना यह आप तथ्य के आधार पर कैसे कह सकते हैं? समस्या यह है कि हम प्रायः हाल की सरगर्मियों से इतना अधिक प्रभावित हो जाते हैं कि अतीत को व यथार्थ को को भूल जाते हैं.! लोकपाल आन्दोलन के समय जब सब अन्ना अन्नामय था तबके केजरीवाल को याद करिए जिनकी पहचान अन्ना के प्रवक्ता मात्र की थी.! अतः प्रारंभ केजरीवाल ने मजबूती से किया यह तो प्रश्न ही नहीं है, प्रारंभ को जो राजनैतिक स्वरुप केजरीवाल ने दिया उसका भविष्य क्या होगा विषय यह है और लेख में मैंने इसे ही उठाने का प्रयास किया है! ..साभार!

bhuwan19 के द्वारा
October 17, 2012

अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम के बारे में आज कुछ भी opinion बनाना बहुत मुश्किल लगता है | ये लोग जब तक अन्ना जी के मार्ग दर्शन में जन लोक पाल बिल के लिए लड़ रहे थे हम सब देशवासियों का सहयोग और सक्रिय योगदान उसमें था | तब एक लक्ष्य था और उसके लिए बिशाल जन मत का क़ुरबानी का संकल्प था | हमारे जैसे सामान्य नागरिकों को तब बड़ा धक्का लगा जब सिविल सोसाइटी का आन्दोलन अचानक समाप्त कर अन्ना और किरण बेदी को छोड़ कर सरे लोग राजनीती की तरफ लालायित होगई | इस निर्णय के दो परिणाम हुए ;- – सामान्य जन मानस में निराशा और हताशा का भाव की भविष्य में अगले बीस बर्ष तक कोई भी सिविल सोविएटी का आन्दोलन पनपने से पहले ही मर जायेगा | क्यों की उसे जनता द्वारा खाद , पानी, और हवा मुहया नहीं होगी | इसके लिए भविष्य केजरीवाल को ही जिम्मेदार मानेगी | – एक राजनितिक दल बनाकर ये भ्रीष्टाचार से लड़ना चाहते हैं | राजनितिक दल राजनीती के कीचड में ही पनपते हैं , चाहे वह कांग्रेस हो, भाजपा हो या स्वयं केजरीवाल का दल हो | ज्यादा समय नहीं लगेगा , सारा नजारा नज़र आने लगेगा |

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 18, 2012

    भुवन जी, आपका विचार यथार्थ से काफी मिलता है| निश्चित रूप से आज एक जन आन्दोलन को और अधिक जीववित रहने की आवश्यकता जिसे कि केजरीवाल की राजनैतिक इच्छाओं ने मृतप्राय कर दिया.! निश्चित रूप से आगे से जनता को उसी उत्साह के साथ जोड़ना थोडा कठिन होगा!

rahulpriyadarshi के द्वारा
October 17, 2012

मैं भी केजरीवाल के राजनीतिक दिशा और भविष्य को लेकर किसी नतीजे तक नहीं पंहुचा हूँ,उनकी राजनीतिक प्रति की विचारधारा को लेकर मैं हमेशा संशय में रहा हूँ,क्यूंकि यह तो ठीक है की वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में भ्रष्टाचार का विरोध कर थोड़ी लोकप्रियता अर्जित की जा सकती है,किन्तु ऐसा नहीं है कि केजरीवाल के पहले कोई भ्रष्टाचार का विरोध नहीं कर रहा,यह केजरीवाल नहीं थे,जिन्होंने 2G ,आदर्श,राष्ट्रमंडल,कोयला जैसे घोटालों का पर्दाफाश किया,किन्तु फिर भी एक आम इंसान मानते हुए देखा जाए तो उनका संघर्ष प्रशंसनीय रहा है,लेकिन यह तो तय है कि वो केन्द्रीय नेतृत्व देने में नाकाम रहेंगे,केजरीवाल के आने से यही हुआ है कि नीतिगत लड़ाइयाँ अब संवैधानिक तरीके से लड़ी जाने के बजाये सड़कों पर लड़ी जा रही हैं,यह कदम जनता को मानसिक संतुष्टि जरुर दे सकता है,किन्तु एक लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए ऐसी प्रवृत्ति सर्वथा अनुचित है,लोकतंत्र को भीडतंत्र में बदलते देर नहीं लगती.

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 17, 2012

    पूर्णतः सहमत हूँ राहुल भाई। यही मैंने लेख में कहने का प्रयास किया है। 2 घरों में मीडिया को साथ ले जाकर नियम कानून संविधान को दरकिनार कर बिजली कनैक्शन जोड़कर लोकप्रियता तो मिल सकती है किन्तु इससे राष्ट्रहित में हाथ कुछ नहीं लगने वाला। अरविंद केजरीवाल शुरुआत ही इस तरह से करेंगे, बिलकुल भी सुखद नहीं है।

sudhajaiswal के द्वारा
October 17, 2012

वासुदेव जी, आपने तार्किक ढंग से अपनी बात सामने रखी है, सही आकलन किया है मगर जनता असमंजस की स्थिति में है पूर्ण विश्वास किस आधार पर करें समझना मुश्किल है | अच्छे लेख के लिए बहुत बधाई |

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 17, 2012

    सुधा जी, जनता की स्थिति तो चुनाव आने पर ही समझ आएगी। हमें इंतजार करना होगा। हार्दिक आभार।

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
October 17, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, राजनीति का अर्थ तो अब जा के सही मायने में सार्थक हो रहा है…बस गोल-गोल- घुमा कर नाचते-नचाते रहों और बेवकूफ़ बनाते राहों इस जनता को…मैं ज्यादा इस मामले में नहीं कहना चाहती हूँ बस इतना कहूँगी कुछ नहीं होने वाला……| राजनीति कि राजनीतियों पर एक अच्छा विषय उठाया है आपने | बहुत-बहुत बधाई |

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 17, 2012

    धवालिमा जी, सही कहा आपने जब तक जनता बेवकूफ बनती रहेगी कुछ नहीं होने वाला..!! ..हार्दिक आभार|

munish के द्वारा
October 17, 2012

आदरणीय त्रिपाठी जी सुन्दर आकलन, वाकई में कुछ मुद्दों पर केजरीवाल से सहमत नहीं हुआ जा सकता …….. ! लेकिन राजनितिक मंशा होना या राजनैतिक मंशा के साथ कार्य करना कहाँ तक गलत है ……………. ! में केजरीवाल के राजनीति में आने का विरोधी नहीं हूँ, और मेरा तो मानना है की आप और हम जैसे लोगों को सक्रिय राजनीति में भूमिका निभानी चाहिये तभी तो आज की विकृत राजनीति का स्वरुप बदला जा सकेगा ……… ! बुराई अपने आप नहीं फैलती, अच्छाई के निष्क्रिय हो जाने पर ही फैलती है……..!

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 17, 2012

    मुनीश जी, राजनैतिक मंशाओं के संदर्भ में मैंने लेख में लिखा- “राजनीति निश्चित रूप से कोई कोई बुरी बात नहीं है किन्तु इस तरह के राजनैतिक हथकंडे कहीं न कहीं आदर्शों के खोखलेपन को ही दर्शाते हैं।” मेरा मात्र इतना मानना है कि आदर्श के नाम पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए जैसा कि मैंने लेख में कई बिन्दुओं में स्पष्ट किया है, और निष्कर्ष यह है कि केजरीवाल की पहचान मात्र मीडिया की देन है अतः केजरीवाल का राजनैतिक भविष्य बहुत दूर तक नहीं जाता..!! …साभार।

yogi sarswat के द्वारा
October 17, 2012

राजनीति में वायदों व रणनीतियों के अतिरिक्त भी सबसे पहली आवश्यकता है जमीनी स्थिति समझने की। यथार्थ में केजरीवाल को अन्ना आंदोलन से जुड़े रहने के कारण भले ही मीडिया में अच्छा खासा कवरेज मिल रहा हो किन्तु फिर भी उनके किसी भी प्रदर्शन में पहुँचने वाले समर्थकों की संख्या एक हजार भी नहीं पहुँच रही है। अन्ना वाली भीड़ अब गायब हो चुकी है। केन्द्र में सरकार बनाने के लिए 272 सांसदों की आवश्यकता होती है, इतने सांसदों के लिए न तो केजरीवाल के पास दिल्ली के बाहर पूरे भारत में पहचान है और न ही तन्त्र। मीडिया भी लगातार केजरीवाल पर इतना समय भविष्य में नहीं दे पाएगी, उस स्थिति में केजरीवाल के समक्ष अपनी पहचान बनाए रखने की चुनौती होगी। दिल्ली की क्षेत्रीय राजनीति में केजरीवाल के लिए कुछ संभावनाएं अवश्य हैं और संभवतः दिल्ली विधानसभा व म्यूनिसिपल ही केजरीवाल का लक्ष्य भी है। त्रिपाठी जी , मैं हमेशा आपको पढता आया हूँ किन्तु आज आपकी बात से सहमत नहीं हूँ ! अरविन्द ने सच कहूं तो राजनीती की परिभाषा को बदल दिया है ! ये जरूरी नहीं की देश को सही दिशा देने के लिए विधायक या मंत्री ही बना जाये किन्तु कुछ ऐसे विधेयक हैं जो तभी पूरे हो सकते हैं जब आपके पास राजनीतिक शक्ति हो ! अरविन्द राजनीतिक शक्ति बनें या न बनें किन्तु उनका आन्दोलन देश के गद्दारों की असलियत तो खोल ही रहा है !

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 17, 2012

    योगी जी, आप हमेशा मुझे पढ़ते आए हैं तो आप अवश्य परिचित होंगे कि मैं तथ्य और आंकड़ों से दूर काल्पनिक विश्लेषण नहीं करता। आपने कहा कि अरविन्द राजनीतिक शक्ति बनें या न बनें किन्तु उनका आन्दोलन देश के गद्दारों की असलियत तो खोल ही रहा है, लेकिन मैंने लेख में यही लिखा कि अरविन्द ने आज तक एक भी असलियत खोली कहाँ है? जितने भी मुद्दों पर उन्होने हँगामा किया वो दूसरों के मुद्दे थे जिन्हें उन्होने ने इस तरीके से प्रस्तुत किया जैसे वो ही संघर्ष के सूत्रधार हों.! एक एक उदाहरण लेख में देखें। और फिर आरोप लगाने से राजनीति की दिशा नहीं बदलती, केजरीवाल कितने भ्रष्टाचार के केस अदालत तक ले गए हैं.? केजरीवाल ने अपने अथवा साथियों के ऊपर लगे आरोपों का प्रतिउत्तर कभी क्यों नहीं दिया.? अतः आपने कहा कि केजरीवाल ने राजनीति की परिभाषा बदल दी है, ऐसा कुछ भी नहीं है। हँगामा से जनता उत्साहित हो जाती है, वही थोड़ा बहुत हुआ है लेकिन इतना भी नहीं कि अन्ना के बाद केजरीवाल 2-3 हजार की भीड़ भी जुटा लेते.! तथ्यों के आधार पर मुझे जैसा दिखता है वो यही है अतः इस तरह मात्र आरोप की अवसरवादी राजनीति का कोई बड़ा भविष्य नहीं है, यही लेख का निष्कर्ष है। …साभार।

rekhafbd के द्वारा
October 16, 2012

आदरणीय वासुदेव जी ,हमारे देश का हाल तो अब खुली किताब है ,ऐसे में क्या कोई विकल्प है ?जनता असमंजस की स्थिति में है ,कहीं से भी कुछ आशा नजर आती है जनता की आँखे उसे ही देखने लगती है ,शायद स्थिति में सुधार आ जाए |,आभार

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय रेखा जी, जनता अपनी इच्छा से परिवर्तन कर सकती है, कम से कम पांच साल में हर बार जनता के पास अवसर आता है| जनता कितना भ्रमित है और कितना सजग यह चुनाव आने पर देखना होगा। …साभार

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 16, 2012

फिर क्या किया जाए प्रिय वासुदेव जी, सस्नेह . राष्ट्र भ्रम की स्थिति में इस वक्त लेख हेतु बधाई.

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी, मेरे अनुसार भ्रम दो ही स्थितियों में होता है, या तो हम वस्तु स्थिति को बुद्धिमत्ता से समझ नहीं रहे अथवा हम किसी चमत्कार की आशा लगाए बैठे हैं.! इन दोनों ही स्थितियों से मुक्त हुआ जाए, यही करना है। हार्दिक आभार।

bharodiya के द्वारा
October 15, 2012

वासुदेवभाई थोडा और पिछे जाईए । अडवाणीने घोटालों के कारण और थोमस को ले कर पूरा संसद सत्र बंद कराया था । और रामदेव का भी पेरेलल चलता था । रामदेव का रामलीला का प्रोग्राम जग जाहिर था । रामदेव की सभा में श्रोतागण के बीच बैठनेवाले अन्ना अचानक जन्तर मंतर पर आ गये, रामदेव से पहले । और सब नेताओं को गालियां देने लगे, उमा भारती को भी अपने मंच पे नही आने दिया । लोकपाल की फाईलें ले के सरकार से ईलुपीलु करने लगे । फिर रामदेव का राम लीला कांड हो गया । अडवानी और भाजप को नेपथ्य में जाना पड गया । क्यों की पिक्चरें लग गई थी पिटक्लास को खूश कर देनेवाली । फिर अन्ना रामलीला पर आए । कुछ हासिल नही हुआ । काले अंग्रेज, भारत माता की जै और सब नेता चोर । पिटक्लास को खूश करनेवाले डायलोग के अलावा कुछ नही । कुछ उतार छडाव के बाद कोयला घोटाला आया । अडवाणी फीर मैदान में आये । पूरे देश में कोयला कोयला हो गया अचानक अन्ना टीम साबून ले के आ गई । सब नेता के मुह काले, आओ सब को धोता हुं । मोदी को बोल दिया तू भी भ्रष्ट । अचानक चवनी की किमत के छोटे छोटे घोटाले उजागर करने लगा । कोयला घोटाला और अडवानी को पिछे छोड दिया । कोयले घोटाले का जीक्र सिर्फ एक दो बार की किया जब भाजप को लपेटना था तब । मेरा आकलन कहता है की केजरी सिधा अमरिका के ईशारे चलता है और मिडिया भी ईस लिए ही उसे कवर करता है ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 16, 2012

    भरोदिया जी, मैं तो काफी पीछे से अपनी बात कह रहा हूँ.! मेरे दृष्टिकोण से केजरीवाल की अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं हैं, बिलकुल हो सकती हैं और हम किसी की राजनीति में आने की इच्छा का विरोध करते किन्तु सम्पूर्ण आदर्शवाद सच नहीं है और जिन रास्तों पर केजरीवाल चल रहे हैं वहाँ से सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन की बात एक नारा मात्र है.! …साभार!

jlsingh के द्वारा
October 14, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, नमस्कार! फिर उपाय क्या है? क्या भाजपा इस स्थिति में है कि अगली सरकार वह अपने दम पर बना ले …. वहां भी काफी खींच तान है … अभी गडकरी जी पर आरोप लगने वाले हैं ????? आम जनता तो आशा भरी नजरों से विकल्प की तलाश कर रही है, पर कोई भी बुद्धिजीवी वर्ग आगे नहीं आ रहा … बाबा राम देव भाजपा के वोट बैंक में कुछ वृद्धि कर सकते हैं; पर आडवाणी बनाम मोदी बनाम नितीश बनाम सुषमा स्वराज बनाम अरुण जेटली बनाम अन्यलोग नहीं खींच तान कर रहे हैं??? टीम केजरीवाल जितना कर सकते हैं करने दीजिये कांग्रेस को तो पहले हटाइए, उसकी हेंकड़ी तो बंद कीजिये … आज कांग्रेस जो चाहे कर रही है उसे रोकने वाला कोई नहीं है एक ममता कभी कभी गुर्राती है पर उसका साथ कोई नहीं देता. वह भी क्षेत्रीय दल ही है … मैं ज्यादा राजनीतिक समझ नहीं रखता, पर बदलाव अवश्य चाहता हूँ…. आपका आकलन और विश्लेषण सही है.

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 14, 2012

    आदरणीय जवाहर जी, इस लेख का उद्देश्य उपाय बताना नहीं था क्योंकि मेरे उपाय लागू नहीं हो सकते, मैं केवल वस्तु स्थिति स्पष्ट करना चाहता था। केजरीवाल कॉंग्रेस को राजनैतिक चुनौती देने की स्थिति के आस पास भी नहीं हैं.! शहरी क्षेत्रों में यदि कुछ सीटों पर वोटों का विभाजन होता भी है तो अवश्य संभव है कि 10-15 सीटें कॉंग्रेस हारती हुई जीत जाए। दूसरा भाजपा के विषय में आपने कहा, मैं भाजपा कोई कट्टर समर्थक नहीं हूँ। जनता जिसे सबल विकल्प समझेगी उसे वोट देगी। किन्तु जहां तक प्रधानमंत्री पद की बात है, सुषमा, जेटली व नितीश के नाम पर भाजपा में कोई अंदरूनी झगड़ा है ही नहीं और न ही कभी ऐसा कोई बयान आया। मीडिया अपना कयास लगाती है और वो उसका हक है। संघर्ष मोदी व आडवाणी को लेकर अवश्य दिखाई देता है किन्तु ये उनके लिए मायने रखना चाहिए जो इनमें से किसी एक लिए विशेष आग्रह रखते हों…!!! कॉंग्रेस जब तक सत्ता में है गुर्राने से कौन रोक सकता है.?? सवाल यह है कि 2014 में कौन रोकेगा…कम से कम केजरीवाल तो इस स्थिति में नहीं दिखाई देते.!

pitamberthakwani के द्वारा
October 14, 2012

वासुदेव जी आपकी फोटो से तो आपकी आयु इतनी नहीं लगती की आपका लंबा अनुभव है पार इस पोस्ट ने तो हमारी आंखे ही खोल दी! आपने इतना सुन्दर आकलन किया है की कोई भी नहीं कर सक़ता! सच में केजरीवाल के बारे मे आपने जो भविष्य वाणी की है वह मुझे तो १०१% सही लगीं!आभार के साथ!

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 14, 2012

    पीताम्बर जी, मैं अभी कॉलेज में छात्र ही हूँ किन्तु आवश्यक नहीं कि आयु सदैव अनुभव की समानुपाती हो.! कई बार जीवन थोड़े में ही अधिक अनुभव दे देता है!! आपको लेख सार्थक लगा इसकी मुझे प्रसन्नता है। हार्दिक आभार॥


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