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जीवन है शमशान मेरा

Posted On: 20 Oct, 2012 में

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प्रिय जीवन है शमशान मेरा!


प्रथम पहर में महानिशा रव

तुम बिन जीवन के सब कलरव

स्वाँग मात्र है चक्रव्यूह यह,

मैं ही पांडव मैं ही कौरव।

हृदयकोश के चरम लक्ष्य तक

अति दुष्कर है उत्थान मेरा।

प्रिय जीवन है….


स्वप्नों की छाया आघातित

हर वरदान स्वयं में श्रापित

चिर अतीत अब तक सहमा है

थकित चकित विस्मित विस्फारित।

दृढ़ विश्वास भ्रमित शंकित है,

क्या यही सत्य आख्यान मेरा?

प्रिय जीवन है…


मार्तण्ड के अंतस में तम

प्राची को हो स्वयं दिशाभ्रम

गीतों के उर में निर्जनता,

विरहग्रसित हो प्रतिक्षण संगम

तुम बिन यह मेरी परिभाषा,

तुम बिन यह उपमान मेरा।

प्रिय जीवन है….


स्मृतियों का यह आराधन

रह रहकर तेरा सम्बोधन

नहीं सत्य शाश्वत विधान है

यह विछोह यह एकल साधन।

अहो सनातन प्रकृति प्रणय हो,

शव से शिव में उत्थान मेरा।

प्रिय जीवन है…

-© वासुदेव त्रिपाठी

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 29, 2012

बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही भावनामई रचना.बहुत बधाई आपको . मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद . सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला -

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
October 28, 2012

स्वप्नों की छाया आघातित हर वरदान स्वयं में श्रापित चिर अतीत अब तक सहमा है थकित चकित विस्मित विस्फारित। दृढ़ विश्वास भ्रमित शंकित है, क्या यही सत्य आख्यान मेरा? प्रिय जीवन है… प्रिय त्रिपाठी जी अद्भुत …बहुत सुन्दर …जीवन के बिभिन्न पहलुओं और आज के हालत पर नजर डालती खुद को पहचानने को जताती ये प्यारी रचना सुन्दर शब्द विन्यास के साथ मन को छू गयी …कृपया इस तरह की रचनाएं लिखते रहें ..यादगार होंगी … बधाई भ्रमर ५

October 28, 2012

सादर नमस्कार! ……………. मैं ही पांडव मैं ही कौरव। हृदयकोश के चरम लक्ष्य तक अति दुष्कर है उत्थान मेरा। प्रिय जीवन है…………………..भौतिकवादी जगत में जीवन को सुचारू रूप से परिभाषित करती रचना…………..हम सबके सर्व श्रेष्ठ प्राणी होने पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है,,,,,,,,,,,,,,,,,

MAHIMA SHREE के द्वारा
October 27, 2012

तुम बिन जीवन के सब कलरव स्वाँग मात्र है चक्रव्यूह यह, मैं ही पांडव मैं ही कौरव। ……………………… अहो सनातन प्रकृति प्रणय हो, शव से शिव में उत्थान मेरा। नमस्कार वासुदेव जी … वाह !!!!!!!!!!!! बहुत ही उच्च कोटि की काव्य सरंचना ….. बस चमकृत कर दिया है आपने .. अति सुंदर …. ऐसे साहित्य को समृद्ध करते रहे . बहुत-२ ब्दाही आपको

वासुदेव त्रिपाठी ! प्रत्येक पंक्ति में छिपा एक गूढ़ रहस्य और उसमे प्रोयोग किये हुए सभी सार्थक शब्द ……….बहूत ही सुन्दर ही नहीं लाजबाब है |

वासुदेव त्रिपाठी प्रत्येक पंक्ति में छिपा एक गूढ़ रहस्य और उसमे प्रोयोग किये हुए सभी सार्थक शब्द ……….बहूत ही सुन्दर ही नहीं लाजबाब है |

ANAND PRAVIN के द्वारा
October 23, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, सादर नमस्कार शब्द बहुत बड़ी चीज है…….किन्तु जब किसी रचना को संबोधित करने के लिए शब्द भी छोटे पड़ने लगे तब आप समझ सकते हैं की वाकई में उस रचना में क्या रचनात्मकता छुपी होगी …….मैं यह दावा तो नहीं करता किन्तु इतना अवस्य कह सकता हूँ की यह रचना इतनी अद्भुत है की बड़े से बड़ा विख्याता भी आपके रचना के सामने नतमस्तक हो जाए…………अति सुन्दर और प्रेरणादायक………………..आपके ब्लॉग पर आ कर अत्यंत प्रसन्ता हुई…………………..सदेव यह धार बनी रहे

Madhur Bhardwaj के द्वारा
October 23, 2012

भाई वासुदेव जी सादर, भई वाह गज़ब लिखते हैं…. क्या कहूँ, मेरे पास वो शब्द ही नहीं है कि मैं कुछ कह सकूँ ! फिर भी शानदार प्रस्तुति जरूर कहूँगा! थकित चकित विस्मित विस्फारित। दृढ़ विश्वास भ्रमित शंकित है, क्या यही सत्य आख्यान मेरा? प्रिय जीवन है… एक उम्दा काव्य के लेखन हेतु सादर बधाई स्वीकार करें! भाई कभी समय निकलकर अपने इस भाई का भी मार्गदर्शन करें! मधुर भारद्वाज WASTAV ME SUCH TO YEHI HAI JANAB http://madhurbhardwaj.jagranjunction.com

shalinikaushik के द्वारा
October 22, 2012
rekhafbd के द्वारा
October 22, 2012

वासुदेव जी ,सादर नमस्ते स्मृतियों का यह आराधन रह रहकर तेरा सम्बोधन नहीं सत्य शाश्वत विधान है यह विछोह यह एकल साधन। अहो सनातन प्रकृति प्रणय हो,अति सुंदर अभिव्यक्ति ,हार्दिक बधाई शव से शिव में उत्थान मेरा।

jlsingh के द्वारा
October 22, 2012

आदरनीय वासुदेव जी, नमस्कार! मैं क्या प्रतिक्रिया दूं… यही कह सकता हूँ किइस कविता के माध्यम से आपके व्यक्तित्व का दूसरा पहलू भी आलोकित होता है जो अभी तक निशा के तम में छिपा था अब उदित सूर्य के समान मनोहर दृष्टिगोचर हो रहा है! आपको ढेर सारी बधाई पर श्मशान में नहीं, जीवन के पटल पर!

yatindranathchaturvedi के द्वारा
October 22, 2012

बेहतर! स्वागत है!_____शमशानों पर भी, जीवन रोज जिया जाता।

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 22, 2012

मार्तण्ड के अंतस में तम प्राची को हो स्वयं दिशाभ्रम गीतों के उर में निर्जनता, विरहग्रसित हो प्रतिक्षण संगम तुम बिन यह मेरी परिभाषा, तुम बिन यह उपमान मेरा। प्रिय जीवन है…. प्रिय वासुदेव जी, सस्नेह रचना सुन्दर भाव सुन्दर पढ़ के लगता मुझको डर शव से शिव में उत्थान हो उत्थान तेरा कंटक चुन पथ प्रशस्त कर चूर हो न कभी स्वाभिमान तेरा. बधाई.

yamunapathak के द्वारा
October 22, 2012

वासुदेव जी गद्य की विधा में आपके चिंतन को हम सब ने सराहा है पर काव्य भी आप लिखते हैं इसका इल्म न था. शब्द बहुत ही सुन्दर हैं.भाव बहुत प्रतीकात्मक हैं . प्रथम पहर में महानिशा रव तुम बिन जीवन के सब कलरव स्वाँग मात्र है चक्रव्यूह यह, मैं ही पांडव मैं ही कौरव। हृदयकोश के चरम लक्ष्य तक अति दुष्कर है उत्थान मेरा। प्रिय जीवन है…. मैं ही पांडव मैं ही कौरव में अंतर्द्वंद की जो झलक है वह प्रत्येक इंसान महसूस करता है.बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति है साभार

Alka Gupta के द्वारा
October 22, 2012

वासुदेव जी , आपके आलेख तो पढ़ती ही हूँ पर बहुत दिनों बाद काव्य रचना को पढ़ा अभिभूत हो गयी …….. रचना में गुह्य भाव हृदय पर अंकित से हो गए…. मैं बस इतना ही कहूँगी ..अति उत्तम शब्दों से सुसज्जित अप्रतिम उत्कृष्ट काव्य कृति ! साभार

Santlal Karun के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, एक इकार मात्र की हीनता जीवन को भी शवता के लिए विवश किए रहती है,किन्तु इकार हीन शिव को अपना मन इतना छोटा भी नहीं करना चाहिए | आखिर जब शिवा को निहारा ही है, तो प्रबल एकनिष्ठता तो “उत्त्थान” लेकर आयेगी ही आयेगी | हाँ, विरह संयोग का ही रूप है, संयोग का तप है, इसलिए एकल साधन की साधना का सात्विक मार्ग ही श्रेयकर है | फिर भी मनोव्यथा से अनुस्यूत इस कविता के लिए हार्दिक साधुवाद एवं हृदयकोश के उत्तुंग शिखर पर शिवत्व की शीघ्र प्राप्ति के लिए मेरी ओर से ढेरों शुभ कामनाएँ !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय वासुदेव जी, सादर ! अद्भुत ! बहुत समय बाद इतनी नायब रचना के अवलोकन का सौभाग्य मिला ! यह रचना कहीं और प्रकाशित हुई है क्या ? न जाने क्यों लगता है यह रचना पहले भी मैं पढ़ चुका हूँ ! बहुत सुन्दर ! अद्भुत भाव ! बेजोड़ शब्द ! त्रुटिहीन ! प्रवाहमय ! हार्दिक बधाई !

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 21, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी, मैं कभी अपनी काव्य रचनाओं को कहीं प्रकाशित नहीं करता, यह कविता जिस दिन यहाँ डाली उसी दिन लिखी थी, यदि अगला दिन हो जाता तो संभवतः यहाँ भी प्रकाशित नहीं होती… अतः इस कविता को आपने पहले कहीं पढ़ा हो इसकी संभावना नहीं है। हार्दिक आभार।


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