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आतंक के पैरोकार

Posted On: 15 Feb, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Afzal Guruकल्पना करिए कि 2 मई 2011 को जब अमेरिका ने एक दशक के प्रयासों व संघर्ष के बाद अमेरिकी सम्मान के प्रतीक ‘वर्ल्ड ट्रेड टावर’ पर हमले के सूत्रधार ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के ऐबटाबाद में घुसकर मार गिराया था और जिस तरह से उसकी लाश को समुद्र में बहा दिया था, उस पर यदि अमेरिका में किसी समुदाय अथवा विचाधारा के तथाकथित ठेकेदार मानवाधिकार अथवा किसी अन्य अधिकार के नाम पर बयानबाजी, विरोधप्रदर्शन या दुआ-प्रार्थना करते तो अमेरिका की ऐसे लोगों के प्रति प्रतिक्रिया क्या होती?

अमेरिका विश्व का सबसे पुराना लोकतन्त्र कहा जाता है और आधुनिक लोकतन्त्र का जन्मदाता भी! किन्तु कहने की आवश्यकता नहीं कि लोकतन्त्र के नाम पर अमेरिका ओसामा के लिए दुआ पढ़ने व रैली निकालने की अनुमति नहीं देता, न ही विश्व का अन्य कोई लोकतन्त्र! किन्तु भारत में जब सात साल की मशक्कत के बाद भारतीय लोकतन्त्र के प्रतीक संसद पर हमले के सूत्रधार आतंकी अफजल गुरु को फांसी होती है तो लोकतन्त्र के नाम पर ही उसकी वकालत करने वाले खुले आम उतर पड़ते हैं.! कितना विचित्र होता है जब जेहादी आतंकवाद में पला-बढ़ा और उसकी विषबेल को सींचने वाला अलगाववादी यासीन मलिक पाकिस्तान जैसे देश में, जहां सेना व आईएसएआई के पंजों में छटपटाता लोकतन्त्र रोज पचासों शियाओं अथवा अल्पसंख्यकों के बहते खून का गवाह बनता है, हाफिज़ सईद जैसे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी से सीना जोड़कर कहता है कि अफजल की फांसी भारत के लोकतन्त्र पर एक धब्बा है.! उसी यासीन मलिक की पूंछ थामकर कश्मीर में उपद्रवियों की बेकाबू भीड़ भड़क उठती है और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बेधड़क अफजल के लिए नमाज़ अदा की जाती है.! देश में एक आतंकी के लिए यह इश्क अलगाववादी अथवा जेहादी मानसिकता तक ही सीमित नहीं है, दिल्ली के जंतर-मंतर पर जेएनयू डीयू आदि के कई वामपंथी संगठन भी इस फांसी के विरोध भारतीय न्याय-व्यवस्था व तंत्र को शर्म करने का नारा बुलंद करते हैं तथा “हम भी अफजल हैं” की तख्तियाँ लहराते हैं.!

अमेरिका में आतंकियों के सक्रिय अथवा वैचारिक समर्थकों को ढूंढ निकालने के लिए अमेरिकी एजेंसियां संदेहास्पद व्यक्तिओं के व्यक्तिगत जीवन तक घुस जाती हैं जैसा की एक अमेरीकन पुलिस कमिश्नर रेमंड केली ने स्वयं स्वीकारा था किन्तु भारत में यह सब सरकार की नाक के नीचे होता है! क्या यह स्पष्ट नहीं करता कि भारत विरोधी मानसिकता की विषवेल काफी गहरे तक फैल चुकी है और हमने ही इसे फैलने का खुला अवसर दिया है?

लोकतन्त्र की संकल्पना का प्राथमिक व चरम उद्देश्य है- राष्ट्र के समस्त नागरिकों की भागीदारी के साथ अंतर व बाह्य परिसंकटों से उनकी सुरक्षा निर्धारित करते हुए सम्पूर्ण संप्रभुतात्मक राष्ट्र का विकास। ऐसे में यदि किसी प्रकार की अव्यवस्था से बचने के लिए अफजल गुरु की दया याचिका अस्वीकृत होने की पूर्वघोषणा न करते हुए गोपनीयता पूर्वक फांसी दे दी जाती है तो इसमें लोकतन्त्र अथवा मानवाधिकार का शोर क्यों मचाया जाना चाहिए? जिनके अनुसार अफजल को ट्रायल कोर्ट, हाइकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका, राष्ट्रपति के पास दयायाचिका के बाद भी एक और अवसर मिलना चाहिए था, उन्हें लगता है कि आतंक के गुरु को किसी भी हाल में जिंदा रहना चाहिए था! जहां तक कानूनी अधिकार का विषय है तो कानून अपराध की गंभीरता के अनुसार काम करता है, अपराध की गंभीरता व प्रकार के अनुरूप परिवर्तनशील कानून ही परिपक्व हो सकता है। विशेष मामलों के लिए विशेष अदालत अथवा शीघ्र निस्तारण अदालतें बनाए जाने की आवश्यकता भी इसीलिए होती है। अतः अफजल जैसे आतंकवादी को सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था से गुजरने के बाद भी और अधिक अवसर मिलना चाहिए था, इस बात का कोई प्रयोगिक अर्थ नहीं है। वास्तव में मानवाधिकार के नाम पर ऐसी मांग करने वाले भी भलीभाँति जानते हैं कि जिस जघन्य अपराध में अफजल गुरू दोषी सिद्ध हुआ था उसके लिए भारतीय न्याय व्यवस्था में फांसी की सजा को टाला ही नहीं जा सकता था, वे अपनी वैचारिक अथवा भावनात्मक आकांक्षा के चलते मात्र मामले को टालना चाहते थे। यदि इन अफजल समर्थकों अथवा वामपंथियों का आग्रह न्याय को लेकर ही है तो इन्होंने सात साल से गृहमंत्रालय के पास लटकी दया याचिका के शीघ्र निस्तारण की आवाज बुलंद क्यों नहीं की? शायद यह ये भलीभाँति जानते थे कि, जब भी होगा, क्या निर्णय होगा!

शहीद सैनिकों अथवा उनके परिजनों के मानवाधिकार पर आँखें मूंदने वाले तथाकथित मानवाधिकारवादी मानवाधिकार के जिस विकृत स्वरूप का दुराग्रह करते हैं वह केवल आतंकवादियों एवं नक्सलियों की वकालत में ही मुखर होता है, कश्मीरी पण्डितों से लेकर दंतेवाड़ा के शहीदों तक यह मानवाधिकार लकवाग्रस्त व चेष्टाहीन बना रहता है। यदि इन मानवाधिकारियों के तर्क को आधार माना जाए तो संसद पर हमले के समय मारे गए पाँच आतंकवादियों तथा 26/11 के आतंकी अजमल कसाब के मानवाधिकार का भी हनन किया गया! तय मानिए यदि कसाब हाथ में बंदूक लिए सरेआम न पकड़ा गया होता तो इस देश में उसके लिए भी हमदर्दों की एक बड़ी फौज खड़ी हो गयी होती! हाँलाकि केरल में फिर भी कुछ लोग उसके लिए दुआ पढ़ने के लिए निकल ही आए! किन्तु छत्तीसगढ़, झारखंड अथवा कश्मीर में मरने वाले सैनिकों पर ठीक से अखबारों में खबर भी नहीं बन पाती! यदि आंकड़ों के आधार पर बात करें तो साउथ एशिया टेररिज़्म पोर्टल संस्था के अनुसार 1988 से जनवरी 2013 तक कश्मीर में, अफजल भी जहां की पैदावार था, 14656 नागरिक व 6033 सैनिक आतंकवाद के शिकार होकर अपनी जान गंवा चुके हैं। वहीं वामपंथ आतंकवाद के लाल शिकंजे में 2005 से अब तक 2459 नागरिकों व 1543 सुरक्षाबलों की जान जा चुकी है। दुर्भाग्य व आश्चर्य यह है कि कभी इनके मानवाधिकार की बात करने वाले सामने नहीं आते!

समस्या की जड़ जितनी अधिक अतिवादी विचारधारा में निहित है उतनी ही लचर व अवसरवादी राजनीति में! तुष्टीकरण और विभाजन की राजनीति की इससे अधिक चरमसीमा और क्या होगी कि जिस आतंकी अफजल के निशाने पर संसद में बैठे नेता थे, वही नेता अफजल की फांसी को सात साल तक टाँगे रहे, और जब देश के दबाब में फांसी का फैसला लेना ही पड़ा तो भी अफजल के लिए आँसू बहाने से नहीं चूके! कश्मीर में उमर अब्दुल्ला व महबूबा मुफ़्ती अलगाववादियों के साथ अफजल पर शोक मानते व भारत सरकार की आलोचना करते नजर आए, सीपीएम व सीपीआई ने फैसले की निंदा की और कॉंग्रेस के मणिशंकर अइयर ने फांसी को दुखद बताया! ऐसे में क्या यह स्पष्ट नहीं होता कि लोकतन्त्र के नायक ही लोकतन्त्र के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में कार्य कर रहे हैं? क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि इन राजनैतिक दलों अथवा नेताओं की न ही भारत की अखंडता में कोई आस्था है और न ही लोकतान्त्रिक न्याय व्यवस्था में कोई विश्वास?

जिस अफजल गुरु के लिए अलगाववादी अपनी छाती कूटते हैं, पाकिस्तान जिसका समर्थन करता है, मोस्ट वांटेड आतंकी हाफिज़ सईद जिसके लिए इस्लामाबाद में सभा करता है और लश्कर-ए-तैयबा व जैश-ए-मोहम्मद जिसकी मौत का भारत से बदला लेने के लिए इस्लामाबाद में इकट्ठा होकर कसम खाते हैं, उसी अफजल गुरु के रहनुमा यदि भारत की राजनैतिक पार्टियों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में बैठे हैं तो निश्चित रूप से हमें मानना पड़ेगा कि आतंकवाद के जहरीले जाल की जकड़न से अभी हम मुक्त होने की स्थिति में नहीं हैं! पाकिस्तान में इकट्ठा हुए कश्मीरी अलगाववादियों व पाकिस्तानी आतंकियों का यह कहना कि अफजल की फांसी भारत के काम नहीं आएगी, संभवतः सही ही है क्योंकि भारत में आतंक के पैरोकारों के स्वर बुलंद हैं किन्तु सरकार हाफिज़ सईद से मुंहजोड़ इश्क़ करके आने वाले यासीन मालिक के लिए लड़खड़ाती जुबान में बस इतना कहने की हिम्मत जुटा पाती है कि हम मामले में गौर करेंगे.!!

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-वासुदेव त्रिपाठी



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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

prashant choubey के द्वारा
May 16, 2013

यह भारत का दुर्भाग्य है कि यहाँ अलगाववादी खुलेआम घूमते है।

JJ Blog के द्वारा
February 20, 2013

आदरणीय वासुदेव त्रिपाठी जी आपका ब्लॉग “आतंक के पैरोकार” नाम से दिनॉक 19 फरवरी 2013 को दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है. इस हेतु आपके पास सूचना आपकी मेल आई डी पर भेजी जा चुकी है. मंच की तरफ से आपको हार्दिक बधाइयां धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

yogi sarswat के द्वारा
February 19, 2013

वास्तव में मानवाधिकार के नाम पर ऐसी मांग करने वाले भी भलीभाँति जानते हैं कि जिस जघन्य अपराध में अफजल गुरू दोषी सिद्ध हुआ था उसके लिए भारतीय न्याय व्यवस्था में फांसी की सजा को टाला ही नहीं जा सकता था, वे अपनी वैचारिक अथवा भावनात्मक आकांक्षा के चलते मात्र मामले को टालना चाहते थे। यदि इन अफजल समर्थकों अथवा वामपंथियों का आग्रह न्याय को लेकर ही है तो इन्होंने सात साल से गृहमंत्रालय के पास लटकी दया याचिका के शीघ्र निस्तारण की आवाज बुलंद क्यों नहीं की? शायद यह ये भलीभाँति जानते थे कि, जब भी होगा, क्या निर्णय होगा! अब हम इतने कमजोर नहीं रहे हैं ! मैं शायद आपकी बात से असहमत होने की कोशिश कर रहा हूँ त्रिपाठी जी ! हर देश की अपनी एक व्यवस्था और अपनी एक खासियत होती है ! आप जिस देरी को कमजोरी मान रहे हैं वाही हमारी ताकत भी तो है ! हम खुद को मानवता का इतना बड़ा दुश्मन नहीं होने देना चाहते इसलिए अगर किसी ने अपराध किया है तो उसे उसकी सज़ा अवश्य मिले लेकिन उसके साथ भी एक आम इंसान की तरह न्याय की प्रक्रिया चलनी चाहिए !

    vasudev tripathi के द्वारा
    February 19, 2013

    मैं आपके तर्क को समझा नहीं आदरणीय योगेन्द्र जी.! न्याय में देरी को स्वाभाविक व न्यायिक दृष्टि से व्यवस्था की खामी माना जाता है, वह ताकत कैसे हो सकती है.! हमारे देश में इस देरी का परिणाम है कि यदि सभी अदालतें 24×7 काम करने में जुट जाएँ तो लम्बित मामलों में न्याय मिलने में 400 साल लग जाएंगे.! दुनिया के सभी देशों में कुछ सप्ताह अथवा माह में न्याय आ जाता है, हम भी कई समितियों विशेषज्ञों की अनुशंसाओं के बाद सुधार करने का प्रयास कर रहे हैं, फास्ट ट्रैक अदालतें इसीलिए तो खोली जा रही हैं.?? विशेष मुकदमों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाता है…. अफजल कि बात करें तो उसके मुकदमे को गृहमंत्रालय से राष्ट्रपति तक जाने व राष्ट्रपति द्वारा खारिज किए जाने में 13 दिन और कुल 14 दिन लगे। जो काम (पूरी न्याय प्रक्रिया) 14 दिन में हो सकता है उसे 7 साल तक लटकाए रखने में हमारी कौन सी ताकत सिद्ध होगी, यह मुझे समझ नहीं आया.!

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
February 18, 2013

तुष्टीकरण और विभाजन की राजनीति की इससे अधिक चरमसीमा और क्या होगी कि जिस आतंकी अफजल के निशाने पर संसद में बैठे नेता थे, वही नेता अफजल की फांसी को सात साल तक टाँगे रहे, और जब देश के दबाब में फांसी का फैसला लेना ही पड़ा तो भी अफजल के लिए आँसू बहाने से नहीं चूके! प्रिय वासुदेव जी आप के लेख का एक एक शब्द सोचने पर विवश करता है ….व्यंग्य से भरा ..सामजिक राजनितिक चित्रण ….आंकड़े देख मन खीझ जाता है ..विचारणीय आलेख भ्रमर ५

    vasudev tripathi के द्वारा
    February 19, 2013

    सुरेन्द्र जी, जब राजनैतिक स्वार्थ न्याय व्यवस्था व देश की नीति को पंगु करें तो मन का खीजना स्वाभाविक है। हार्दिक आभार॥

atharvavedamanoj के द्वारा
February 18, 2013

प्रिय वासुदेव भाई सादर वंदे मातरम…हाफिज सईद और यासीन मलिक जैसे आतंकवादी नेता कंधार में अपहृत विमान में अनपेक्षित ढंग से दिखायी गई राजनैतिक नरमी की उपज हैं यदि उन्हें तब ही कुचल दिया गया होता तो स्थितियां आज इतनी विकट न होती..इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध दृढता से बोलने वाला अब कोई नहीं रहा…मुर्दे लोगों में प्राण फूंक देने वाला एक बेहतरीन आलेख..बधाइयाँ

    vasudev tripathi के द्वारा
    February 18, 2013

    आतंकवादियों के खिलाफ नरमी से पेश आना उनके दुस्साहस को सदैव निमंत्रण देना है। इसे बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।! हार्दिक आभार मनोज भाई॥

आर.एन. शाही के द्वारा
February 18, 2013

हमेशा की तरह बेहतरीन प्रस्तुति वासुदेव जी । अमेरिका ने तो उस दुश्मन को मरणोपरांत इस लायक छोड़ा ही नहीं कि उसकी हवा भी किसी को लगे, या सियासत कर सके, मज़ार बना सके और वहाँ हर वर्ष याद में मेले लगवाने की व्यवस्था कर सके । लेकिन हमारे नपुंसक योजनाकारों ने विदेशी कसाब की तरह ही उस गद्दार को भी जेल में ही मिट्टी दिलवाकर अपने गले में मरा साँप लटकाकर घूमने जैसी नादानी दिखाई है, तो देश को थोड़ा भुगतना तो पड़ेगा ही । धन्यवाद ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    February 18, 2013

    सही कहा आपने शाही जी, और वैसे जिंदा साँप मरा साँप लटकाकर घूमता है तो और भी विचित्र लगता है..!! :) …साभार.!!

alkargupta1 के द्वारा
February 16, 2013

वासुदेव जी , कुव्यवस्था पर बहुत अच्छा विश्लेषण किया है अर्थपूर्ण आलेख

    vasudev tripathi के द्वारा
    February 18, 2013

    हािर्दक आभार आदरणीय अल्का जी.!

Santlal Karun के द्वारा
February 15, 2013

आदरणीय वासुदेव जी, अफजल गुरू की फाँसी के समर्थन में छिट-पुट उठे बेईमान आतंकी स्वरों पर उचित और भरपूर ठोकरें मारता बेहद तार्किक लेख प्रस्तुत कर आप ने अपेक्षित तात्कालिक माँग तो पूरी की ही है, साथ ही कमजोर नेतृत्व के चलते देश की कमजोर लोकतांत्रिक विचारशीलता को बल भी प्रदान किया है | इतना ही नहीं, आगे बढ़कर आप का आकलन भी कितना सही है — “जिस अफजल गुरु के लिए अलगाववादी अपनी छाती कूटते हैं, पाकिस्तान जिसका समर्थन करता है, मोस्ट वांटेड आतंकी हाफिज़ सईद जिसके लिए इस्लामाबाद में सभा करता है और लश्कर-ए-तैयबा व जैश-ए-मोहम्मद जिसकी मौत का भारत से बदला लेने के लिए इस्लामाबाद में इकट्ठा होकर कसम खाते हैं, उसी अफजल गुरु के रहनुमा यदि भारत की राजनैतिक पार्टियों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में बैठे हैं तो निश्चित रूप से हमें मानना पड़ेगा कि आतंकवाद के जहरीले जाल की जकड़न से अभी हम मुक्त होने की स्थिति में नहीं हैं!” ऐसे तीखे किन्तु स्वस्थ वैचारिक आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्द्भावानाएँ !

    vasudev tripathi के द्वारा
    February 18, 2013

    हार्दिक आभार संतलाल जी।

shashibhushan1959 के द्वारा
February 15, 2013

आदरणीय वासुदेव जी, सादर ! ऐसी बातें सिर्फ हमारे नेताओं की घातक चालों का परिणाम है ! वरना क्या हाफिज सईद, और क्या यासीन मालिक ! कीड़े-मकोड़ों की हैसियत रखने वाले ये तुच्छ आज सम्पूर्ण देश को अस्त- व्यस्त किये हुए हैं ! बहुत सटीक विश्लेषण ! सादर !

    vasudev tripathi के द्वारा
    February 18, 2013

    बिलकुल सही कहा शशिभूषण जी.! एक विशाल राष्ट्र के सामने चंद आतंकवादियों की स्थिति कीड़ों से ज्यादा कुछ भी नहीं यदि हम इच्छाशक्ति दिखाएँ.! हार्दिक आभार।

nishamittal के द्वारा
February 15, 2013

वासुदेव जी एक करारी चोट उस व्यवस्था पर जो अंध, मूक, बधिर बनी है जान बूझ कर ये जानते हुए भी कि उनके द्वारा वही स्थिति उत्पन्न की जा रही है जिस डाल पर बैठना उसी को काटना.गड्ढा खोदना अपने लिए. अमेरिका तथा अन्य पाश्चात्य देश अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर किसी भी सीमा तक हस्तक्षेप कर सकते हैं जबकि हमारे यहाँ हर बात पर मानवाधिकार का रोना रोते हैं,ये दोहरे मापदंड !

    vasudev tripathi के द्वारा
    February 18, 2013

    बिलकुल सही कहा आपने, दोहरे मापदंड ही हमारी नियति बन गए हैं! हार्दिक धन्यवाद|


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