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मोदी बनाम सेकुलरिज़्म का घमासान

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सेकुलरिज़्म शब्द भारतीय संविधान का जन्मजात हिस्सा नहीं है। सेकुलरिज़्म शब्द को 1976 में 42वें संशोधन के द्वारा संविधान में सम्मिलित किया गया था किन्तु अपने मूल अर्थ से अलग भारतीय स्वीकृति में सेकुलरिज़्म राज्य के लिए “सर्वधर्म समभाव” के आदर्श के रूप में ही ग्रहण किया गया था। कुछ हद तक संविधान का अनुच्छेद 15 इसी आशय की पुष्टि करता है। किन्तु आज वास्तविक स्थिति बदल चुकी है, सेकुलरिज़्म आज भारतीय राजनीति का सबसे प्रचलित व अवसरवादी शब्द बन चुका है। जब एफ़डीआई जैसे विशुद्ध आर्थिक व नीतिगत मामले में सपा बसपा जैसे दल अपनी कथनी और करनी के बींच की खाईं को सेकुलरिज़्म की चादर से ढँकते नजर आते हैं तब सेकुलरिज़्म के वर्तमान स्वरूप और राजनैतिक उद्देश्य पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक हो जाता है.!

भ्रष्टाचार के एक के बाद एक विस्फोटों, आर्थिक बदहाली, महंगाई व सुरक्षा संकटों के बींच यूपीए-2 के पूर्ण असफल कार्यकाल में सेकुलरिज़्म शब्द की अवसरवादी प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ गई है। जहां एक ओर किसी भी प्रकार अपने कार्यकाल को पूरा करने के लिए संघर्षरत कॉंग्रेस के पास मुख्य विपक्षी दल भाजपा के विरोध में जनता के सामने जाने के लिए सेकुलरिज़्म के अतिरिक्त और कोई भी नारा या मुद्दा नहीं है, वहीं इस पूर्ण असफल सरकार की कालिख से बचने के लिए सहयोगी दलों के पास भी एक मात्र सेकुलरिज़्म का ही कारगर बहाना बचा है। इन क्षेत्रीय दलों के साथ समस्या यह है कि ये केन्द्रीय सत्ता की मलाई का लालच भी छोड़ नहीं पाते और क्षेत्रीय स्तर पर नुकसान का भय भी इन्हें लगा रहता है। भले ही इनका परंपरागत मतदाता जीडीपी अथवा मुद्रा स्फीति जैसे मामलों से बहुत इत्तेफाक न रखता हो किन्तु मंहगाई की मार वोट के जातिगत घेरे को भी तोड़ने पर विवश कर सकता है जोकि अधिकांश क्षेत्रीय दलों की जीवनबूटी है।

यूपीए-2 की असफलता के अतिरिक्त सेकुलरिज़्म के इस अवसरवादी शोर के लिए एक और भी मजबूरी खड़ी हो गई है, और वह है नरेन्द्र मोदी का शक्तिशाली उत्थान। मोदी की ऐतिहासिक गुजरात विजय ने उन्हें वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में लगभग अविजेय विकल्प के रूप में उभार दिया है। मोदी के नाम पर जनता के बींच उठने वाली आवाज़ और मीडिया का फोकस कोई संयोग अथवा चमत्कार बिलकुल नहीं है। यह एक दशक के मोदी के आविर्भाव की क्रमबद्ध व संतुलित प्रक्रिया का परिणाम है जिसे यूपीए-2 की कालिमा ने और तेजी से चमकने अवसर अवश्य दे दिया। भले ही कॉंग्रेस सरकार की जनविरोधी छवि व उसके एकमात्र युवराज राहुल गांधी की एक के बाद एक असफलताओं ने यह सुनिश्चित कर दिया हो कि 2014 में कॉंग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता देखना होगा, किन्तु कई धुरंधरों व दावेदारों से सजी भाजपा के बींच से मोदी का प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में उभरने का श्रेय उनकी छवि, कार्यशैली व गुजरात के विकास को ही देना होगा। अब चूंकि मोदी की छवि सेकुलरिज़्म के पैमाने पर खरी नहीं उतरती, और बड़ी बात यह है कि मोदी स्वयं ऐसा प्रयास भी नहीं करते उल्टे वे राजनैतिक दलों के सेकुलरिज़्म पर करारा प्रहार करने का कोई अवसर भी नहीं चूकते हैं, अतः मोदी की सफलता व बढ़ता कद सेकुलरिज़्म की चादर के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। इस सम्पूर्ण परिदृश्य का परिणाम यह है कि “सेकुलरिज़्म बनाम सांप्रदायिकता” की प्रतिस्पर्धा अब “सेकुलरिज़्म बनाम मोदी” की लड़ाई बन चुकी है और इसमें संदेह नहीं कि फिलहाल अभी मोदी ही भारी पड़ते नजर आ रहे हैं।

भले ही जातिगत गठजोड़ के चलते भारतीय राजनीति हाथी के दाँत की तरह हो गई हो जहां विचारधारा व घोषणापत्र के मुद्दे और होते हैं और जमीन पर चुनाव लड़ने के और, किन्तु फिर भी लोकतन्त्र में प्रत्येक विचारधारा को, चाहे वह तथाकथित सेकुलरिज़्म हो अथवा हिन्दुत्व या इस्लाम, अपनी मौलिक स्वतन्त्रता होनी चाहिए जिसका अन्तिम निर्णय जनता के द्वारा ही होना है। सेकुलरिज़्म समेत समाजवाद, जनवाद या किसी अन्य वाद पर किसी पार्टी, व्यक्ति अथवा संस्थान की परिभाषा को लेकर दुराग्रह परिपक्व लोकतन्त्र का हिस्सा नहीं हो सकता। किन्तु जब कॉंग्रेस जैसे दल भाजपा की ओर अथवा नितीश कुमार जैसे नेता नरेन्द्र मोदी की ओर सांप्रदायिकता की उंगली उठाते हैं तो यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र का एक अस्वस्थ दुराग्रह ही लगता है। विचारधारा बहस का विषय तो हो सकती है किन्तु आक्षेप का नहीं! यदि नरेन्द्र मोदी सांप्रदायिक हैं तो सांप्रदायिकता लोकतन्त्र का हिस्सा है, क्योंकि इसी सांप्रदायिकता को देश की जनता चुनती आ रही है। वास्तव में जिस सेकुलरिज़्म को उदार और लोकतान्त्रिक होना चाहिए वह अपनी संकीर्णता व दुराग्रह के चलते उपरोक्त सच को उदारतापूर्वक स्वीकार करने में सदैव हिचकता रहा है।

हमारी लोकतान्त्रिक संरचना का और भी अधिक दुर्भाग्य यह है कि राजनैतिक दलों से अलग देश का एक वर्ग, जो स्वयं को बौद्धिक कहलाना पसंद करता है, भी कहीं न कहीं सेकुलरिज़्म व सांप्रदायिकता पर लोकतान्त्रिक स्वीकृति से दूर बौद्धिक दुराग्रह का शिकार है। नरेन्द्र मोदी को सांप्रदायिक सिद्ध करने के लिए गुजरात दंगों के संदर्भ में उनके उस बयान को उठाया जाता है जिसमें उन्होने कथित रूप से कहा था कि “क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है”, किन्तु सिख दंगों के सन्दर्भ में राजीव गांधी के बयान- “बड़ा पेड़ गिरने पर जमीन हिलती ही है”- को भूल जाया जाता है, ऐसे में राजनैतिक सेकुलरिज़्म के लोकतान्त्रिक चेहरे के साथ साथ उसकी ईमानदारी भी सन्देह के घेरे में आ जाती है.! वास्तव में धर्मनिरपेक्षता सभ्य समाज का एक चारित्रिक गुण व स्वीकृति है किन्तु सेकुलरिज़्म को जिस प्रकार एक “वाद” एवं गुट का स्वरूप दे दिया गया है उसने न सिर्फ इतिहास के साथ अन्याय किया है वरन वर्तमान को भी गुमराह करने का प्रयास किया है। नरेन्द्र मोदी पर बहस करने वाले अथवा बड़े-बड़े लेख लिखने वाले बुद्धिजीवी प्रायः एक कथन दोहराते दिखाई देते हैं, मैं एक न्यूज़ चैनल के स्टूडिओ में था जहां मोदी पर एक बहस के दौरान इसी कथन की व्याख्या करते हुए एक बुद्धिजीवी ने कहा कि अटल जी ने मोदी को राजधर्म की नसीहत दी थी, इसका अर्थ यह हुआ कि अटल जी की दृष्टि में मोदी एक राज्य के राजधर्म को निभाने में अक्षम थे, फिर वे पूरे देश के राजधर्म को कैसे निभाएंगे? इस बहुप्रचारित बयान का पूरा सच यह है कि अटल जी ने कहा था “एक मुख्यमंत्री के रूप में मोदी को राजधर्म का पालन करना चाहिए… और मुझे पूरा विश्वास है कि नरेन्द्र भाई वही रहे हैं..!” (विडियो) ऐसे में क्या यह स्पष्ट नहीं होता कि स्वयं को सही सिद्ध करने के लिए सेकुलरों को आधे बयान को काट-छांट कर इस स्तर तक झूँठ का सहारा लेना पड़ता है.?

जब मोदी 2002 में विजय प्राप्त करते हैं तो कहा जाता है कि यह जीत मोदी के कट्टर हिन्दुत्व के कारण हुई है, और 2012 में जीतते हैं तो कहा जाता है कि यह जीत हिन्दुत्व से हटकर विकास के एजेंडे के कारण हुई है! प्रायः हिन्दुत्व व विकास को विरोधाभासी ढंग से चित्रित किया जाता है, जबकि मोदी हिन्दुत्व व विकास को एक साथ एक सिद्धान्त बनाकर पेश करने में सफल हो चुके हैं। वे 2012 का पूरा चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ते हैं लेकिन चुनावी मौसम में ही जब एक मौलवी उन्हें मुल्ला टोपी पहनाता है तो उसे पहनने से साफ इंकार कर देते हैं! प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि कॉंग्रेस समेत सभी पार्टियां मुस्लिम हित के एजेंडे को निःसंकोच अपनी सर-आँखों पर रखती हैं, सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशें उनके चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा होती हैं, वक्फ बोर्ड के लिए वादे और मुसलमानों के लिए सहूलियतें उनकी चुनाव प्रचार के पर्चों पर वरीयता से छपे रहते हैं, किन्तु यदि इससे सेकुलर राजनीति विकास के मुद्दे से नहीं भटक जाती, तो केवल हिन्दुत्व के साथ ही विकास की राजनीति क्यों नहीं खड़ी हो सकती? मोदी ने इसी प्रोपेगैण्डा को खोखला साबित किया है और यही उनकी आज की ऐतिहासिक सफलता का कारण है।

यहाँ प्रश्न सेकुलरिज़्म बनाम मोदी में से किसी को सही अथवा गलत साबित करने का नहीं है, अपितु तथ्य यह है कि संविधान की सेकुलर अवधारणा को एक “वाद” के रूप में स्थापित कर उसे एक आदर्श के स्थान पर एक दुराग्रह व राजनैतिक अवसरवाद का रूप दिया जा चुका है। आज के सेकुलरिस्ट एक विचारधारा को ही अपराध घोषित करने के प्रयास में लोकतन्त्र के मूल से ही भटक गए हैं! सेकुलर ताकतों को यह समझने की आवश्यकता है कि जब तक वे सच को स्वीकारने का साहस नहीं दिखाते, “सेकुलरिज़्म बनाम मोदी” के घमासान में मोदी-विरोधियों का प्रत्येक दांव मोदी के पक्ष में रामबाण ही सिद्ध होता रहेगा।

.

-वासुदेव त्रिपाठी

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50 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 13, 2013

आदरणीय वासुदेव जी सादर दोहरी बधाई

ashokkumardubey के द्वारा
March 12, 2013

वासुदेव जी सबसे पाहे बेस्ट ब्लागर चुने जाने पर आपको हार्दिक बधाई आपने सेकुअरिज्म पर विस्तार से लिखा है जो आज बहुचर्चित विषय है राजनेताओं का हथियार है और बीजेपी को अछूत केवल सेकुलरिज्म के नाम पर ही सारी पार्टियाँ एकजुट होकर बीजेपी का विरोध करने पर आमादा हैं और इससे फायदा केवल कांग्रेस को होने वाला है बीजेपी के नरेन्द्र मोदी जितना मर्जी अपने विकास के फार्मूले को जनता को बताते रहें ये अल्पसंख्यक समुदाय उनके सारे दावों को चुनाव में झूठा साबीत करते नजर आयेंगे हाँ अगर हिन्दू जो बहुमत में है एकजुट होकर बीजेपी का सामर्थ्यं करे तो जरुर यह देश नरेन्द्र मोदी जैसे विकास पुरुष के नेत्रित्व में एक मजबूत राष्ट्र बनाकर पूरे विश्व में उभरेगा कम से कम अपने देश का प्रधानमंत्री एक मजबूत और अनुभवी एवं लोकप्रिय ब्यक्ति तो बनेगा पर बीजेपी का तो दुर्भाग्य है ही इस देश की जनत का महा दुर्भाग्य है जो की घोटालों में लिप्त सरकार को इस देश की राजनितिक पार्टियां एकजुट होकर भ्रष्ट कांग्रेस को हराने का प्रयास नहीं करती अब बीजे पी को ही सोचना है यह पार्टी अपने पर लगे साम्प्रदिकता का दाग कैसे धो पायेगी जबकि १९८४ के दंगों में सिख भी भरी संख्या में मरे गए पर कांग्रेस को साम्प्रदयिक कोई पार्टी नहीं कहती यह बिडम्बना नहीं तो और क्या है ?

बैजनाथ पाण्डेय के द्वारा
March 12, 2013

श्रधेय श्री वासुदेव जी, यद्यपि आपके पोस्ट ने कुछ कहने के लिए छोड़ा नहीं है, तथापि यह लोकतंत्र के लिए अभिशाप नहीं तो और क्या कहा जाएगा कि बड़े से बड़े मुद्दे को धार्मिक रंग देकर भ्रष्टाचार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को हिन्दू आतंकवाद की संज्ञा दे दी जाती है | क्या ऐसा आचरण उन लोगों से अपेक्षित है जिन्हें जनता की भलाई के लिए हीं संसद में भेंजा गया हो ? धर्मनिरपेक्षता के नाम पर देश हित को ताक पर रखना एक ऐसी परंपरा है जो समय रहते न तोड़ी गयी तो देश को हीं खा जायेगी | बहुत उपयोगी पोस्ट, आभार |

seemakanwal के द्वारा
March 11, 2013

राजनीती में शायद शब्दों के अर्थ भी समयानुसार बदल जाते हैं . हार्दिक धन्यवाद .

om prakash shukla के द्वारा
March 11, 2013

त्रिपाठी जी सार्थक लेख केलिए बधाई आपने अपने ब्लॉग के माध्यम से तमाम तरह के गलतफहमियो से आम जनता के विचारो को सकारात्मक रूप से मोदी भाई के बारे में वास्तविक समझ बढ़ने और साम्प्रदायिकत तथा तथाकथित साम्प्रदायिकता के बहस को आम जनता के बीच लेन का मह्त्व्पुर्द कार्य किया है इसकी जीतनी तारीफ की जय कम है आज समय की मांग है की गैर्संप्रदयिकता का मुखौटा ओढ़े बहुरूपियो को समाज के सामने नंदा किया जाय इन देशद्रोहियो से तात्कालिक घटनाओ पर कुछ सवाल पुचा जाना चाहिए (१) पाकिस्तानी सीमा पर सर कटाने वाले के निवास पर जाने में साम्प्रदायिकता क्यों नहीं? (२)) उत्तर प्रदेश के कुंडा में हत्या के ताफ्शिस में डिप्टी एस.पी. के हत्या में मुख्यमंत्री,नेता विरोधी दल,देश के युवराज राहुल गाँधी सभी पहुचे मृतक आश्रित क्र एक नौकरी की जगह ८ अदद नौकरियो का प्रस्ताव और धन वर्षा का विवारद पत्रकारों के पास भी नहीं . (३) शाही हेमराज के विधवा ने मात्र अपने पति के सर की मांग की नतीजे में क्लुर्क की नौकरी पैसो को तो खुद लत मर चुकी थी वही मुस्लमान विधवा जो शायद संविधान के अनुसार शहीद की श्रेदी में भी नहीं /क्या देश है यह यहाँ का मानदंड क्या है बिना सीधे जनता से निर्वाचित मनमोहन आराम से देश को विदेशियो को बेचने में लगे है गेम चेंजर खेल से राजनीतिक जुआ KHELA JA RAHA है देश पर JAN DENE वाले TAJ HOTAL में LOGO की JANBACHANE वाले ऊण्णीखृईष्डाण को शहीद मानाने से इंकार ंऊष्ळींळेआघे के ओबैसी के समर्थन से सर्कार चलने वाले गैर्सम्प्र्दयिकता के चैम्पियन रोजैफ्तर में उल्लातोपी पहनने वाले गैसंप्रदायिक लगता है किसी ऐसे ही देश पर यह मुहावरा चला होगा अन्धेरपुर नगरी चौपट राजा——–

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 10, 2013

पुनश्च……… बेस्ट ब्लॊगर ऑफ डा वीक चुने जाने पर अतिरिक्त बधाई !

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 11, 2013

    हार्दिक आभार आचार्य विजय गुंजन जी॥

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 10, 2013

यहाँ परिभाषाएं अवसर और स्वार्थ की कसौटी पर बनती, मिटतीं और बदलती रहतीं हैं ! वासुदेव जी! आप का यह आलेख अत्यंत ही सुचिंतित है और आप की बौद्धिकता की छननी से छनकर तैयार हुआ है ! साधुवाद !1

Dr S Shankar Singh के द्वारा
March 10, 2013

मैं अपने एक पुराने आलेख की और ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ. इस आलेख में अगर ‘बुद्धिजीवी ‘ शब्द की जगह ‘ सेक्युलर ‘ को प्रयोग में लाया जाय तो यह आपके आलेख ‘ मोदी बनाम सेकुलरिज़्म का घमासान ‘ पर टिपण्णी के तौर पर लागू हो सकती है. अपने आलेख को मैं नीचे दुबारा प्रस्तुत कर रहा हूँ. हिंदुओं को गाली दो, बुद्धिजीवी कहलाओ रोज़ रोज़ नए नए फैशन आते रहते हैं। शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो नया फैशन नहीं अपनाना चाहेगा। फैशन के अनुसार न चलनेवाला पिछड़ा कहलाता है। जब फैशन का रिवाज़ हो तो पिछड़ा कौन कहलाना चाहेगा ! वैसे तो बुद्धिजीवी होने का फैशन कोई नया नहीं है , लेकिन फैशन की दौड़ में कोई भी पिछड़ा कहलाना क्यों चाहेगा , जबकि खासतौर से बुद्धिजीवी होना सबसे आसान है। इसके कुछ शर्तिया , अचूक , रामबाण सूत्र ( फॉर्मूले ) हैं जो कभी असफल नहीं होते हैं। इन फार्मूलों को हमारे बुद्धिजीवियों नें इजाद किया है। बुद्धिजीवी आसानी से पहचाने जा सकते हैं। हमारे बुद्धिजीवी कंधे पर झोला लटकाए , बुद्धिजीवी होने का लबादा ओढ़े जगह जगह घूमते नज़र आ जाएंगे। इसलिए इनको झोलावाला भी कहा जाता है। अगर दाढ़ी हो और आंखों में चश्मा लगा हो तब तो यह इनके बुद्धिजीवी होने का पक्का सबूत है। इनके पास बुद्धि होना कोई ज़रूरी नहीं है। बस एक गुट में शामिल होना चाहिए। गुट में शामिल होने से बुद्धिजीवी होने का प्रमाणपत्र आसानी से मिल जाता है। गुटों का काम है लोगों को बुद्धिजीवी होने का प्रमाण पात्र देना। गुट में शामिल होने से बुद्धिजीवी बनाना बहुत ही आसान हो जाता है। बुद्धिजीवी होना फैशन में शुमार है। इसके तो बहुत ही फायदे हैं। इसमें सरकारी संरक्षण , जेएनयू जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में प्रोफेसरशिप मिल जाना , समाज में प्रतिष्ठा , टीवी चैनलों में विशेषज्ञ के तौर पर भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाना इत्यादि शामिल हैं। बुद्धिजीवी समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। जैसे लोगों को ‘ सेक्युलर ‘ होने का प्रमाणपत्र बांटना , आतंकवादियों , माओवादियों के गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए कुतर्क गढ़ना , लोगों को भ्रमित करने के लिए नए नए शब्दजाल बुनना। अब आइये ‘ सेक्युलर ‘ होने के लिए इनके द्वारा ईजाद किये गए फार्मूलों पर पर विचार कर लें। आपको बस इतना करना है कि सेक्युलर बनने का सबसे आसान तरीका है, हिंदुओं को गाली देना , हिंदू परंपरा , सभ्यता और संस्कृति का अपमान करना इत्यादि। दूसरे धर्मों की नाजायज़ मांगों के सामने पलक पांवड़े बिछाना , जैसे शाहबानो के केस में भारतीय संविधान में संशोधन करवाना , वन्दे मातरम् गाने का अनुरोध करने वालों को सांप्रदायिक कहना इत्यादि। हमारे देश में मुसलामानों को एक विशेष दर्जा प्राप्त है क्योंकि उनका अपना एक सशक्त वोट बैंक है , जिसको देखकर सभी सेक्युलर राजनितिक दलों के मुंह में लार टपकने लगती है। सेक्युलर कहलाने का इससे आसान तरीका क्या हो सकता है। फैशन का फैशन और आसानी की आसानी। हमारे बुद्धिजीवियों ने सेक्युलरिज़म को एक निहायत ही नए मौलिक अंदाज़ में परिभाषित किया है। हमारे बुद्धिजीवियों नें एक नई शब्दावली का निर्माण किया है , जिसको समझना अति आवश्यक है। नई-नई परिभाषाएं गढ़ी गई हैं। नए नए सांकेतिक शब्द ( code word ) गढ़े गए हैं। आइये इस पर भी एक नज़र डाल लें। माओवादी डिक्टेटरशिप के लिए इस्तेमाल किया जाने वाले ‘ कोड वर्ड ( code word ) हैं ‘ जनवादी , ‘ ‘ जन आंदोलन ‘ ‘ जन तंत्र ‘ । इसी प्रकार ‘ मानवाधिकार ‘ का मतलब है आतंकवादियों , अपराधियों और माओवादियों द्वारा निरीह और निरपराध आम आदमियों की हत्या करने का अधिकार। बिना कोड वर्ड समझे आप इन बुद्धिजीवियों की बातों को नहीं समझ सकते। है न कितना आसान सेक्युलर और बुद्धिजीवी बनना। :

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 11, 2013

    आदरणीय एस शंकर जी, जहां तक शाहबानों जैसे मामले का प्रश्न है तो निश्चित रूप से यह देश के भविष्य के लिए एक घातक निर्णय था जिसके पीछे संकीर्ण राजनीति ही जिम्मेदार थी। ऐसे निर्णयों को लोकतन्त्र के विरुद्ध एक षड्यंत्र क्यों माना जाए.!! हार्दिक आभार!!

    SNSHARMAJI के द्वारा
    March 13, 2013

    आपकी टिपणी एकदम सही व सटीक है

yamunapathak के द्वारा
March 9, 2013

वासुदेव जी एक बेहद प्रासंगिक और चर्चित विषय पर बेहतरीन आलेख और बेस्ट ब्लॉगर के रूप में चयनित होने पर हार्दिक बधाई.

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 11, 2013

    हार्दिक आभार यमुना जी।

Santlal Karun के द्वारा
March 8, 2013

आदरणीय वासुदेव जी, विभिन्न दलों और नेताओं द्वारा सेकुलर होने का ढिंढोरा कोरा ढकोसला है | मुझे तो ढकोसले के विपरीत साम्प्रदायिकता का व्यंग्य-दन्त तोड़ते आक्रामक मोदी कहीं अधिक सर्वधर्म समभावी लगते हैं | उन्होंने वर्षों से साम्प्रदायिकता को लेकर व्यंग्य-बाणों के बीच से विकास का मार्ग प्रशस्त किया है और गुजरात को समृद्धि की ऊँचाई दी है | अपना घोड़ा छोड़ने, घोड़ा रोककर चुनौती देनेवाले को परास्त कर आगे बढ़ने और जहाँ तक घोड़ा जाए वहाँ तक राज हमारा की तुरही बजवाने वाले राजे-महराजे तो यहाँ से सदियों पहले विदा हो गए; किन्तु लगता है इस युग में धरती पर उनकी जगह मज़हबी आतंकवाद ने ले ली है | इन्हें विदा होने में कितना समय लगेगा और तब तक भारतीय महाद्वीप और अन्य क्षेत्रों में कितने निर्दोषों की बलि चढ़ चुकी होगी कहना कठिन है | यह स्पष्ट नहीं है कि देश-दुनिया, हमारे महान लेखक-विचारक और मीडिया के लोग हिन्दू-ह्रदय से कितनी उदारता और समभाव की अपेक्षा रखते हैं और उसकी सीमा कहाँ जाकर मानते हैं?– कहीं हिन्दू-जनसंख्या, उसकी विद्यमानता की शून्य स्थिति पर तो नहीं ! जिस तरह राष्ट्र के समस्त शासन ने आतंकवाद के आगे नतमस्तक होकर बहिष्कृत कश्मीरी पंडितों के बिना आज के कश्मीर की स्थिति पर हस्ताक्षर-सा किया हुआ है, उससे तो यही लगता है कि भारतीय महाद्वीप में हिन्दुओं की शून्य जनसंख्या को ही उनकी वास्तविक उदारता और समभाव माना जाएगा ! अंत में उनकी शून्य जनसंख्या को ही ‘सेकुलर होने का प्रमाण-पत्र’ मिल पाएगा ! इतिहास की कवायद, महापुरुषों का चरित्र-पाठ, पुराणों-अंतर्कथाओं का वाचन आदि के उपरान्त आप किसी से दिल खोल के गले लगें या दिल फाड़ के, सवाल फिर भी है कि आखिर अकेला गला क्या करेगा? आखिर गले लगने-लगाने के लिए दूसरी ओर से भी तो कदम बढ़ना चाहिए न ! आप के ‘मोदी बनाम सेकुलरिज़्म का घमासान’- जैसे तात्विक, गंभीर लेख से ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ कॉलम तथा जागरण जंक्शन का गौरव बढ़ा है, पत्थर-सा जो उछाला है; —हृदयपूर्वक साधुवाद एवं बधाई !

    Ramesh Nigam के द्वारा
    March 9, 2013

    करुण जी को पढ़ने के पश्चात मुझे आश्चर्य होता है कि ऐसे लोगों के होते हुए हिन्दू की ऐसे दुर्दशा क्यों.  रमेश निगम

    Ramesh Nigam के द्वारा
    March 9, 2013

    करुण जी को पढ़ने के पश्चात मुझे आश्चर्य होता है कि ऐसे लोगों के होते हुए हिन्दू की ऐसी दुर्दशा क्यों.  रमेश निगम

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 11, 2013

    आदरणीय संतलाल जी, अपने विचारों को रखते हुए विस्तृत प्रतिक्रिया व लेख को समय देने के लिए हार्दिक आभार!

Sushma Gupta के द्वारा
March 8, 2013

त्रिपाठी जी, मोदी वनाम साम्प्रदायिकता जैसे गंभीर विषय पर आपका एक वृहद व् सम्पूर्ण चिंतन सराहनीय है. यह भी सही है की वर्तमान परिस्थिति में मोदी जी की हवा जोरों पर है, जो उन्हें सफलता की ओर ले जा सकती है . साभार..

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 11, 2013

    हार्दिक आभार सुषमा जी।

Ayush Kumar Dwivedi के द्वारा
March 8, 2013

त्रिपाठी जी……सादर नमस्कार. “सांप्रदायिकता लोकतन्त्र का हिस्सा है, क्योंकि इसी सांप्रदायिकता को देश की जनता चुनती आ रही है। वास्तव में जिस सेकुलरिज़्म को उदार और लोकतान्त्रिक होना चाहिए वह अपनी संकीर्णता व दुराग्रह के चलते उपरोक्त सच को उदारतापूर्वक स्वीकार करने में सदैव हिचकता रहा है।” बहुत महत्वपूर्ण बात कही आपने. यह बात हर मोदी विरोधी के सवाल का सबसे सटीक और उचित उत्तर है. मोदी की गलतियों या दंगों में उनकी भूमिका पर तो टिपण्णी नहीं करना चाहूँगा परन्तु इस्ताना ज़रूर कहना चाहता हूँ कि देश की वर्त्तमान स्थिति को सुधारने के लिए एक कट्टर व्यक्तित्व वाले इन्सान की जरूरत है. फिर चाहे वो कट्टर हिन्दू हो या कट्टर मुस्लिम…… सुंदर लेख.. अक्सर लोग कहते है कि राजनीति के समीक्षकों की भाषा भी राजनेताओं की तरह गन्दी हो जाती है परन्तु आपका यह लेख उस बात का एक अपवाद है. सुंदर भाषा और प्रासंगिक तर्कों का अनमोल संगम….. -आयुष कुमार द्विवेदी http://www.ayushkumardwivedi.jagranjunction.com

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 8, 2013

    आपसे सहमत होते हुए कहना चाहूँगा कि कट्टर शब्द के स्थान पर दृढ निश्चयी शब्द अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि राजनीति के लिए कट्टरता का कोई तात्पर्य नहीं होता.! हार्दिक आभार.!

    Ayush Kumar Dwivedi के द्वारा
    March 9, 2013

    सही कहा आपने, दृढ निश्चयी ज्यादा उपयुक्त होगा….यही हिंदी भाषा की खासियत है जो हर शभ पर मंथन करने का अवसर प्रदान करती है… आभार.

Shashank Upadhyay के द्वारा
March 8, 2013

महोदय, मोदी क्या बोलते हैं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता…. फर्क मोदी के काम से पड़ता है… गलती हर इंसान से होती है हो सकता है की मोदी से भी हुई हो…. अब जरा ऐसे सोचो की यदि मुस्लिम की जगह गोधरा कांड में हिन्दू मारे जाते तब आप क्या कहते ??? दंगे का कोई मज़हब नहीं होता, उसमे हर कौन के लोग अपनी जान गवाते हैं…. अब जरा और छोटे स्टार पर सूचो की यदि तुम्हारे ऊपर कोई हमला करेगा तो क्या करोगे ?? शायद……उसपर पलटवार करोगे… ऐसे में मोदी को दोष देना उचित नहीं है…. मोदी विकास पथ पर अग्रसर हैं उसके लिए उन्हें साधुवाद दीजिये…..

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 8, 2013

    शशांक उपाध्याय जी, मैंने अपने लेख में मोदी को दोष कहाँ दिया?? मैंने तो यही कहा है कि जनता उनके पक्ष में फैसला दे रही है! मोदी ji के विकास को सभी स्वीकारते हैं और इस पर मेरा एक पिछला लेख भी आप देख सकते हैं, Hat-trick Of Modi.

Vijay Pratap Singh के द्वारा
March 8, 2013

वासुदेव जी बधाई हो आपको बेस्ट ब्लागर के लिए… लेखनी शानदार है ….

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 8, 2013

    हार्दिक आभार विजय प्रताप जी!

Ramesh Nigam के द्वारा
March 7, 2013

प्रिय वासुदेव , आपका आलेख पढ़, मन गद गद हो उठा. एक स्तंभकार हैं श्री एस शंकर, जागरण में उन्हें पढ़ने का अवसर मिलता रहता है. जितना आत्म विभोर उन्हें पढ़ कर होता था, कदाचित उससे कुछ अधिक आज अनुभूति हुई. मेरी आकांक्षा है कि भगवान आपको दीर्घायु बनाए और इतना सामर्थ्य दे कि आप छद्म धर्मनिरपेक्षता के कुहासे में से राष्ट्र को बाहर कर पायें. मुझे लगता है कि तथ्यों को मस्तिष्क से ओझल करके जब इतिहास का विश्लेषण हम करते हैं तो एक ऐसी विकृति को जन्म देते हैं जो देश को दुर्भाग्य के गर्त में धकेल देती है. देश के रक्त रंजित विभाजन का विवेचन करते समय गांधी को क्लीन चिट देने के साथ इतना अधिक सरलीकरण करते हैं कि मु० बिन कासिम के काल से होते आये आक्रमणों , खिलाफत को समर्थन, मोपला हत्याकांड, मुस्लिम लीग का डायरेक्ट एक्शन, सन ४६ से आज तक एथनिक क्लीन्सिंग हेतु बर्बरतापूर्ण पाकिस्तानी प्रयास, ब्रिटिश एवं इस्लामी कुचक्र, गांधी का पाकिस्तानी प्रेम जिसके अंतर्गत आज की गणना से अरबों रुपये दिलवाना, नेहरु द्वारा कश्मीर में आक्रमणकारियों से अधिक राजा के प्रति शत्रुभाव और बढ़ती सेना को रोक युएनओ में मामला ले जाना , हम सभी कुछ को भुलाने की चेष्टा करते हैं, जो राष्ट्र को रसातल में ले जाने हेतु पर्याप्त है. क्या भविष्य में इन बिंदुओं पर आप तार्किक विश्लेषण करेंगे. मुझे यह भी लगता है कि हम जिस सर्वधर्म समभाव को अपना गुण मानते हैं वह वास्तव में हमारा दुर्गुण है. प्रागैतिहासिक काल में जब वेदों की रचना हुई होगी, जब हमारी पूर्वजों ने जीवन दर्शन का निरूपण किया होगा, जब इस्लाम और ईसाईयत जैसे मजहबों का आविर्भाव नहीं हुआ था, उस काल में यह दर्शन एब्सोल्यूट टर्म में भी एक गुण अवश्य था. पर उपरोक्त मजहबों के प्रादुर्भाव के पश्चात जो हमारे ऊपर समूलोच्छेदन हेतु आक्रमण होते आ रहे हैं और हमारा प्रभाव क्षेत्र सिक्द्ता जा रहा है, क्या परिवर्धन की आवश्यकता को परिलक्षित नहीं करता. आज की राजनीति में अंधाधुंध खैरात बाटने की प्रवृत्ति , जो एक प्रकार की घूस है, जो हमारी अपरिहार्य सामरिक शक्ति प्राप्त करने में बाधक है, को क़ानून द्वारा सीमित नहीं करना चाहिए. इसी प्रकार आर्थिक प्रगति को ग्रामोन्मुख बनाने, जैविक खेती, स्वास्थ्य सेवाओं का अर्थ केवल अधिक अस्पताल, अधिक अम्बुलेंस, अधिक औषधियां तक ही न हो कर स्वस्थ भोजन, तनाव रहित जीवन, हेल्थी लाइफ स्टाइल आदि पर भी ध्यान होना आवश्यक रहे ऐसी नीति के विषय पर भी आप लिखें तो प्रसन्नता होगी.

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 8, 2013

    आदरणीय रमेश निगम जी, आप जैसे प्रशंसकों के कारण ही मुक्त विचार रखने का मेरा साहस विकसित होता रहा है। एस शंकर जी को मैं भी बचपन से पढ़ता आ रहा हूँ और स्कूल का होमवर्क न करके घंटों अखबार से चिपके रहने के कारण मुझे डांट भी पड़ती थी.! किन्तु फिर भी एस शंकर और ब्रम्हा चेलानी जैसों को पढ़ने के लिए संपादकीय मेरा फेवरेट पेज होता था…!! :) कई विषयों के लिए आप मेरे ब्लॉग पर मेरे पुराने लेख भी पढ़ सकते हैं, आपके द्वारा उठाए गए कुछ अन्य विषयों की गंभीरता को मैं भी समझता हूँ व प्रयास रहेगा कि समय मिलने पर कुछ उपयोगी तथ्यों व जानकारी के साथ उन पर भी लिखूँ॥ हार्दिक आभार!!

बाबुल के द्वारा
March 7, 2013

सरल हिंदी शब्दों का प्रयोग करते तो आपके लेख को पढने के लिए दिमाग पे इतना जोर नहीं देना परता. फिर भी जितना समझ में आया उससे मैं बहुत ही प्रभावित हुआ . आपसे भविष्य में भी ऐसी ही उम्दा आर्टिकल (पर सरल भाषा में ) लिखने की उम्मीद करता हूँ. ब्लागर आफ़ द वीक चुने जाने पर बहुत बहुत बधाई.

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 8, 2013

    बाबुल जी, हिन्दी से थोड़ा मेरा विशेष प्रेम बचपन से रहा है इसलिए धीरे धीरे शुद्ध हिन्दी आदत में उतरती चली गई। कई बार तो जो मैं कहना चाहता हूँ वह बोलचाल के शब्दों में मिलता ही नहीं अतः थोड़ी कठिन भाषा प्रयोग करनी पड़ती है। फिर भी मेरा प्रयास रहता है, विशेष रूप से आम आदमी से जुड़े सामाजिक राजनैतिक विषयों पर, कि भाषा थोड़ी सरल रहे। आपके सुझाव को ध्यान में रखते हुए आगे से और भी ध्यान में रखने की कोशिश रहेगी। हार्दिक आभार!

deveshsharma के द्वारा
March 7, 2013

वैसे तो राजनीति और अवसरवाद एक ही सिक्के दो पहलु हैं ही पर जब ये अवसरवाद सेकुलरिज्म के नाम पर हो तो और भी घातक रूप ले लेता है हमारे देश में धर्म को एक संवेदनशील विषय बनाने में इस मुद्दे ने बहुत काम किया है. आपके लेख ने बहुत सी अस्पष्ट और छुपी चीजों को सामने रख दिया है. अच्छे लेख और सम्मान के लिए बधाई.

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 8, 2013

    सहमत हूँ आपसे देवेश जी!! हार्दिक आभार!

सरोज कुमार के द्वारा
March 7, 2013

बिलकुल सही कहा आपने, मैं आपके विचारों से पूरी तरह से सहमत हूँ.

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 8, 2013

    हार्दिक आभार सरोज जी॥

आर.एन. शाही के द्वारा
March 7, 2013

ब्लागर आफ़ द वीक चुने जाने पर बधाई वासुदेव जी ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 8, 2013

    हार्दिक आभार॥

nishamittal के द्वारा
March 7, 2013

आज के सेकुलरिस्ट एक विचारधारा को ही अपराध घोषित करने के प्रयास में लोकतन्त्र के मूल से ही भटक गए हैं! सेकुलर ताकतों को यह समझने की आवश्यकता है कि जब तक वे सच को स्वीकारने का साहस नहीं दिखाते, “सेकुलरिज़्म बनाम मोदी” के घमासान में मोदी-विरोधियों का प्रत्येक दांव मोदी के पक्ष में रामबाण ही सिद्ध होता रहेगा .परन्तु वासुदेव जी एक तथ्य पर अवश्य विचार करना होगा (जो शायद आप जैसा विचार शील युवक) कर चुके होंगें की आवश्यकता है इन विजयों पर खुशियाँ मनाने से अधिक नीति निर्माण की जो वृहत स्तर पर सफलता प्रदान करे और साथ ही जिन राज्यों में आंकडा शून्य रहता है वहां भी पहुँचने की बधाई आपको सम्मान के लिए.

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 8, 2013

    आदरणीय निशा जी, लोकतन्त्र के इस महासंग्राम में दशों दिशाओं से सजग ही जीत सकता है। कॉंग्रेस की दुर्दशा के पीछे यही कारण रहा, दोनों बड़े राजनैतिक दल इसे समझते तो होंगे ही। हार्दिक आभार

yogi sarswat के द्वारा
March 6, 2013

इस पूर्ण असफल सरकार की कालिख से बचने के लिए सहयोगी दलों के पास भी एक मात्र सेकुलरिज़्म का ही कारगर बहाना बचा है। इन क्षेत्रीय दलों के साथ समस्या यह है कि ये केन्द्रीय सत्ता की मलाई का लालच भी छोड़ नहीं पाते और क्षेत्रीय स्तर पर नुकसान का भय भी इन्हें लगा रहता है। भले ही इनका परंपरागत मतदाता जीडीपी अथवा मुद्रा स्फीति जैसे मामलों से बहुत इत्तेफाक न रखता हो किन्तु मंहगाई की मार वोट के जातिगत घेरे को भी तोड़ने पर विवश कर सकता है जोकि अधिकांश क्षेत्रीय दलों की जीवनबूटी है।हमारी लोकतान्त्रिक संरचना का और भी अधिक दुर्भाग्य यह है कि राजनैतिक दलों से अलग देश का एक वर्ग, जो स्वयं को बौद्धिक कहलाना पसंद करता है, भी कहीं न कहीं सेकुलरिज़्म व सांप्रदायिकता पर लोकतान्त्रिक स्वीकृति से दूर बौद्धिक दुराग्रह का शिकार है।यहाँ प्रश्न सेकुलरिज़्म बनाम मोदी में से किसी को सही अथवा गलत साबित करने का नहीं है, अपितु तथ्य यह है कि संविधान की सेकुलर अवधारणा को एक “वाद” के रूप में स्थापित कर उसे एक आदर्श के स्थान पर एक दुराग्रह व राजनैतिक अवसरवाद का रूप दिया जा चुका है। आज के सेकुलरिस्ट एक विचारधारा को ही अपराध घोषित करने के प्रयास में लोकतन्त्र के मूल से ही भटक गए हैं! मैंने आपके एक एक शब्द पर गौर किया और मुझे लगता है इस मंच पर अगर कोई बेहतरीन राजनीतिक लेक लिख सकता है या लिखता है तो आपका नाम सर्व प्रथाम आएगा श्री वासुदेव जी ! छदम धर्म्निरेक्षता का ढकोसला करने वालों को सही आइना दिखाया है आपने !

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 8, 2013

    आदरणीय योगी जी, जागरण पर छोटे से समय में ही मुझे सभी सम्मान मिले, किन्तु आप जैसे साथियों का विश्वास व प्रोत्साहन सबसे बहुमूल्य है। कई बार जागरण के इस मंच को अलविदा कहने की आवश्यकता हुई किन्तु आप साथियों के कारण अभी तक मैं यहीं हूँ। इसे छोडने के बाद भी आप सभी के साथ भावनात्मक जुड़ाव तो बना ही रहेगा। …साभार!

dhirchauhan72 के द्वारा
March 5, 2013

मोदी सच में एक प्रभावशाली नेता है इसमें कोई शक नहीं है ! मुझे उनकी तीन बातों ने बेहद प्रभावित किया १.बिना शराब बेचे गुजरात अपने दम पर चल रहा है जबकि बाकी राज्यों में इंग्लिश शराब बेच बेच कर ही उनका बजट बनता है नहीं तो कंगाल हो जाएँ ! २.धार्मिक तुष्टीकरण न करना ३.किसी भी विपरीत परिस्थिति अमना आत्मविश्वास कायम रखना , इन्हीं सब खूबियों के चलते मुझे लगता है की आने वाला समय उनका है कोई रोक सके ये संभव ही नहीं है !

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 8, 2013

    धीर जी, फैसला जनता ही करेगी और राजनीति में उच्चतम की उत्तरजीविता का नियम ही लागू होना चाहिए। प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार।

आर.एन. शाही के द्वारा
March 5, 2013

‘सर्वधर्म समभाव’ भारत के परिप्रेक्ष्य में कोई दरियादिली या सदाशयता का प्रतीक नहीं, अपितु इसे सार्वभौमिक परिस्थितियों की अनिवार्य मांग के रूप में देखा जाना चाहिये । विभिन्नता में एकता की अखंडता के लिये सबके प्रति ‘समभाव’ रखने वाली व्यवस्था से इतर और कोई विकल्प हो भी नहीं सकता । इस भावना को तोड़ मरोड़ कर संकुचित दायरों वाले लाभ के हिमायतियों ने अपनी सुविधानुसार ‘धर्मनिरपेक्षता’ अर्थात सेकुलरिज्म का नाम देकर देश के साथ बहुत बड़ा धोखा किया, जिसका खमियाजा पता नहीं कबतक भुगतना पड़ेगा । गाँधी को आदर्श मानने वालों ने कभी यह नहीं सोचा कि बापू खुद भी कभी सेकुलर नहीं, बल्कि हिन्दुत्व को एक जीवन-पद्धति मानने वाले उदारवादी हिन्दू थे । राम उनके आदर्श एवं नियमित प्रार्थना उनकी दिनचर्या में शामिल थी । सभी धर्मों के सूत्र वाक्य ‘ईश्वर एक है’ पर उनका अटूट विश्वास था, इसीलिये ‘ईश्वर अल्ला तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान’ उनका प्रिय भजन था । उन्हें किसी भी धर्म की पूजा पद्धति के प्रति कभी कोई आपत्ति नहीं रही । अपने स्व-धर्म के प्रति रहस्यमय भाव रखने वाला इंसान न तो सच्चा हिन्दू हो सकता है, न ही सच्चा मुसलमान । किसी और धर्म की टोपी लगा लेना ही ‘सर्वधर्म समभाव’ रखने का प्रमाण नहीं, बल्कि ढोंग कहा जाएगा, जिससे मोदी ने इन्कार किया होगा । हमारे देश के मुसलमान हिन्दुस्तानी मुसलमान हैं, और अपने देश के प्रति किसी भी हिन्दू से कम निष्ठा नहीं रखते । मुट्ठी भर सिरफ़िरों की बात और है । क्या पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ने वाला कोई राष्ट्रभक्त मुसलमान जब कभी हमारी तरह मस्तक पर टीका लगाकर दिखाएगा, तभी हम उसे सर्वधर्म समभाव रखने वाले मुसलमान का सर्टीफ़िकेट देंगे ? यह घटिया और हास्यास्पद सोच कही जाएगी । जहाँ समभाव दिखना चाहिये, वहाँ बिना किसी दिखावे के भी यह भावना दिखती है, चाहे वह फ़ूल वालों की सैर हो, या फ़िर अमरनाथ और वैष्णोदेवी के खच्चरवालों के रूप में देखने को मिलती हो । देश को आज विकास की ज़रूरत है । युवावर्ग इस सच्चाई से बा-खबर है, चाहे वह हिन्दू हो, या मुसलमान, सिख हो, या ईसाई । आज इस कटु सत्य से सभी वाक़िफ़ हो चुके हैं कि विकास हर वर्ग, जाति और सम्प्रदाय की प्राथमिक ज़रूरत है । इसी से सभी को रोटी-कपड़ा और मकान मयस्सर होना है, न कि जाति, धर्म और सम्प्रदायवादी चिकनी चुपड़ी बातों से । भ्रष्टाचारियों को तो हर हाल में सिंहासन खाली करना ही होगा । आने वाला समय सिर्फ़ विकास-पुरुषों की ही बातें सुनेगा । किसी भी हिन्दू, मुसलमान या जातिवादी की अब एक नहीं चलने वाली है । अच्छे लेख के लिये बधाई ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 5, 2013

    आदरणीय शाही जी, विचारशील विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार। मेरा मानना है, जैसा कि मैंने लेख में भी लिखा, कि “सर्वधर्म समभाव” राष्ट्र व संस्कृति का एक चारित्रिक गुण है, इसे किसी “वाद” के रूप में नहीं गढ़ा जाना चाहिए। जहां तक आपका कथन है कि “इसे सार्वभौमिक परिस्थितियों की अनिवार्य मांग के रूप में देखा जाना चाहिये” से भी मैं थोड़ा भिन्न सोचता हूँ क्योंकि अनिवार्य मांग के रूप में जब समाज किसी अवधारणा को लेता है तो उसमें एक कानून की सी अनुभूति होती है, अनिवार्यता में व्यक्ति सहजता के स्थान पर बंधा हुआ अनुभव करता है.! भारत ने सदियों पहले जब ईरान से भागकर आए पारसियों, सीरियाई ईसाइयों अथवा 20वीं शताब्दी में अहमदिया मुसलमानों को जब गले लगाया व शरण दी तो उसके पीछे कोई पारिस्थितिक अनिवार्यता नहीं थी, वह हमारा सांस्कृतिक चरित्र था। हमें सर्वधर्म समभाव के संदर्भ में अपने उसी उदार चरित्र को महत्व देना होगा। गांधी जी भी पर इसी चरित्र की छाप थी।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 6, 2013

    मुझे लगता है कि मेरे ‘अनिवार्य’ शब्द की जगह यदि ‘अपरिहार्य’ लिखा जाय, तो मंतव्य अधिक स्पष्ट हो पाएगा । अनिवार्य और अपरिहार्य समानार्थी शब्द हैं, फ़र्क़ मात्र यह है कि अनिवार्य जहाँ आफ़ेन्सिव चरित्र का दिखता है, वहीं अपरिहार्य डिफ़ेन्सिव । मेरा मतलब भी डिफ़ेन्सिव ही है, अर्थात जिसकी आवश्यकता को टाला नहीं जा सकता । विभिन्न मत सम्प्रदाय के अपने आंतरिक धार्मिक चरित्र हैं, जिनके हर बिन्दु सर्वमान्य बन सकें, यह कभी सम्भव नहीं हो सकता । हिन्दुत्व जहाँ सबको गले लगाने की विशालता प्रदर्शित करने की क्षमता रखता है, वहीं इस्लाम की उदारता को भी हमें बिना किसी पूर्वाग्रह के मान्यता देनी चाहिये । हम समभाव रखने के बावज़ूद जल्दी किसी को अपने सम्प्रदाय में शामिल कर पाना स्वीकार नहीं कर पाते, जबकि इस्लाम सहित कई धर्म बड़ी उदारता के साथ किसी को भी अपना धर्म स्वीकार कर उनकी मान्यतानुसार सामान्य जीवन जीने का अधिकार देने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाते । सबकी अपनी-अपनी मान्यता और जीवन-पद्धति है, जिसके साथ समन्वय स्थापित कर सह-अस्तित्व का भाव लेकर चलना हमारी आवश्यकता ही नहीं बल्कि मजबूरी है । हम कभी भी किसी वाद को स्थापित कर पाने की स्थिति में नहीं आ सकते ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 6, 2013

    आदरणीय शाही जी, आपके “अपरिहार्य” संबंधी विश्लेषण से सहमत हूँ तथा इसमें संदेह भी नहीं कि सामंजस्य अपरिहार्य है। यदि यही अपरिहार्यता सहजता में परिवर्तित हो जाए तो टकराव की जड़ ही समाप्त हो जाएगी। संस्कृत की सूक्ति है- “उत्तमा सहजावस्था”। इस्लाम व हिन्दुत्व की अवधारणा का जहां तक प्रश्न है, तो छद्म-सेकुलरिज़्म का मायाजाल फैलाये राजनेताओं अथवा बहसकारों का इनमें से किसी से अधिक लेना देना नहीं है, इनके अपने निहित स्वार्थ मात्र हैं और इसी पर यह लेख केन्द्रित है। इस विषय पर भी सार्थक बहस की जा सकती है किन्तु मुझे लगता है कि इस राजनैतिक सेकुलरिज़्म से उसका उतना निष्कपट संबंध है ही नहीं!!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 6, 2013

    सहज़ता के बिना तो कुछ भी टिकाऊ नहीं हो सकता । राजनीति ने ही सारे वातावरण को असहज़ किया है, अन्यथा लम्बे समय तक असहज़ भाव से चलते रहना किसी जीवधारी की प्रवृत्ति नहीं है । जहाँ भी रिश्ते सामान्य हैं, वहाँ कुछ भी असहज़ नहीं है । विभाजन एक गैरज़रूरी कार्यवाही थी, जो दोनों सम्प्रदाय के महत्वाकांक्षी नेताओं के कारण सम्पन्न हुई । दोनों को पीएम बनना था, अत: बँटवारे की प्रक्रिया भी कुछ-कुछ अंग्रेज़ों के ट्रान्सफ़र आफ़ पावर की तरह किसी गुप्त समझौते के तहत हुई हो, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये । यदि ऐसा नहीं था, तो जबतक एक भी मुसलमान इस पार रह जाता, दोनों सरहदों को बँटवारे की कार्यवाही अधूरी लगनी चाहिये थी । स्पष्टतया दोनों पक्ष को सिर्फ़ राज करने से मतलब था, आबादी चाहे जैसी और जितनी हो । महात्मा गाँधी को दोनों की जिद के आगे झुकने पर मजबूर होना पड़ा, और उसके बाद का उनका जीवन एक ज़िन्दा लाश की तरह गुज़रा, यह सभी जानते हैं । इन्होंने एक अविवेकपूर्ण विभाजन को अंजाम देकर एक लम्बे उलझाव का वरण किया, जिसका नतीज़ा है कि दो भाइयों की कभी खत्म न होने वाली लड़ाई में चीन चौधरी बन गया है । कश्मीर मामला ऊपर से बँटवारे के बाई प्रोडक्ट के रूप में आ गिरा । अन्यथा आज हमारी स्थिति कुछ और होती । विभाजन प्रक्रिया के साथ जो खाई बनी, उसके कारण एक साथ मिलकर आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले दोनों सम्प्रदाय भावनात्मक रूप से दिन प्रतिदिन एक दूसरे से दूर होते चले जा रहे हैं । अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद इस दूरी में खाद-पानी देने का काम कर रहा है । जब यहाँ पाकिस्तान से अधिक मुस्लिम आबादी है ही, तो फ़िर इन सरहदों का कोई मतलब नहीं है, इन्हें गिराकर एकसाथ विकास की राह पर बढ़ना ही दोनों कौमों के लिये श्रेयस्कर है । इस दिशा में बुद्धिजीवियों को पहल करनी चाहिये ।

    jlsingh के द्वारा
    March 8, 2013

    देश को आज विकास की ज़रूरत है । युवावर्ग इस सच्चाई से बा-खबर है, चाहे वह हिन्दू हो, या मुसलमान, सिख हो, या ईसाई । आज इस कटु सत्य से सभी वाक़िफ़ हो चुके हैं कि विकास हर वर्ग, जाति और सम्प्रदाय की प्राथमिक ज़रूरत है । इसी से सभी को रोटी-कपड़ा और मकान मयस्सर होना है, न कि जाति, धर्म और सम्प्रदायवादी चिकनी चुपड़ी बातों से । भ्रष्टाचारियों को तो हर हाल में सिंहासन खाली करना ही होगा । आने वाला समय सिर्फ़ विकास-पुरुषों की ही बातें सुनेगा । किसी भी हिन्दू, मुसलमान या जातिवादी की अब एक नहीं चलने वाली है । अच्छे लेख के लिये बधाई । परम आदरणीय शाही साहब और प्रिय वासुदेव जी, आप दोनों की बौधिक क्षमता के बारे में विश्लेषण करने की सामर्थ्य मुझमे नहीं है – पर शाही जी की उपर्युक्त टिप्पणी जिसे मैंने यहाँ कॉपी पेस्ट किया है से किसी को भी ऐतराज नहीं होना चाहिए! विकास के साथ अगर हम अपनी अपनी आस्था के साथ अपरिहार्य रूप से बंधे भी रहें तो क्या फर्क पड़ता है! बहरहाल यह आलेख एक स्वस्थ परिचर्चा क विषय हो सकता है … पर इसमे कोई संदेह नहीं कि देश को परिवर्तन की जरूरत है. पर अगर मुलायम सरीखे अवसर वादी अगर भाजपा की तरफ रुख करेंगे तो अंजाम क्या होगा? वही न, जो आज अखिलेश यादव को राजा भैया को साथ रखने से हो रहा है! भाजपा और मोदी जी को जनता के मूल भूत मुद्दे को ही सामने रखकर चलना चाहिए, ऐसी मेरी मान्यता है! आप दोनों का बहुत बहुत आभार! मंच पर मंजे हुए लोगों के पुनरागमन से हम जैसे लोगों का उत्साह बढ़ता है! वासुदेव जी को यहीं पर ‘ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ सम्मान के लिए बधाई दे दे रहा हूँ!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 8, 2013

    श्रद्धेय सिंह साहब, वैचारिक समर्थन के लिये आभार प्रकट करना चाहूँगा । आपने सौ बात की जो एक बात की है, अर्थात ‘देश को आज परिवर्तन की ज़रूरत है’, वही मेरा भी प्रमुख मंतव्य है । परन्तु ऊपर की टिप्पणियों जैसे कुछ विद्वान एवं ऊर्जावान पुरुष बिना अभिप्राय को ठीक से समझे जब पूर्वाग्रहग्रस्त होकर विषयान्तर के माध्यम से अपनी बात रखने का प्रयास करने लगते हैं, तो उनमें और इस्लामिक आतंकवाद के समर्थक विचारों में फ़र्क़ कर पाना बड़ा कठिन हो जाता है । काफ़ी पूर्व मैंने इसी मंच पर अपने इन्हीं विचारों को ‘हिन्दू-मुस्लिम और हिन्दुस्तान’ शीर्षक वाले ब्लाग के माध्यम से प्रकट किया था, जिसपर बड़ी लम्बी बहस चली थी । परन्तु आश्चर्यजनक यह रहा कि अनुपात में मेरे विचारों का समर्थन करने वालों की संख्या अधिक थी । गाँधी, भगत, अशफ़ाक़ या चन्द्रशेखर आज़ाद जैसे महापुरुषों के प्रशंसक और आलोचक दोनों ही उनके जीवनकाल में भी थे, और मरणोपरांत भी होते आए हैं । किसी का समर्थक या आलोचक होना जितना आसान है, खुद उनके जैसा बन पाना या उनके विचारों कृत्यों को आत्मसात कर अपने जीवन में उतारकर दिखा पाना उतना ही कठिन । परन्तु यहाँ आज के संदर्भ में वास्तविक समस्या यह नहीं है कि गाँधी की नीतियाँ हमारे लिये कितनी नुकसानदेह थीं और कितनी पाकिस्तान परस्त, न ही इस बात से आज कोई फ़र्क़ पड़ने वाला है कि नेहरू ने राजा हरी सिंह को कितनी गालियाँ सुनाई थीं । हम मात्र संदर्भवश उनकी चर्चा भर कर सकते हैं, जिससे आज की परिस्थितियों को समझने और उनका समाधान निकाल पाने की दिशा में कुछ हासिल कर सकें । कम से कम शब्दों में यदि स्पष्ट करना चाहूँ, तो वही कहूँगा जो उस समय कहा था । अर्थात अन्तर्राष्ट्रीय इस्लामिक आतंकवाद को अपने देश में और जड़ें जमाने से रोकने का उपाय यह नहीं है कि उनके समानान्तर हिन्दू आतंकवाद का तानाबाना खड़ा करने का कोई प्रयास हो, या इस्लामिक विचारधारा की आलोचनाएँ कर अपनी भड़ास निकाली जाय । हिन्दू या मुस्लिम विचारों से जुड़े कुछ व्यक्ति या समूह को हमला कर समाप्त किया जा सकता है, किसी विचार को आज तक समाप्त नहीं किया जा सका । गाँधी खुद एक विचार के रूप में विश्व-स्तर पर स्थापित हैं, किसी की आलोचना से उनके विचारों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है । जब तक कोई विचार प्रासंगिक है, उसके अनुयाइयों को पैदा होने, फ़लने और फ़ूलने से रोका नहीं जा सकता । भारत में आज जो मुस्लिम आबादी है, कोई शेखचिल्ली नुमा व्यक्ति ही ऐसी कल्पना कर सकता है कि उसके चाहने से मुसलमान अपना बोरिया बिस्तर समेटकर देश के बाहर जाकर कहीं शरण ले लेंगे, और वह आराम से यहाँ हिन्दूराष्ट्र बना लेगा । जब सच्चाई है कि यह दिवास्वप्न हक़ीक़त नहीं बन सकता, तो फ़िर दो ही रास्ते हैं, जिससे समस्या समाप्त की जा सकती है । पहला रास्ता यह कि एक और विभाजन स्वीकार करते हुए देश को एक बार पुन: दो टुकड़े कर हिन्दू-मुसलमानों में आबादी के हिसाब से तक़सीम कर झंझट खत्म किया जाय, जबकि दूसरा और अंतिम रास्ता यह होगा कि दोनों कौमें एकदूसरे के साथ मिलजुल कर रहना सीख लें, एक दूसरे के धर्म और मूल्य-मान्यताओं के प्रति सम्मान व समभाव रखते हुए कंधे से कंधा मिलाकर देश के विकास में बढ़-चढ़ कर अपना योगदान करें । समस्या यह भी है कि जब पाकिस्तान हमने बनवा ही डाला है, तो उसके वज़ूद में रहते न तो कभी हिन्दुस्तान फ़ल-फ़ूल सकता है, न ही पाकिस्तान । बीच में चाँदी हमेशा विदेशी व्यापारियों की ही कटेगी, चाहे अमेरिका हो या चीन । पाकिस्तान रहेगा, तो उसको मोहरा बनाकर इस्लामिक आतंकवाद दोनों मुल्कों की नाक में दम करके रखेगा । भारत में जब-जब भी ये हमारे ही देश से खरीदे गए गुमराह नौजवानों के माध्यम से विस्फ़ोटों को अंजाम देंगे, तो दंगे भले न हों, आपसी गलतफ़हमी और अ-विश्वास की खाई और चौड़ी होती जाएगी, नतीज़तन एक ही सीमा के अन्दर हमारा मुल्क हमेशा दो खेमों में बँटा हुआ नज़र आएगा । विकास अवरुद्ध रहेगा, देश आतंकवादियों की तलाश में छापे मारेगा, गलतफ़हमियाँ और बढ़ेंगी । पाकिस्तान भी कम त्रस्त नहीं है । बारूद के ढेर पर ज़बरन बिठाकर रखे गए एक निरीह बबुए में तब्दील हो चुका है । ऐसा ही माहौल शीत-युद्ध और उसके बाद भी पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन के दर्म्यान भी था । समय ने दोनों को सद्बुद्धि दी, और दीवार गिराकर आज दोनों ही सुकून के साथ जी रहे हैं । उसी तर्ज़ पर मेरा सुझाव है कि इस अविवेकपूर्ण विभाजन को नकार कर एक ही मिट्टी के इन दो टुकड़ों को जोड़े बिना इस भूखंड का जीवन सामान्य नहीं हो सकता । धन्यवाद ।

    vasudev tripathi के द्वारा
    March 8, 2013

    आदरणीय शाही जी व जवाहर जी, हार्दिक आभार लेख पर स्वस्थ चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए। आप दोनों वरिष्ठ लोगों के वैचारिक अभिप्राय से मैं सहमत हूँ कि अशांति के विरुद्ध शांति व अविश्वास के विरुद्ध विश्वास ही एकमात्र विकल्प होना चाहिए। मेरा दृढ़ता से मानना है कि राष्ट्र सर्वोपरि होना चाहिए। शाही जी, आपकी प्रतिक्रियायों में कई जगह मैं ऐतिहासिक व तथ्यगत आधार पर सहमत नहीं हूँ, जैसे कि पाकिस्तान के निर्माण के संदर्भ में कारकों व उत्प्रेरकों के विषय पर.! मेरा मानना है कि इतिहास व वर्तमान के दो पहलू होते हैं, पहला कि जैसा होना चाहिए, दूसरा जैसा है अथवा था.! जब हम होने की आदर्श स्थिति में अपनी श्रद्धा के चलते उसे यथार्थ के स्थान पर निरूपित अथवा स्थापित करने लगते हैं तब हम भूल कर रहे होते हैं। उससे हम सच को कभी जान नहीं पाते परिणाम स्वरूप समस्या का निराकरण संभव नहीं हो पाता। आदर्श परिभाषाओं के स्थान पर कड़वे से कड़वे यथार्थ को स्वीकार किया जाना चाहिए, तभी वह आदर्श स्थिति प्राप्त की जा सकती है जो हमें चाहिए। व्यस्तता के चलते मैं आपके साथ उतने विस्तार से चर्चा में भाग नहीं ले पाया जितना कि मुझे लेना चाहिए था, लेख से थोड़ा इतर जो विषय आपने उठाए उन पर केन्द्रित कभी पृथक लेख के माध्यम से हम यह चर्चा विस्तार से आगे बढ़ाएँगे, और निश्चय ही आप वरिष्ठों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा ऐसी मुझे आशा है। ….साभार!!


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