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ड्रैगन के सामने समर्पण की रणनीति

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15 अप्रैल को चीनी सेना ने भारतीय नियंत्रण सीमा में लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में 19 किमी भीतर घुसपैठ करते हुए अपने पाँच तम्बू गाड़ दिये थे, परिणामस्वरूप सीमा के दोनों ओर लगभग बीस दिनों तक एक गहरे तनाव का वातावरण बना रहा। कई दौर की बातचीत एवं सुलह-समझौतों के बाद भले ही चीनी सेना वापस अपनी सीमा में चली गई हो लेकिन इसे भारत की किसी बड़ी जीत अथवा कूटनीतिक सफलता के रूप में जल्दबाज़ी में परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए। एक ऐसी कल्पित सफलता, जिसमें हमें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ, पर उल्लास के स्थान के पर समय मंथन व चिंतन का है कि आखिर ऐसी स्थिति उत्पन्न ही क्यों हुई.? इसके लिए तात्कालिक ही नहीं पुरानी कूटनीतिक व रणनीतिक असफलताओं व चूकों पर भी ईमानदारी से विचार होना चाहिए।

भारतीय सीमा में 19 किमी चीनी घुसपैठ न चीन की उद्देश्यहीन चूक थी और न ही 20-25 किमी के भारतीय परिक्षेत्र को हड़पने का प्रयास.! भारतीय नीतिकार भले ही चीनी सेना की वापसी पर अपनी पीठ ठोंक लें किन्तु सच्चाई यह है कि चीन वह अपने साथ ले जा चुका है जो वो लेने आया था। 15 अप्रैल को चीन भारत के दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में घुसा था और सूचना होते ही 16 अप्रैल को भारत ने अपना विरोध दर्ज कराते हुए चीन से सेना वापसी की मांग कर डाली थी। 18 अप्रैल को दोनों देशों की सेनाओं के बींच हुई पहली फ्लैग मीटिंग निष्कर्षहीन रही। इसके बाद की सभी फ्लैग मीटिंग से भी कोई रास्ता नहीं निकल सका। मान्य सीमा के 19 किमी एक ऐसे देश की सेना की घुसपैठ जिसके साथ सीमा को लेकर हमारा कड़वा अनुभव रहा है निश्चित रूप से एक सामान्य घटना नहीं थी जिसकी उपेक्षा की जा सकती हो, देश के भीतर फैला व्यापक जनाक्रोश इस घटनाक्रम की संवेदनशीलता को व्यक्त करने के पर्याप्त था। राष्ट्र की संप्रभुता, जिसे कि भारतीय संविधान ने अपनी भावना के भीतर स्थान दिया है, राष्ट्र की आत्मा का सर्वोच्च व सर्व-प्राथमिक प्रश्न है। किन्तु दुर्भाग्य से भारत सरकार ने आश्चर्य व विडम्बनापूर्ण तरीके से चीन के सुर में सुर मिलाते हुए 20 अप्रैल को इस गंभीर मसले को स्थानीय समस्या कहकर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया। जनता, विपक्ष व मीडिया के घोर दबाब के बावजूद सरकार घुसपैठ को महत्व न देते हुए 2 मई तक विदेश मंत्री की चीन यात्रा को सुनिर्धारित बताती रही। सीमा सुरक्षा जैसे एक गंभीरतम विषय पर सरकार के ऐसे लचर, लाचार, जनभावना विरोधी व कूटनीति से मीलों दूर कदम इतिहास में चूक के रूप में नहीं वरन घोर मूर्खता के रूप में अंकित किए जाते हैं! यही कारण है कि हमें आज फिर पलटकर इतिहास की ओर देखने की देखने व सीखने की आवश्यकता है।

1962 के युद्ध में मिली शर्मनाक हार नेहरू व उनके सहयोगियों की ऐसी ही मूर्खता का परिणाम थी जिसमें भारत को अपना लगभग 38,000 वर्ग किमी क्षेत्र चीन के हाथों गंवाना पड़ा था। किन्तु चीन का भारत के प्रति कुटिलतापूर्ण रवैया 1962 के बाद भी जारी रहा, और निःसन्देह अधिकांश मौकों पर भारत की लचर नीतियाँ भी! 1962 की पराजय के बाद भारत लंबे समय तक कोई प्रतिक्रिया देने अथवा दबाब बनाने की स्थिति में ही नहीं था अतः इन परिस्थितियों में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा 1988 में किया गया चीन का दौरा एक सकारात्मक शुरुआत थी जोकि नेहरू द्वारा किए गए अनर्थ की भरपाई के लिए एकमात्र कदम हो सकता था। परिणामस्वरूप दोनों देशों ने सीमा संबंधी समस्या को नए सिरे से स्वीकारा और समाधान के लिए प्रतिबद्धता जताई। 1991 में चीनी प्रधानमंत्री ने भी भारत यात्रा की और सीमा समस्या को सुलझाने की बात दोहराई गई। किन्तु भारत-चीन सम्बन्धों में वास्तविक प्रगति नरसिम्हा राव के कार्यकाल में हुई और 1993 में दोनों देशों ने सीमा पर शांति बनाए रखने के समझौते पर हस्ताक्षर किए और विशेषज्ञों के एक समूह को संभावित समाधान तलाशने के लिए नियुक्त किया गया। परिणामस्वरूप आगे पूर्वोत्तर सीमा पर कई पोस्टों से दोनों देशों की सेना हटाये जाने जैसे महत्वपूर्ण निर्णय हुए। यह प्रगति एक प्रारम्भ मात्र थी जिसे किसी सफलता के रूप में नहीं वरन सफलता प्राप्ति के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए था जिसके द्वारा एक एक करके भारत के हित साधे जा सकते थे, दुर्भाग्य से भारतीय नीतिनिर्धारक ऐसा नहीं कर सके। किन्तु चीन बखूबी जानता था कि उसे भारत से क्या चाहिए और तीन दशकों से ठंडे पड़े रिश्तों की नयी शुरुआत को अपने फायदे के लिए बखूबी प्रयोग किया।

चीन ने भारत के साथ रिश्तों को सामान्य करने की आड़ में दो बड़े व महत्वपूर्ण हित साधे; पहला व्यापारिक व दूसरा सीमा संबंधी। व्यापार के क्षेत्र में जहां चीन ने भारत को अपने बाज़ार के रूप में छोटे बड़े सामानों से पाट दिया और अरबों डॉलर का शुद्ध लाभ अपने विकास के लिए निकाला वहीं भारत निर्यात के मामले में पूर्णतः असंतुलित व्यापार की चपेट में है। सीमा विवाद के मुद्दे पर भी भारत सभी सौदों में घाटे में ही रहा है। उदाहरण के लिए कश्मीर के अक्साई चिन मसले पर भारत वहीं खड़ा है किन्तु चीन अरुणाचल प्रदेश पर लगातार दबाब बढ़ाता जा रहा है। 1993 की शुरुआत के एक दशक बाद भी सीमा विवाद पर भारत अपने किसी भी दावे को मजबूत नहीं कर सका, यद्यपि चीन द्वारा कब्जे में लिए गए कैलाश मानसरोवर को तीर्थयात्रा के लिए अवश्य खोला गया। 2003 में एक बार फिर भारत-चीन संबंधों में एक नई शुरुआत देखने को मिली और विशेष प्रतिनिधियों के स्तर पर वार्ताएं आयोजित हुईं और परिणामस्वरूप चीन ने पहली बार सिक्किम को भारतीय प्रदेश स्वीकारते हुए भारत के मानचित्र में दिखाया। किन्तु भारत ने इसके लिए एक बड़ी कूटनीतिक कीमत चुकाई और तिब्बत को चीन का अभिन्न भाग स्वीकार कर लिया। निश्चित रूप से यह बड़े घाटे का सौदा नहीं होता यदि भारत सरकार सिक्किम के साथ साथ कम से कम अरुणाचल प्रदेश और केंद्रीय सैक्टर के क्षेत्रों, जोकि भारतीय नियंत्रण में ही हैं, को भारतीय क्षेत्र स्वीकार करवा लेती। फिर हम वेस्टर्न सैक्टर मे चीनी अधिकृत भारतीय क्षेत्र को विवाद और समझौते का केंद्र बना सकते थे। किन्तु यही पूरे इतिहास में भारतीय पक्ष की सबसे बड़ी कूटनीतिक असफलता रही है कि भारत ने समझौता उस पर किया जो उसका अपना है और उसके नियंत्रण में भी है, और वह भी अधूरा समझौता! इस तरह चीन को भारतीय पक्ष ने अपने आप बढ़त व दबाब बनाने की स्थिति में पहुंचा दिया। इसी गलती को भारत ने 2013 में फिर दौलत बेग ओल्डी में दोहराया है।

भारत सरकार भले ही मुंह चुराने के लिए स्थिति साफ नहीं कर रही हो किन्तु जितना अब तक स्पष्ट हो सका है उसके आधार पर चीनी सेना के भारतीय क्षेत्र से हटने के लिए भारत को चीन की मांगों के सामने घुटने टेकने पड़े। भारतीय सीमा में सेना की चुमार पोस्ट को खाली करने व वहाँ बनाए गए बंकर हटाने के लिए भारत को तैयार होना पड़ा। चुमार भारतीय सैन्य दृष्टिकोण अत्यधिक महत्वपूर्ण पोस्ट है जहां से काराकोरम के उस पार चीन द्वारा बनाए गए हाइवेज़ पर चीनी सेना की गतिविधि पर नजर रखी जा सकती है किन्तु चीन अपने क्षेत्र से इस ओर नहीं देख पाता। यह पोस्ट पीपल्स लिबरेशन आर्मी को अत्यधिक खटक रही थी। इसी तरह सम्पूर्ण भारतीय सीमा पर सैन्य दृष्टि से विशाल इनफ्रास्ट्रक्चर बना चुके चीन को पिछले तीन चार सालों से भारतीय सेना द्वारा बनाई जा रही सड़कों व हवाईपट्टियों पर गहरी आपत्ति है।

भारत ने यदि चीन की शर्तों को मानते हुए ऐसे कुछ भी समझौते किए हैं तो निश्चित रूप से उसने भविष्य के लिए चीन को ऐसी घुसपैठों व अन्य समानान्तर तरीकों से भारत को मजबूर करने का निमंत्रण दे दिया है। मैंने लिखा कि चीन जिस उद्देश्य के लिए दौलत बेग ओल्डी में घुसा उसे वह पाकर निकला है। पहला; भारत के प्रतिरोधहीन लचर नेतृत्व की कलई खोलकर चीन ने न सिर्फ भारतीय पक्ष पर अपना दबाब स्पष्ट कर दिया वरन भारत को मजबूर कर मनमुताबिक सौदेबाजी का एक और रास्ता खोज निकाला है, दूसरा; चुमार जैसी रणनीतिक पोस्ट को खाली कराने में सफलता प्राप्त करने के साथ साथ भारत को ऐसे किसी निर्माण के विरुद्ध चेतावनी दे दी है, तीसरा; बिना किसी सैन्य कार्यवाही के भारतीय सेना को अपने ही क्षेत्र से पीछे हटने को मजबूर कर भारतीय नियंत्रण वाले क्षेत्र को विवादित चित्रित करने में सफलता पा ली है। अब भविष्य में जब कभी भारत अक्साइ चिन की बात उठाएगा चीन भारत के इस क्षेत्र पर ही सवाल उठाकर उसे रक्षात्मक भूमिका में आने को मजबूर करेगा। यही चीन की रणनीति रही है और इसी के तहत भारत को दबाब में लाने के लिए उसकी ओर से भारतीय सीमा में घुसपैठ होती है, अरुणाचल प्रदेश के सरकारी अधिकारी को वीजा देने से इन्कार किया जाता है, कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताकर स्टेपल वीजा जारी किया जाता है, भारतीय सेना के अधिकारी जनरल जसवाल को वीजा देने से इन्कार किया जाता है और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अरुणाचल प्रदेश यात्रा का चीन यह कहकर विरोध करता है कि भारतीय प्रधानमंत्री चीनी क्षेत्र में अनाधिकृत प्रवेश कर रहे हैं। इन सब के बाद भी भारत सरकार सख्त संदेश तक देने की हिम्मत नहीं जुटा पाती, उल्टे ब्रह्मपुत्र पर चीन द्वारा बांध बनाने जैसे गंभीर मुद्दे पर लंबे समय तक देश की जानता को ही गुमराह करके रखती है!

1962 से लेकर 2013 तक एक के बाद एक की गई गलतियों के बाद भारत के पास सीमित विकल्प बचे हैं और उन सभी विकल्पों के लिए प्रबुद्ध कूटनीति व निर्णायक इच्छाशक्ति वाले नेतृत्व की आवश्यकता है। सबसे पहले भारत को स्पष्ट कर देना चाहिए कि यदि चीन अरुणाचल प्रदेश समेत भारत के किसी भी हिस्से पर सवाल उठाता है तो भारत तिब्बत पर अपने रुख पर पुनर्विचार करने के लिए विवश होगा। दूसरा, चीन के किसी अतिक्रमण या घुड़की के जबाब में सरकार को चीनी दोस्ती का नेहरू राग अलापना बंद करके दृढ़ता से देश की जानता को आश्वासन देना चाहिए कि भारत परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है और किसी भी स्थिति में देश की सीमाओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है ताकि चीन तक भारत के सख्त रुख का संदेश जाए। इसके अतिरिक्त जापान सहित पूर्वोत्तर के वियतनाम जैसे उन सभी देशों के साथ सम्बन्धों को वरीयता से सुदृढ़ करना चाहिए व उनकी चीन विरोधी स्थिति को उसी प्रकार भुनाना चाहिए जैसे चीन पाकिस्तान में करता है। वर्तमान में ईरान व उत्तर कोरिया जैसे मुद्दों पर अमेरिका इस्राइल आदि के साथ कूटनीतिक तरीकों से चीन को विपरीत ध्रुव पर पहुंचाना चाहिए व उसकी वर्तमान स्थिति को भुनाना चाहिए। साथ ही रूस के सम्बन्धों को समानान्तर तरीके से मजबूत करना होगा। इसके अतिरिक्त सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, सैन्य आत्मनिर्भरता व व्यापार। व्यापार में 2011-12 में भारत का चीन को मात्र निर्यात 17.90 अरब अमेरिकी डॉलर रहा जबकि चीन ने भारत को 57.55 अरब अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया। इस वर्ष भारत के निर्यात में 19.6% की तीव्र कमी हुई। हम चीन को खनिज, दुर्लभ मृदा तत्व व कॉटन आदि कच्चा माल बेंचते हैं और बदले में सजावट से लेकर मशीन तक बना बनाया माल खरीदते हैं। इस असंतुलन को न सिर्फ हमें पाटना होगा वरन यह समझते हुए कि भारतीय बाज़ार चीन की बड़ी आर्थिक ताकत है और चीन इसे खोना कभी नहीं चाहेगा। अतः चीन के किसी भी अवांछनीय कदम उठाते ही हमें इस बात का दृढ़ संदेश देना चाहिए कि यदि सीमा संबंधी भारतीय हितों पर आंच आती है तो ऐसे में चीन के साथ व्यापारिक संबंध बिलकुल कायम नहीं रखे जा सकते! चीन को होने वाला भारतीय अधिकांश निर्यात दुर्लभ मृदा तत्व जैसे कच्चे माल का है जिसके लिए भारत के पास और भी बाज़ार हैं जिन्हें भारत को जापान आदि में तलाशना चाहिए। आवश्यकता तो यह है कि व्यापार के दांव को भारत चीन अधिकृत कश्मीर के लिए भी सफलतापूर्वक प्रयोग करे लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि भारत सैन्य व व्यापारिक दोनों रूप से आत्मनिर्भर बने।

निश्चित रूप से ये कूटनीतिक तीर भारत के तरकश में अभी भी बचे हुए हैं लेकिन प्रश्न यह है कि वो धनुर्धर अभी हमारे पास कहाँ है जो इनका सधा प्रयोग कर सके। वैश्विक राजनीति में हर कूटनीतिक तीर का या तो आपको लाभ उठाना आना चाहिए अन्यथा उसी से आप क्षति भुगतने के लिए तैयार रहें।

.

-वासुदेव त्रिपाठी

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44 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

prashant choubey के द्वारा
May 16, 2013

अक्षरशः सत्य तो यह है कि चीन, भारत को ओल्डी बेग से भगाने आया है। वह ओल्डी बेग यहाँ से भारत चीन की गतिविधियाँ देख सकता है पर चीन भारत को नहीं देख सकता। चीन अपने कुर्कमों को बन्द करने के बजाय पड़ोसी देशों को परदे लगाने की सलाह दे रहा हैैोो

aman kumar के द्वारा
May 14, 2013

निश्चित रूप से ये कूटनीतिक तीर भारत के तरकश में अभी भी बचे हुए हैं लेकिन प्रश्न यह है कि वो धनुर्धर अभी हमारे पास कहाँ है जो इनका सधा प्रयोग कर सके। वैश्विक राजनीति में हर कूटनीतिक तीर का या तो आपको लाभ उठाना आना चाहिए अन्यथा उसी से आप क्षति भुगतने के लिए तैयार रहें। किस को फुर्सत है ? सत्ता को अपनी खुद की ये चिंता है की बनी रहे ! विपक्ष को सत्ता चाहयिये जनता रोजी -रोटी मे लगी है …….कोण करे क्या करे ?

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 13, 2013

बेस्ट ब्लोगर हेतु हार्दिक बधाई

yatindrapandey के द्वारा
May 11, 2013

हैलो सर, बेहतरीन प्रस्तुति बेस्ट ब्लोगेर के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करे यतीन्द्र

ashokkumardubey के द्वारा
May 11, 2013

जब चीन भारत से ३ गुना ज्यादा निर्यात करता है और भारत एक साधारण सीमा विवाद सुलझाने में इतना समय लगाता है फिर इसे कुटनीतिक विफलता ही कहेंगे वरना भारत को चाहिए चीन को आर्थिक पटकनिया लगाये एक तरफ चीन भारत से आर्थिक लाभ भी उठा रहा है और सीमा पर हमारे क्षेत्र में घुसपैठ भी कर रहा है, जरुर अपनी विदेश निति में खामियां हैं किस पडोसी के साथ कैसे ब्यवहार किया जाये यह भारत को चीन से सीखना पड़ेगा बेस्ट ब्लागर चुने जाने पर आपको बधाई आपका लेख बेस्ट ब्लागर के उपयुक्त है ही

alkargupta1 के द्वारा
May 11, 2013

सम्मान हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें वासुदेव जी

Himanshu Nirbhay के द्वारा
May 10, 2013

प्रिय वासुदेव जी, सार्थक विश्लेषण, व बेस्ट ब्लॊगर के लिए बधाई

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार हिमांशु जी।

jlsingh के द्वारा
May 10, 2013

आदरणीय वासुदेव जी, सादर अभिवादन! विश्लेषण युक्त आलेख और बेस्ट ब्लॊगर की सम्मान हेतु बधाई!

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार जेएल जी।

omdikshit के द्वारा
May 9, 2013

वासुदेव जी, बेस्ट -ब्लागर की बधाई. त्रिपाठी जी, मैं आप की इस बात से सहमत नहीं हूँ कि नेहरु जी और उनके सहयोगियों की मूर्खता-पूर्ण नीतियों के कारण ही भारत की शर्मनाक हर हुई और हमें 38000 व० कि० का क्षेत्र गंवाना पड़ा था.आप ,उस समय की देश के अपर्याप्त सामरिक-शक्ति,नवीन हथियारों की कमी,के कारण हजारों की संख्या में मारे जा रहे हमारे सैनिकों एवं देश की आर्थिक परिस्थितियों और चीन की सामरिक-क्षमता पर भी विचार करते तो शायद इस तरह की बात नहीं करते. भारतीय सेना न तो उस समय चीन से लड़ाई जारी रखने और न तो आज शुरू करने की या उसे परास्त करने की क्षमता रखता है. आज रूस या अन्य कोई सशक्त देश भी नहीं है जो आप का साथ दे.इसलिए समस्या का समाधान कूटनीति से और बात-चीत से निकल जाय तो ही अच्छा होगा.

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    असहमत विचार पर हुआ जा सकता है तथ्य पर नहीं.! चीन युद्ध मे नेहरू व सहयोगियों की असफल नीतियां एक तथ्य है। इस पर हजारों पुस्तकें व लेख देशी विदेशी विद्वानों द्वारा लिखे जा चुके हैं। नेहरू ने चीन से हार के बाद संसद के अंदर इसे स्वीकार भी किया था। उन्होने कहा था कि हम आधुनिक विश्व को समझने मे नाकाम रहे, हम एक बनावटी माहौल मे जी रहे थे। आपने शस्त्रों की कमी का बिन्दु उठाया, लेकिन उसके लिए जिम्मेदार कौन था?? नेहरू ने अपनी तटनिरपेक्ष नीति का सूत्रपात किया, और वो इस कल्पना मे जीने लगे कि हमारा विश्व मे कोई भी शत्रु नहीं है। देश की सुरक्षा जरूरतों व हथियार फैक्ट्रीज़ को उन्होने फिजूलखर्च बताते हुए बंद करा दिया। रक्षामंत्री नेहरू के खास व्यक्ति कृष्ण मेनन थे जिन्हें कि इतिहासकार बदजुबान और सनकी कहते हैं। 1957 से विदेशमंत्री रहे मेनन की देश के प्रति अपराध मे नेहरू के साथ बराबर की भागीदारी थी। बीजी कौल उनके खास थे और उन्हें पूरी पूर्वोत्तर की कमांड सौंपी जो कि सैनिक कम एक नौकरशाह अधिक थे। हिमालय पर पहुँचकर वे बीमार पड़ गए और उन्हें दिल्ली अस्पताल मे उपचार के लिए लाया गया। अस्पताल से छुट्टी होने पर घर लाकर रखे गए, नेहरू और मेनन ने आदेश दिया कि लेफ्टिनेंट जनरल कौल अपने घर से ही युद्ध का संचालन करेंगे.!!! क्या इससे भी आगे कोई मूर्खता हो सकती है.?? मैं इसे मूर्खता ही नहीं धृष्टता भी कहता हूँ। चीन की लड़ाई 1962 की ही शुरुआत नहीं थी, चीन 1959 मे भी एक बार भारतीय सेना पर लद्दाख मे हमला कर चुका था। नेहरू इसके बाद भी देश को यही बताते रहे कि हिन्दी-चीनी भाई भाई…!! लड़ाई की बात बहुत बाद मे आती है, नेहरू की नीतियों ने भारत को खतरे मे बहुत पहले ही डाल दिया था और इसी कारण चीन की हिम्मत पड़ी भारत पर हमला करने की। अधिक लिखूंगा तो एक और लेख लिख जाएगा, आशा करता हूँ मूर्खता और असफलता सिद्ध करने के लिए यही पर्याप्त होगा। यह इतना बड़ा लेख हमला कर देने की सलाह नहीं देता, मैंने कूटनीति को ही केंद्र में रखकर इसे लिखा है। किन्तु कूटनीति केवल बातचीत करना नहीं होता। बातचीत नेहरू ने भी की और मनमोहन भी कर रहे हैं किन्तु असफल..!! इसी असफलता ने भारत का 380000 वर्ग किमी भूभाग छीना, सैन्य असफलता ने नहीं..!

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार।

    prashant choubey के द्वारा
    May 16, 2013

    हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि कृष्णा मेनन ने संसद में कहा था कि चूँकि अब हमारा कोई शत्रु नहीं इसलिए हमें हथियारों की जरूरत नहीं और उसके बाद सब बेफ्रिक होकर सोये। जब चीन ने सीमा विवाद सुलझाने को नेहरू को आमंत्रण दिया तब नेहरू मन नहीं है यार ऐसा बोलकर चीन का और संयुक्त राष्ठ्र का अपमान किया और तब चीन ने भारत को सबक सिखाने को आक्रमण किया। भारत ने 1947 में ही पाकिस्तान को हराया था तो क्या उसकी क्षमता 1962 तक बढ़ नहीं जाती। यह नेहरू की गुलाब बाँटते चलो योजना का परिणाम था। किसी ने कहा है युध की तैयारी करना युद्ध से बचने का अच्छा तरीका है

seemakanwal के द्वारा
May 9, 2013

विचारणीय चिन्तनशील सार्थक लेख . आप को बधाई साप्ताहिक सम्मान की .

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार सीमा जी।

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 9, 2013

प्रिय वासुदेव जी आप के लेख इतने आंकड़ों और विश्लेषण के साथ होते है की विचार का मुद्दा बन ही जाता है जो भी हो लगता है ड्रैगन पर इस का असर पड़ा और हमारे लोग भी जागे कुछ भागे होश में रहना जरुरी है अगर कुछ नीति नियम में गलती कभी हुयी तो आगे तो कदम सम्हाल कर रखना चाहिए हम धोखे का शिकार ही तो सदा होते रहे हैं बेस्ट ब्लागर आफ दी वीक के लिए बधाई भ्रमर ५

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    आपके विचारों से सहमत हूँ सुरेन्द्र जी। हार्दिक आभार.!

yamunapathak के द्वारा
May 9, 2013

वासुदेव जी एक अच्छे और विश्लेष्णात्मक लेख के लिए हार्दिक बधाई साभार

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार यमुना जी।!

AJAY KUMAR CHAUDHARY के द्वारा
May 9, 2013

वासुदेव भाई अभिवादन…! निःसंदेह एक कीमती लेख…! भारत सरकार के लिए अति उपयोगी. बहुत बहुत धन्यवाद.

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार अजय जी.!

nishamittal के द्वारा
May 9, 2013

बधाई सम्मान हेतु

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार आदरणीय निशा जी!

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
May 9, 2013

बेस्ट ब्लॉगर बनने पर बधाइयाँ / चीन की सिमाबिस्तार निति विश्व शांति के लिए बाधक है/

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    धन्यवाद राजेश जी.!

ऋषभ शुक्ला के द्वारा
May 9, 2013

आपका लेख बहूत ही शानदार है . आपको बेस्ट ब्लोगर का ताज मुबारक हो . विशेष Mothers Day पर मैंने एक कविता लिखी है आप सब उसे पढ़े और मेरा मार्गदर्शन करे . http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=13

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    धन्यवाद ऋषभ जी.!

aman kumar के द्वारा
May 9, 2013

आपके लेख से पूर्ण सहमती ………आपको मुबारक हो .

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार.!

sinsera के द्वारा
May 9, 2013

वासुदेव जी, नमस्कार.. नेहरु की मूर्खता भरी नीति के चलते हमने 1962 में अपना काफी क्षेत्र युद्ध में हार के गंवाया लेकिन अभी तो बिना युद्ध के ही हम लदाख का काफी हिस्सा गँवा चुके हैं…आखिर कब तक त्रुटिपूर्ण विदेश नीतियों के कारण हिंदुस्तान का नक्शा छोटा होता जायेगा……?? अपने आंकड़े बड़ी मेहनत से जुटाए, काश सुझावों को अमली जामा पहनाने का उपाय भी कोई जुटाता…. बेस्ट ब्लॉगर का ताज मुबारक हो…..

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    जो राष्ट्र अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं कर सकता वो प्रतियोगी विश्व में अपने अस्तित्व को बनाए रखने की योग्यता खो देता है! इस लेख में मैंने विश्लेषण को मैंने केंद्र में रखा है, आंकड़ों पर अधिक ध्यान नहीं दिया अन्यथा लेख विस्तृत हो जाता.! आंकड़े भी अंत में वही निष्कर्ष निकाल सकते हैं.! हार्दिक आभार!

alkargupta1 के द्वारा
May 9, 2013

वासुदेव जी , सारगर्भित और विश्लेष्णात्मक आलेख की प्रस्तुति .. साभार

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार अलका जी.!

bhagwanbabu के द्वारा
May 9, 2013

बहुत ही सार्थक व विचारणीय लेख…. पीठ के पीछे रखे छूरे को आपने दिखला दिया… धन्यवाद… . http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2013/05/05/%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%AC%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%A4-%E2%80%9C%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%A6%E2%80%9D-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82/

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार.!!

nishamittal के द्वारा
May 9, 2013

वासुदेव जी.विज्ञान का विद्यार्थी होने पर भी इतना समय और  सारगर्भित विचार ज्वलंत मुद्दों पर प्रस्तुत करना .आपकी प्रतिभा सराहनीय है.बहुत सार्थक विश्लेषण

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार निशा जी.!

shashibhushan1959 के द्वारा
May 8, 2013

आदरणीय वासुदेव जी, सादर ! “”लेकिन प्रश्न यह है कि वो धनुर्धर अभी हमारे पास कहाँ है जो इनका सधा प्रयोग कर सके।”" ?????????????????? इसी प्रश्न का उत्तर तो सभी समस्यायों की कुंजी है ! बहुत सारगर्भित रचना !

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार शशिभूषण जी.!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 8, 2013

सार्थक लेख हेतु आभार. जानकारी मिली प्रिय वासुदेव जी सस्नेह

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    हार्दिक आभार कुशवाहा जी.!

Dinesh Shukla के द्वारा
May 7, 2013

चीन की आक्रामकता,दादागिरी के समय कम्यूनिस्ट पार्टियाँ मौन रहतीं हैं । पाक का विश्वासघात मुलायम सिंह को नही दिखता । सत्ता मे रहने पर भाजपा व कांग्रेस दोनो की नीतियाँ चीन व पाक के लिये एक सी रहती हैं । देश की जनता इस प्रकार के नेतृत्व को झेलने के लिये कब तक बाध्य रहेगी ?

    vasudev tripathi के द्वारा
    May 10, 2013

    सहमत हूँ दिनेश जी.! लेकिन फिर भी भाजपा के सन्दर्भ में हमें स्वीकारना होगा कि जब २००२ में चीन ने इसी तरह की घुसपैठ की कोशिश की थी तत्कालीन भाजपा सरकार ने निह्तायत सख्ती से पेश आते हुए मामले को सुलझाया था| कांग्रेस सरकार जिस तरह देश को ही अँधेरे में रख रही है और संजीदा मामले पर चीन के सामने घुटने टेककर धूल डालने का प्रयास कर रही है वह विचित्र व घातक है| सवाल के जबाब में कि क्या उन्होंने चीनी घुसपैठ पर वहां की सरकार से सवाल उठाने व कारण जानने का प्रयास किया, चीन गए विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा है कि जो हुआ सो हुआ उस पर अब ध्यान देने व बात बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है|


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