RASHTRA BHAW

"प्रेम भी प्रतिशोध भी"

68 Posts

1377 comments

vasudev tripathi


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by: Rss Feed

इकॉनमी का डिजिटाइज़्ड कल

Posted On: 29 Oct, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

लोकल टिकेट में

1 Comment

मोदी युग का राजनैतिक गणित

Posted On: 15 Sep, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (12 votes, average: 4.67 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

13 Comments

The Paradoxes of Indian System

Posted On: 2 Sep, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Politics social issues में

1 Comment

मोदी बनाम कॉंग्रेस के चुनावी समीकरण

Posted On: 26 Jul, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Politics में

1 Comment

अंग्रेज़ियत के कबूतर-छाप रखवाले

Posted On: 20 Jul, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

3 Comments

आपदा और त्रासदी की दोहरी मार

Posted On: 4 Jul, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 4.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

12 Comments

कर्नाटक के राजनीतिक निष्कर्ष

Posted On: 9 May, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

6 Comments

ड्रैगन के सामने समर्पण की रणनीति

Posted On: 7 May, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (10 votes, average: 4.70 out of 5)
Loading ... Loading ...

पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

44 Comments

सवाल कई सरबजीतों का है

Posted On: 4 May, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

6 Comments

The Question Of National Interests

Posted On: 26 Mar, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

0 Comment

मोदी बनाम सेकुलरिज़्म का घमासान

Posted On: 5 Mar, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (12 votes, average: 4.33 out of 5)
Loading ... Loading ...

पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

50 Comments

प्रेमिका के संसर्ग में

Posted On: 16 Feb, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (8 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

8 Comments

आतंक के पैरोकार

Posted On: 15 Feb, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (9 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

18 Comments

गर्दन की कीमत समझो

Posted On: 12 Jan, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

5 Comments

बलात्कार पर दो टूक

Posted On: 3 Jan, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (9 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

4 Comments

संकट में गंगा; संकट में भविष्य

Posted On: 30 Oct, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

8 Comments

मलाला यूसफजई; विश्व को एक गंभीर सीख

Posted On: 23 Oct, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

10 Comments

जीवन है शमशान मेरा

Posted On: 20 Oct, 2012  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (11 votes, average: 4.82 out of 5)
Loading ... Loading ...

में

18 Comments

Page 1 of 41234»

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

इसके अलावा दिक्कतें दक्षिण और पूर्व के पथरीले इलाकों में भी हैं जहां भाजपा का कमल नहीं खिलता है, लेकिन अगर कर्नाटक में मोदी येदुरप्पा को पाले में ला सके और उत्तर में उत्तर प्रदेश व बिहार समेत अपने गढ़ों को बचाने में सफल रहे तो प्रधानमन्त्री की गद्दी पर फिर शायद बहुत दूर नहीं रहेगी। यदि ऐसा होता है तो भाजपा के स्वरूप परिवर्तन के बाद अगला नंबर उस तंत्र का होगा जिसे काँग्रेस ने 1947 से आज तक दिल्ली के राजपाठ में खड़ा किया है। ये काँग्रेस के गांधी परिवार के लिए भी एक बड़ी चिंता विषय होगा जिसे मोदी “दिल्ली की सल्तनत” कहते हैं, और इस चिंता के बल काँग्रेस के माथे पर अभी से देखे जा सकते हैं। इसके अलावा वर्तमान सरकार की कुव्यवस्था और जनता में परिवर्तन की चाह, मोदी की सभा में भीड़, मीडिया कवरेज सबकुछ अभीतक ठीक दिशा में जाता हुआ लग रहा है आगे तो बस यही है कि सेक्युलर की आड़ में दूसरा ध्रवीकरण न उभरे तो मोदी, भाजपा, संघ और जनसाधारण लोगों के भी सपना जरूर पूरा होगा ... इसी कामना के साथ!

के द्वारा:

आदरणीय वासुदेव जी, काफी समय बाद आप का लेख देख रहा हूँ | मोदी पर आप की गणितीय व्याख्या बड़े तार्किक तथ्यों व प्रासंगिताओं के साथ उपस्थित हुई है | 'जागरण जंक्शन' पर ऐसे सम्पादकीय पृष्ठ का स्तर साधे वैचारिक लेख प्राय: नहीं दिखाई देते --- "राजनैतिक पंडितों का बड़े-बड़े विश्लेषणों में एक बड़ा तर्क रहता है कि मोदी को सामने लाने से भ्रष्टाचार और महंगाई की बहस सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता की बहस में तब्दील हो जाएगी और काँग्रेस समेत विपक्षियों को मौका मिल जाएगा! इसका सीधा सा जबाब ये है कि विपक्षियों के इन्हीं आरोपों और मीडिया में होने वाली सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता की इन्हीं बहसों ने ही नरेन्द्र दामोदर मोदी जैसे एक मुख्यमंत्री को इतना लोकप्रिय बना दिया कि पूरी भाजपा आज नमो-नमो कर रही है।" .... सहृदय साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय जेएल जी, क्या कदम उठाने चाहिए यह एक पृथक विषय है जिस पर कम से कम एक अलग विस्तृत लेख के माध्यम से ही कुछ कहा जा सकता है। पहले समीक्षा इसी पर होनी चाहिए कि क्या जिस रास्ते पर चल रहे हैं वो सही है.?? आगे किस रास्ते पर चलें यह तो आगे का विषय होगा.!! प्रधानमन्त्री क्यों चुप हैं इसे अब बताने की आवश्यकता नहीं है, उनका हर संवेदनशील विषय पर चुप रहने का ही रेकॉर्ड रहा है। जनता के बींच से उठा हुआ अपना एक विज़न रखने वाला प्रधानमन्त्री यदि चुप्पी साधे होता तो अवश्य हमारे मन मे प्रश्न उठते.!! जहां तक संसद में हंगामे की बात है तो इसमें गलत क्या है.?? यदि सरकार इतने गंभीर व राष्ट्र को झकझोर देने वाले मुद्दे पर बात करने के लिए भी तैयार नहीं होती है और कहती है अभी जरूरी मुद्दों पर बात कर रहे हैं, इस पर शाम 3:30 के बाद बात करेंगे तो विपक्ष हँगामा नहीं तो क्या करे.?? हम क्या उम्मीद करते कि विपक्ष शाम का इंतजार करता बैठा रहता और सरकार को उसके वोट बैंक के मुद्दों के लिए समय देता.?? मैं इस मामले में भाजपा, बसपा, सपा समेत लगभग सभी पार्टियों की सराहना करता हूँ जिन्होंने सरकार को उसकी संवेदनहीनता के लिए दुत्कारा! यदि रक्षामंत्री के बेहद गैर-जिम्मेदाराना व देशविरोधी बयान की लोग आलोचना करते हैं तो कॉंग्रेस कहती कि राजनीति कर रहे हैं.!संसद क्या राजनीति नहीं पापड़ बेलने के लिए लगाई जाती है?? इन मुद्दों पर राजनीति नहीं तो किस पर राजनीति की जाए?? सरकार यदि नाकारा बनती है तो क्या चुप रहा जाये.?? क्यों राष्ट्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण ऐसे मुद्दों को ही आगे रखकर वोट मांगने न जाया जाए.?? देखेंगे तो सुरक्षा से जुड़े मसलों पर ही अन्य देशों बहस कर चुनाव होते हैं। जहां तक अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हल ढूँढने की आपकी राय है कोई भी जानकार उससे सहमत नहीं होगा। यूपीए सरकार की कश्मीर मुद्दे पर एक ही मामले में में प्रशंसा करनी होगी कि ढीली विदेशनीति के बाद भी उसने अंतर्राष्ट्रीय मंच से इस मुद्दे को बचाए रखा, जोकि 50 के दशक की भारत की बड़ी भूल थी।

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

..उत्तराखंड में आई आपदा,  प्रकृति के साथ खिलवाड़ का परिणाम है........... और मानव निर्मित ही कहूँगी मैं इसको........ जहाँ पर सडक बनने की इजाजत नहीं है वहाँ रोजाना हेलीकॉप्टरों से यात्री आ जा रहे है.... विकास के नाम पे हम विनाशलीला ही रच रहे हैं.... पैसा कमाने की अंधी दौड में कई कई मंजिला ईमारत खड़ी कर दी गयी ... नदी के मुहानो में दुकाने होटल बना दिए गए... तब भी सरकरी तन्त्र सो रहा था जब अवैध निर्माण हुआ और तब भी तब विनाश हुआ, जगा तो अब है सरकारी महकमा क्यूँ कि आपदा के नाम पे राहत कोष में धन जो बरस रहा है ..मौसम विभाग द्वारा पूर्व सुचना मिल गयी थी वहीं नासा ने २५ दिन पहले ही तस्वीर भेज दी थी जिसमे नासा ने जो चित्र जारी किए थे, उनसे साफ हो रहा है कि किस तरह केदारनाथ के ऊपर मौजूद चूराबारी व कंपेनियन ग्लेशियर की कच्ची बर्फ सामान्य से अधिक मात्रा में पानी बनकर रिसने लगी थी। फिर भी विनाश का इंतजार किया गया प्रकृति ने हमको बहुत कुछ दिया है मगर हम उसका दोहन ही कर रहे है ................उतराखंड की त्रासदी अंधाधुंध विकास की दें है सटीक विश्लेषण किया आपने वासुदेव जी

के द्वारा:

के द्वारा: prashant choubey prashant choubey

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

असहमत विचार पर हुआ जा सकता है तथ्य पर नहीं.! चीन युद्ध मे नेहरू व सहयोगियों की असफल नीतियां एक तथ्य है। इस पर हजारों पुस्तकें व लेख देशी विदेशी विद्वानों द्वारा लिखे जा चुके हैं। नेहरू ने चीन से हार के बाद संसद के अंदर इसे स्वीकार भी किया था। उन्होने कहा था कि हम आधुनिक विश्व को समझने मे नाकाम रहे, हम एक बनावटी माहौल मे जी रहे थे। आपने शस्त्रों की कमी का बिन्दु उठाया, लेकिन उसके लिए जिम्मेदार कौन था?? नेहरू ने अपनी तटनिरपेक्ष नीति का सूत्रपात किया, और वो इस कल्पना मे जीने लगे कि हमारा विश्व मे कोई भी शत्रु नहीं है। देश की सुरक्षा जरूरतों व हथियार फैक्ट्रीज़ को उन्होने फिजूलखर्च बताते हुए बंद करा दिया। रक्षामंत्री नेहरू के खास व्यक्ति कृष्ण मेनन थे जिन्हें कि इतिहासकार बदजुबान और सनकी कहते हैं। 1957 से विदेशमंत्री रहे मेनन की देश के प्रति अपराध मे नेहरू के साथ बराबर की भागीदारी थी। बीजी कौल उनके खास थे और उन्हें पूरी पूर्वोत्तर की कमांड सौंपी जो कि सैनिक कम एक नौकरशाह अधिक थे। हिमालय पर पहुँचकर वे बीमार पड़ गए और उन्हें दिल्ली अस्पताल मे उपचार के लिए लाया गया। अस्पताल से छुट्टी होने पर घर लाकर रखे गए, नेहरू और मेनन ने आदेश दिया कि लेफ्टिनेंट जनरल कौल अपने घर से ही युद्ध का संचालन करेंगे.!!! क्या इससे भी आगे कोई मूर्खता हो सकती है.?? मैं इसे मूर्खता ही नहीं धृष्टता भी कहता हूँ। चीन की लड़ाई 1962 की ही शुरुआत नहीं थी, चीन 1959 मे भी एक बार भारतीय सेना पर लद्दाख मे हमला कर चुका था। नेहरू इसके बाद भी देश को यही बताते रहे कि हिन्दी-चीनी भाई भाई...!! लड़ाई की बात बहुत बाद मे आती है, नेहरू की नीतियों ने भारत को खतरे मे बहुत पहले ही डाल दिया था और इसी कारण चीन की हिम्मत पड़ी भारत पर हमला करने की। अधिक लिखूंगा तो एक और लेख लिख जाएगा, आशा करता हूँ मूर्खता और असफलता सिद्ध करने के लिए यही पर्याप्त होगा। यह इतना बड़ा लेख हमला कर देने की सलाह नहीं देता, मैंने कूटनीति को ही केंद्र में रखकर इसे लिखा है। किन्तु कूटनीति केवल बातचीत करना नहीं होता। बातचीत नेहरू ने भी की और मनमोहन भी कर रहे हैं किन्तु असफल..!! इसी असफलता ने भारत का 380000 वर्ग किमी भूभाग छीना, सैन्य असफलता ने नहीं..!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: nishamittal nishamittal

सिंह साहब मेरे विचार से प्रश्न कांग्रेस की जड़ें हिलने का नहीं प्रश्न है,अपितु जनता के पास ठोस विकल्प का अभाव होना मुख्य कारण है..वासुदेव जी के विश्लेषण से सहमति है कि जनता ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध जाकर वोट नहीं दिया अन्यथा येदुरप्पा का समर्थन नहींमिलता.बी जे पी की विडंबना ये है कि कांग्रेस की तुलना में एक ओर तो सम्पूर्ण भारत में उसकी पहुँच नहीं,और जहाँ मित्र खोज कर सत्ता मिलती भी है तो वो प्राय तो असंतुष्ट ही होते हैं जो अतिरिक्त लोभ के कारण जुड़ते हैं और सत्ता मिलने पर वही सब कार्यों में लिप्त हो जाते हैं ,जिनका विरोध कर सत्ता में आये थे.बी जे पी भी अंतर्विरोधों के कारण एक सूत्र में बंध नहीं पा रही है और यही कांग्रेस को पुनः अवसर डेटा है और देश की स्थिति में वांछित सुधार नहीं होता.

के द्वारा: nishamittal nishamittal

वासुदेव जी, बेस्ट -ब्लागर की बधाई. त्रिपाठी जी, मैं आप की इस बात से सहमत नहीं हूँ कि नेहरु जी और उनके सहयोगियों की मूर्खता-पूर्ण नीतियों के कारण ही भारत की शर्मनाक हर हुई और हमें 38000 व० कि० का क्षेत्र गंवाना पड़ा था.आप ,उस समय की देश के अपर्याप्त सामरिक-शक्ति,नवीन हथियारों की कमी,के कारण हजारों की संख्या में मारे जा रहे हमारे सैनिकों एवं देश की आर्थिक परिस्थितियों और चीन की सामरिक-क्षमता पर भी विचार करते तो शायद इस तरह की बात नहीं करते. भारतीय सेना न तो उस समय चीन से लड़ाई जारी रखने और न तो आज शुरू करने की या उसे परास्त करने की क्षमता रखता है. आज रूस या अन्य कोई सशक्त देश भी नहीं है जो आप का साथ दे.इसलिए समस्या का समाधान कूटनीति से और बात-चीत से निकल जाय तो ही अच्छा होगा.

के द्वारा: omdikshit omdikshit

के द्वारा: nishamittal nishamittal

वासुदेव जी सबसे पाहे बेस्ट ब्लागर चुने जाने पर आपको हार्दिक बधाई आपने सेकुअरिज्म पर विस्तार से लिखा है जो आज बहुचर्चित विषय है राजनेताओं का हथियार है और बीजेपी को अछूत केवल सेकुलरिज्म के नाम पर ही सारी पार्टियाँ एकजुट होकर बीजेपी का विरोध करने पर आमादा हैं और इससे फायदा केवल कांग्रेस को होने वाला है बीजेपी के नरेन्द्र मोदी जितना मर्जी अपने विकास के फार्मूले को जनता को बताते रहें ये अल्पसंख्यक समुदाय उनके सारे दावों को चुनाव में झूठा साबीत करते नजर आयेंगे हाँ अगर हिन्दू जो बहुमत में है एकजुट होकर बीजेपी का सामर्थ्यं करे तो जरुर यह देश नरेन्द्र मोदी जैसे विकास पुरुष के नेत्रित्व में एक मजबूत राष्ट्र बनाकर पूरे विश्व में उभरेगा कम से कम अपने देश का प्रधानमंत्री एक मजबूत और अनुभवी एवं लोकप्रिय ब्यक्ति तो बनेगा पर बीजेपी का तो दुर्भाग्य है ही इस देश की जनत का महा दुर्भाग्य है जो की घोटालों में लिप्त सरकार को इस देश की राजनितिक पार्टियां एकजुट होकर भ्रष्ट कांग्रेस को हराने का प्रयास नहीं करती अब बीजे पी को ही सोचना है यह पार्टी अपने पर लगे साम्प्रदिकता का दाग कैसे धो पायेगी जबकि १९८४ के दंगों में सिख भी भरी संख्या में मरे गए पर कांग्रेस को साम्प्रदयिक कोई पार्टी नहीं कहती यह बिडम्बना नहीं तो और क्या है ?

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

त्रिपाठी जी सार्थक लेख केलिए बधाई आपने अपने ब्लॉग के माध्यम से तमाम तरह के गलतफहमियो से आम जनता के विचारो को सकारात्मक रूप से मोदी भाई के बारे में वास्तविक समझ बढ़ने और साम्प्रदायिकत तथा तथाकथित साम्प्रदायिकता के बहस को आम जनता के बीच लेन का मह्त्व्पुर्द कार्य किया है इसकी जीतनी तारीफ की जय कम है आज समय की मांग है की गैर्संप्रदयिकता का मुखौटा ओढ़े बहुरूपियो को समाज के सामने नंदा किया जाय इन देशद्रोहियो से तात्कालिक घटनाओ पर कुछ सवाल पुचा जाना चाहिए (१) पाकिस्तानी सीमा पर सर कटाने वाले के निवास पर जाने में साम्प्रदायिकता क्यों नहीं? (२)) उत्तर प्रदेश के कुंडा में हत्या के ताफ्शिस में डिप्टी एस.पी. के हत्या में मुख्यमंत्री,नेता विरोधी दल,देश के युवराज राहुल गाँधी सभी पहुचे मृतक आश्रित क्र एक नौकरी की जगह ८ अदद नौकरियो का प्रस्ताव और धन वर्षा का विवारद पत्रकारों के पास भी नहीं . (३) शाही हेमराज के विधवा ने मात्र अपने पति के सर की मांग की नतीजे में क्लुर्क की नौकरी पैसो को तो खुद लत मर चुकी थी वही मुस्लमान विधवा जो शायद संविधान के अनुसार शहीद की श्रेदी में भी नहीं /क्या देश है यह यहाँ का मानदंड क्या है बिना सीधे जनता से निर्वाचित मनमोहन आराम से देश को विदेशियो को बेचने में लगे है गेम चेंजर खेल से राजनीतिक जुआ KHELA JA RAHA है देश पर JAN DENE वाले TAJ HOTAL में LOGO की JANBACHANE वाले ऊण्णीखृईष्डाण को शहीद मानाने से इंकार ंऊष्ळींळेआघे के ओबैसी के समर्थन से सर्कार चलने वाले गैर्सम्प्र्दयिकता के चैम्पियन रोजैफ्तर में उल्लातोपी पहनने वाले गैसंप्रदायिक लगता है किसी ऐसे ही देश पर यह मुहावरा चला होगा अन्धेरपुर नगरी चौपट राजा--------

के द्वारा:

मैं अपने एक पुराने आलेख की और ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ. इस आलेख में अगर 'बुद्धिजीवी ' शब्द की जगह ' सेक्युलर ' को प्रयोग में लाया जाय तो यह आपके आलेख ' मोदी बनाम सेकुलरिज़्म का घमासान ' पर टिपण्णी के तौर पर लागू हो सकती है. अपने आलेख को मैं नीचे दुबारा प्रस्तुत कर रहा हूँ. हिंदुओं को गाली दो, बुद्धिजीवी कहलाओ रोज़ रोज़ नए नए फैशन आते रहते हैं। शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो नया फैशन नहीं अपनाना चाहेगा। फैशन के अनुसार न चलनेवाला पिछड़ा कहलाता है। जब फैशन का रिवाज़ हो तो पिछड़ा कौन कहलाना चाहेगा ! वैसे तो बुद्धिजीवी होने का फैशन कोई नया नहीं है , लेकिन फैशन की दौड़ में कोई भी पिछड़ा कहलाना क्यों चाहेगा , जबकि खासतौर से बुद्धिजीवी होना सबसे आसान है। इसके कुछ शर्तिया , अचूक , रामबाण सूत्र ( फॉर्मूले ) हैं जो कभी असफल नहीं होते हैं। इन फार्मूलों को हमारे बुद्धिजीवियों नें इजाद किया है। बुद्धिजीवी आसानी से पहचाने जा सकते हैं। हमारे बुद्धिजीवी कंधे पर झोला लटकाए , बुद्धिजीवी होने का लबादा ओढ़े जगह जगह घूमते नज़र आ जाएंगे। इसलिए इनको झोलावाला भी कहा जाता है। अगर दाढ़ी हो और आंखों में चश्मा लगा हो तब तो यह इनके बुद्धिजीवी होने का पक्का सबूत है। इनके पास बुद्धि होना कोई ज़रूरी नहीं है। बस एक गुट में शामिल होना चाहिए। गुट में शामिल होने से बुद्धिजीवी होने का प्रमाणपत्र आसानी से मिल जाता है। गुटों का काम है लोगों को बुद्धिजीवी होने का प्रमाण पात्र देना। गुट में शामिल होने से बुद्धिजीवी बनाना बहुत ही आसान हो जाता है। बुद्धिजीवी होना फैशन में शुमार है। इसके तो बहुत ही फायदे हैं। इसमें सरकारी संरक्षण , जेएनयू जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में प्रोफेसरशिप मिल जाना , समाज में प्रतिष्ठा , टीवी चैनलों में विशेषज्ञ के तौर पर भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाना इत्यादि शामिल हैं। बुद्धिजीवी समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। जैसे लोगों को ‘ सेक्युलर ‘ होने का प्रमाणपत्र बांटना , आतंकवादियों , माओवादियों के गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए कुतर्क गढ़ना , लोगों को भ्रमित करने के लिए नए नए शब्दजाल बुनना। अब आइये ‘ सेक्युलर ‘ होने के लिए इनके द्वारा ईजाद किये गए फार्मूलों पर पर विचार कर लें। आपको बस इतना करना है कि सेक्युलर बनने का सबसे आसान तरीका है, हिंदुओं को गाली देना , हिंदू परंपरा , सभ्यता और संस्कृति का अपमान करना इत्यादि। दूसरे धर्मों की नाजायज़ मांगों के सामने पलक पांवड़े बिछाना , जैसे शाहबानो के केस में भारतीय संविधान में संशोधन करवाना , वन्दे मातरम् गाने का अनुरोध करने वालों को सांप्रदायिक कहना इत्यादि। हमारे देश में मुसलामानों को एक विशेष दर्जा प्राप्त है क्योंकि उनका अपना एक सशक्त वोट बैंक है , जिसको देखकर सभी सेक्युलर राजनितिक दलों के मुंह में लार टपकने लगती है। सेक्युलर कहलाने का इससे आसान तरीका क्या हो सकता है। फैशन का फैशन और आसानी की आसानी। हमारे बुद्धिजीवियों ने सेक्युलरिज़म को एक निहायत ही नए मौलिक अंदाज़ में परिभाषित किया है। हमारे बुद्धिजीवियों नें एक नई शब्दावली का निर्माण किया है , जिसको समझना अति आवश्यक है। नई-नई परिभाषाएं गढ़ी गई हैं। नए नए सांकेतिक शब्द ( code word ) गढ़े गए हैं। आइये इस पर भी एक नज़र डाल लें। माओवादी डिक्टेटरशिप के लिए इस्तेमाल किया जाने वाले ‘ कोड वर्ड ( code word ) हैं ‘ जनवादी , ‘ ‘ जन आंदोलन ‘ ‘ जन तंत्र ‘ । इसी प्रकार ‘ मानवाधिकार ‘ का मतलब है आतंकवादियों , अपराधियों और माओवादियों द्वारा निरीह और निरपराध आम आदमियों की हत्या करने का अधिकार। बिना कोड वर्ड समझे आप इन बुद्धिजीवियों की बातों को नहीं समझ सकते। है न कितना आसान सेक्युलर और बुद्धिजीवी बनना। :

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

आदरणीय वासुदेव जी, विभिन्न दलों और नेताओं द्वारा सेकुलर होने का ढिंढोरा कोरा ढकोसला है | मुझे तो ढकोसले के विपरीत साम्प्रदायिकता का व्यंग्य-दन्त तोड़ते आक्रामक मोदी कहीं अधिक सर्वधर्म समभावी लगते हैं | उन्होंने वर्षों से साम्प्रदायिकता को लेकर व्यंग्य-बाणों के बीच से विकास का मार्ग प्रशस्त किया है और गुजरात को समृद्धि की ऊँचाई दी है | अपना घोड़ा छोड़ने, घोड़ा रोककर चुनौती देनेवाले को परास्त कर आगे बढ़ने और जहाँ तक घोड़ा जाए वहाँ तक राज हमारा की तुरही बजवाने वाले राजे-महराजे तो यहाँ से सदियों पहले विदा हो गए; किन्तु लगता है इस युग में धरती पर उनकी जगह मज़हबी आतंकवाद ने ले ली है | इन्हें विदा होने में कितना समय लगेगा और तब तक भारतीय महाद्वीप और अन्य क्षेत्रों में कितने निर्दोषों की बलि चढ़ चुकी होगी कहना कठिन है | यह स्पष्ट नहीं है कि देश-दुनिया, हमारे महान लेखक-विचारक और मीडिया के लोग हिन्दू-ह्रदय से कितनी उदारता और समभाव की अपेक्षा रखते हैं और उसकी सीमा कहाँ जाकर मानते हैं?-- कहीं हिन्दू-जनसंख्या, उसकी विद्यमानता की शून्य स्थिति पर तो नहीं ! जिस तरह राष्ट्र के समस्त शासन ने आतंकवाद के आगे नतमस्तक होकर बहिष्कृत कश्मीरी पंडितों के बिना आज के कश्मीर की स्थिति पर हस्ताक्षर-सा किया हुआ है, उससे तो यही लगता है कि भारतीय महाद्वीप में हिन्दुओं की शून्य जनसंख्या को ही उनकी वास्तविक उदारता और समभाव माना जाएगा ! अंत में उनकी शून्य जनसंख्या को ही ‘सेकुलर होने का प्रमाण-पत्र’ मिल पाएगा ! इतिहास की कवायद, महापुरुषों का चरित्र-पाठ, पुराणों-अंतर्कथाओं का वाचन आदि के उपरान्त आप किसी से दिल खोल के गले लगें या दिल फाड़ के, सवाल फिर भी है कि आखिर अकेला गला क्या करेगा? आखिर गले लगने-लगाने के लिए दूसरी ओर से भी तो कदम बढ़ना चाहिए न ! आप के ‘मोदी बनाम सेकुलरिज़्म का घमासान’- जैसे तात्विक, गंभीर लेख से ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ कॉलम तथा जागरण जंक्शन का गौरव बढ़ा है, पत्थर-सा जो उछाला है; —हृदयपूर्वक साधुवाद एवं बधाई !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आदरणीय शाही जी व जवाहर जी, हार्दिक आभार लेख पर स्वस्थ चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए। आप दोनों वरिष्ठ लोगों के वैचारिक अभिप्राय से मैं सहमत हूँ कि अशांति के विरुद्ध शांति व अविश्वास के विरुद्ध विश्वास ही एकमात्र विकल्प होना चाहिए। मेरा दृढ़ता से मानना है कि राष्ट्र सर्वोपरि होना चाहिए। शाही जी, आपकी प्रतिक्रियायों में कई जगह मैं ऐतिहासिक व तथ्यगत आधार पर सहमत नहीं हूँ, जैसे कि पाकिस्तान के निर्माण के संदर्भ में कारकों व उत्प्रेरकों के विषय पर.! मेरा मानना है कि इतिहास व वर्तमान के दो पहलू होते हैं, पहला कि जैसा होना चाहिए, दूसरा जैसा है अथवा था.! जब हम होने की आदर्श स्थिति में अपनी श्रद्धा के चलते उसे यथार्थ के स्थान पर निरूपित अथवा स्थापित करने लगते हैं तब हम भूल कर रहे होते हैं। उससे हम सच को कभी जान नहीं पाते परिणाम स्वरूप समस्या का निराकरण संभव नहीं हो पाता। आदर्श परिभाषाओं के स्थान पर कड़वे से कड़वे यथार्थ को स्वीकार किया जाना चाहिए, तभी वह आदर्श स्थिति प्राप्त की जा सकती है जो हमें चाहिए। व्यस्तता के चलते मैं आपके साथ उतने विस्तार से चर्चा में भाग नहीं ले पाया जितना कि मुझे लेना चाहिए था, लेख से थोड़ा इतर जो विषय आपने उठाए उन पर केन्द्रित कभी पृथक लेख के माध्यम से हम यह चर्चा विस्तार से आगे बढ़ाएँगे, और निश्चय ही आप वरिष्ठों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा ऐसी मुझे आशा है। ....साभार!!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

त्रिपाठी जी......सादर नमस्कार. "सांप्रदायिकता लोकतन्त्र का हिस्सा है, क्योंकि इसी सांप्रदायिकता को देश की जनता चुनती आ रही है। वास्तव में जिस सेकुलरिज़्म को उदार और लोकतान्त्रिक होना चाहिए वह अपनी संकीर्णता व दुराग्रह के चलते उपरोक्त सच को उदारतापूर्वक स्वीकार करने में सदैव हिचकता रहा है।" बहुत महत्वपूर्ण बात कही आपने. यह बात हर मोदी विरोधी के सवाल का सबसे सटीक और उचित उत्तर है. मोदी की गलतियों या दंगों में उनकी भूमिका पर तो टिपण्णी नहीं करना चाहूँगा परन्तु इस्ताना ज़रूर कहना चाहता हूँ कि देश की वर्त्तमान स्थिति को सुधारने के लिए एक कट्टर व्यक्तित्व वाले इन्सान की जरूरत है. फिर चाहे वो कट्टर हिन्दू हो या कट्टर मुस्लिम...... सुंदर लेख.. अक्सर लोग कहते है कि राजनीति के समीक्षकों की भाषा भी राजनेताओं की तरह गन्दी हो जाती है परन्तु आपका यह लेख उस बात का एक अपवाद है. सुंदर भाषा और प्रासंगिक तर्कों का अनमोल संगम..... -आयुष कुमार द्विवेदी www.ayushkumardwivedi.jagranjunction.com

के द्वारा: Ayush Kumar Dwivedi Ayush Kumar Dwivedi

श्रद्धेय सिंह साहब, वैचारिक समर्थन के लिये आभार प्रकट करना चाहूँगा । आपने सौ बात की जो एक बात की है, अर्थात 'देश को आज परिवर्तन की ज़रूरत है', वही मेरा भी प्रमुख मंतव्य है । परन्तु ऊपर की टिप्पणियों जैसे कुछ विद्वान एवं ऊर्जावान पुरुष बिना अभिप्राय को ठीक से समझे जब पूर्वाग्रहग्रस्त होकर विषयान्तर के माध्यम से अपनी बात रखने का प्रयास करने लगते हैं, तो उनमें और इस्लामिक आतंकवाद के समर्थक विचारों में फ़र्क़ कर पाना बड़ा कठिन हो जाता है । काफ़ी पूर्व मैंने इसी मंच पर अपने इन्हीं विचारों को 'हिन्दू-मुस्लिम और हिन्दुस्तान' शीर्षक वाले ब्लाग के माध्यम से प्रकट किया था, जिसपर बड़ी लम्बी बहस चली थी । परन्तु आश्चर्यजनक यह रहा कि अनुपात में मेरे विचारों का समर्थन करने वालों की संख्या अधिक थी । गाँधी, भगत, अशफ़ाक़ या चन्द्रशेखर आज़ाद जैसे महापुरुषों के प्रशंसक और आलोचक दोनों ही उनके जीवनकाल में भी थे, और मरणोपरांत भी होते आए हैं । किसी का समर्थक या आलोचक होना जितना आसान है, खुद उनके जैसा बन पाना या उनके विचारों कृत्यों को आत्मसात कर अपने जीवन में उतारकर दिखा पाना उतना ही कठिन । परन्तु यहाँ आज के संदर्भ में वास्तविक समस्या यह नहीं है कि गाँधी की नीतियाँ हमारे लिये कितनी नुकसानदेह थीं और कितनी पाकिस्तान परस्त, न ही इस बात से आज कोई फ़र्क़ पड़ने वाला है कि नेहरू ने राजा हरी सिंह को कितनी गालियाँ सुनाई थीं । हम मात्र संदर्भवश उनकी चर्चा भर कर सकते हैं, जिससे आज की परिस्थितियों को समझने और उनका समाधान निकाल पाने की दिशा में कुछ हासिल कर सकें । कम से कम शब्दों में यदि स्पष्ट करना चाहूँ, तो वही कहूँगा जो उस समय कहा था । अर्थात अन्तर्राष्ट्रीय इस्लामिक आतंकवाद को अपने देश में और जड़ें जमाने से रोकने का उपाय यह नहीं है कि उनके समानान्तर हिन्दू आतंकवाद का तानाबाना खड़ा करने का कोई प्रयास हो, या इस्लामिक विचारधारा की आलोचनाएँ कर अपनी भड़ास निकाली जाय । हिन्दू या मुस्लिम विचारों से जुड़े कुछ व्यक्ति या समूह को हमला कर समाप्त किया जा सकता है, किसी विचार को आज तक समाप्त नहीं किया जा सका । गाँधी खुद एक विचार के रूप में विश्व-स्तर पर स्थापित हैं, किसी की आलोचना से उनके विचारों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है । जब तक कोई विचार प्रासंगिक है, उसके अनुयाइयों को पैदा होने, फ़लने और फ़ूलने से रोका नहीं जा सकता । भारत में आज जो मुस्लिम आबादी है, कोई शेखचिल्ली नुमा व्यक्ति ही ऐसी कल्पना कर सकता है कि उसके चाहने से मुसलमान अपना बोरिया बिस्तर समेटकर देश के बाहर जाकर कहीं शरण ले लेंगे, और वह आराम से यहाँ हिन्दूराष्ट्र बना लेगा । जब सच्चाई है कि यह दिवास्वप्न हक़ीक़त नहीं बन सकता, तो फ़िर दो ही रास्ते हैं, जिससे समस्या समाप्त की जा सकती है । पहला रास्ता यह कि एक और विभाजन स्वीकार करते हुए देश को एक बार पुन: दो टुकड़े कर हिन्दू-मुसलमानों में आबादी के हिसाब से तक़सीम कर झंझट खत्म किया जाय, जबकि दूसरा और अंतिम रास्ता यह होगा कि दोनों कौमें एकदूसरे के साथ मिलजुल कर रहना सीख लें, एक दूसरे के धर्म और मूल्य-मान्यताओं के प्रति सम्मान व समभाव रखते हुए कंधे से कंधा मिलाकर देश के विकास में बढ़-चढ़ कर अपना योगदान करें । समस्या यह भी है कि जब पाकिस्तान हमने बनवा ही डाला है, तो उसके वज़ूद में रहते न तो कभी हिन्दुस्तान फ़ल-फ़ूल सकता है, न ही पाकिस्तान । बीच में चाँदी हमेशा विदेशी व्यापारियों की ही कटेगी, चाहे अमेरिका हो या चीन । पाकिस्तान रहेगा, तो उसको मोहरा बनाकर इस्लामिक आतंकवाद दोनों मुल्कों की नाक में दम करके रखेगा । भारत में जब-जब भी ये हमारे ही देश से खरीदे गए गुमराह नौजवानों के माध्यम से विस्फ़ोटों को अंजाम देंगे, तो दंगे भले न हों, आपसी गलतफ़हमी और अ-विश्वास की खाई और चौड़ी होती जाएगी, नतीज़तन एक ही सीमा के अन्दर हमारा मुल्क हमेशा दो खेमों में बँटा हुआ नज़र आएगा । विकास अवरुद्ध रहेगा, देश आतंकवादियों की तलाश में छापे मारेगा, गलतफ़हमियाँ और बढ़ेंगी । पाकिस्तान भी कम त्रस्त नहीं है । बारूद के ढेर पर ज़बरन बिठाकर रखे गए एक निरीह बबुए में तब्दील हो चुका है । ऐसा ही माहौल शीत-युद्ध और उसके बाद भी पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन के दर्म्यान भी था । समय ने दोनों को सद्बुद्धि दी, और दीवार गिराकर आज दोनों ही सुकून के साथ जी रहे हैं । उसी तर्ज़ पर मेरा सुझाव है कि इस अविवेकपूर्ण विभाजन को नकार कर एक ही मिट्टी के इन दो टुकड़ों को जोड़े बिना इस भूखंड का जीवन सामान्य नहीं हो सकता । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

देश को आज विकास की ज़रूरत है । युवावर्ग इस सच्चाई से बा-खबर है, चाहे वह हिन्दू हो, या मुसलमान, सिख हो, या ईसाई । आज इस कटु सत्य से सभी वाक़िफ़ हो चुके हैं कि विकास हर वर्ग, जाति और सम्प्रदाय की प्राथमिक ज़रूरत है । इसी से सभी को रोटी-कपड़ा और मकान मयस्सर होना है, न कि जाति, धर्म और सम्प्रदायवादी चिकनी चुपड़ी बातों से । भ्रष्टाचारियों को तो हर हाल में सिंहासन खाली करना ही होगा । आने वाला समय सिर्फ़ विकास-पुरुषों की ही बातें सुनेगा । किसी भी हिन्दू, मुसलमान या जातिवादी की अब एक नहीं चलने वाली है । अच्छे लेख के लिये बधाई । परम आदरणीय शाही साहब और प्रिय वासुदेव जी, आप दोनों की बौधिक क्षमता के बारे में विश्लेषण करने की सामर्थ्य मुझमे नहीं है - पर शाही जी की उपर्युक्त टिप्पणी जिसे मैंने यहाँ कॉपी पेस्ट किया है से किसी को भी ऐतराज नहीं होना चाहिए! विकास के साथ अगर हम अपनी अपनी आस्था के साथ अपरिहार्य रूप से बंधे भी रहें तो क्या फर्क पड़ता है! बहरहाल यह आलेख एक स्वस्थ परिचर्चा क विषय हो सकता है ... पर इसमे कोई संदेह नहीं कि देश को परिवर्तन की जरूरत है. पर अगर मुलायम सरीखे अवसर वादी अगर भाजपा की तरफ रुख करेंगे तो अंजाम क्या होगा? वही न, जो आज अखिलेश यादव को राजा भैया को साथ रखने से हो रहा है! भाजपा और मोदी जी को जनता के मूल भूत मुद्दे को ही सामने रखकर चलना चाहिए, ऐसी मेरी मान्यता है! आप दोनों का बहुत बहुत आभार! मंच पर मंजे हुए लोगों के पुनरागमन से हम जैसे लोगों का उत्साह बढ़ता है! वासुदेव जी को यहीं पर 'ब्लॉगर ऑफ़ द वीक' सम्मान के लिए बधाई दे दे रहा हूँ!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

प्रिय वासुदेव , आपका आलेख पढ़, मन गद गद हो उठा. एक स्तंभकार हैं श्री एस शंकर, जागरण में उन्हें पढ़ने का अवसर मिलता रहता है. जितना आत्म विभोर उन्हें पढ़ कर होता था, कदाचित उससे कुछ अधिक आज अनुभूति हुई. मेरी आकांक्षा है कि भगवान आपको दीर्घायु बनाए और इतना सामर्थ्य दे कि आप छद्म धर्मनिरपेक्षता के कुहासे में से राष्ट्र को बाहर कर पायें. मुझे लगता है कि तथ्यों को मस्तिष्क से ओझल करके जब इतिहास का विश्लेषण हम करते हैं तो एक ऐसी विकृति को जन्म देते हैं जो देश को दुर्भाग्य के गर्त में धकेल देती है. देश के रक्त रंजित विभाजन का विवेचन करते समय गांधी को क्लीन चिट देने के साथ इतना अधिक सरलीकरण करते हैं कि मु० बिन कासिम के काल से होते आये आक्रमणों , खिलाफत को समर्थन, मोपला हत्याकांड, मुस्लिम लीग का डायरेक्ट एक्शन, सन ४६ से आज तक एथनिक क्लीन्सिंग हेतु बर्बरतापूर्ण पाकिस्तानी प्रयास, ब्रिटिश एवं इस्लामी कुचक्र, गांधी का पाकिस्तानी प्रेम जिसके अंतर्गत आज की गणना से अरबों रुपये दिलवाना, नेहरु द्वारा कश्मीर में आक्रमणकारियों से अधिक राजा के प्रति शत्रुभाव और बढ़ती सेना को रोक युएनओ में मामला ले जाना , हम सभी कुछ को भुलाने की चेष्टा करते हैं, जो राष्ट्र को रसातल में ले जाने हेतु पर्याप्त है. क्या भविष्य में इन बिंदुओं पर आप तार्किक विश्लेषण करेंगे. मुझे यह भी लगता है कि हम जिस सर्वधर्म समभाव को अपना गुण मानते हैं वह वास्तव में हमारा दुर्गुण है. प्रागैतिहासिक काल में जब वेदों की रचना हुई होगी, जब हमारी पूर्वजों ने जीवन दर्शन का निरूपण किया होगा, जब इस्लाम और ईसाईयत जैसे मजहबों का आविर्भाव नहीं हुआ था, उस काल में यह दर्शन एब्सोल्यूट टर्म में भी एक गुण अवश्य था. पर उपरोक्त मजहबों के प्रादुर्भाव के पश्चात जो हमारे ऊपर समूलोच्छेदन हेतु आक्रमण होते आ रहे हैं और हमारा प्रभाव क्षेत्र सिक्द्ता जा रहा है, क्या परिवर्धन की आवश्यकता को परिलक्षित नहीं करता. आज की राजनीति में अंधाधुंध खैरात बाटने की प्रवृत्ति , जो एक प्रकार की घूस है, जो हमारी अपरिहार्य सामरिक शक्ति प्राप्त करने में बाधक है, को क़ानून द्वारा सीमित नहीं करना चाहिए. इसी प्रकार आर्थिक प्रगति को ग्रामोन्मुख बनाने, जैविक खेती, स्वास्थ्य सेवाओं का अर्थ केवल अधिक अस्पताल, अधिक अम्बुलेंस, अधिक औषधियां तक ही न हो कर स्वस्थ भोजन, तनाव रहित जीवन, हेल्थी लाइफ स्टाइल आदि पर भी ध्यान होना आवश्यक रहे ऐसी नीति के विषय पर भी आप लिखें तो प्रसन्नता होगी.

के द्वारा:

आज के सेकुलरिस्ट एक विचारधारा को ही अपराध घोषित करने के प्रयास में लोकतन्त्र के मूल से ही भटक गए हैं! सेकुलर ताकतों को यह समझने की आवश्यकता है कि जब तक वे सच को स्वीकारने का साहस नहीं दिखाते, “सेकुलरिज़्म बनाम मोदी” के घमासान में मोदी-विरोधियों का प्रत्येक दांव मोदी के पक्ष में रामबाण ही सिद्ध होता रहेगा .परन्तु वासुदेव जी एक तथ्य पर अवश्य विचार करना होगा (जो शायद आप जैसा विचार शील युवक) कर चुके होंगें की आवश्यकता है इन विजयों पर खुशियाँ मनाने से अधिक नीति निर्माण की जो वृहत स्तर पर सफलता प्रदान करे और साथ ही जिन राज्यों में आंकडा शून्य रहता है वहां भी पहुँचने की बधाई आपको सम्मान के लिए.

के द्वारा: nishamittal nishamittal

सहज़ता के बिना तो कुछ भी टिकाऊ नहीं हो सकता । राजनीति ने ही सारे वातावरण को असहज़ किया है, अन्यथा लम्बे समय तक असहज़ भाव से चलते रहना किसी जीवधारी की प्रवृत्ति नहीं है । जहाँ भी रिश्ते सामान्य हैं, वहाँ कुछ भी असहज़ नहीं है । विभाजन एक गैरज़रूरी कार्यवाही थी, जो दोनों सम्प्रदाय के महत्वाकांक्षी नेताओं के कारण सम्पन्न हुई । दोनों को पीएम बनना था, अत: बँटवारे की प्रक्रिया भी कुछ-कुछ अंग्रेज़ों के ट्रान्सफ़र आफ़ पावर की तरह किसी गुप्त समझौते के तहत हुई हो, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये । यदि ऐसा नहीं था, तो जबतक एक भी मुसलमान इस पार रह जाता, दोनों सरहदों को बँटवारे की कार्यवाही अधूरी लगनी चाहिये थी । स्पष्टतया दोनों पक्ष को सिर्फ़ राज करने से मतलब था, आबादी चाहे जैसी और जितनी हो । महात्मा गाँधी को दोनों की जिद के आगे झुकने पर मजबूर होना पड़ा, और उसके बाद का उनका जीवन एक ज़िन्दा लाश की तरह गुज़रा, यह सभी जानते हैं । इन्होंने एक अविवेकपूर्ण विभाजन को अंजाम देकर एक लम्बे उलझाव का वरण किया, जिसका नतीज़ा है कि दो भाइयों की कभी खत्म न होने वाली लड़ाई में चीन चौधरी बन गया है । कश्मीर मामला ऊपर से बँटवारे के बाई प्रोडक्ट के रूप में आ गिरा । अन्यथा आज हमारी स्थिति कुछ और होती । विभाजन प्रक्रिया के साथ जो खाई बनी, उसके कारण एक साथ मिलकर आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले दोनों सम्प्रदाय भावनात्मक रूप से दिन प्रतिदिन एक दूसरे से दूर होते चले जा रहे हैं । अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद इस दूरी में खाद-पानी देने का काम कर रहा है । जब यहाँ पाकिस्तान से अधिक मुस्लिम आबादी है ही, तो फ़िर इन सरहदों का कोई मतलब नहीं है, इन्हें गिराकर एकसाथ विकास की राह पर बढ़ना ही दोनों कौमों के लिये श्रेयस्कर है । इस दिशा में बुद्धिजीवियों को पहल करनी चाहिये ।

के द्वारा:

आदरणीय शाही जी, आपके "अपरिहार्य" संबंधी विश्लेषण से सहमत हूँ तथा इसमें संदेह भी नहीं कि सामंजस्य अपरिहार्य है। यदि यही अपरिहार्यता सहजता में परिवर्तित हो जाए तो टकराव की जड़ ही समाप्त हो जाएगी। संस्कृत की सूक्ति है- "उत्तमा सहजावस्था"। इस्लाम व हिन्दुत्व की अवधारणा का जहां तक प्रश्न है, तो छद्म-सेकुलरिज़्म का मायाजाल फैलाये राजनेताओं अथवा बहसकारों का इनमें से किसी से अधिक लेना देना नहीं है, इनके अपने निहित स्वार्थ मात्र हैं और इसी पर यह लेख केन्द्रित है। इस विषय पर भी सार्थक बहस की जा सकती है किन्तु मुझे लगता है कि इस राजनैतिक सेकुलरिज़्म से उसका उतना निष्कपट संबंध है ही नहीं!!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

इस पूर्ण असफल सरकार की कालिख से बचने के लिए सहयोगी दलों के पास भी एक मात्र सेकुलरिज़्म का ही कारगर बहाना बचा है। इन क्षेत्रीय दलों के साथ समस्या यह है कि ये केन्द्रीय सत्ता की मलाई का लालच भी छोड़ नहीं पाते और क्षेत्रीय स्तर पर नुकसान का भय भी इन्हें लगा रहता है। भले ही इनका परंपरागत मतदाता जीडीपी अथवा मुद्रा स्फीति जैसे मामलों से बहुत इत्तेफाक न रखता हो किन्तु मंहगाई की मार वोट के जातिगत घेरे को भी तोड़ने पर विवश कर सकता है जोकि अधिकांश क्षेत्रीय दलों की जीवनबूटी है।हमारी लोकतान्त्रिक संरचना का और भी अधिक दुर्भाग्य यह है कि राजनैतिक दलों से अलग देश का एक वर्ग, जो स्वयं को बौद्धिक कहलाना पसंद करता है, भी कहीं न कहीं सेकुलरिज़्म व सांप्रदायिकता पर लोकतान्त्रिक स्वीकृति से दूर बौद्धिक दुराग्रह का शिकार है।यहाँ प्रश्न सेकुलरिज़्म बनाम मोदी में से किसी को सही अथवा गलत साबित करने का नहीं है, अपितु तथ्य यह है कि संविधान की सेकुलर अवधारणा को एक “वाद” के रूप में स्थापित कर उसे एक आदर्श के स्थान पर एक दुराग्रह व राजनैतिक अवसरवाद का रूप दिया जा चुका है। आज के सेकुलरिस्ट एक विचारधारा को ही अपराध घोषित करने के प्रयास में लोकतन्त्र के मूल से ही भटक गए हैं! मैंने आपके एक एक शब्द पर गौर किया और मुझे लगता है इस मंच पर अगर कोई बेहतरीन राजनीतिक लेक लिख सकता है या लिखता है तो आपका नाम सर्व प्रथाम आएगा श्री वासुदेव जी ! छदम धर्म्निरेक्षता का ढकोसला करने वालों को सही आइना दिखाया है आपने !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

मुझे लगता है कि मेरे 'अनिवार्य' शब्द की जगह यदि 'अपरिहार्य' लिखा जाय, तो मंतव्य अधिक स्पष्ट हो पाएगा । अनिवार्य और अपरिहार्य समानार्थी शब्द हैं, फ़र्क़ मात्र यह है कि अनिवार्य जहाँ आफ़ेन्सिव चरित्र का दिखता है, वहीं अपरिहार्य डिफ़ेन्सिव । मेरा मतलब भी डिफ़ेन्सिव ही है, अर्थात जिसकी आवश्यकता को टाला नहीं जा सकता । विभिन्न मत सम्प्रदाय के अपने आंतरिक धार्मिक चरित्र हैं, जिनके हर बिन्दु सर्वमान्य बन सकें, यह कभी सम्भव नहीं हो सकता । हिन्दुत्व जहाँ सबको गले लगाने की विशालता प्रदर्शित करने की क्षमता रखता है, वहीं इस्लाम की उदारता को भी हमें बिना किसी पूर्वाग्रह के मान्यता देनी चाहिये । हम समभाव रखने के बावज़ूद जल्दी किसी को अपने सम्प्रदाय में शामिल कर पाना स्वीकार नहीं कर पाते, जबकि इस्लाम सहित कई धर्म बड़ी उदारता के साथ किसी को भी अपना धर्म स्वीकार कर उनकी मान्यतानुसार सामान्य जीवन जीने का अधिकार देने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाते । सबकी अपनी-अपनी मान्यता और जीवन-पद्धति है, जिसके साथ समन्वय स्थापित कर सह-अस्तित्व का भाव लेकर चलना हमारी आवश्यकता ही नहीं बल्कि मजबूरी है । हम कभी भी किसी वाद को स्थापित कर पाने की स्थिति में नहीं आ सकते ।

के द्वारा:

आदरणीय शाही जी, विचारशील विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार। मेरा मानना है, जैसा कि मैंने लेख में भी लिखा, कि "सर्वधर्म समभाव" राष्ट्र व संस्कृति का एक चारित्रिक गुण है, इसे किसी "वाद" के रूप में नहीं गढ़ा जाना चाहिए। जहां तक आपका कथन है कि "इसे सार्वभौमिक परिस्थितियों की अनिवार्य मांग के रूप में देखा जाना चाहिये" से भी मैं थोड़ा भिन्न सोचता हूँ क्योंकि अनिवार्य मांग के रूप में जब समाज किसी अवधारणा को लेता है तो उसमें एक कानून की सी अनुभूति होती है, अनिवार्यता में व्यक्ति सहजता के स्थान पर बंधा हुआ अनुभव करता है.! भारत ने सदियों पहले जब ईरान से भागकर आए पारसियों, सीरियाई ईसाइयों अथवा 20वीं शताब्दी में अहमदिया मुसलमानों को जब गले लगाया व शरण दी तो उसके पीछे कोई पारिस्थितिक अनिवार्यता नहीं थी, वह हमारा सांस्कृतिक चरित्र था। हमें सर्वधर्म समभाव के संदर्भ में अपने उसी उदार चरित्र को महत्व देना होगा। गांधी जी भी पर इसी चरित्र की छाप थी।

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

'सर्वधर्म समभाव' भारत के परिप्रेक्ष्य में कोई दरियादिली या सदाशयता का प्रतीक नहीं, अपितु इसे सार्वभौमिक परिस्थितियों की अनिवार्य मांग के रूप में देखा जाना चाहिये । विभिन्नता में एकता की अखंडता के लिये सबके प्रति 'समभाव' रखने वाली व्यवस्था से इतर और कोई विकल्प हो भी नहीं सकता । इस भावना को तोड़ मरोड़ कर संकुचित दायरों वाले लाभ के हिमायतियों ने अपनी सुविधानुसार 'धर्मनिरपेक्षता' अर्थात सेकुलरिज्म का नाम देकर देश के साथ बहुत बड़ा धोखा किया, जिसका खमियाजा पता नहीं कबतक भुगतना पड़ेगा । गाँधी को आदर्श मानने वालों ने कभी यह नहीं सोचा कि बापू खुद भी कभी सेकुलर नहीं, बल्कि हिन्दुत्व को एक जीवन-पद्धति मानने वाले उदारवादी हिन्दू थे । राम उनके आदर्श एवं नियमित प्रार्थना उनकी दिनचर्या में शामिल थी । सभी धर्मों के सूत्र वाक्य 'ईश्वर एक है' पर उनका अटूट विश्वास था, इसीलिये 'ईश्वर अल्ला तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान' उनका प्रिय भजन था । उन्हें किसी भी धर्म की पूजा पद्धति के प्रति कभी कोई आपत्ति नहीं रही । अपने स्व-धर्म के प्रति रहस्यमय भाव रखने वाला इंसान न तो सच्चा हिन्दू हो सकता है, न ही सच्चा मुसलमान । किसी और धर्म की टोपी लगा लेना ही 'सर्वधर्म समभाव' रखने का प्रमाण नहीं, बल्कि ढोंग कहा जाएगा, जिससे मोदी ने इन्कार किया होगा । हमारे देश के मुसलमान हिन्दुस्तानी मुसलमान हैं, और अपने देश के प्रति किसी भी हिन्दू से कम निष्ठा नहीं रखते । मुट्ठी भर सिरफ़िरों की बात और है । क्या पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ने वाला कोई राष्ट्रभक्त मुसलमान जब कभी हमारी तरह मस्तक पर टीका लगाकर दिखाएगा, तभी हम उसे सर्वधर्म समभाव रखने वाले मुसलमान का सर्टीफ़िकेट देंगे ? यह घटिया और हास्यास्पद सोच कही जाएगी । जहाँ समभाव दिखना चाहिये, वहाँ बिना किसी दिखावे के भी यह भावना दिखती है, चाहे वह फ़ूल वालों की सैर हो, या फ़िर अमरनाथ और वैष्णोदेवी के खच्चरवालों के रूप में देखने को मिलती हो । देश को आज विकास की ज़रूरत है । युवावर्ग इस सच्चाई से बा-खबर है, चाहे वह हिन्दू हो, या मुसलमान, सिख हो, या ईसाई । आज इस कटु सत्य से सभी वाक़िफ़ हो चुके हैं कि विकास हर वर्ग, जाति और सम्प्रदाय की प्राथमिक ज़रूरत है । इसी से सभी को रोटी-कपड़ा और मकान मयस्सर होना है, न कि जाति, धर्म और सम्प्रदायवादी चिकनी चुपड़ी बातों से । भ्रष्टाचारियों को तो हर हाल में सिंहासन खाली करना ही होगा । आने वाला समय सिर्फ़ विकास-पुरुषों की ही बातें सुनेगा । किसी भी हिन्दू, मुसलमान या जातिवादी की अब एक नहीं चलने वाली है । अच्छे लेख के लिये बधाई ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

मैं आपके तर्क को समझा नहीं आदरणीय योगेन्द्र जी.! न्याय में देरी को स्वाभाविक व न्यायिक दृष्टि से व्यवस्था की खामी माना जाता है, वह ताकत कैसे हो सकती है.! हमारे देश में इस देरी का परिणाम है कि यदि सभी अदालतें 24x7 काम करने में जुट जाएँ तो लम्बित मामलों में न्याय मिलने में 400 साल लग जाएंगे.! दुनिया के सभी देशों में कुछ सप्ताह अथवा माह में न्याय आ जाता है, हम भी कई समितियों विशेषज्ञों की अनुशंसाओं के बाद सुधार करने का प्रयास कर रहे हैं, फास्ट ट्रैक अदालतें इसीलिए तो खोली जा रही हैं.?? विशेष मुकदमों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाता है.... अफजल कि बात करें तो उसके मुकदमे को गृहमंत्रालय से राष्ट्रपति तक जाने व राष्ट्रपति द्वारा खारिज किए जाने में 13 दिन और कुल 14 दिन लगे। जो काम (पूरी न्याय प्रक्रिया) 14 दिन में हो सकता है उसे 7 साल तक लटकाए रखने में हमारी कौन सी ताकत सिद्ध होगी, यह मुझे समझ नहीं आया.!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

वास्तव में मानवाधिकार के नाम पर ऐसी मांग करने वाले भी भलीभाँति जानते हैं कि जिस जघन्य अपराध में अफजल गुरू दोषी सिद्ध हुआ था उसके लिए भारतीय न्याय व्यवस्था में फांसी की सजा को टाला ही नहीं जा सकता था, वे अपनी वैचारिक अथवा भावनात्मक आकांक्षा के चलते मात्र मामले को टालना चाहते थे। यदि इन अफजल समर्थकों अथवा वामपंथियों का आग्रह न्याय को लेकर ही है तो इन्होंने सात साल से गृहमंत्रालय के पास लटकी दया याचिका के शीघ्र निस्तारण की आवाज बुलंद क्यों नहीं की? शायद यह ये भलीभाँति जानते थे कि, जब भी होगा, क्या निर्णय होगा! अब हम इतने कमजोर नहीं रहे हैं ! मैं शायद आपकी बात से असहमत होने की कोशिश कर रहा हूँ त्रिपाठी जी ! हर देश की अपनी एक व्यवस्था और अपनी एक खासियत होती है ! आप जिस देरी को कमजोरी मान रहे हैं वाही हमारी ताकत भी तो है ! हम खुद को मानवता का इतना बड़ा दुश्मन नहीं होने देना चाहते इसलिए अगर किसी ने अपराध किया है तो उसे उसकी सज़ा अवश्य मिले लेकिन उसके साथ भी एक आम इंसान की तरह न्याय की प्रक्रिया चलनी चाहिए !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय वासुदेव जी, अफजल गुरू की फाँसी के समर्थन में छिट-पुट उठे बेईमान आतंकी स्वरों पर उचित और भरपूर ठोकरें मारता बेहद तार्किक लेख प्रस्तुत कर आप ने अपेक्षित तात्कालिक माँग तो पूरी की ही है, साथ ही कमजोर नेतृत्व के चलते देश की कमजोर लोकतांत्रिक विचारशीलता को बल भी प्रदान किया है | इतना ही नहीं, आगे बढ़कर आप का आकलन भी कितना सही है -- "जिस अफजल गुरु के लिए अलगाववादी अपनी छाती कूटते हैं, पाकिस्तान जिसका समर्थन करता है, मोस्ट वांटेड आतंकी हाफिज़ सईद जिसके लिए इस्लामाबाद में सभा करता है और लश्कर-ए-तैयबा व जैश-ए-मोहम्मद जिसकी मौत का भारत से बदला लेने के लिए इस्लामाबाद में इकट्ठा होकर कसम खाते हैं, उसी अफजल गुरु के रहनुमा यदि भारत की राजनैतिक पार्टियों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में बैठे हैं तो निश्चित रूप से हमें मानना पड़ेगा कि आतंकवाद के जहरीले जाल की जकड़न से अभी हम मुक्त होने की स्थिति में नहीं हैं!" ऐसे तीखे किन्तु स्वस्थ वैचारिक आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्द्भावानाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय वासुदेव जी, सादर ! अनाचारियों और पापियों का वध करना अकर्म नहीं बल्कि सत्कर्म होता है ! कोई कमजोर अगर प्रतिरोध न करे तो यह उसकी मजबूरी है, पर कोई ताकतवर प्रतिरोध न करे तो यह उसकी कायरता कही जायेगी ! यहाँ "दिनकर जी" की पंक्तियाँ बिलकुल; सटीक हैं ....... "क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो ! उसे नहीं जो दंतहीन, विष हीन, विनीत, सरल हो !"" पाकिस्तान (जिसका नाम बदल कर अब "अपाकिस्तान" कर देना चाहिए) ने जो बर्बर कृत्य किया है, और सदियों से करता आ रहा है, उसका प्रोत्साहन हमारी नपुंसक सरकारों ने ही दिया है ! छोटी सी फुंसी इन सरकारों की लापरवाही के चलते आज नासूर बन गया है, जो रह-रह कर टीस दे रहा है ! कभी संसद हमले के रूप में, कभी मुंबई हमले के रूप में, कभी सैनिकों की बर्बर ह्त्या के रूप में ! और हमारे ये मौगे राजनेता केवल बातों से आश्वाशन देते हैं ! एक पता नहीं कहाँ का कोई विधायक है जिसे पता ही नहीं की शहीद हेमराज का घर किस जिले में है ! जिस शहीद के घर का पता भारत का बच्चा - बच्चा जान गया हो, उसका पता इनको नहीं मालूम और ये अपने को जनप्रतिनिधि कहते हैं ! आपने ठीक ही कहा है .......... "" अरे सत्तासीनों, गर्दन की कुछ तो कीमत समझो!!""

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

आदरनीय वासुदेव जी, दामिनी और बलात्कार पर आए लेखों की बाढ़ में यह लेख अधिक तथ्यात्मक, संतुलित, विचारबद्ध और सही समाधान की बात करता हुआ लगा -- "स्त्री को न परम्परा के नाम पर चहरदीवारी में कैद किया जा सकता है और न ही मनोरंजन के नाम पर सरेआम अश्लीलता के साँचे में आइटम बनाकर पेश किया जा सकता है। यदि हम अपने सनातन सांस्कृतिक नैतिक मूल्यों की ओर लौटते हुए एक स्वतंत्र उदार किन्तु आचारबद्ध समाज की पुनर्स्थापना का संकल्प लेकर स्वयं तथा अपने बच्चों को मर्यादा, नैतिकता व आचरण का पाठ पढ़ाएँ तो यही हजारों लाखों दामिनी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी व समाज के पापों का प्रायश्चित्त भी!! इसके बाद ही न्यायिक प्रक्रिया में सुधार अथवा नए कठोर कानून, जोकि आवश्यक हैं, प्रभावी हो सकते हैं।" हार्दिक साधुवाद एवं सदभावनाएँ ! नव वर्ष की मंगलकामनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

गंगा को अमरापगा कहा गया है, किन्तु अभिनव मनुष्य न केवल गंगा के प्रवाह को, बल्कि अपने जीवन-प्रवाह को भी दूषित और क्षीण करता जा रहा है; गंगाधारा और उससे जुड़ी विसंगतियों और भावी संकेत पर प्रभावी आलेख; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! "गंगा व अन्य नदियों के प्रदूषण ने उस देश में साफ पानी 15 रुपये लीटर बिकने की स्थिति पैदा कर दी है जहां 28 रुपये में व्यक्ति से दिन भर का पूरा खर्च निकालने की आशा की जाती है। इन परिस्थितियों में आज अनिवार्य हो गया है कि देश के सांस्कृतिक आध्यात्मिक व आर्थिक जीवन को साँसे देने के लिए गंगा को स्वस्थ प्रवाह दिया जाए। “गंगे तव दर्शनात् मुक्तिः” के गान को पुनः सत्य के साथ स्थापित करने के लिए गंगा को मुक्त करना ही होगा |"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

वासुदेव जी बहुत ही अच्छी सार्थक प्रस्तुति सार्थक आलेख की बधाई ,,,,,,,,,,,, आतंकवादियों को मजहब के जुनून में यह सोचकर सदैव समर्थन दिया कि वे गैर-मुस्लिमों के खिलाफ लड़ रहे हैं, वे यह बात नहीं समझ सके कि छठी सदी का जो कानून और इतिहास गैर-मुस्लिमों के अनुकूल नहीं बैठता वह आज उनके जीवन के दायरे के अनुकूल भी नहीं बैठ सकता! जेहादी इस्लाम की इस पौध के अतिरिक्त एक ऐसी बड़ी जनसंख्या है जो स्वयं को उदार कहते हुए आतंकवाद की तो आलोचना करती है किन्तु कट्टरपंथ के अन्य चेहरों को जाने अंजाने पोषती है। जैसे कि कई मुल्ला मौलवी व इमामों के नेतृत्व में अन्य धर्मों को भी इस्लाम की रोशनी में जायज नाजायज ठहराने की व्यापक प्रवत्ति है

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

आदरणीय वासुदेव जी, मलाला और उसकी सत्साहसी जिजीविषा की प्रतीकात्मकता का यह विस्तार-लेख अत्यंत सुचिंतित तथा गंभीर है | मज़हब के बीच की बारीक रेखा का यह स्पष्टीकरण -- " स्पष्ट है कि कहीं न कहीं एक ही मजहब के अन्दर दो मजहब पल रहे हैं किन्तु दो मजहबों अथवा मजहब के दो चेहरों के बींच की बारीक रेखा बहुत स्पष्ट नहीं है। मजहब के दो चेहरों के बींच की बारीक रेखा का यह भ्रम मलाला की घटना के बाद पाकिस्तान की आवाम में उभरकर सामने आया है।" कितना महत्तवपूर्ण है | और कितना महत्तवपूर्ण है यह निष्कर्ष कि "अतः मलाला की घटना कट्टरपंथ के विरुद्ध एक वैश्विक सीख है। बस एक प्रश्न यह अभी भी अनुत्तरित है कि इस सीख को मजहब के दूसरे (रूढ़) चेहरे के अनुयायी, विशेषकर पाकिस्तान में, कब समझ पाते हैं?" ऐसे व्यवस्थित आलेख के लिया हार्दिक आभार एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय शशिभूषण जी, यद्यपि इस लेख का मुख्य विषय केजरीवाल की पार्टी के भविष्य का आंकलन ही था किन्तु फिर भी मैंने कुछ बिन्दुओं पर संक्षेप में प्रकाश डाला है| यदि तथ्य की बात करें तो जनता में जो मंथन चल रहा है वह महंगाई व UPA सरकार के एक के बाद एक बड़े घोटालों के उजागर होने से हुआ है जिसमें कि जन-आन्दोलनों ने घृतवत कार्य किया है| घोटाले एक भी केजरीवाल ने उजागर नहीं किये, हाल के जिन मामलों में उन्होंने प्रदर्शन आदि कर मीडिया में सुर्खियाँ बटोरी वो भी उनके उजागर किए हुए नहीं थे| इसे ही मैंने लेख में स्पष्ट किया है| जनांदोलन का जहाँ तक प्रश्न है उसके लिए जनता अन्ना व रामदेव से जुडी! अतः केजरीवाल के कारण वातावरण बना यह आप तथ्य के आधार पर कैसे कह सकते हैं? समस्या यह है कि हम प्रायः हाल की सरगर्मियों से इतना अधिक प्रभावित हो जाते हैं कि अतीत को व यथार्थ को को भूल जाते हैं.! लोकपाल आन्दोलन के समय जब सब अन्ना अन्नामय था तबके केजरीवाल को याद करिए जिनकी पहचान अन्ना के प्रवक्ता मात्र की थी.! अतः प्रारंभ केजरीवाल ने मजबूती से किया यह तो प्रश्न ही नहीं है, प्रारंभ को जो राजनैतिक स्वरुप केजरीवाल ने दिया उसका भविष्य क्या होगा विषय यह है और लेख में मैंने इसे ही उठाने का प्रयास किया है! ..साभार!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

kejriwal was basically bureaucrate and his wife is still an officer in revenue department. Though he nurtured the ambition of becoming a great politician lack of political background and inexperience are quite evident in his movement.He is experimenting a short cut method generally successful in small countries. India is too big multi ethenic, thousands castes,multilingual population, diversent geografic areas and above all multiple problems in different states.Even after 65 years there is non expect Congress could develop as national party in real sense of the term.India has seen nuber of political outfits and political leaders emersing in different region or states and have been successful only in limited areas. Developing a political party on national level appears to be next to impossible for new commers as Kejriwal. If he concentrate only on delhi state he may expect one or two M.P.got elected. In present senario he can not expect becoming Mulayam or Maya or Mamta or Sharad pawar. Time is very short for Kejriwal. Moreover he has confused public as a whole. When there is hot topic price rise -in food grains,petrol,diesel,manure,LPG and other essential commodities he was cocentrating on Jan lok pal bill.HE IS DEAF AND DUMB so far as poor persons in villlages are concerned due to price hike.He did not and could not prove the effects of corruption on price rise or he conveniently avoided. How can he garner the poor peoples vote. It is certain no one get chance to lead country without caring village population,poor population.

के द्वारा:

आदरणीय वासुदेव जी, सादर ! किसीके भविष्य का आकलन और विश्लेषण मैं कर सकूं, ऐसी मेरी क्षमता नहीं है, पर इस वर्तमान भ्रष्ट राजनैतिक परिवेश में एक सम्पूर्ण और सार्थक बदलाव की जो बात केजरीवाल ने उठाई है, उससे इनकार भी नहीं किया जा सकता ! आज देश की जनता के मानस में जो मंथन चल रहा है, और जो आवश्यक था, उसका प्रारंभ केजरीवाल ने मजबूती से किया इससे इनकार करना नासमझी होगी ! भविष्य में क्या होगा, क्या नहीं होगा, वह तो समय बताएगा, पर क्या मीडिया, क्या राजनेता, और क्या जनता, सभी ने वर्तमान दौर के राजनितिक परिदृश्य पर और उसकी खूबियों-खामियों पर गंभीरता से आत्म-मंथन शुरू कर दिया है, यह केजरीवाल की कमतर उपलब्धि नहीं कही जायेगी ! सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम के बारे में आज कुछ भी opinion बनाना बहुत मुश्किल लगता है | ये लोग जब तक अन्ना जी के मार्ग दर्शन में जन लोक पाल बिल के लिए लड़ रहे थे हम सब देशवासियों का सहयोग और सक्रिय योगदान उसमें था | तब एक लक्ष्य था और उसके लिए बिशाल जन मत का क़ुरबानी का संकल्प था | हमारे जैसे सामान्य नागरिकों को तब बड़ा धक्का लगा जब सिविल सोसाइटी का आन्दोलन अचानक समाप्त कर अन्ना और किरण बेदी को छोड़ कर सरे लोग राजनीती की तरफ लालायित होगई | इस निर्णय के दो परिणाम हुए ;- - सामान्य जन मानस में निराशा और हताशा का भाव की भविष्य में अगले बीस बर्ष तक कोई भी सिविल सोविएटी का आन्दोलन पनपने से पहले ही मर जायेगा | क्यों की उसे जनता द्वारा खाद , पानी, और हवा मुहया नहीं होगी | इसके लिए भविष्य केजरीवाल को ही जिम्मेदार मानेगी | - एक राजनितिक दल बनाकर ये भ्रीष्टाचार से लड़ना चाहते हैं | राजनितिक दल राजनीती के कीचड में ही पनपते हैं , चाहे वह कांग्रेस हो, भाजपा हो या स्वयं केजरीवाल का दल हो | ज्यादा समय नहीं लगेगा , सारा नजारा नज़र आने लगेगा |

के द्वारा: bhuwan19 bhuwan19

योगी जी, आप हमेशा मुझे पढ़ते आए हैं तो आप अवश्य परिचित होंगे कि मैं तथ्य और आंकड़ों से दूर काल्पनिक विश्लेषण नहीं करता। आपने कहा कि अरविन्द राजनीतिक शक्ति बनें या न बनें किन्तु उनका आन्दोलन देश के गद्दारों की असलियत तो खोल ही रहा है, लेकिन मैंने लेख में यही लिखा कि अरविन्द ने आज तक एक भी असलियत खोली कहाँ है? जितने भी मुद्दों पर उन्होने हँगामा किया वो दूसरों के मुद्दे थे जिन्हें उन्होने ने इस तरीके से प्रस्तुत किया जैसे वो ही संघर्ष के सूत्रधार हों.! एक एक उदाहरण लेख में देखें। और फिर आरोप लगाने से राजनीति की दिशा नहीं बदलती, केजरीवाल कितने भ्रष्टाचार के केस अदालत तक ले गए हैं.? केजरीवाल ने अपने अथवा साथियों के ऊपर लगे आरोपों का प्रतिउत्तर कभी क्यों नहीं दिया.? अतः आपने कहा कि केजरीवाल ने राजनीति की परिभाषा बदल दी है, ऐसा कुछ भी नहीं है। हँगामा से जनता उत्साहित हो जाती है, वही थोड़ा बहुत हुआ है लेकिन इतना भी नहीं कि अन्ना के बाद केजरीवाल 2-3 हजार की भीड़ भी जुटा लेते.! तथ्यों के आधार पर मुझे जैसा दिखता है वो यही है अतः इस तरह मात्र आरोप की अवसरवादी राजनीति का कोई बड़ा भविष्य नहीं है, यही लेख का निष्कर्ष है। ...साभार।

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

मैं भी केजरीवाल के राजनीतिक दिशा और भविष्य को लेकर किसी नतीजे तक नहीं पंहुचा हूँ,उनकी राजनीतिक प्रति की विचारधारा को लेकर मैं हमेशा संशय में रहा हूँ,क्यूंकि यह तो ठीक है की वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में भ्रष्टाचार का विरोध कर थोड़ी लोकप्रियता अर्जित की जा सकती है,किन्तु ऐसा नहीं है कि केजरीवाल के पहले कोई भ्रष्टाचार का विरोध नहीं कर रहा,यह केजरीवाल नहीं थे,जिन्होंने 2G ,आदर्श,राष्ट्रमंडल,कोयला जैसे घोटालों का पर्दाफाश किया,किन्तु फिर भी एक आम इंसान मानते हुए देखा जाए तो उनका संघर्ष प्रशंसनीय रहा है,लेकिन यह तो तय है कि वो केन्द्रीय नेतृत्व देने में नाकाम रहेंगे,केजरीवाल के आने से यही हुआ है कि नीतिगत लड़ाइयाँ अब संवैधानिक तरीके से लड़ी जाने के बजाये सड़कों पर लड़ी जा रही हैं,यह कदम जनता को मानसिक संतुष्टि जरुर दे सकता है,किन्तु एक लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए ऐसी प्रवृत्ति सर्वथा अनुचित है,लोकतंत्र को भीडतंत्र में बदलते देर नहीं लगती.

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

राजनीति में वायदों व रणनीतियों के अतिरिक्त भी सबसे पहली आवश्यकता है जमीनी स्थिति समझने की। यथार्थ में केजरीवाल को अन्ना आंदोलन से जुड़े रहने के कारण भले ही मीडिया में अच्छा खासा कवरेज मिल रहा हो किन्तु फिर भी उनके किसी भी प्रदर्शन में पहुँचने वाले समर्थकों की संख्या एक हजार भी नहीं पहुँच रही है। अन्ना वाली भीड़ अब गायब हो चुकी है। केन्द्र में सरकार बनाने के लिए 272 सांसदों की आवश्यकता होती है, इतने सांसदों के लिए न तो केजरीवाल के पास दिल्ली के बाहर पूरे भारत में पहचान है और न ही तन्त्र। मीडिया भी लगातार केजरीवाल पर इतना समय भविष्य में नहीं दे पाएगी, उस स्थिति में केजरीवाल के समक्ष अपनी पहचान बनाए रखने की चुनौती होगी। दिल्ली की क्षेत्रीय राजनीति में केजरीवाल के लिए कुछ संभावनाएं अवश्य हैं और संभवतः दिल्ली विधानसभा व म्यूनिसिपल ही केजरीवाल का लक्ष्य भी है। त्रिपाठी जी , मैं हमेशा आपको पढता आया हूँ किन्तु आज आपकी बात से सहमत नहीं हूँ ! अरविन्द ने सच कहूं तो राजनीती की परिभाषा को बदल दिया है ! ये जरूरी नहीं की देश को सही दिशा देने के लिए विधायक या मंत्री ही बना जाये किन्तु कुछ ऐसे विधेयक हैं जो तभी पूरे हो सकते हैं जब आपके पास राजनीतिक शक्ति हो ! अरविन्द राजनीतिक शक्ति बनें या न बनें किन्तु उनका आन्दोलन देश के गद्दारों की असलियत तो खोल ही रहा है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

वासुदेवभाई थोडा और पिछे जाईए । अडवाणीने घोटालों के कारण और थोमस को ले कर पूरा संसद सत्र बंद कराया था । और रामदेव का भी पेरेलल चलता था । रामदेव का रामलीला का प्रोग्राम जग जाहिर था । रामदेव की सभा में श्रोतागण के बीच बैठनेवाले अन्ना अचानक जन्तर मंतर पर आ गये, रामदेव से पहले । और सब नेताओं को गालियां देने लगे, उमा भारती को भी अपने मंच पे नही आने दिया । लोकपाल की फाईलें ले के सरकार से ईलुपीलु करने लगे । फिर रामदेव का राम लीला कांड हो गया । अडवानी और भाजप को नेपथ्य में जाना पड गया । क्यों की पिक्चरें लग गई थी पिटक्लास को खूश कर देनेवाली । फिर अन्ना रामलीला पर आए । कुछ हासिल नही हुआ । काले अंग्रेज, भारत माता की जै और सब नेता चोर । पिटक्लास को खूश करनेवाले डायलोग के अलावा कुछ नही । कुछ उतार छडाव के बाद कोयला घोटाला आया । अडवाणी फीर मैदान में आये । पूरे देश में कोयला कोयला हो गया अचानक अन्ना टीम साबून ले के आ गई । सब नेता के मुह काले, आओ सब को धोता हुं । मोदी को बोल दिया तू भी भ्रष्ट । अचानक चवनी की किमत के छोटे छोटे घोटाले उजागर करने लगा । कोयला घोटाला और अडवानी को पिछे छोड दिया । कोयले घोटाले का जीक्र सिर्फ एक दो बार की किया जब भाजप को लपेटना था तब । मेरा आकलन कहता है की केजरी सिधा अमरिका के ईशारे चलता है और मिडिया भी ईस लिए ही उसे कवर करता है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय जवाहर जी, इस लेख का उद्देश्य उपाय बताना नहीं था क्योंकि मेरे उपाय लागू नहीं हो सकते, मैं केवल वस्तु स्थिति स्पष्ट करना चाहता था। केजरीवाल कॉंग्रेस को राजनैतिक चुनौती देने की स्थिति के आस पास भी नहीं हैं.! शहरी क्षेत्रों में यदि कुछ सीटों पर वोटों का विभाजन होता भी है तो अवश्य संभव है कि 10-15 सीटें कॉंग्रेस हारती हुई जीत जाए। दूसरा भाजपा के विषय में आपने कहा, मैं भाजपा कोई कट्टर समर्थक नहीं हूँ। जनता जिसे सबल विकल्प समझेगी उसे वोट देगी। किन्तु जहां तक प्रधानमंत्री पद की बात है, सुषमा, जेटली व नितीश के नाम पर भाजपा में कोई अंदरूनी झगड़ा है ही नहीं और न ही कभी ऐसा कोई बयान आया। मीडिया अपना कयास लगाती है और वो उसका हक है। संघर्ष मोदी व आडवाणी को लेकर अवश्य दिखाई देता है किन्तु ये उनके लिए मायने रखना चाहिए जो इनमें से किसी एक लिए विशेष आग्रह रखते हों...!!! कॉंग्रेस जब तक सत्ता में है गुर्राने से कौन रोक सकता है.?? सवाल यह है कि 2014 में कौन रोकेगा...कम से कम केजरीवाल तो इस स्थिति में नहीं दिखाई देते.!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आदरणीय वासुदेव जी, नमस्कार! फिर उपाय क्या है? क्या भाजपा इस स्थिति में है कि अगली सरकार वह अपने दम पर बना ले .... वहां भी काफी खींच तान है ... अभी गडकरी जी पर आरोप लगने वाले हैं ????? आम जनता तो आशा भरी नजरों से विकल्प की तलाश कर रही है, पर कोई भी बुद्धिजीवी वर्ग आगे नहीं आ रहा ... बाबा राम देव भाजपा के वोट बैंक में कुछ वृद्धि कर सकते हैं; पर आडवाणी बनाम मोदी बनाम नितीश बनाम सुषमा स्वराज बनाम अरुण जेटली बनाम अन्यलोग नहीं खींच तान कर रहे हैं??? टीम केजरीवाल जितना कर सकते हैं करने दीजिये कांग्रेस को तो पहले हटाइए, उसकी हेंकड़ी तो बंद कीजिये ... आज कांग्रेस जो चाहे कर रही है उसे रोकने वाला कोई नहीं है एक ममता कभी कभी गुर्राती है पर उसका साथ कोई नहीं देता. वह भी क्षेत्रीय दल ही है ... मैं ज्यादा राजनीतिक समझ नहीं रखता, पर बदलाव अवश्य चाहता हूँ.... आपका आकलन और विश्लेषण सही है.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

बड़े अर्थशास्त्री होने के बाद भी ये लोग भूल जाते हैं कि रोजगार जनसंख्या बढ्ने से नहीं अर्थव्यवस्था से पैदा होते हैं। वाल-मार्ट का अमेरिका में 258 billion डॉलर का व्यापार है, अर्थात यदि वाल-मार्ट भारत 450 बिल्यन डॉलर के खुदरा बाजार से सबकी सफाई करके एकाधिकार कर ले तो भी इससे अधिकतम 25 लाख लोगों को ही रोजगार मिलेगा जहां अभी 4.5 करोड़ लोग अपनी जीविका चला रहे हैं। तिवारी जी सुन्दर व्याख्या अच्छे आंकड़ों के साथ लेकिन इतने बड़े मन को मोहने वाले अर्थ शास्त्री जी अब भारत को फिर से सोने की चिड़िया बनाने वाले हैं तो उन पर भरोसा क्यों नहीं माया जी तो उन को परखने का मन बना रही है सुन्दर आलेख ..उपयोगी भ्रमर ५

के द्वारा:

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

के द्वारा: annurag sharma(Administrator) annurag sharma(Administrator)

गीता में पहले कभी मेरा चित्त एकाग्र नहीं होता था पढने में क्योंकि बहुत उत्साह से प्रारम्भ करती थी परन्तु फिर आकर बीच में ही छोड़ देती है,जब ध्यान से और पूरेमं से उसको पढ़ा था तब उसकी महत्ता का पता चला.इस संदर्भ में मुझको स्वामी विवेकानन्द का वो प्रसंग सदा स्मरण रहता है जिसके अनुसार एक बाद विदेश में ही स्वामी विवेकानन्द को नीचा दिखने के दृष्टिकोण से गीता को सभी धार्मिक ग्रंथों में नीचे रख दिया और उनको कहा गया देखो तुम्हारी गीता सबसे नीचे है.विवेकानन्द जी ने शांतभाव से उत्तर दिया है मेरी गीता सम्पूर्ण विचारों को अपने में समाहित किये हुए अतः सबका भार वहन कर सकती है,इसीलिये नीचे है

के द्वारा: nishamittal nishamittal

योगी जी, आपने कहा हिन्दू कम है इसलिए दंगा नहीं होता... किन्तु भारत में तो उत्पात कर सकता था जब जब हिन्दू आस्थाओं पर प्रहार हुआ.? ईसाई तो मुसलमानों से ज्यादा है, क्यों वैश्विक दंगा नहीं करता.? कारण सीधा सा और एक ही है जो आपने बाद मे कहा- हमे अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है। क्या इसी ओर मुसलमानों को बढ़ने की आवश्यकता नहीं है.? मुसलमानों ने जो दंगे किए उनमें मुसलमान ही सर्वाधिक मरे, क्या मुसलमानों को यह नहीं समझना चाहिए.? अपमान को समर्थन तो लेख का आशय निकाला ही नहीं जा सकता, प्रारम्भ में ही मैंने स्पष्ट लिखा है कि किसी की आस्था पर प्रहार को उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेख का विषय है कि इस्लाम को सहनशीलता की ओर बढ़ना चाहिए। सहनशील इस्लाम की वकालत करना भी मुसलमानों की आस्था को चुनौती देना है? क्या सहनशील इस्लाम की वकालत में मुस्लिमों का हित नहीं है.?

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

वासुदेव जी,देश का दुर्भाग्य ही कहा जाए या कांग्रेस का शातिर दिमाग ,जैसे ही कांग्रेस के पैर उखड़ने के आसार दीखते है,वोपैर उखाड़ने का प्रयास करने वालों को ही कभी कोर्ट के माध्यम से तो कभी अन्य माध्यमों से झूठे सच्चे प्रचार से जनता को यह सन्देश देती है कि राजनीति में सभी एक जैसे हैं और जनता दिग्भ्रमित हो जाती है.भले ही बाद में सच कुछ और सामने आये.आज .जनता को ऐसे किसी करिश्माई नेता की जरूरत है जो अपने सहयोगियों के माध्यम से जनता को ये सन्देश दे सके कि जिन कारणों से जनता त्रस्त है,हां हाकार मचा है,उसको दूर कर कर एक ठोस विकल्प जनता को मिलेगा. केजरीवाल और अन्ना के विचारों में संभवतः असहमति प्रारम्भ से ही रही होगी परन्तु अन्ना स्वयम को उनसे अलग पहले नहीं कर पाए या यूँ कहे कि केजरीवाल ने प्रचार पाने के लिए अन्ना की लोकप्रियता का लाभ उठाया. फिलहाल ऐसी स्थितियां पीडादायक हैं क्योंकि २०१४ दूर नहीं.

के द्वारा: nishamittal nishamittal

क्या इस्लाम को अन्य धर्मों की तरह परिपक्व व सहनशील नहीं होना चाहिए? ये बात हकीकत है वासुदेव जी की इस्लाम अपने आप में सबसे अलग धर्म है , कट्टरपन है वहां , किन्तु उनके अपने नियम कानून हो सकते हैं , कोई उन्हें क्यूँ चुनौती देना चाहता है ! आपने कहा - हिन्दू धर्म पर जब कोई बात आती है तो वैश्विक दंगा क्यूँ नहीं होता ? उसके अपने कारण हैं -हम संख्या में इतने ज्यादा नहीं हैं , हमने क्षेत्रफल भी इस दुनिया का बहुत कम घेरा हुआ है और सबसे बड़ी बात , हमारे घरों में बच्चों को अहिंसा का पाठ पढाया जाता है , हिंसा का नहीं ! ये हमारे धर्म की अच्छा ही है ! हम अपने आपको किसी और के कहने से या किसी और को देखकर क्यूँ बदलें ! बल्कि विश्वभर में लोग हिन्दू धर्म से सहनशीलता और अहिंसा सीख रहे हैं तब हमें और ज्यादा अपने आपको गौरवान्वित होने की जरुरत है ! इस्लाम , शुरू से ही खून्खाराबबे में लिप्त रहा है लेकिन इसका मतलब ये नहीं की हम , अगर कोई उनके महापुरुषों का अपमान करे तो उसका समर्थन करें ! ये गलत परंपरा होगी , और इसके साथ साथ इस्लाम के मानने वालों को भी ये ध्यान रखना चाहिए की वो भी और धर्मों का सम्मान करना सीखें ! आपके लिखे शब्द हमेशा आकर्षित करते हैं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय जवाहर जी, हम भारतीयों के सनातन गौरव पर किसी को शंका नहीं है, यदि आज की वस्तुस्थिति की बात की जाये तो निःसन्देह स्थिति अनुकूल नहीं है तथापि हम इतना नीचे नहीं जा चुके हैं कि उठ न सकें। गुलामी का बाद आजादी मिली तो जनता लूटी पिटी थी, गरीबी में सबसे पहले पेट दिखाता है उसी का लाभ उठाकर नेताओं ने जनता की दृष्टि को बांध दिया। अधिकांश बहुत दूर तक नहीं सोच पा रहे हैं अथवा समय नहीं है। किन्तु परिवर्तन भी कोई खेल नहीं होता जो एक दो दिनों अथवा दो तीन वर्षों मे आ जाए। अब लोगों ने सोचना आरंभ कर दिया है तो स्थिति बदलेगी भी! भावुकता से समस्या हल नहीं होती, पहले बेहतर विकल्प चुनना होगा उसके बाद पूरा खरा! हाँलाकि पूरा खरा तो कभी होता नहीं! हमे प्रयोगिक मार्ग अपनाने होंगे अन्यथा कभी यही मुलायम जी और लालू जी समाजवाद के मसीहा के रूप मे जाने जाते थे...!!! जागरूकता प्रथम आवश्यकता है।

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

योगी जी, आपने इस लेख को थोड़ा कम समय दिया! मैंने प्रारम्भ मे ही लिखा है- "निःसन्देह एक विकसित मानव सभ्यता में किसी व्यक्ति विशेष अथवा समुदाय विशेष की आस्थाओं को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए" मेरा यही मत है, किन्तु स्वस्थ सभ्यता मे आलोचना का भी एक स्थान होना चाहिए। यदि आलोचना निंदा अथवा अपमान भी बन जाये तो भी मानव सभ्यता को इस प्रकार परिपक्व होना चाहिए कि उसका उत्तर शब्दों से व बहस से हो बम हथियारों से नहीं! और फिर एक अमेरिकी ने फिल्म बनाई उसके लिए आप जो भी अमेरिकी हाथ लगेगा उसकी जान ले लेंगे यह सभ्यता क्या मनुष्यता ही नहीं है.! अमेरिका का कानून ऐसी अभिव्यक्ति को भी कानूनी मानता है। मैंने लिखा कि न जाने कितनी बार जीसस का अपमान होता रहता है, हिन्दू धर्म के अपमान के मैंने कुछ उदाहरण दिये, तब तो वैश्विक दंगा नहीं हुआ.? इस्लाम के साथ ही ऐसा क्यों है? क्या इस्लाम को अन्य धर्मों की तरह परिपक्व व सहनशील नहीं होना चाहिए? यही इस लेख का आशय है न कि इस्लाम की आस्था पर प्रहार को सही ठहराना! इसीलिए मैंने लेख का अन्त इस आशा के साथ किया है कि बुद्धिजीवियों को आवश्यकता है कि वे धैर्य व सहनशीलता के पाठ का प्रारम्भ करें ताकि पुराने रूढ़िवादी इस्लाम से निकलकर आधुनिक समयानुकूल इस्लाम की ओर बढ़ा जा सके और एक सहनशील शान्त सुखी इस्लामी जगत की स्थापना हो सके।

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आपकी बैटन से सहमत हूँ, किन्तु एक महत्वपूर्ण बात.. अरब में उस समय जंगली लोग ही बसते थे, जैसा की आपने कहा, सत्य नहीं है| अरब में कबीले होते थे और उनमें वैर झगडा भी होता था किन्तु उनकी अपनी सभ्यता संस्कृति थी| तत्कालीन अरब व्यवहार से लेकर वैश्विक व्यापार तक में एक विकसित भूभाग था| कबीले बहुदेववादी थी, इनके के अतिरिक्त ईसाई व यहूदी भी अच्छी संख्या में थे, आप देखेंगे तो कुरआन में ईसाईयों यहूदियों का बार बार उल्लेख है| जहाँ तक आज के समय का प्रश्न है धार्मिक सहनशीलता लानी ही होगी, विदेश में किसी के फिल्म अथवा कार्टून बनाने से अपने घर में उपद्रव करना और अपने ही भाइयों का जीवन नष्ट करना तो मूर्खता ही है! यही इस लेख का आशय है|

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

फिलहाल अन्ना अपनी राह पर हैं और केजरीवाल गुट से मीटिंग के बाद उन्होने पत्रकारों से न सिर्फ अपनी पुरानी रणनीति दोहराई वरन स्वामी रामदेव व पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह के साथ बैठक करके भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी जंग जारी रखने का संदेश भी दिया। संतोषजनक यह है कि तमाम कयासों व आशंकाओं के बाद भी बाबा रामदेव राजनीति के मोह में नहीं फंसे और अब दोनों आसानी से साथ मिलकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध आगे बढ़ सकेंगे। आदरणीय वासुदेव जी, सादर अभिवादन! आप काफी दिनों से इतिहास और पुरानों का हवाला देकर हम बर्तीयों का मान बढ़ाते रहे हैं. पर वस्तुस्थिति क्या है और आज हम किस कदर तक नीचे जा चुके हैं वह भी आप भलीभांति जानते हैं ... एक विकल्प देने में हम सक्षम नहीं हैं ... कांग्रेस या नेहरू परिवार की जितनी भी बुराई कर लें, जबतक विकल्प नहीं देंगे जनता का भला कौन करेगा? राजनीति और इमानदारी दो अलग अलग चीजें हैं. भाजपा में भी अंतर्कलह कम नहीं है. चुनाव की संभावना बनती दीख रही है पर अभी तक प्रधान मंत्री का उम्मीदवार और सहयोगी पार्टियों का रुख स्पष्ट नहीं दीख रहा ... जनता के पास विकल्प क्या है ? वही जातिगत, धर्मगत, या भाषागत विभेद? ... भविष्य बड़ा अन्धकारमय दीख रहा है. उधर शिंदे साहब कहते हैं - जनता बोफोर्स की तरह कोलगेट को भी भूल जायेगी ..... आपका आभार !

के द्वारा: jlsingh jlsingh

एक बहूत ही विचारशील लेख जिसमे आपने कुछ ऐसे तथ्यों को रक्खा है जो की निसंदेह विचार करने वाले हैं पर हमें यहभी ध्यान रखना होगा कि मुस्लिम भाई बन्धु शायद अभी इतने जागरूक और सहनशील नहीं हैं कि उस मानसिकता से निकल सकें जिसने सदियों से और विशेसरूप से पिछले कुछ दशकों से उनके दिल दिमाग पर अधिकार कर रक्खा है. शायद हमारी आपकी बात एक दिन वो स्वयं समझ सकेंगे और तब भी कोई स्वपरिवर्तन संभव हो सकेगा. वासुदेवजी मैं रामायण को अंग्रेजी में एक मुक्त कविता के रूप में रखने का प्रयास कर रहा हूँ और मैं इस विषय में अपने किएगए एक अंश को Jagran Junction पर भी रक्खा है. इस विषय में मैं आपकी टिका टिपण्णी के लिए आभारी रहूँगा. सुभकामनाओं के साथ . रवीन्द्र

के द्वारा: Ravindra K Kapoor Ravindra K Kapoor

जो है नहीं उसके नाम से जो है उनकी हत्या करना वहशीपन के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। मुहम्मद साहब निःसंदेह एक महान समाजशास्त्री थे। जंगली लोगों को संगठित करके एक राष्ट्र का सृजन उन्हें निश्चत ही महान बनाता है, उस समय वहाँ के जंगली किसी तरह के नियम एवं कानून नहीं मातने थे। अतः मुहम्मद साबह ने उन लोगों के अंदर डर उत्पन्न करने के लिये खुदा की कल्पना करके उन जंगलियों के अंदर खुदा का खौप भरा। अरब समाज को संगठित करने के लिये उन्होंने कुछ नियम  बनाये और लोगों में यह बात फैलादी कि यह खुदा का आदेश है। असभ्य, जंगली एवं अशिक्षित लोगों ने इस बात पर यकीन कर लिया। जिन्होंने उन नियमों को नहीं माना उनके लिये यह कहा गया कि खुदा का  आदेश है कि इन काफिरों का कत्ल कर दो। शायद एक राष्ट्र को संगठित करने के लिये यह अनिवार्य था। क्योंकि खुदा की कल्पना करने ही और उसका नाम लेकर ही कत्ल को जायज ठहराया जा सकता था। इसके लिये उन्हें कई लड़ाईयाँ लड़ना पड़ी। जिससे हजारों की संख्या में सैनिक मारे गये। औरतें विधवा  हो गई। समाज में अनैतिकता न फैले इसके लिये कहा गया कि पुरुष को की शादी करने का अधिकार  खुदा ने दिया है। शायद यह उस समय की परिस्थिति के अनुसार उचित था। उस समय के नियम या कानून उस समय के हिसाब से सही थे किन्तु आज के परिवेश में वह व्यर्थ हैं।कुरान एक प्राचीन सभ्यता की कानूनी पुस्तक है। अन्य धार्मिक पुस्तकें भी तत्कलीन समय की कानूनी  पुस्तकें हीं थी। जिन्हें हम अपनी अज्ञानता के कारण धार्मिक मान लेते हैं। उस समय के लिये वह अनिवार्य थी किन्तु आज के परिवेश में उनका कोई औचित्य नहीं है।जैसे कि हमारे संविधान में आरक्षण आजादी के बाद कुछ समय के लिये जरूरी था किन्तु अब वह अनावश्यक है। जो धर्म नैतिकता को त्याग दे, हिंसा का समर्थन करे, वह मानवीय कदापि नहीं हो सकता।यदि वाकई खुदा है तो क्या वह हिंसक हैं। भाई ये ईश्वर और धर्म की बातें तो मेरी समझ के परे हैं। मुझे जहाँ  भी धर्म दिखता है वहाँ अज्ञानता, अधर्म,  हिंसा, लूटपाट, भेदभाव और कुरीतियाँ ही दिखती हैं। धर्म की शराब पीने के बदले मुझे इन्द्रासन भी प्राप्त हो जाय तो मैं उसे त्याग दूँगा। यह देखकर दुखा होता है कि जब व्यक्ति इंसान न बनकर मुसलमान, हिन्दु, सिक्ख तथा ईसाई बनना बेहतर  समझता है। हम इंसान तो बन नहीं पाये और बनने चले हिन्दु या मसलमान। मानव बनना हमारी वास्तविकता है और किसी धर्म जाति का बनना कृत्रिमता्।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

चातक जी, राष्ट्र चिन्ह के लिए भले ही कुछ और समीचीन चिन्ह हो सकते थे किन्तु अभी ये हमारे राष्ट्र चिन्ह ही हैं, इनका जो भी आशय स्वीकारा गया है वह हमारी विरासत व संस्कृति को किन्ही सन्दर्भ में प्रदर्शित करते हैं.! भेडिये बनाकर उस पर राष्ट्रिय चिन्ह लिख दो तो क्या आशय है.? भेडिये हमारे राष्ट्र की संस्कृति के सूचक हैं.? यदि कहे भ्रष्ट नेताओं को प्रदर्शित किया है तो भी बचकाना है... भ्रष्टाचारी नेता न तो सवा अरब की आबादी के मूल्यों के सूचक हैं और न ही हजारों सालों की इस संस्कृति के ही..!! वैसे हमें इस पर इतनी बहस की आवश्यकता नहीं है... असीम ने इतना नहीं सोचा था... यह उनका बचकाना ढंग था जैसे बच्चे किसी पर अपना गुस्सा निकालते हैं तो उसका नाम बिगाड़कर चिढाते हैं..!! आपने गोहत्यारों की बात कही तो मैं लेख में उठाया प्रश्न ही दोहराऊंगा... एक जघन्य पाप का उदहारण देकर किसी अन्य भूल को जायज नहीं ठहराया जा सकता..!!!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

स्नेही वासुदेव जी, आपकी पोस्ट को पढने के बाद भी मैं आपसे पूरी तरह सहमत नहीं हो पा रहा हूँ क्योंकि राष्ट्र के ये प्रतीक ना तो हमारी सहमति हैं और ना हमारी आस्था के केंद्र हम एक जिम्मेदार नागरिक की तरह सिर्फ इन्हें ढो रहे हैं| अभी मैं अपनी बात सिर्फ राष्ट्रीय चिन्ह तक ही सीमित रखता हूँ- जहाँ तक मुझे याद है इस चिन्ह पर एक हाथी, एक वृषभ, एक घोडा और एक शेर भी अंकित है| यदि ऊपर के चार शेरों की जगह एक तस्वीर में भेदिये बना देने मात्र से राष्ट्र का अपमान हो जाता है तो फिर गोवंश का वध करके बाकायदा पार्टी करना आप किस श्रेणी में रखेंगे| मैं बहुत संतुलित मूर्धन्य समालोचक या मीडिया के गुण दोष समझने वाला व्यक्ति नहीं हूँ बल्कि उसी सवा अरब भीड़ का एक गुमनाम चेहरा हूँ जिसे सोसल मीडिया के गैरजिम्मेदार और भावुक लोग होने की संज्ञा दी जाती है इसीलिए शायद आपके अच्छे तर्कों में से भी कुछ तर्कों के मैं नहीं स्वीकार कर पा रहा| इस मामले में मैं कम समझदार भीड़ में ही शामिल रहूँगा| विनम्र असहमति प्रतिक्रिया में प्रेषित है|

के द्वारा: chaatak chaatak

त्रिपाठी जी आपकी बातें तो सत्य है कि राष्ट्रीय चिन्हों का सम्मान होना चाहिए ..मगर इस समय स्थिति काफी बिगडती जा रही है जिस तरह से कांग्रेस देश का शासन चला रही है उसको लेकर लोगों के दिलों में काफी गुस्सा है... और वो गुस्सा इस तरह से निकल रहा है... आपने लिखा कि विरोध सवैंधानिक तरीके से होना चाहिए मगर वो सवैंधानिक तरीका भी कुछ कारगर नहीं रहा कांग्रेस कि बेशर्मी कि खाल बहुत मोटी हो गयी है ..उसपर कुछ असर नहीं हो रहा है...यहाँ देश का लाखों करोड़ रूपया बाहर पड़ा हुआ जिसमें कि बहुत बड़ा भाग कांग्रेसियों का है.. देश की फिर टूटने कि स्थिति चल रहा है... मगर कांग्रेसी हर बात को हलके में ले रहे हैं.... ये कार्टून भी एक तिलमिलाहट है... ये एक गुस्सा है... अभी मैं एक जल सत्याग्रह का आन्दोलन देख रहा था टीवी में जिसमें लोग अपनी जमीन बचाने के लिए कई दिनों से पानी के अन्दर है.. मगर कोई उनको पूछ नहीं रहा यहाँ तक की कोई नेता उनको ये नहीं समझा रहा की ये गलत या सही है... सवैंधानिक तरीके के आन्दोलन कहीं समाचार पत्र या टीवी चैनल की एक छोटी सी स्टोरी में गुम हो जाते है फिर उन्हें कोई नहीं पूछता ... मुझे ये समझ नहीं आ रहा इस देश के वासी अति अहिंसा वादी या अहिंसावाद के परदे में डरपोक हैं या मरे हुए है......

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

कांग्रेस की नीतियाँ हमेशा से मुस्लिम पोषक रही है उसमे यह भी एक निति है क्यूंकि पाकिस्तान तो एक मुस्लिम राष्ट्र है और ओपने यहाँ भी तो मुस्लिमों की हिमायत ज्यादातर पार्टियाँ करती नजर आ रहीं है यहाँ बहुमत हीं अल्पमत की तरह समझा जा रहा है और बहुमत की बात करनेवालों को सांप्रदायिक करार दिया जा रहा है इस देश की धर्म्निरापेक्छ्ता को ठीक से जनता ने समझना होगा पडोसी देश सीमा पर सुरंग बना रहा है और उसको जल्दी वीजा देकर हमारी सरकार के विदेश मंत्री आने का न्योता दे रहें हैं पूरा विश्व ब्यापार के लिए कम पड़ रहा है जो ऐसे धोकेबाज मुल्क से दोस्ती की चाहत बन रही है यह तो कांग्रेस ही जाने जनता तो मूक दर्शक है वह पहले भी इनकी गलत नीतियों से बर्बाद हो रही है आगे भी उसका हाल बद से बदतर ही होना है पहले ही यहाँ लोग सुरक्छित नहीं अब और असुरक्छा का सामना करना पड़ेगा अपने देशवासियों को पर इसके लिए सरकार और खासकर कांग्रेस तो बेफिक्र बने हुए अपने बाकि के डेढ़ साल पूरा करने में लगी है . ठाकरे जैसे नेता क्रिकेट पर तो पिच खोदने की बात करते हैं पर इस वीजा नियमों में ढील देने पर चुप्पी क्यूँ? कुछ नहीं बोलते क्या बात है .

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

राष्टीय चिन्हो का तो खुद कांग्रेस ने मजाक बनाया हुआ है देस के झण्डे जैसा कांग्रेस का झण्डा क्यूं हर कांग्रेसी अपनी गाडी पर लगाए घूम रहा है गान्धी नेहरू इन्दिर राजीव के जन्म मृत्यु दिवस  पर करोडो के विज्ञापन क्यूं   मुसलमानो के लिए अलग कानून क्यो  कहां जाए हिन्दू  कहां है संविधान क्या इजत होगी इसकी-  प्रधान मन्त्री राष्ट्रपति के भाषण देखो क्या गरिमा है उनकी उसमे कुछ योगदान असीम ने भी डाल दिया  तो खास फर्क नहीं पडता क्योकि राष्ट्रीय अस्मिता नाम की कोई वस्तु कांग्रेस ने छोडी ही नही बस कुर्सी चाहिए धन चाहिएबाकी कुछ नही- ये मर्यादा  सिर्फ हिन्दुओ के लिए है इसका कारण भी पता चल गया है

के द्वारा:

वासुदेवजी , आपका आलेख बहुत ही संतुलित और समझदारी से लिखा गया एक उत्तम प्रस्तुति है और प्रभावी भी है . अब कांग्रेस सोंच रही हो की वह ७५ वाला आपातकाल लगाकर जनता का मुह बंद कर देगी या अन्ना हजारे के टीम को भंग कर उनको तीन खेमे में बाँट देगी या रामदेव पर इनकम टैक्स के छापे डलवा कर अपने खिलाफ भ्रष्टाचार की उठते आवाज को बंद कर देगी तो उसकी यह भूल है ,पर दुःख तो यह है की यह सोशल मिडिया भी कितने लोगों के बीच पढ़ी और समझी जाती है मेरी समझ से अभी इसका भी दायरा उतना नहीं बढ़ा जितना बढ़ना चाहिए था क्यूंकि लोगों के अलग अलग पसंद है कोई इन साईटों पर अपने मन के भड़ांस को कई गलत बातों को लिखकर निकालता है तो कोई कुछ और लिखता पढ़ता है सामाजिक सरोकार बहुत कम लोगों का होता है और यही कारन है की इन आंदोलनों में जो मजबूती जो समर्थन मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिल रही है और मिला जुलकर कांग्रेस की तानाशाहियत चल रही है और मुझे नहीं लगता यह सरकार २०१४ से पहले सत्ता को छोड़ने वाली है क्यूंकि जो अपने को कांग्रेस विरोधी कहते हैं वे भी केंद्र में सरकार के समर्थन में है और राज्यों में विरोधी हैं और सौदेबाजी हो रही है कोई पार्टी का मुखिया कहता है मेरी सीबीआई की फाईल बंद रखो मैं तुम्हारी सर्कार को समर्थन दूंगा और यह सर्कार जो जनविरोधी नीतियों के तहत काम कर रही है जिस सरकार को जनता की समस्यायों से कोई सरोकार नहीं वह साल दर साल अपना कार्यकाल निकालते जा रही है चाहे वह नित नए घोटाले करे महंगाई चरम सीमा पर हो जाये लोगों को दो वक्त की रोटी की मुश्किल हो , बच्चे कुपोषण के शिकार हों इन सब समस्यायों को यह सरकार तो दर किनार कर दे रही है और एन केंन प्रकारेन सत्ता पर काबिज रहने को ही अपनी जीत समझ रही है आज कोई मजबूत विपक्छ भी नहीं है पहले हम कमजोर प्रधानमंत्री का रोना रोते थे अब मजबूत बिपक्छ को रोते हैं जनता के हिस्से में तो रोना तड़पना ही बाकि बचा है क्यूंकि जनता इन भ्रष्ट नेताओं को चुनने की जिम्मेवार है ऐसा नेता चिल्ला चिल्ला कर कह रहें हैं और ठीक कह रहे हैं जब वोट देने की बरी आती है तो लोग छुट्टियाँ मानते है और जब अपराधी और भ्रष्ट सताने लगते हैं तो यही जनता शोर मचाती है यही बयां आज नेता चारो तरफ प्रचारित कर रहे हैं और साडी बुराई और नाकामी को जनता के ऊपर ही दाल रहे हैं जनता को अपने लिए सडकों पर आना होगा धरना प्रदर्शन को बधन होगा गाँव गाँव शहर शहर इन भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ लम बंद होना होगा अगर जनता में एकता आएगी तभी यह सरकार सत्ता से जाएगी वरना यह अपने खिलाफ प्रचार को भिन्न तरीकों से रोने का ही प्रयास करेगी और सोशल मिडिया पर लगाम उसी और उठे जानेवाला सरकारी कदम है . अंत में एक अच्छा लेख और बेस्ट ब्लागर कहे जाने को बधाई

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

सदा की भांति एक सशक्त लेख के लिए साधुवाद ! सत्ता में बने रहने के लोभ के चलते देश के नेतृत्व का नैतिक पतन चरम पर है ! वोट की राजनीति / जाती विशेष का तुष्टिकरण एक आम बात हो गई है ! बेशर्मी की हद तो तब होती है जब, धर्मान्ध लोग हुकूक की लड़ाई का फतवा दे कर, देश की सम्पदा को आग के हवाले कर देते हैं, और नेतृत्व इसे, मात्र प्रतिक्रिया की नज़र से देखता है ! यदि ऐसा है तो प्रतिक्रिया का प्रतिउत्तर भी होता है, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है !इस सब के बावजूद हिन्दू विचार-धारा ही दोषी ठहराई जाती है ! बंगला देशी घुस-पैठ के चलते पूर्वोत्तर-राज्यों के जन-मानस में भय का माहौल है !वे स्वयं को हिन्दोस्तानी नगरों में असुरक्षित महसूस करने लगे हैं !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

वासुदेव जी , आपके लेखन में हमेशा ही एक नवीनता , स्पष्टवादिता और जोश होता है ! आपने ये तो सुना ही होगा की जब दिया बुझने वाला होता है तो वो जलने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता है , उसे स्वीकार ही नहीं होता है की उसे भी कभी न कभी बुझ जाना ही है , कोई अज़र नहीं कोई अमर नहीं किन्तु सोनिया गाँधी को शायद प्रकृति का ये सिधांत पता नहीं है , उन्हें यही लगता है की जब तक वो हैं सत्ता उनके ही हाथ में होनी चाहिए , शायद बिना सत्ता के वो कैसे जी पायेगी , मैं नहीं जानता ! लेकिन इतना जरूर जानता हूँ की वो इंदिरा गाँधी नहीं है , इंदिरा को भी इस देश की जनता ने सत्ता से हटा दिया था ! अपनी खोई हुई साख को बचाने के चक्कर में कांग्रेस सही और गलत का अंतर भूल गयी है ! बढ़िया लेख

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय सरिता जी, आक्रोश नहीं प्रश्नों को बस थोड़ी धार देकर रख देता हूँ..! सार्थक बहस में भी एक बड़ा दोष आता है कि प्रायः लोग circle run way पकड़ लेते हैं... किन्तु मेरा भी एक दोष है कि मैं वैसे तो कई जगह उपेक्षा करता हूँ किन्तु जहां टिकता हूँ वहाँ सामने वाले को circle run way नहीं पकड़ने देता... ;) मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया था और फिर उसे सुस्पष्ट भी कर दिया कि व्यक्तिगत किसी हिन्दू मुसलमान अथवा सिख की बात ही नहीं है, प्रश्न है विचारधारा का। मैं कलाम और असफाक जैसों का उदाहरण दे रहा हूँ .......सामान्य जन की दीन के नाम पर उमड़ती भीड़ और राष्ट्रहित के नाम चुप्पी ही तो परेशान करती है..!! उदाहरण के लिए ऊपर की टिप्पड़ी और लेख पुनः देखें। समर्थन न मिलने का डर..... यही तो मुख्य बिन्दु है..! अभी मामला मुम्बई में रातोंरात 50,000 की भीड़ का हो अथवा कुछ वर्ष पहले 1 लाख 20 हजार की भीड़ का.! अतः दीन के नाम पर रातोंरात बेफिक्र भीड़ और देश के नाम पर इसलिए गिनेचुने लोगों को समर्थन नहीं मिलना क्या सूचित करता है..?? उत्तर तो आपने स्वयं ही अपने प्रश्न को दे दिया है। आपने पहले भी कहा भी आप बात गिने चुने लोगों की कर रही हैं... अब दोबारा यह मत कहिएगा कि गिने चुने लोगों पर तोहमत क्यों... इसके लिए मैं ऊपर प्रतिक्रिया दे ही चुका हूँ, और मैंने उसमे आप को राष्ट्रविरोधी नहीं ठहराया बल्कि उन लोगों के साथ खड़ा किया है जोकि जाने अनजाने सच से आंखे मूँदे हैं और जेहादी लोगों के प्रति उदारवाद का प्रदर्शन कर जाते हैं..!! circle break...!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

हे परम आक्रोशित वासुदेव भ्राता... इस बार आपने मुझे ही राष्ट्रविरोधी ठहरा दिया.. यह सच है कि मूक रहना सहमति की निशानी होती है.लेकिन कभी कभी समर्थन न मिलने का डर भी किसी को मूक रहने पर मजबूर कर सकता है..डॉ.कलाम, या मुख़्तार अब्बास नकवी बस...मुझे इन दोनों के सिवा कोई तीसरा नहीं दीखता जिसे हम आदर्श मुसलमान कह सकें ..फिर भी बात जौहर अली , मदनी, या सिमी संगठन या दारुल इस्लाम की मांग करने वाले स्वार्थी तत्वों की नहीं बल्कि सामान्य जन की है जिसका इस राजनैतिक उठापटक या चाल पेंच से कोई फायदा नहीं, बल्कि नुकसान ही है...और नुकसान के रूप में वही घृणा ....जो आपके लेख में स्पष्ट दिख रही है.. अगर कुछ जाहिलों या स्वार्थी लोगों की करनी के लिए पुरे समुदाय को घृणा की दृष्टि से देखा जाये , या बदला लिया जाये तो क्या आप 84 के दंगों में सिखों को चुन चुन के मारे जाने को सही ठहराते हैं......????

के द्वारा: sinsera sinsera

सुन्दर ऴेख के लिए बधाई कांग्रेस एक बिदेशी सस्था है इसका काम हिन्दुओ पर राज करना है इसके तीन टूल हैं पहला सी बी आई दूसरा प्रिन्ट मिडीया जिसको 1947 से अब तक  बहुत अर्थहीन विज्ञापन दिएशायद बजट से भी ज्यादा  तीसरा कोर्ट अन्दाजा लगाईये कितने जज 15-8-1947 से आज तक  कमीशन अध्यक्ष नाम की रिश्वत खा चुके है देश मे चार कानून हैं पहला मुसलमानो के लिए जो सिर्फबच्चे पैदा करने के लिएहै पालने के लिय गुलाम  हिन्दू जो है दूसरा काग्रेस के लीडरो के लिए जो तथा कथित संविधान सेऊपर  हैं तीसरा कानून अपराधियो के  लिए जिसे धन बल से खरीदते है  चौथा कानून हि न्दुओ के लिए कोरटो मे धके खाने के वासते ईस सब के लिए खुद हिन्दू जुमेवारहैं लम्बी दासता से जमीर मरलगई हैबेटियो की ईजत  लुटवाकरजयचन्द मानसिंह की श्रेणी मे नाम लिखवा चुके हैं

के द्वारा:

भाई  वासुदेव आपने सही लिखा है.मै इस के लिए सबसे ज्यादा गान्धी को जुमेवार मानता हूं  दो नम्बरपर जार्ज नेहरू था इन दोनो ने हमे बी कलास नागरिक बना दिया दोनो लुचे थे  गान्धी को मैडलीन सलैड मिली नेहरू को लेडी माऊन्ट बैटन  व इन ने हमे आजाद नही  होने दिया  गान्धी तो 1944 मे ही जेल मे स्वराज का नारा छोड चुका था बदले मे मैडलीन सलैड मिली जिस  के साथ नगां हो कर सोता था सविंधान 1932 मे  अंग्रेजो ने डोमीनियन स्टेट के लिए जो  एक्ट बनाया था वही लागू हुआ 1949 मे नेहरू ने लन्दन मे क्राउन की वफादारी पर दस्तक किए वाह हमारे नेता डोमीनियन स्टेट का ताज नेहरूको मिला जो तय था गदारो ने अपना नाम सैकुलर  रख लिया जिस  देश भगत का कद बढता दिखाई दिया उसे कत्ल कर दिया लाल बहादुर ललितनारायन मिश्रा शामाप्रसाद मुकरजी दीनदयाल उपाध्याय आदि का कद नेबरू व गान्धी से ऊंचा हो गया  ईसीलिए मरवा दिए. भारत मे मुस्लिम भी गान्धी नेहरू की साजिस के तहत रखेथे

के द्वारा:

चन्दन साहब अपनी सोच सही करो तुम जैसे सुधारक जयचन्द मानसिंह व गान्धी के चेले ही हमारी  गुलामी के काररण बने सिरफ सता बदली है हम आज भी गुलाम हैं मानवता के भार का ठेका सिरफहिन्दुओ पर है  मुसलमान राज करने के लिए हैं मनमरजी करना उनका  अधिकार है हिन्दू बहन बेटियो की ईजत लूटना   जान से मारना जायदाद लूटना व नष्ट करना मुसलमनो का अधिकार है हिन्दुओ का रोना भी अपराध है   सहने के लिए हिन्दू हैं जब तुम जैसे काठ के उलू ओ के विचार  पढता हूं तो रोना आता है कि ये हिन्दू हैं या मुसलमानो के एजेंट हर साम्रगायिक दंगा मुसलमानो से शुरूहोता है पर किसी को सजा नही मिलती   किसी मुसलमान को नसीहत देकर देखो पता चल जायेगा छठी सदी के  बाद गुलाम थे गुलाम हैं गुलाम रहेंगे

के द्वारा:

धन्यवाद.! किसी भी राष्ट्रवादी मुस्लिम के प्रति द्वेष सहन नहीं किया जा सकता। फिलहाल यहाँ लेख बढ़ती हुई मुस्लिम कट्टरता पर केन्द्रित है जो राष्ट्रीयता को नहीं इस्लाम को महत्व देता है। बात-बात पर देश भर मे होने वाली रैलियाँ, मुद्दे जिन पर मुस्लिम वोट बैंक आकर्षित होता है, आतंकी गतिविधियो के विरोध में खड़ा न होना, असहनशीलता का चरम प्रदर्शन उदाहरण हैं कि संक्रामण कितना गहरा है...!!! राष्ट्रवादी मुस्लिमों पर ताने की बात तभी तक सटीक बैठती है जब तक वो दीनी अतिवाद का खुलकर विरोध नहीं करते क्योंकि इससे जिहाद की मानसिकता को मौन स्वीकृति देने वालों में विभेद नहीं हो पाता। वास्तविक राष्ट्रवादी मुसलमान मैं समझता हूँ खुलकर विरोध करता है और ऐसे मुसलमानों पर कोई उंगली नहीं उठाता.! हिन्दूवादी कहे जाने वाले दल भाजपा व संघ जैसे संगठनों में भी आपको मुस्लिम दायित्व संभाले दिखते हैं। पृथक देखिये तो कौन बड़े से बड़ा हिन्दू कलाम साहब पर उंगली उठाता है.? कलाम साहब को राष्ट्रपति बनाने और पुनः समर्थन की घोषणा करने वाले हिन्दूवादी ही तो थे..?? आम हिन्दू जनमानस समर्थन मे था.! हिन्दूवाद इसीलिए तो स्वयं को राष्ट्रवादी कहते हैं क्योंकि वे मौलाना जौहर अली की तरह घोषणा नहीं करते कि महात्मा गांधी भले ही कितने महान व्यक्ति हों लेकिन मैं उन्हें एक तुच्छ मुसलमान से नीचा मानता हूँ क्योंकि आखिरात में वो काफिर ही हैं..!!! जौहर आज भी मुसलमानों के बड़े आदर्श माने जाते हैं... अधिकांश हिन्दू तो उन मुसलमानों पर भी उंगली उठाने में रुचि नहीं रखता जो आज़ाद मैदान जैसे दंगो मे सम्मिलित होते हैं...!!! आप विरोध करिए देखिए आपके विरोध में खड़े पाँच लोगों में से तीन हिन्दू होंगे..., मीडिया से लेकर जनता तक और ब्लॉग में आप तक ;) उदाहरण है..!!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

वासुदेव जी, मैं भी उन्ही "बेचारे गिने चुने सुधारवादी उदारवादी मुसलमान " भाईओं की बात कर रही हूँ, जो दिल से राष्ट्रवादी होते हुए भी तिरछी नज़र से देखे जाते हैं... मुसलमानों की ज़िन्दगी गारत करने के लिए ही उन्हें अलग देश बना कर दिया गया..उन्हें तो अब हमेशा ऐसे ही बंजारापन झेलना होगा..सैकड़ों वर्षों पहले किसी आक्रमणकारी ने जो जाहिलपन दिखाया उसका बदला सारे मुसलमानों से सभ्य लोगो द्वारा लिया जाता रहेगा..उसके बदले में गंवार और बेवकूफ मुसलमान भारत का खा कर पाकिस्तान के गुण गायें गे..फिर वो तो अपनी जहालत में खुश रहेंगे लेकिन व्यंग्य और अलगाव के ताने वो भी सुनेंगे जो खुद को सच्चा भारतीय मुसलमान मानते हैं...मैं ने खुद गाँव में ही नहीं शहर में भी हमारे आपके जैसे सभ्य लोगों के घर में, उनके बर्तन अलग होते देखा है.... आपके लेख में जो फोटो लगी है , वो इन्सान कहलाने लायक व्यक्ति नहीं है, यदि वह मुस्लिम है तो उसने सारे मुस्लिम समुदाय को शर्मसार किया है. मेरी सहानुभूति सिर्फ उन मुस्लिमों के साथ है जो ह्रदय से सच्चे भारतीय होते हुए भी व्यंग्य व अलगाववाद का शिकार होते हैं...

के द्वारा: sinsera sinsera

सरिता जी, हार्दिक आभार.! मुझे विश्वास है कि यदि आपने समस्या की जड़ को गंभीरता से समझा होता तो आपको आपके प्रश्न का उत्तर स्वयं मिल जाता| हिन्दू मुसलमानों के वर्तन अलग रखते हैं इसलिए अलगाव की भावना पनपती है, कहने में तो दमदार लगता है किन्तु वास्तविकता में कहीं नहीं ठहरता.! हिन्दू इस तरह की दूरी गावों में बनाकर रखते हैं, किन्तु गावों में हिन्दू मुसलमान दंगे नहीं होते। वहाँ आज भी भाई-चारा देखने को मिलता है, वहाँ मुसलमान केवल यह जनता है कि वह मुसलमान है, इस्लाम, शिर्क, काफ़िर उसे नहीं आता, संस्कृति व यहाँ तक आस्था भी एकरस है! दंगे शहरों में होते हैं, शहरों में छुआछूत अब विलुप्तप्राय हो गई है, उससे भी महत्वपूर्ण कि जीवन नितान्त व्यक्तिगत होता है। उपरोक्त घटना मुम्बई जैसे मेट्रो शहर की है..!! यदि इसे भी जाने दें तो... यूरोप और अमेरिका के बारे मे आप क्या कहेंगी..?? वहाँ यह अलगाववाद इसी तरह विस्फोटक है.! उनके अपने देश पाकिस्तान मे तो हिंदुओं को राजनैतिक अधिकार भी नहीं हैं... वहाँ हिन्दू मुसलमान की बराबरी करने की सोच भी नहीं सकता, वहाँ यह अतिक्रमण क्यों.? यदि व्यक्तिगत भेदभाव कारण है तो यहाँ बैठकर अमेरिका से दुश्मनी क्यों.? ओसामा के लिए शोकसभाएं क्यों? कश्मीर क्यों.? यदि उन्हें अपने पूर्वजों के यहाँ बस जाने पर अफसोस होता तो सत्ता और समाज के सामने हर बात पर सीना तान खड़ा होने की हिम्मत कहाँ से आती.? दारुल-इस्लाम का नारा हिंदुस्थान के भीतर क्यों दिया जाता.? और फिर जैसा कि आपने कहा कि उनका अपना देश आग मे जल रहा है उसके लिए जिम्मेदार कौन.? हिन्दुओं द्वारा अपने वर्तन न देना.?? यदि हिन्दुओं द्वारा अपने वर्तन न देने के कारण मुसलमान अपने पूर्वजों के यहाँ बसने पर अफसोस करते हैं तो तीन करोड़ बांग्लादेश से यहाँ क्यों घुस आए जबकि बांग्लादेश की खुद की जनसंख्या ही 15 करोड़ है.?? उन्हें वर्तन की चिन्ता क्यों नहीं हुई.? अभी आप इन्हीं प्रश्नों के आधार पर निर्णय करें, मेरे पास तो कहने को बहुत कुछ है किन्तु विस्तार का यहाँ कोई औचित्य नहीं है क्योंकि सभी जानते हैं कि छुआछूत मेल की स्पीड से घट रही है जबकि इस्लामी कट्टरपंथ कम से कम एक्स्प्रेस की स्पीड से बढ़ रहा है। यह सभी मुसलमानों पर प्रश्नचिन्ह नहीं है, यह विचारधारा के पुनरोद्धार का आवाहन है। स्वीकार न करना बेईमानी होगी कि विचारधारा उत्तरदाई नहीं है जोकि आज भी औरंगजेब की बुराई स्वीकार नहीं करती और अपने पूर्वजों के यहाँ बसने पर अफसोस की जगह उनके द्वारा हिन्दुओं पर किए गए अत्याचारों को अपना गौरव समझती है, पहले पाकिस्तान बनाने के बाद अब भारत मे ही शरीयत लागू करने का ख्वाब रच रही है। मुसलमानों ने तो सदियों हिन्दुओं पर अत्याचार किए, भेदभाव तो दलितों के साथ हुआ... दलित तो आज अलगाववाद को नहीं पाल रहे हैं वरन बदलते समय के साथ भेदभाव कम होता जा रहा है और समाज समांगीभूत होता जा रहा है...!!! पूरे विश्व में मुसलमानों के साथ ही क्या समस्या है.??? (बेचारे गिने चुने सुधारवादी उदारवादी मुसलमान कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा अलग थलग कर दिये जाते हैं)

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

वासुदेव जी नमस्कार, बेस्ट ब्लॉगर बनने की बहुत बधाई.. आपने बेबाकी भरा लेख लिख कर सच्चा लेखक धर्म निभाया है..लेकिन एक सच ये भी है कि भारत की सम्पूर्ण मुस्लिम जनसँख्या ऐसी नहीं है, बहुतेरे राष्ट्रवादी भी मिलें गे लेकिन ज़रा सोचिये ..जब भारत की मिटटी में जन्म लेने , यहीं पलने बढ़ने के बाद भी जब मुस्लिमों को हिन्दुओं द्वारा नीची नज़र से देखा जाता है , छूत पात की भावना या अलगाववादी विचारों का सामना करना पड़ता है , घरों में बच्चों के मुस्लिम दोस्तों के बर्तन अलग रखे जाते हैं, या उन्हें बचपन में हुए धार्मिक संस्कार का आधार ले कर व्यंगात्मक नाम दिया जाता है.. ..(जो हमारे समाज में बहुतायत से व्याप्त है )...तब उन्हें कैसा लगता होगा... क्या उन्हें आपने पूर्वजों द्वारा भारत में ही बसने के निर्णय पर अफ़सोस न होता होगा.... मेरे हिसाब से तो उनकी स्थिति धोबी के कुत्ते जैसी हो गयी है.....जो देश उनके लिए बनाया गया, वो अलग गृह युद्ध की आग में जल रहा है..और जो मुस्लिम भारत में रह गए, उनमे से अधिकांश तो असमंजस में हैं जैसा कि आपने लिखा कि उन्हें खुद नहीं पता कि वे क्या करें....और बाकियों को भारत तो क्या सारे विश्व में कोई भी सम्मान देने वाला नहीं है....

के द्वारा: sinsera sinsera

इसका बीज गान्धी की महत्वकाक्षा मे निहीत है जो  हिन्दुओ के कन्धो पर पैर रख उपर उठा नेता बना  उन्ही हिन्दुओ से गदारी की मुसलमान तो उसे नेता मानते नही थे उनकी नजर मे नेता  बनने के लिए  हर कदम पर हिन्दुओ का बुराकिया हिन्दुओ पर हुए अत्याचार पर कभी  इतराज नही किया चाहे मालाबार हो या दूसरी जगह   . जनसख्या आधार पर देस बटा पर 20 करोड मुसलमान रखे वह सार्व भौम नेता बन शान्ति का नोबल पुरसकार लेना चाहता थाइसी चक्र मे बटवारे मे 5 लाख हिन्दू मरवा दिए जो आज भी चालू है  लुचा था पराई औरतो संग नंगा सोता थासरला सुशीला मनी आभा मैडलीन  सलैड  उनके नाम थे नमकहराम था खाता हिन्दुओ का था पर भला मुसलमानो का करताथा 1944 मे जेल से छूटने पर स्वराज का नाराछोडा बदले मे मैडलीन सलैड मिली  यानी जेल मे समझोता  पटेल की जगह उसी ने नेहरू को आगे किया जो पूर्णरूप से  हिन्दुओ के खिलाफ था देश कभी आजाद हुआ ही नही सिर्फ सता बदली थी नेहरू रानी का  प्रतिनिधी था1949 मे लन्दन मे नेहरू ने क्राऊन का वफादार रहने वाले पैकट पर साईन किए आज देश की 90 प्रतिसत समस्या ईन दोनो की देन है  गदारो ने अपने नाम सैकुलर रख लिए है जयचन्द व मानसिंह बहुत है चन्द्र शेखर आदि कम है

के द्वारा:

के द्वारा: annurag sharma(Administrator) annurag sharma(Administrator)

Hallo Sir , आप के लेख को पढ़ कर हृदय आंदोलित हो गया इसके लिए आप को बधाई , और साथ ही साथ हमें आपनी राजनेताओ की स्वार्थी एवं स्तरहीन सोच पर तरश आ रहा था जो केवलअपने राजनेतिक हितो को ही साधेने में लगे रहेते हैं . हमें आपनी कायरता पर भी तराश आ रहा है जो की हमारे अन्दर हज़ार सालो की गुलामी के कारन हमारे रक्त में मिल चूका है जिसे हम धर्मन्निर्पक्षेता एवं उदारवादी का लबादा पहन कर छिपाते रहते हैं जिसके कारण हम हर स्त्तेअर पर रक्ष्तामाक नीतियों पर चलते है . इस रास्त्र में जयचंद एवं मीरजाफर तो हमेसा थे और रहेगे भी जिनका कोई रास्त्र धर्मं नहीं होता वो केवल अपने नीजी हितो को ही श्रेष्ठ मान कर चलते हैं . अता हमें एक स्पस्ट रास्त्रवादी नीतिओ की जरोरत है जो रस्ट्रभावना को प्रेरित करे और रास्त्र हित में भी हो . अंत आप की विचारो का हम स्वागत करते हैं और आसा करते है हर ब्लोगर आप के विचारो को अपने मित्रो/ परिवार में चर्चा करके पुनह प्रसारित करेगा. धनयवाद

के द्वारा:

महाशय मैं आपकी तिलमिलाहट समझ सकता हूँ... ये बात बहुत से लोगों को समझ में नहीं आ रही है... सब अपने घर में मजे लेने में व्यस्त हैं और इस विश्वाश में जी रहे हैं कि उनके साथ कुछ नहीं होने वाला... मगर इतिहास के आकड़ें भयावह हैं...वास्तव में वर्तमान के आकड़ें भी बड़े गंभीर संकेत दे रहे हैं...जयचंद जो कि मुहम्मद गोरी कि बड़ी मदद करता था बाद में वो भी मुहम्मद गोरी के हाथों मारा गया....और उसके बाद क्या हुआ इतिहास गवाह है....जजिया कर देकर और अपनी बहु बेटियों को लुटा कर हिन्दुओं कि आत्मा मर गई है..... आज कांग्रेस असम में जिसे अपना बड़ा वोट बैंक समझ रही है वो ही आने वाले सालों में उसके लिए बड़ी चुनौती बनने वाला है... ये बात तरुण गोगोई को महसूस होने लगी है.... एक तरफ ये तथाकित शांति प्रिय लोग हैं जिन्होंने अपने असम ( घुसपैठ) और बर्मा (बौद्ध लड़कियों के साथ बलात्कार) के भाईयों की गलत हरकत से इस देश का जीना मुहाल कर रखा है.. वही दूसरी तरफ हिंदूओ जैसे बेवक़ूफ़ भी हैं जो पाकिस्तान में मारे जा रहे हिन्दुओं और उनकी लड़कियों के साथ बलात्कार और धर्म परिवर्तन की घटनाओं पर साम्प्रदायिक सौहाद्र की बातें कर रहे हैं... वाह क्या बात!!!!!!!! जहाँ एक हिन्दू एक तरफ श्री कृष्ण के बड़े भक्त हैं वही हिन्दू गीता के मूल सन्देश को भूल गए.... वास्तव में मुझे लगता है ये सनातन धर्म जो गीता पे विश्वाश करने वाला था कई साल पहले ही ख़त्म हो गया मात्र हिंदुत्व के अवशेष मात्र रह गए हैं... अफ़सोस होता है.... ये देखकर ...

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

त्रिपाठीजी , राष्ट्रीयता की परिभाषा को दुबारा परिभाषित करने की जरुरत आज आन पड़ी है आज सत्ता में काबिज कांग्रेस ने धर्मनिरापेक्छाता के नाम पर केवल मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए हीं सारे मसौदे बनाती है और चुनाव दर चुनाव केवल एक हीं अजेंडा इनका रहता है कैसे मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ मिलाया जाये और कामो बेश गैर पार्टियाँ जैसे की समजवादी पार्टी जो अभी यूपी में भारी बहुमत से जीती है उसको भी मुस्लिमों के वोट पर हीं नजर थी और मुस्लिम वोट मिले भी उसी पार्टी को और वे बिजयी हुए अब ये कैसी त्राश्दी है की हिन्दू बहुल देश में नेता केवल मुस्लिमों पर भरोसा कर के हीं वोट की राजनीत करते हैं उसके लिए चाहे देश में अलगाववाद क्यूँ न पनपे यह किस राष्ट्रीयता की मिशाल है जहाँ सम्विधान इस बात की इजाजत देता है की राष्ट्रिय नीतियाँ भी धर्म के आधार पर तय होती हैं जब भारत में रहना है तो भारतीय बनकर रहना है न की मुस्लिम हिन्दू बनकर एक दुसरे के बीच नफरत के बीज बोने हैं, जरुर सर्कार को हर हाल में राष्ट्रीयता को सर्वोपरि मानकर हिन् नीतियों का निर्धारण करना चाहिए अगर आबादी एक समस्या है तो वह मुस्लिम आबादी के लिए भी है और अगर उनका धर्म परिवार नियोजन को धर्म के खिलाफ बताता है तो इसकी इजाजत भी नहीं मिलनी चाहिए और जरुर अधिक बच्चे पैदा करने पर सरकारी सुविधाओं से उनको वंचित करने का भी प्रावधान लाना चाहिए कानून बनाना चाहिए ताकि चार चार शादियाँ कर ये देश के ऊपर आबादी का बोझ न बदहा सकें . एक अच्छा लेख लिखने के लिए बधाई

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

त्रिपाठीजी आपका वही सत्य से भरा उम्दा विश्लेषण... मगर इस छद्म सेकुलर वादी इस सत्य को झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं... हम जब इतिहास को पढ़ते हैं तो उस समय की भूलों को देखते हैं... तो हमें लगता है की उस समय के शासन कर्ताओं को कुछ उदार वादी होने के बजाय क्रूरता से आक्रमण कारियों का दमन करना चाहिए ... मगर आज स्थिति अगर हमारे सामने फिर से हम हताश महसूस कह रहे हैं... लगता है.. पिछले हज़ार सालों की गुलामी की वजह से भारतवासी अपना आत्मविश्वास खो चुके हैं.. यहाँ के सत्ता धरी राज़ करना भहो चुके हैं... एक ख़ास वर्ग का वोट पाने के चक्कर में उस वर्ग को एक जगह में बढ़ावा देना ये केवल इतना भर नहीं हैं... इन बातों की जड़ें और भी गहरी हैं और लोग इन बातों को मानते नहीं ...जब एक खास वर्ग के अलग क़ानून होते हैं समस्या यही से शुरू हो जाती है...

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

संवेदनशीलता राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों की अपेक्षा मजहबी वाकयों पर इनका यूँ विद्रोही रुख इख्तियार करना कुछ ऐसा ही है जिस प्रकार आपने आलेख में बताया है,यह वो पीढ़ी नहीं है जो देश की उन्नति चाहती है,ये वो पीढ़ी है जो मजहबी जेहाद के नाम पर अपने सहोदर की बलि चढाने से भी नहीं चूकती,ऐसे लोगों की नजर में लोकतंत्र सर गैर-मझाबियों का चोंचला है जिनमे उनके कुछ मजहबी भी फंस गए हैं,हर तंत्र की स्थापना के कुछ सौ वर्षों बाद ही उनकी खामियां लोगों को नजर आती हैं,और तब उसका विकल्प सामने आता है,वैसे लोकतंत्र अभी युवा हैं,किन्तु लोकतंत्र संविधान से चलता है तब तक उसका स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है,अन्यथा कितने ही लोग अल्पायु में ही चल बसते हैं.संविधान लोकतंत्र को ताकतवर बनता है,किन्तु बदजात नेता इसे जबरन नपुंसक बनाना चाहते हैं.अगर किसी मजहब को तरजीह नहीं देनी है तो किसी मजहब को नहीं देना चाहिए,फ़र्ज़ कीजिये कि ये दंगाई 'एक ख़ास मजहब' के ना होकर मजहब से मुक्त भी हों तो क्या उनकी यह हरकतें एक प्रभुतासंपन्न देश का जमीर जगाने के लिए काफी नहीं है,खैर इसे नजरअंदाज करने में ही सबकी भलाई है,क्यूंकि यहाँ तो यह भी इल्जाम नहीं लगाया जा सकता की इसके पीछे आर एस एस का हाथ है,क्यूंकि दंगाइयों के दादा के परदादा को संघ के एक कारसेवक के दूर के रिश्ते के मौसा के नाना ने अपने यहाँ काम पर रखने के लिए पेशावर से बुलाया था.

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

सब वोटों की राजनीति है वासुदेव जी.....पाकिस्तान से आये हिन्दुओं के रहने के लिए जगह नहीं है....इस देश में.......लेकिन मुसलमान बंगलादेश तो क्या चाहे किसी भी और देश से क्यों ना आये हों....ये कांग्रेस उन्हें शुरू से ही सर-माथे पर बैठाती रही है.....क्योंकि ये उसका वोट-बैंक जो है...... और तो और......ये हिंसा तो आज की बात है...लेकिन जो हिंसा नक्सलवादियों ने फैला रखी है इस देश में....उसे कौन नहीं जानता.......अब तो इन्होने छत्तीसगढ़ के देहात में हथियारों के कारखाने और वर्कशॉप भी खोल दी हैं........हजारों सुरक्षाकर्मी बलि चढ़ चुके हैं....और आये दिन चढ़ रहे हैं.......लेकिन इस सरकार के कानों पर जूं नहीं सरकती......संसद के दोनों सदनों में विपक्ष की तरफ से कई बार मांग करने के बावजूद इस नक्सलवाद को राष्ट्रीय आपदा घोषित नहीं किया जा रहा.......क्या है ये....??? अति उत्तम और विचारणीय आलेख....... आप ही.....सही सम्मान के हकदार थे........वासुदेव जी......जो आपको मिला.......

के द्वारा: vikramjitsingh vikramjitsingh

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आदरणीय वासुदेव जी, "यह आजादी स्वीकार नहीं" नामक पोस्ट पर प्रतिक्रिया सम्मिट नहीं हो रही है, अतः यहाँ सम्मिट कर रहा हूँ। मैं आपकी इस रचना को केवल कविता नहीं मानता। इसमें एक देशभक्त की पीड़ा मुखर हुई है। लेकिन अब इस पीड़ा में क्राँति का ज्वाल होना जरूरी है। जब तक जाति विहीन समाज की कल्पना नहीं की जाती, इस देश पर इन गद्दारों की ही शासन रहेगा। व्यवस्था परिवर्तन  अनिवार्य है। इसके हिन्दुओं का सशक्त होना अनिवार्य है। इसके लिये जाति विहीन समाज प्रथम शर्त  है। इस संबंध में कोई सार्थक पहल करें। हिन्दु केवल हिन्दु बनकर रहे। ब्राह्मण या हरिजन बनकर नहीं।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

अगर कोई राष्ट्रवादी नहीं है,तब भी स्वीकारे जाने योग्य है,लेकिन जो राष्ट्र-विरोधी है,उसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए,और उस गन्दी नाली के कीड़े को यह भी पता नहीं था की जिन दो वीर सेनानियों की याद में वो अमर जवान ज्योति जल रही थी उनमे से एक वीर मुसलमान ही थे,इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इन जुनूनियों की निगाह में कोई मुसलमान जो देश के लिए अपनी जान लगा दे,सम्मान के योग्य नहीं है,लेकिन मैं दुखी हु उन मुसलमान भाइयों से जो इन जुनूनियों से खुद को अलग कर उसे ही अपने ईमान की इन्तहा मान लेते हैं,जब उनमे इतनी भी हिम्मत नहीं बची जो गलत रास्ते पर जाते अपने मजहब के लोगो को रोक सके,फिर कैसा ईमान और कैसा मुसलमान.तो या तो वो अपने मुसलमान होने का फ़र्ज़ अदा करने में अल्लाह से चोरी कर रहे हैं या उनकी अनुमति भी इन हरामजादों के साथ है,तीसरा कोई आप्शन एक मुसलमान के पास नहीं हो सकता,क्यूंकि जिसका सच्चा ईमान हो वही मुसलमान होता है,पांच वक़्त की नमाज भर पढ़ लेने से कोई मुसलमान नहीं हो जाता.

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

जातिभेद तो टूटने ही चाहिए और यह सुखद है कि हिन्दू समाज तेजी से बदल रहा है| समाज में विकृतियाँ सदैव परिस्थितियोंवश जन्मती हैं और पुनः भी धीरे धीरे ही बदलती हैं| एक बात कि कुछ ही मुसलमान कट्टरता का समर्थन करते हैं... मुझे लगता है यह धीरे बदल रहा है| जैसे जैसे अरब देशों का इस्लाम हावी होता जा रहा है भारतीय संस्कृति की छाप मनोमस्तिष्क से हटती जा रही है| इसके लिए मुसलामानों का प्रमुख दोष नही है, दोषी वह विचारधारा है जो समाज को संक्रमित कर रही है! यदि कट्टरपंथ बढ़ न रहा होता और मुस्लिम बहुमत इसका समर्थन में न उतर रहा होता तो राजनीति कट्टरपंथ के तुष्टीकरण के लिए दिन प्रतिदिन विवश क्यों होता जा रहा है? क्यों मुलायम सिमी का समर्थन करके मुसलमानों के सबसे चाहीते बन जाते हैं? जब आज़म खान कहते हैं कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है तो क्यों मुस्लिम समाज से विरोध नहीं उठता.... क्यों वे उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े नेता बने रहते हैं? और भारत माँ को डायन.... असम और केरल में मुस्लिम किसका समर्थन कर रहे हैं? मुम्बई मे रातों-रात 50,000 लोग असम और म्यांमार के लिए खड़े हो जाते हैं... यह उत्साह और जगह क्यों नहीं दिखता.? कई प्रश्न हैं, कुछ लेख में भी हैं। मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि हर मुस्लिम कट्टर है। कट्टरता के खिलाफ सोचने वाले कुछ मुस्लिम मेरे मित्र हैं और वो मेरे समर्थक भी हैं किन्तु बहुमत क्या कह रहा है? दोष विचारधारा मे है और ये फैल रही है। हम भी उन्हें मुख्यधारा में लाने का प्रयास करने के स्थान पर मदरसों को बढ़ावा देते हैं तो कभी इमामों के लिए सरकारी वेतन बांधते हैं..!! उपासना पद्धति से समस्या नहीं होती.... समस्या होती है इस विचारधारा से। सच बोलोगे तो सांप्रदायिकता का ठप्पा लगेगा.... और फिर हम तुरंत अपने कपड़े झाड़ने लगते हैं ताकि हम उदार और आधुनिक दिख सके.! सहिष्णुता कम करने की आवश्यकता नहीं है मेरे अनुसार, बस भय को खत्म करना पड़ेगा। सत्य को देखेंगे तो स्वीकारेंगे.,स्वीकारेंगे तो समाधान भी निकलेगा। फिर राष्ट्र सर्वोपरि होगा तो क्या फर्क पड़ता है आप नमाज़ पढ़ते हैं या मंदिर मे फूल चढ़ाते हैं.!!!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आदरणीय वासुदेव जी, सादर नमसमकार। आपके आलेख एवं विचारों से मैं सहमत हूँ। लेकिन इन समस्याओं का मूल कारण क्या है। हम उनपर विचार क्यों नहीं करते। उन्हें नजर अन्दाज कर देते हैं। यदि हमें इन समस्याओं से निजात पाना है तो हिन्दु समाज से जातिगत भेदभाव को मिटाना होगा। छुआछूत को नष्ट करना होगा। जातियों को तोड़कर केवल हिन्दु बनकर रहना होगा। अतिसहिष्णुता के सिन्द्धाँत को व्यवहार में भूलना होगा। किन्तु यह बात भी सत्य है कि कुछ मुसलमान ही कट्टरता का समर्थन करते हैं, लेकिन वे इतने अधिक शक्तिशाली हैं कि आम सच्चा भारतीय मुसलमान उनका विरोध नहीं कर पाता। ऐसे मुसलमानों को आगे आना चाहिये। मुझे लगता है कि असम शासकीय षडयंत्र है। असम में काँग्रेसी शासन को स्थायित्व प्रदान करने के लिये यह नीति अपनाई जा रही है। हमारी कोशिश हो कि इस बार केन्द्र में काँग्रेसी तथा उसकी विचारधारा से  संबंधित पार्टियाँ केन्द्र में न आ पायें। आपके राष्ट्रवादी विचारों का समर्थन, किन्तु साम्प्रदायिकता का..........

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

चन्दन जी, मेरे लेख के कोई भी दो अर्थ नहीं हैं.! इसका एक ही अर्थ और वह बिलकुल स्पष्ट है| मेरे आलेख में क्या साहस कि हिन्दू-मुस्लिम के बींच रेखा खींच दे.... लेख सिर्फ सच को कह रहा है सच को बदल नहीं रहा। सच को बदलने की क्षमता मुझमे नहीं है... संभवतः किसी मे भी नहीं है। हाँ झुठलाया अवश्य जा सकता और वही हो रहा है। यदि आपको लगता है कि लेख मे कुछ ऐसा अनुचित या असत्य है जो बींच में रेखा खींच रहा है तो उन पंक्तियों को तर्क व प्रमाण के साथ बताये, मुझे भी विचार करने का अवसर प्राप्त होगा। और यदि तथ्य के आधार पर सत्य है तो ऑस्ट्रिच अप्रोच अपनाने से काम नहीं चलने वाला..!!! रेत में आँख बन्द कर चोंच घुसेड़ देने से भी क्या सत्य बदल जाएगा.? जिनके लिए राष्ट्र मजहब से बड़ा है वो हिन्दू हों अथवा मुस्लिम मेरे लिए समान हैं किन्तु जो भारत के सीने पर बम फोड़कर मजहब की पपीहरी बजा रहे हैं उनके लिए राग भारतीय हमारे संगीत शास्त्र में नहीं है। हम अपनी कायरता को मानवता मानवता चिल्लाकर कब तक अपने आपको महान समझकर अपनी पीठ ठोंकते रहेंगे.? इससे न इतिहास बदला है और न वर्तमान या भविष्य ही बदलेगा..!!! हार्दिक आभार।

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आदरणीय दिनेश जी, यह सत्य है कि हिन्दू समुदाय ने बलात धर्मांतरित किए गए हिन्दुओं को पुनः अपने समाज में स्वीकार नहीं किया जिसके परिणाम स्वरूप 8वीं शताब्दी में जो क्षेत्र धर्मांतरित मुसलमानों से भर गए थे वे 1191 आते आते हिंदुस्थान के लिए मर्म स्थान से बन चुके थे, सिंधु पार का क्षेत्र अब भारत के विरुद्ध खड़ा हो था। यह हिन्दू जाति की महानतम भूल थी जिसका परिणाम बाद की सदियों तक देश ने भुगता, बाबजूद इसके कि हिन्दू धर्म ग्रंथ धर्मभ्रष्ट कर दिए जाने वाले को पुनः धर्म में समाहित होने की पूरी व्यवस्था करते हैं। सदियों से निष्कंटक जीवन व्यतीत कर रही यह जाति यह भूल चुकी थी उसके लिए भी संकट आ सकता है। किन्तु जहां तक जाति व्यवस्था का प्रश्न है ऐतिहासिक रूप से यह हमारी दासता का कारण रही हो ऐसा नहीं है, कम से कम मुस्लिम आक्रमण काल के समय तो बिलकुल नही.! ऐसा हमे बताने का प्रयास किया जाता है... राजीव दीक्षित जी कहा करते थे कि मैंने 50,000 से अधिक आधिकारिक दस्तावेज़ पढे और समझे हैं, हम जाति व्यवस्था के कारण हार गए ये कोरी भावुकता है। मेरा इतना व्यापक अध्ययन तो नहीं है किन्तु यह मैंने जाना और समझा है कि इतिहास का generalization नहीं किया जा सकता..!!!! प्रत्येक घटना के पीछे एक या अधिक विशिष्ट कारण होते हैं। हम जाति के कारण हार गए, मुस्लिम कालीन इतिहास को सामान्य रूप से पढ़ने समझने पर यह तर्क थोथा लगने लगता है। यहाँ एक-एक घटना का उदाहरण देकर तो नहीं दिया जा सकता और उसकी आवश्यकता भी नहीं है। आप स्वयं विद्वान हैं, इतिहास की एक-एक घटना का विश्लेषण करेंगे और उसके कारणों को ढूंढेगे तो समझ जाएंगे। मैं यहाँ जाति व्यवस्था की रूढ़ता का समर्थन नहीं कर रहा किन्तु हम इतिहास पर अपनी मन-मर्जी से जो चाहे थोप भी नहीं सकते। ऐसा बहुधा वामपंथी इतिहासकार करते हैं और उन्हें करना भी चाहिए क्योंकि उनका उद्देश्य रहता है कि हिन्दू सभ्यता को नीचा दिखाना... हम तो कहते हैं हमें जब आप प्रमाण देंगे हम तब तुरंत मान लेंगे..!!!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

इतिहास की मानसिकता अभी तक जीवित है अतः वर्तमान में इतिहास का प्रतिबिम्ब भी झलकता है। यदि भारत को जीवित रखना है तो भारत को पाकिस्तान बनने से रोकना होगा और इसके लिए आवश्यक है कि कट्टरपंथ के आगे घुटने टेकने की आदत को बदला जाए। वास्तविक पंथनिरपेक्षता को आखिर समान संवैधानिक क़ानूनों से परहेज क्यों होना चाहिए.? अन्यथा यह प्रश्न तो उठना स्वाभाविक ही है कि 21वीं सदी के लोकतन्त्र में इस्लाम से यह खौफ और हिन्दुओं के साथ ही दोगला व्यवहार क्यों.? मित्रवर वासुदेव , एक और पाकिस्तान का बनना निश्चित है , भले थोड़ी देर लगे लेकिन बनेगा जरूर ! हमारे नीति निर्माता इतनी घटिया सोच के बैठे हैं ! बहुत ही सटीक और साहसिक लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

स्नेही वासुदेव जी, सादर अभिवादन, साम्प्रदायिक मानसिकता से ग्रसित सभी सभ्यताएं धर्म को भुला कर सिर्फ सम्प्रदाय पर आश्रित हो रही है इसका प्रमुख कारण है कि सम्प्रदाय में आक्रामकता होती है जबकि धर्म पूर्णतयः बौद्धिक| लोकतंत्र में इस्लाम के खौफ का प्रमुख कारण यही है कि जहां सनातन विचारधारा धर्म पर बल देती है वही इस्लाम सिर्फ सम्प्रदाय पर यानी कि सनातन हिन्दू जहाँ आत्मोथान, मोक्ष और सर्वे भवन्तु सुखिनः की और जाने के कारण अपनी मारक क्षमता (भीड़ और उत्तेजना) को खो देता है वहीँ इस्लाम में धर्म के नाम पर सिर्फ सम्प्रदाय का बोध मात्र उसकी मारक क्षमता को बढा देता है| लोकतंत्र वास्तव में कोई शासन प्रणाली न होकर एक हवा-महल है जो जल में बने हुए प्रतिबिम्ब को असली दिखा कर वास्तविक शासन के दुर्ग तक कभी जनता को पहुँचने नहीं देता| परिणामतः भीड़ बनाना और उसकी ताकत दिखाकर शासन और प्रशासन को प्रभावित करना ही लोकतंत्र का एक मात्र मकसद बन जाता है| सम्प्रदाय भीड़ को बढ़ावा देकर इस्लाम को लोकतंत्र पर हावी करने का पूरा मौका और सारी आवश्यक सामग्री प्रदान करता है जबकि हिंदुत्व इसके विपरीत सिर्फ शासन के नियमो, सदाचार के नियमो और मानवता के लिए आत्म-चिंतन और स्वयं में जो कमियां हैं उनके लड़ना सिखाता है न कि भीड़ बनाकर लोकतंत्र पर हावी होना| यहीं पर भीड़ गायब हो जाती है यही पर हिंदुत्व का लोकतंत्र पर वास्तविक अधिकार लुप्त हो जाता है (मेरी इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण आप मित्र दिनेश अग्रवाल जी की प्रतिक्रिया में देख सकते हैं| अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

के द्वारा: chaatak chaatak

वासुदेव त्रिपाठीजी केजरीवाल क्या आप भी आंदोलन का मुखिया बनने का प्रयास कर सकते हैं और हम आप और युवायों के साथ हैं | आंदोलन अन्ना से नहीं अपितु जन -आन्दोलन था | केजरीवाल भी अन्ना आंदोलन के मुख्य और अभिन्न साथी रहे हैं | केजरीवाल आंदोलन के मुखिया बनने कि कोशिश करें तो क्या हर्ज़ है यह सब तो आनेवाला वक़्त बतायेगा किसने क्या किया | यह अवश्य नहीं कि केजरीवाल ने अपनी मर्जी से अनशन छोड़ा हो | चाहे दोषपूर्ण हो यह टीम अन्ना का निर्णय था | आपने सत्य कहा आजादी बलिदान मांगती है… बलिदान के दावे नहीं। हाँ टीम अन्ना को सोच – समझ कर सारे देश में अन्दोलन चलाने होंगे | टीम अन्नाजी के पीछे भी अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, मनीष सिसोदिया औरे दुसरे निस्वार्थ अन्दोलन कर्त्तायों के प्रति हमें सम्मान की भावना रखनी चाहिए | आदमी गलती का पुतला है | कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिससे गलतियें न हों | एक भजन याद आगया : प्रभु ना बिसारिये हिम्मत न हारिये | हस्ते मुस्कराते हुये जिंदगी गुजारिये || आपकी सोच और कहनी से मैं प्रभावित हूँ | प्रयास, पुरषार्थ और जोश को कभी न छोड़े | आप कहनी और करनी में विश्वास रखनेवाले व्यक्तित्व है | परमात्मा हमें सबुद्धि दे और हम अपनी संस्कृति, संस्कारों और और सब भाषाओँ कि माँ संस्कृत की रक्षा कर सकें | अभार |

के द्वारा:

वासुदेव त्रिपाठीजी केजरीवाल क्या आप भी आंदोलन का मुखिया बनने का प्रयास कर सकते हैं और हम आप और युवायों के साथ हैं | आंदोलन अन्ना से नहीं अपितु जन -आन्दोलन था | केजरीवाल भी अन्ना आंदोलन के मुख्य और अभिन्न साथी रहे हैं | केजरीवाल आंदोलन के मुखिया बनने कि कोशिश करें तो क्या हर्ज़ है यह सब तो आनेवाला वक़्त बतायेगा किसने क्या किया | यह अवश्य नहीं कि केजरीवाल ने अपनी मर्जी से अनशन छोड़ा हो | चाहे दोषपूर्ण हो यह टीम अन्ना का निर्णय था | आपने सत्य कहा आजादी बलिदान मांगती है… बलिदान के दावे नहीं। हाँ टीम अन्ना को सोच - समझ कर सारे देश में अन्दोलन चलाने होगे | टीम अन्नाजी के पीछे भी अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, मनीष सिसोदिया औरे दुसरे निस्वार्थ अन्दोलन कर्त्तायों के प्रति हमें सम्मान कि भावना रखनी चाहिए | आदमी गलती का पुतला है | कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिससे गलतियें न हों | एक भजन याद आगया : प्रभु ना बिसारिये हिम्मत न हारिये | हस्ते मुस्कराते हुये जिंदगी गुजारिये || आपकी सोच और कहनी से में प्रभावित हूँ | आप कहनी और करनी में विशवास रखनेवाले व्यक्तित्व है | परमात्मा हमें सबुद्धि दे और हम अपनी संस्कृति, संस्कारों और और सब भाषाओँ कि माँ संस्कृत कि रक्ष कर सकें |

के द्वारा:

आदरणीय वासुदेव जी, आपका आलेख पढकर बहुत मनन किया कि इन सबका कारण क्या है। िहिन्दुओं पर जितने अत्याचार हुये शायद ही विश्व की किसी कौम  पर कभी इतने अत्याचार हुये हों। गजनवी के दस हजार सैनिक सोमनाथ राज्य के एक लाख सैनिकों के रहते हुये भी सोमनाथ को लूटकर ले गई। कैसे........ इसका मूल कारण है जाति प्रथा। जिसके कारण बहुसंख्य हुन्दुओं का अल्पसंख्य  जैसा हो जाना। दूसरे धर्म के उन लोंगो को जिनके पूर्वज कभी हिन्दु थे, क्यों नहीं  वापस सम्मान के साथ अपने धर्म में विलय करते हैं। यदि जाति प्रथा को हिन्दु धर्म  से समाप्त कर दिया जाय तो सारी समस्याओं का निराकरण हो जायगा। बुन्देलखण्ड का एक गाँव है, जिसे कभी किसी मुस्लिम सेनापति में घेर कर इस्लाम धर्म स्वीकार करने को विवश कर दिया था। वह क्षत्रियों का गाँव था। आज पूरा का  पूरा गाँव मुसलमानों का गाँव है। वह लोग बताते हैं कि कभी हमारे पूर्वज क्षत्री थे। क्या हि्दु धर्म के धर्मगूरु उन्हें वापस अपने धर्म में लाने का प्रयास नहीं कर सकते थे। यदि हमने अपनी नीतियाँ और सोच नहीं बदली तो कालान्तर में हिन्दु धर्म एक इतिहास  बनकर रह जायगा। मैं साम्प्रदायिकता के खिलाफ हूँ, लेकिन संस्कृति पर आक्रमण बरदास्त नहीं कर सकता। हिन्दु एक संस्कृति है। हमें इसकी रक्षा के लिये सार्थक पहल करना चाहिये। अब केवल लिखने और बोलने से काम नहीं चलेगा। सभी जातियों के हिन्दुओं को एक साथ  लाना होगा। जातिगत भेदभाव को भुलाना होगा।  

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

प्रसाद जी, यह मान लेने से कि टीम अन्ना के सदस्य बहुत बढ़िया कर रहे हैं भटका हुआ आंदोलन रास्ते पर तो नहीं आ जाता..!! उसके लिए आवश्यक कि पहले आप वह काम करे जो करने आए थे। छोटा सा आंदोलन यदि 10 दिन नहीं संभला तो सवा अरब के देश की राजनीति कैसे संभलेगी? अच्छा होने भर से तो सफलता नहीं मिलती... उसके लिए योग्यता, सामर्थ्य और रणनीति चाहिए होती है। अब बात कलमाड़ी, ए राजा और टीम अन्ना के सदस्यों की... कलमाड़ी राजा ने तो देश को अपने लाभ के लिए चूना लगाया किन्तु खुला विरोध तो नहीं किया... टीम के उन लोगों को देश की जनता कलमाड़ी राजा जैसों से बेहतर कैसे मान ले जो डंके की चोट पर देश की अखंडता संप्रभुता को चुनौती देते हैं, अफजल के लिए आंदोलन करते हैं, भारतीय सेना के खिलाफ कश्मीर से असम तक यात्रा निकलते हैं...????

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

दर्शन जी, चूंकि मैं लेख 4 अगस्त को लिख रहा हूँ अतः 25 अगस्त तो नहीं ही होगा... त्रुटि का दर्शन कराने के लिए धन्यवाद। केजरीवाल को आगे करने न करने मे बुराई है अथवा नहीं यह मेरा विषय नहीं था किन्तु अन्ना को दबा के केजरीवाल को आगे करना जनता को तो पसंद नहीं ही आयेगा क्योंकि आप भी जानते होंगे कि जनता केजरीवाल से अन्ना से जुड़ी... मैं अन्ना हूँ ये नारा था न कि मैं केजरीवाल हूँ! अन्ना की अपेक्षा केजरीवाल पर ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास हुआ ये आप सोश्ल नेटवर्किंग साइट्स पर देख सकते हैं.... कुमार विश्वास के एफ़बी पेज को देख लीजिए। मैं श्रद्धा का विषय बनाने के स्थान पर इसके निहितार्थ देखता हूँ...!! सरकार तो हर उस व्यक्ति को परेशान करती है जो उसके विरोध में होता है चाहे वह कैसा हो... यह इस बात का प्रमाणपत्र नहीं है कि आप निस्वार्थ भाव से किसी कार्य मे लगे हैं! आप अग्निवेश की बात करते हैं.... अभी देखिये कितने और गद्दार निकलते, वो तो अच्छा हुआ टीम ही अन्ना ने भंग कर दी..!! मैं केजरीवाल का विरोध नहीं कर रहा वरन यह कह रहा हूँ कि केजरीवाल आंदोलन का मुखिया बनने का प्रयास करेंगे तो रहा बचा भी अधिक दिन अनहि चलेगा क्योंकि आंदोलन अन्ना से था न कि टीम के किसी सदस्य से..!! जो मैंने का कहा है वह यह कि जब आप बलिदान देने के नारे से मैदान मे उतरे तो स्वस्थ्य गिरने का भय आपकी विश्वसनीयता को कमजोर ही करता है.... आप कह सकते हैं कि यह और लोगों को भय था, किन्तु अंततोगत्वा यह सभी को पता होता है कि स्वस्थ्य गिरने पर अनुरोध भी आएगे और दबाब भी अतः श्रेष्ठ यह होता कि बलिदान की बात बार बार न दोहराई जाती। जैसा कि आपने कहा आजादी बलिदान मांगती है... बलिदान के दावे नहीं। यह मैं बार बार इसलिए दोहरा रहा हूँ क्योंकि इससे जनता मे पहले तूफानी जोश पैदा होता है और बाद मे उतनी ही बड़ी निराशा हाथ लगती है। आज अन्ना से जनता को उम्मीदें हैं सही है, किन्तु बेहतर होगा अन्ना को अन्ना रहने दिया जाए। मेरा लेख का जो उद्देश्य है वह यह कहना कि बेहतर होता कि टीम भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनजागृति को लक्ष्य कर के जमीन पर काम करे न कि राजनीति। राजनीति का कदम आत्मघाती सिद्ध होगा, यह भविष्य मे स्वयं सिद्ध हो जाएगा॥ ....आभार॥

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

वासुदेवजी अनशन २५ जूलाई से शुरू हुआ ना की 25 अगस्त को | जनलोकपाल अन्ना टीम ने नहीं सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल रखा है | अरविन्द केजरीवाल को आमरण अनशन से पहले सरकार कैसे - कैसे तंग कर चुकी है यह किसी भी बुद्धिजीवी से छुपा नहीं है | ऐसे में अगर टीम अन्ना अरविन्द केजरीवाल को आंदोलन के आगे करती है तो उसमें कोई बुराई नहीं | सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर केजरीवाल को अगर अधिक से अधिक प्रचारित किया गया तो वोह उनके कब्लियाय और आंदोलन में नंबर दो होने के कारण | मधुमेह (शुगर) के रोगीहोते हुए भी उन्होंने जान और सेहत जोखम में डाली | बलिदान का संकल्प और यह दोहराते रहना कि इस बार लड़ाई आर-पार की है इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि अरविन्द ने धोखेबाजी की है यां उनका aawshya कोई स्वार्थ रहा होगा | हाँ मैं आपसे सहमत हूँ कि जिस तरह आंदोलन को दसवें दिन बिना किसी निष्कर्ष व सार्थक कारण के चुपचाप समाप्त कर दिया गया उससे न सिर्फ जनता को निराशा हाथ लगी | सरकार शीघ्र झुकने वाली नहीं है क्यूंकि नेतालोग स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त हैं | आपतो जानते हैं कि कैसे अग्निवेश जैसा गद्दार अन्नाजी के आंदोलन में सरकार का इन्फोर्मर बना हुआ था | ऐसे और भी लोग आंदोलन को प्रभावित करने और सलाह देने के लिए अवश्य आंदोलन में घुसे हुये हैं | अरविन्द का स्वास्थ्य गिर रहा था और वोह मधुमेह के कारण कोमा में जा सकता था तो सामूहिक रूप से तात्कालिक निर्णय ले लिया गया हो सकता है | समस्या के समाधान का राजनितिक विकल्प तो पहले से रहा होगा | समर्थको को इतने बढ़े राष्ट्रीय मुद्दे पर राय देने के लिये मात्र दो दिन जचते नहीं हैं । हाँ आपका यह अवलोकन पूरन्तया सही है कि तात्कालिक निर्णय अपरिपक्व था | अन्ना का आंदोलन दिशाहीन तो कदापि नहीं अपितु गुमराह हो गया था | राजनीति में उतरने के जगह अगर महात्मा गाँधी कि तरह असहयोग आंदोलन का रास्ता अपनाते तो जनता अन्ना सा विश्वास प्राप्त कर लेते । आपकी दूरदर्शिता का मैं कायल हूँ कि जनसमर्थन का सैलाब भी अब सिमट सा चुका है और टीम अन्ना के लिए 2014 तक पूरे देश में राजनितिक संगठन खड़ा करना असम्भव नहीं तो कठिन चुनौती अवश्य है । केवल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर स्थापित राजनितिक दलों और राजनीति के मंझे हुये खिलाडियों/प्रत्याशियों को का मुकाबला अत्यंत कठिन है | राजगद्दी, सरकारी तंत्र और पैसे कि ताक़त होते हुए टीम अन्ना के नौसिखिये खिलाडी कैसे पुराने और मंझे हूए भ्रष्ट और अपराधी नेताओं के दांत कैसे खट्टे कर सकते हैं | अज्ज्दी खून मांगती है | देश, जाती, धर्मं त्याग मांगते हैं | लाला लाजपतराय के बलिदान का बदला टीम भगत सिंह ने अंग्रेजी सांड सान्द्रस को मारकर भलीभांति ले लिया था | इन भ्रष्टाचारियों, चालबाजों और गद्दारों का क्या इलाज है जो वोटों के लिये धरती के लालों धरतीमाँ छीन लेते है और अपने ही देश में खुलकर वोटों के लिये बांग्लादेशियों को बसाते हैं और और उनको हथियार और ट्रेनिंग दिलवा कर अपने ही नागरिको पर हमले करवाते हैं | यह ठीक है कि चंद सीटों से न तो लोकपाल आने वाला है और न भ्रष्टाचार ही समाप्त होगा। क्या आप जानते हैं कि शीला दीक्षित कि बेटी का निकाह शाही इम्माम बुखारी के भाई से हुआ हुआ है | जयप्रकाश जैसा कद्दावर और दूरदर्शी नेता हमारे पास नहीं है पर अन्नाजी से हमें बहुत उमीदे हैं | आप जैसे युवा भी सो नहीं रहे हैं और आनेवाली नस्लों से भी हमें बहुत उम्मीदे हैं |

के द्वारा:

क्या केजरीवाल और टीम को यह आशा थी कि वे दस दिनों में ही वह हासिल कर लेंगे जिसके लिए उन्होने बलिदान के नारे के साथ आन्दोलन के इस चरण का श्रीगणेश किया था.? इतना तो देश का आम से आम आदमी भी जानता था कि सरकार इतना शीघ्र झुकने वाली नहीं है, क्या पिछले कई दौर का अनुभव लिए टीम अन्ना को यह बात नहीं पता थी? जो भी ये बड़े बड़े प्रश्न चिन्ह लगे वासुदेव जी कोई अभी सफाई देने वाला नहीं लोग आंकते रहे जांचते रहे कुछ को पहले ही भ्रम था सरकार इनकी ये मंशा पहले से चिल्ला रही थी और इस बार इनको किनारे फेंक दिया था लोग मजाक उड़ा रहे थे ..मत बिभिन्नता तो हुयी ..अब राज क्या है अन्दर की बात क्या है क्या ले ये सामने आते हैं क्या सफाई देते हैं ये देखना है आन्दोलन/नीति में जान है लोग जुड़े हैं नब्ज पकड आ जाए तो दवा हो भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

इस लेख को पढ़कर एक कहानी याद आ गयी ,एक कुत्ता था,धीरे -धीरे कराह रहा था ,एक आदमी ने उससे पुछा क्यों रो रहे हो ,कुत्ते ने कहा की मैं जहाँ बैठा हूँ ,वहां कटे हुए पेड़ का कुछ हिस्सा है जो गढ़ रहा है .तो उस आदमी ने कहा की वहां से उठ कर कहीं और क्यों नहीं बैठ जाते ,कुत्ते ने कहा की गढ़ रहा है लेकिन उतना नहीं की बर्दाश्त न हो सके .वैसे ही हम हिन्दुस्तानी ,भ्रस्टाचार गढ़ रहा है लेकिन उतना नहीं की बर्दाश्त न हो सके.एक व्यक्ति ७५ साल का भ्रस्टाचार से लड़ने के लिए उठा, साथ में कुछ युवा चेहरे उसका साथ देने के लिए उठे तो आप लोग लगे खोजने की कैसे टांग खिंची जाय.एक बात मुझे जरूर बताइयेगा अरविन्द केजरीवाल या टीम अन्ना के लोग क्या इतना बुरा कर रहें हैं जितना ऐ राजा ,सुरेश कलमाड़ी ,चिदम्बरम और बाकी के कांग्रेस के मंत्रियों ने किया ,क्या रोबेर्ट वढेरा की असलियत और कारनामे आपको पता है ,अगर नहीं तो सियासत की पूरी जानकारी लीजिये .मैं टीम अन्ना का सदस्य नहीं ना ही कोई बहुत बड़ा प्रसंसक ,लेकिन अगर ऐसे लोगों ने पहल की है तो उनका साथ दीजिये .क्यों की अब बहुत अच्छा ढूडने से बेहतर है की कम बुरे की तलाश हो .

के द्वारा:

यह तो भविष्य ही बताएगा की अन्ना ने पार्टी बनाकर अच्छा किए या भूल की, मगर अब जब अन्ना टीम ने यह निर्णय ले ही लिया है तो उन्हें अपनी कमियों ,  वर्तमान राजनीतिक परिवेश और आम भारतीय की मनोदशा देखते  हुए निम्न बातों पर ध्यान  देना चाहिए. १. अन्ना टीम को राजनीती की शुरुआत ग्राम पंचायत स्तर से करना चाहिए. ग्राम पंचायतों और मनरेगा  जैसी परियोजनाओं  में  जितना भ्रष्टाचार व्याप्त  है, वह किसी से छिपा नहीं है. यदि अन्ना की टीम एक एक करके ग्राम पंचायतों पर कब्जा करती गयी और उस स्तर पर सचमुच भ्रष्टाचार  हटा  सकी तो न केवल आगे की राजनीती के लिए उन्हें ताज़ी हवा  मिलेगी बल्कि लोग देखेंगे  की ये दल  जो कहता  है, करता भी वही है. २. ग्राम / नगर के  स्तर के  बाद उन्हें उन प्रदेशो की राजनीती लक्ष्य करनी होगी  जो अति पिछड़े हों और जहाँ के नेता भ्रष्टतम हों. ऐसे एक भी प्रदेश में यदि अन्ना सत्ता पर कब्ज़ा करके अपनी कथनी को करनी में बदल सके तो केंद्र पर अन्ना दल का दबाव अपने आप बढ़ जायेगा और वे बहुत सी अच्छी बातें  केन्द्रीय सरकार से केवल बन्दर घुड़की देकर मनवा लेंगे. ३. यदि अन्ना दल के लोग  कभी संसद में आये तो उन्हें न केवल सशक्त लोकपाल के लिए जूझना पड़ेगा वरना  संविधान  में व्यापक संशोधन करके हर तरह के आरक्षण को केवल आर्थिक आधार पर देने, राष्ट्रपति के कार्यकाल को सात साल करने और किसी को केवल एक ही बार राष्ट्रपति बन सकने जैसे गंभीर  मुद्दों पर भी करो या मरो की नीति अपना कर संघर्ष करना पड़ेगा. अन्ना दल को शुभकामनाएं !! डा ० उत्सव कुमार चतुर्वेदी , क्लीवलैंड, अमेरिका

के द्वारा:

वासुदेव जी नमस्कार,    औरों के बारे में तो नहीं जानता किन्तु अन्ना जी,अरविन्द केजरीवाल एवं किरन बेदी के बारे में संदेह  करने का कोई औचित्य नहीं जान पड़ता। सभी टीमों में हर तरह के लोग होते हैं लेकिन देखना यह है कि  उनका नेतृत्व कैसा है। जिस सिस्टम में एक क्लर्क के यहां भी करोड़ों का काला धन मिलता हो उसी सिस्टम  में आयकर आयुक्त जैसे पद को त्याग कर धरना,प्रदर्शन,अनशन करने वाले पर संदेह करना ,आलोचना करना देश व समाज के लिये सोचने वालों को हतोत्साहित करना ही है।   आन्दोलन जनजागरुकता के उद्देश्य में पूरी तरह सफल रहा है और यदि ये लोग  सच में राजनैतिक विकल्प देने में सफल हो गये तो बाकी काम जनता वोट डाल कर पूरा कर देगी।प्रचारशैली,कौन आगे अनशन पर बैठा कौन बाद में ये बहुत छोटी बातें हैं।   इस आन्दोलन का एक मात्र उद्देश्य राजनीति में उतरना था यह एकदम अतार्किक निष्कर्ष है क्योंकि अरविन्द केजरीवाल जी ने यह कह दिया है कि अभी भी एक वर्ष से अधिक समय है,यदि सरकार  जनलोकपाल,राइट टू रिजेक्ट,राइट टू रिकाल विधेयक पास कर दे तो वह चुनाव में नहीं उतरेंगे।

के द्वारा: Ajay Singh Ajay Singh

भरोदिया जी, नमस्कार! जहाँ तक नास्तिकता का प्रश्न है मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं है.. मुझे नहीं लगता कि यदि कोई ईश्वर के अस्तित्व को नहीं स्वीकारता तो इससे कोई आपत्ति होनी चाहिए.! किन्तु मैं ईश्वर मे विश्वास करता हूँ और यह दृढ़तापूर्वक कह सकता हूँ कि मैंने जितने भी नास्तिक देखे उनमे से अधिकांश ने अपने मस्तिष्क को बंद कर रखा होता है यद्यपि उन्हें लगता है कि वे बहुत ही वैज्ञानिक और आधुनिक सोच वाले हैं.! वस्तुतः अधिकांश विज्ञानं के विषय में कुछ नहीं जानते। इस विषय पर मैं अधिकतम तार्किक स्टीफन हाकिन्स को मानता हूँ और उनकी एक प्रशिद्ध पुस्तक मैं इस समय पढ़ रहा हूँ किन्तु अधिकांश नास्तिकों का ज्ञान तो उसका भी 100वां हिस्सा नहीं होता है। यह एक ऐसा विषय है जिसमें आप 360 डिग्री अपने मस्तिष्क की सीमाओं को खोल दें जैसा कि मुझे आइन्सटाइन के विषय मे लगता है। समस्या लोगों के साथ तब उत्पन्न होती है जब हिन्दू धर्म की ब्रम्होंमुखी प्रक्रिया के प्रारम्भिक चरण को अब्राहमिक मतों के परमज्ञान/परमलक्ष्य के साथ घालमेल करके प्रस्तुत कर जाता है। ऐसा करने वालों का अज्ञान भी होता है और द्वेष भी.! आप उन्हें हिन्दू धर्म की वह महानता उनके लेखों पर प्रतिक्रियाओं में नहीं समझा सकते जो दर्शन से लेकर क्वांटम फ़िज़िक्स तक के सूत्रों से परिभाषित होती है। हाँ फिर भी उन लोगों को जोकि हिन्दू धर्म को अपमानित करने का काम कर रहे हैं, ऐसा प्रतिउत्तर दिया जाना आवश्यक है जोकि उनके मुंह पर एक करारे तमाचे के रूप में इस तरह बैठे कि दूसरे लोग उसकी छाप दूर से ही देख लें और वे अन्य बहुत ज्ञान न रखने वाले आम लोग उनकी बाचाली से पथभ्रमित न हों.!! मैंने अपनी स्कूली पढ़ाई घर पर ही की है अतः स्कूल से घर से आने के बाद खेलने कूदने व कोचिंग वगैरह के बाद भी बहुत समय बचता था.... तब भारतीय धर्मग्रन्थों के अध्ययन का खूब अवसर मिलता था। हिन्दुत्व के आलोचकों से भी मैं तभी से परिचित हूँ क्योंकि कई बड़े हिन्दू धर्म के आलोचकों की पुस्तके लाकर पढ़ता था। भारत मे हिन्दू धर्म को तो आप गाली भी लिखकर छाप सकते हैं। तब हिन्दू धर्म पर मैंने काफी कुछ लिखा। किन्तु बचपन का लिखा बहुत सुरक्षित नहीं रहा। ग्रेजुएशन के लिए घर से बाहर निकलते ही वह क्रम टूट सा गया... अतः जो लेख जागरण ब्लॉग पर हैं वही सुरक्षित हैं... शेष या तो प्रकाशकों तक पहुँच गए अथवा पुरानी स्कूल की कापियों के पीछे लिखे ही कभी कभार घर मे सफाई के समय निकलते हैं..!! तथापि आपके किसी भी प्रयास मे मैं पूर्णतयः आपके साथ हूँ। आप मुझे लिंक भेज दिया करिए मैं उनके संक्रमण का इलाज करता रहूँगा जहां तक मुझसे संभव होगा..!! व्यस्तता कुछ बाधाएँ बढ़ाती है... प्रॉफेश्नल लेखक और निःशुल्क लेखक के बींच का द्वंद है..!! :) :)

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आदरणीय भरोदिया जी, जवाहर जी व दिनेश जी आपने कहा इस बार अन्ना ने नया हथियार उठाया है. लेख के केंद्र मे यही प्रश्न है कि राजनीति का नया हथियार अन्ना ने उठाया है अथवा ये हथियार वो बंदूक है जिसे अन्ना के कंधे पर रखकर चलाने प्रयास किया जा रहा है..? बारीक विश्लेषण से तो उत्तर नकारात्मक ही अधिक लगता है क्योंकि जैसा कि मैंने लेख मे कहा है कि अन्ना जैसा विश्वास टीम मेंबरों पर नहीं किया जा सकता क्योंकि उनके पास अपना ऐसा कुछ भी रेकॉर्ड नहीं है। टीम में भूषण जैसे बड़े लोगों के अधिवक्ता भी हैं जो अभी तक अफजल की वकालत करते आये हैं और कश्मीर को भारत का अंग मानने में जिन्हें आपत्ति रही है.., अथवा संदीप पाण्डेय जैसे लोग जो भारतीय सेना के विरुद्ध और अफजल गुरु की फांसी माफी के लिए अभियान चला रहे हैं.! संजय सिंह को भ्रष्टाचार के विरुद्ध सजे मंच से गुजरात दंगों की याद आती है और उन्हें मोदी को आदमखोर कहना पड़ता है ताकि सेकुलरिस्म सुरक्षित रहे। केजरीवाल को, जैसा कि मैंने लिखा, बुखारी के खिलाफ आपराधिक मुकदमों को भूलकर उसके पास जाना पड़ता है और उन्हें नक्सली समर्थक स्वीकार हैं किन्तु भाजपाई संघी नहीं (इस हिसाब से देश की आधी से भी अधिक जनता तो उनके लिए खारिज ही हो गई)..!! टीम मे सबके अपने-अपने मतभेद व अलग-अलग राग हैं.! किन्तु इस सब को जनता ने किनारे कर दिया क्योंकि मुद्दा भ्रष्टाचार का था और कोई क्या सोचता है अर्थ नहीं रखता। किन्तु राजनीति में तो ऐसा नहीं होने वाला..!! पार्टी तभी चल सकती है जब उसकी अपनी एक विचारधारा हो, एक एजेंडा हो और अपना एक ढांचा और संगठन हो.! ऐसे मे टीम अन्ना कहाँ और कैसे खड़ी होगी? अन्ना और किरण बेदी को छोड़कर और कौन टीम मे ऐसा है जिसपर जनता विश्वास करे.? और ये दोनों भी राजनीति आने को तैयार नहीं.! अतः जिस संकल्प का न आधार हो न लक्ष्य उसके साथ देश कितना चल सकता है... मेरा व्यक्तिगत मानना है, जैसाकि मैंने लेख मे लिखा, कि बेहतर यही होगा कि टीम अन्ना भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनजागृति को लक्ष्य कर के जमीन पर काम करे क्योंकि आज अभियान जमीन पर ही कमजोर हो चला है|

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आदरणीय वासुदेव भाई, नमस्कार! बहुत हद तक मैं भरोदिया साहब के विचारों से सहमत हूँ! जनता उधेड़ बुन में है, टीम अन्ना भी अपरिपक्कव है, बाबा रामदेव की अपनी महत्वकांक्षाएं हैं. भाजपा भी पूर्ण रूपेण संगठित नहीं है. विकल्प नजर नहीं आ रहा है. जनता चमत्कार चाहती है और सरकार की चमड़ी मोटी हो चुकी है. मीडिया भी इस बार बंटा हुआ नजर आया .... बहुत सारे अनशनकारी विभिन्न मुद्दों पर अपनी जान तक गँवा चुके हैं. रास्ता क्या है? सभी राजनीतिक दल अपने अपने स्वार्थ में उलझे हुए हैं ... देख लीजिये टीम अन्ना को भी और बाबा रामदेव को भी ...... एक बात तो साफ़ है जबतक राजनीति में अच्छे लोग नहीं आएंगे स्वार्थी तत्व अपनी रोटी सेंकते रहेंगे. आपके विश्लेषण से सहमति रखते हुए परिवर्तन की आशा रखता हूँ!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

एक भैंसा है वासुदेवभाई, जो अपने घास के साथ साथ दुसरे का घास भी खा जाता है, और तगडा हो गया है । बलवान हो गया है । दूसरे को पागलों की तरह परेशान करता है । उसे काबू करना जरूरी था । अन्ना कुछ हथियार ले के आ गये । अनशन का हथियार पहले उठाया । लोगों को पसंद भी आया और ताली भी बजाई । लेकिन भैंसा काबूमें नही आया । उल्टा अपने सिंग, दांत को ओर मजबूत और तिक्ष्ण बनाने में लग गया, अपनी चमडी भी मोटी कर ली ताकी अनशनकी लाठी असर ना करे । अनशन का हथियार बूठा बेअसर हो गया लोगोंने तालिया बजाना भी छोडा । अन्ना क्या करते उठाया दुसरा हथियार राजनीति का । भैंसे को नंदी या सांढ ही हरा पाएगा । ईस हथियार की मेरे जैसे कुछ ही लोकों को शंका थी की ये हथियार होगा, बाकी को कल मालुम पडा । कुछ डर गए, कुछ खूश हो गए । हम खूश तो हुए लेकिन उलजन में पड गये । तीन तीन नंदी एक साथ खडे हो गये । मोदी, रामदेव और अन्ना । तिनों को एक साथ करना जरूरी है वरना आपसमें ही एक दुसरे को निपटा देंगे । और भैंसा बडी शान से मुस्कुराता रहेगा । वसुदेवभाई, अच्छे लोग कहां कहांसे गुजरे, क्यों गुजरे, उस का ईतिहास भुगोळ तपासने की जरूरत नही है । कुछ गलत जगह पैर पड गये हो तो उसे नजरांदाज करने में ही भलाई है । ईन लोगों से अच्छे आदमी आप कहां से लाओगे । जो है यही है । उन्हें ही सपोर्ट करना है । वो सब एक हो जाय ऐसे उपाय सुजाना है । राजकारण मे आदर्श्वाद कोइ काम का नही है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

प्रिय त्रिपाठी जी ! सुलगते प्रश्न को उठाने हेतु ........साधुवाद ! बंगलादेशी घुसपैठियों को नज़र अंदाज़ करने के गंभीर परिणाम भुगतने होंगें ! दरअसल यह समस्या पिछले दशक से सर उठाये खड़ी है लेकिन हमारा नेतृत्व कानों में तेल डाले कुम्भकर्णी नींद सो रहा है ! साथ ही यह कहना अतिशयोक्ति न होगी की वो मुस्लिम वोटों को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता ! अगर यही स्थिति रही तो एक दिन असम के हालात भी कश्मीर जैसे ही होंगे इसमें कोई दो मत नहीं ! अमरनाथ यात्रा के दौरान मैंने देखा श्रीनगर से बालटाल तक पूरे यात्रा मार्ग में कई जगह दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था GO BACK INDIAN DOGS वहां के लोग हिन्दू तीर्थयात्री को पसंद नहीं करते ! तीर्थयात्री को तिरिस्कार भरी नज़र से देखते हैं वहां ! सच तो यह है की वहां तैनात B S F की वजह से ही यात्रा संभव है वर्ना अमरनाथ यात्रा एक स्वप्न बनकर रह जाती ! यही स्तिथि कल असम में भी न हो जरूरत है जन-जागरण की ! देश की एकता-अखंडता पहली शर्त है ! इस सोये हुए समाज को जगाना है ! उस साहस उस सामर्थ को जागृत करना है जो इस समाज है ! याद रहे सत्ताओं से राष्ट्र अधिक महत्व पूर्ण है ! राजनैतिक सत्ताओं के हितों से रास्ट्रीय हित अधिक महत्वपूर्ण है ! और इतिहास साक्षी है सत्ता और स्वार्थ की राजनीति ने इस देश का बहुत अहित किया है ! अतः ज़रूरत है देश के नाकारा नेतृत्व को राष्ट्र के प्रति उसका कर्त्तव्य बोध कराने की !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

वासुदेव जी आपने हमेशा की तरह अपने ब्लॉग में तथ्य रखे.. सच्चे और कडुवे ... ये हर किसी को सोचना होगा ये हो क्या रहा है ..आजकल पूरी दुनिया में इस बात पर बहस चल रही है... हर देश मुस्लिम आततायिओं से जल रहा है.... जिस तरह से आपने बताया कि मुस्लिमों ने विभिन्न जगहों में किस तरह से असाधारण रूप से वृद्धि कि है... ऐसे तो कोई खतरनाक वायरस ही वृद्धि करता है.. क्या आपको लगता नहीं कुछ ऐसा ही है ... मुस्लिम पक्षकार कहते हैं की इस्लाम शांति की बात करता है ... मगर इतिहास के और वर्तमान के तथ्य साथ नहीं देते हैं... लोग आपने घरों में सो रहे हैं ..उन्हें कुछ अहसास नहीं ..बस भेड़ की मानिंद... ये निकम्मापन लोगों को भारी पड़ेगा.. कम से कम आने वाली पीढ़ियों इस निकम्मेपन का फल भोगने वाली हैं.... गोधरा की घटना ..राजस्थान के भरतपुर की घटना, मथुरा की घटना .. .. बंगाल में हावड़ा की घटना ...और अब ये रहा कोकराझार!!!!!! कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं... http://yogeshkumar80.jagranjunction.com/2012/07/26/और-ये-रहा-कोकराझार

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi